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कोच्चि बाइएनेल: जड़ों से जुडऩे का एहसास

कोच्चि-मुजिरिस बाइएनेल में कुछ अनोखी कलाकृतियां पर कुछ कमियां भी खटकीं.

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aajtak.in
चार्मी हरिकृष्णननई दिल्ली, 23 December 2014
कोच्चि बाइएनेल: जड़ों से जुडऩे का एहसास

सागर की अनोखी बात क्या हो सकती है? आप कोच्चि के नीले-हरे सागर को आंखों के आगे बेजान पसरा देखते हैं. रोशनियों से सजी नावें सरसरी तरंग की तरह सतह पर तैरती-उतराती हैं. नजदीक ही बसे व्यपिन टापू के बाशिंदे कारों और मोटरबाइकों के साथ इस तरह आर-पार जाते हैं मानो यह रोजमर्रा का काम हो. नमक आपकी त्वचा पर जम गया है. हल्की दुर्गंध ने आपको जकड़ लिया है.

सागर से मुंह फेरकर आप एक कमरे में कदम रखते हैं-और आपका सामना सागर की आदिम ताकत से होता है. यह है अनीश कपूर की कला ‘‘डिसेंशन्य-कोच्चि-मुजिरिस बाइएनेल (केएमबी) के दूसरे आयोजन में उनका सबसे मौलिक, अनोखा काम.

पानी का भंवर तेज रफ्तार से गोल-गोल घूमता गहरे धरती में समा रहा है. गोल चक्करों में पानी लसलसा और धुंधला हो जाता है. भारतीय मूल के ब्रिटिश कलाकार कपूर पानी की फितरत ही बदल देते हैं. वे कहते हैं, ‘‘यहां पानी प्लास्टिक की तरह है. पानी एक वस्तु में बदल जाता है. यही मैं चाहता हूं-उसका रूप बदलना.’’

कपूर की कलाकृतियां फोर्ट कोच्चि में (जो बाइएनेल के आठ आयोजन स्थलों में सबसे बड़ा है) एस्पिनवॉल हाउस के एक कोने के कमरे में हैं. इसके दरवाजे जमीन के जिस टुकड़े पर खुलते हैं, वह मानो घाट की तरह समंदर में निकलता है. वे कहते हैं, ‘‘मैंने बहुत सोच-समझकर यह कमरा चुना.’’ इसीलिए उनका काम लगातार समुद्र से संवाद करता है, समुद्र से रू-ब-रू है. 

क्या उनके काम में कोई राजनैतिक मायने भी छिपे हैं? भंवर के मुहाने पर होते हुए भी आप अब तक यह नहीं जानते. 60 वर्षीय कपूर ने चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी के खिलाफ जबान खोलने की जुर्रत की थी और उनके प्रधानमंत्री बनने पर ‘‘तीव्र चिंता’’ जाहिर करते हुए एक पत्र पर दस्तखत किए थे. वे कहते हैं, ‘‘इसमें तमाम किस्म के मायने हैं और उन सभी में मेरी दिलचस्पी है.’’

2014 बाइएनेल को कलाकार जितिश कल्लत ने क्यूरेट किया है और इसकी जड़ें कोच्चि के इतिहास और भूगोल में रोपी गई हैं. कलाकृतियों का ऐसा दूसरा संग्रह मिलना मुश्किल है, जो एक इलाके की गीली मिट्टी और पानी में रचा-बसा हो, जो वहां के गिरजाघरों के लोबान की खुशबू से महकता हो, जिसमें उसके संग्रहालयों की सीलन कैद हो, जिसने सदियों पहले इसके किनारे आ लगे जहाजों के मस्तूलों से अपने को बांध लिया हो. क्या यह बाइएनेल मुमकिन की हदों को पार करता है? क्या यह देश में समकालीन कला की सबसे अच्छी प्रदर्शनी होने के दावे पर खरा उतरता है?

इसमें 94 कलाकारों का काम प्रदर्शित हैः 42 भारतीय और 54 विदेशी कलाकार. इसमें कुछ अनोखी कलाकृतियां हैं, तो कुछ औसत दर्जे की हैं. कुछ ऐसी भी हैं जिनका न होना ही बेहतर होता. मसलन, योको ओनो पोस्टकार्डों का संग्रह इस बाइएनेल में आखिर क्यों है?

कल्लत कहते हैं, ‘‘मैं चाहता हूं यह बाइएनेल जहाज के डेक की तरह हो, जहां से आप कोच्चि और दुनिया का नजारा ले सकें.’’ उन्होंने यकीनन कुछ शानदार कलाकृतियां जुटाई हैं. कपूर के ऊपर की मंजिल पर मशहूर चीनी कलाकार शू बिंग का चमकदार कैनवस है. यह एक त्रिफलक है, जिस पर आप लैंडस्केप के सबसे नाजुक रंग देखते हैं. ‘‘बैकग्राउंड स्टोरीः एंडलेस शीशेन माउंटेन सीनरी’’ में वे 14वीं सदी के कलाकार शू बेन की एक पेंटिंग की याद दिलाते हैं.
शू बिंग की शैडो पेटिंग बैकग्राउंड स्टोरी: शिशन माउंटेन सीनरी
(शू बिंग की शैडो पेटिंग बैकग्राउंड स्टोरी: शिशन माउंटेन सीनरी)

बेन मिंग सम्राट होंग्वू की कैद में मारे गए थे, जब राजा कोच्चि की समुद्री यात्रा के लिए जहाजी बेड़े के निर्माण की योजना बना रहा था. शू बिंग 1989 में थ्येन आन मन चौक आंदोलन के बाद अमेरिका चले गए थे और 2008 में बीजिंग लौटे. यहां उन्होंने अतीत और उसके मलबे को कैनवस पर उतारा है.

फलक के पीछे आप टहनियां, पुराने मलयाली अखबार और सूखी पत्तियां देखते हैं. चमकीले फलक पर ऐसे रूपाकार रचते हैं, जिनसे पूरा फलक क्लासिक चीनी पेंटिंग की तरह दिखाई देता है. लेकिन ठीक यहीं शू सवालों से उसकी कायापलट कर देते हैः असल क्या है? कला क्या है? कला मलबा है या उसकी छाया?

कोच्चि अजीब जगह है. जब आप शहर से पुल पार करते हुए फोर्ट कोच्चि की तरफ जाते हैं, तो आपको सीपीएम के एक पोस्टर में स्तालिन झांकते नजर आते हैं. कुछेक दूर लेनिन नमूदार होते हैं. केरल कम्युनिस्ट पार्टी के लाल झंडों की लड़ी और क्रिसमस के लिए बांधे गए लाल तारों का गुच्छा दोनों के अनूठे सह-अस्तित्व के बारे में बताता है.

बाइएनेल में भी दोनों की गूंज सुनाई देती है. 2008 में अपनी फिल्म बायोस्कोप के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में स्पेशल ज्यूरी अवार्ड जीतने वाले के.एम. मधुसुदनन के पास साम्यवाद की मौत पर बनाई गई 94 चारकोल पेंटिंग का अद्भुत संग्रह है. लाल घटते-घटते धूसर हो गया है. लेनिन के कपाल से अस्थिपंजर निकलते हैं.
याको ओनो के पोस्टकार्ड अर्थ पीस की प्रतिलिपियांबाइएनेल की एक और शानदार प्रस्तुति मिठु सेन का वीडियो इंस्टॉलेशन है-‘‘आइ हैव ओनली वन लैंग्वेज; इट इज नॉट माइन’’ (मेरी बस एक भाषा है; यह मेरी नहीं है). कोच्चि में बेसहारा बच्चियों के एक अनाथालय में शूट किए गए वीडियो की लाल आकृतियां उम्मीद के कई स्तर रचती हैं. सेन बताती हैं कि उनका इरादा बच्चों को विषय बनाने का कतई नहीं था. वे कहती हैं, ‘‘मैं उनकी सहजता को कैमरे में कैद करना चाहती थी. कभी मैंने बातचीत शूट की, कभी उन्होंने.’’

दयानीता सिंह की केरल की छवियों की भूलभुलैया को भी गौर से देखिए. इसी तरह दरबार हॉल में प्रदर्शित गुलाम मोहम्मद शेख के ‘‘गांधी और गामा’’ के शानदार रंग भी देखने लायक हैं.

बाइएनेल के सह-संस्थापक रियास कोमू बताते हैं कि अभी तक तो पैसा थोड़ा-थोड़ा ही आ रहा है. वे कहते हैं, ‘‘बजट 26 करोड़ रु. है. राज्य सरकार ने 63 फीसदी देने का वादा किया था, लेकिन अब तक हमें केवल 2 करोड़ रु. मिले हैं. लोगों के चंदे से किसी तरह काम चल रहा है.’’

प्रायोजक के तौर पर बीएमडब्ल्यू और डीएलएफ साथ आए हैं. लेकिन टेट मॉडर्न, लंदन के डायरेक्टर क्रिस डर्कोन कहते हैं, ‘‘बीएमडब्ल्यू या कुछ लोग, पैसे या अन्य तरीकों से, बाइएनेल की मदद कर रहे हैं, इससे सरकार की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती.  सरकार की ओर से सार्वजनिक योगदान बहुत अहम है. अगर हम कल के भारत में निवेश करना चाहते हैं तो हमें दीर्घकालिक और टिकाऊ बाइएनेल की दरकार है.’’

लेखक और कोच्चिकर्ण एन.एस. माधवन भी कहते हैं, ‘‘राज्य की भलाई के लिए सरकार को इसमें निवेश करना चाहिए. जिस तरह स्पेन के बिलबाओ में एक संग्रहालय ने पूरे शहर को आकर्षण का केंद्र बना दिया, उसी तरह बाइएनेल भी सैलानियों और कला-प्रेमियों को खींचकर यहां लाएगा. फिलहाल केबीएम का वित्तीय मॉडल कुछ चंदों और खुद कलाकारों के आर्थिक और कलाकृतियों के योगदान पर टिका है. यह इतना कमजोर है कि बाइनाले के टिकाऊ होने पर सवालिया निशान लटके हैं.’’

2016 में ऐसी नुक्ताचीनी फिर न होने देः एस्पिनवॉल हाउस की प्रदर्शनी का एक हिस्सा दूसरे दिन भी तैयार नहीं था, कुछ वीडियो नहीं चल रहे थे और जापानी कलाकार रियोतो कुवाकुबो की टॉय ट्रेन अक्सर झटका खाकर रुकजाती थी. टेट मॉडर्न के डर्कोन भले ही चाव से कहें, ‘‘कला कभी तैयार नहीं होती. काम के दौरान कला को देख पाने के लिए हमें नसीब को सराहना चाहिए.’’ आयोजकों को उस छोटी-मोटी ब्यूटीशियन का एहसानमंद होना चाहिए, जो अपनी सहेली के साथ व्यपिन से आई थी और जिसने अपना रविवार और अपनी अंटी से 100 रु. खर्च किए. उसकी खातिर कला को तैयार होना ही चाहिए.

कोच्चि समकालीन भारतीय कला की बेहतरीन पेशकश है. लेकिन क्या यह समकालीन एशियाई कला का केंद्र बन सकता है? जैसा डर्कोन सुझाते हैं, यह शंघाई और सिडनी बाइएनेल के साथ नजदीकी सहयोग स्थापित कर सकता है. कोच्चि का समंदर और भी अद्भुत नजारों का गवाह बन सकता है.

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