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सहिष्णुता की शरण में संघ

आरएसएस के प्रति समाज का नजरिया आपातकाल के बाद बदलना शुरू हुआ, जब जेलों में बंद उसके नेता तमाम सियासी पार्टियों के नेताओं के संपर्क में आए. इनमें मुस्लिम नेता भी शामिल थे, जो उस वक्त जेलों में बंद थे.

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aajtak.in
उदय माहूरकरनई दिल्ली, 24 September 2018
सहिष्णुता की शरण में संघ भागवत आरएसएस को विभाजनकारी शक्ति की बजाए मुख्यधारा को जोडऩे वाली शक्ति के रूप में पेश कर रहे हैं

राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ (आरएसएस) पर अमेरिकी विशेषज्ञ और भगवा आंदोलन पर किताबें लिखने वाले वाल्टर एंडरसन ने दो दशकों से ज्यादा वक्त पहले एक इंटरव्यू में कहा था, ''आरएसएस को समझना बहुत मुश्किल और गलत समझना बहुत आसान है.''

एंडरसन को आज यह बात शायद नहीं कहनी पड़ेगी. खासकर अब जब आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने 19 सितंबर को दिल्ली के विज्ञान भवन में तीन दिनों की व्याख्यानमाला संपन्न कर ली है और जिसमें विदेशी कूटनीतिज्ञों, अदाकारों से लेकर तमाम विधाओं के पेशेवरों, रक्षा विशेषज्ञों और यहां तक कि मुस्लिम नेताओं तक तकरीबन हर वर्ग के लोगों के साथ आरएसएस का विजन साझा किया गया. संस्था के 93 साल के इतिहास में यह अपने किस्म का पहला मेलजोल कार्यक्रम था जिसने इसे शिखर सम्मेलन के शीर्ष पर स्थापित कर दिया.

व्याख्यानमाला का शीर्षक थाः ''भारत का भविष्यः आरएसएस का दृष्टिकोण.'' कुछ महीनों पहले मेलजोल का एक और बड़ा कदम उठाया गया था, जब पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी आरएसएस के बुलावे पर उसके नागपुर मुख्यालय गए थे और वहां उन्होंने आरएसएस के संस्थापक के.बी. हेडगेवार को 'देशभक्त' बताया था. भागवत उसके बाद दो बार मुखर्जी से मिल चुके हैं.

साफ है कि आरएसएस बदल रहा है. तकरीबन ढाई दशक पहले की अपनी हाशिये की स्थिति से हटकर अब यह साफ तौर पर मुख्यधारा में आ रहा है. आरएसएस के सह सर कार्यवाह मनमोहन वैद्य के मुताबिक, आरएसएस के प्रति समाज का नजरिया आपातकाल के बाद बदलना शुरू हुआ, जब जेलों में बंद उसके नेता तमाम सियासी पार्टियों के नेताओं के संपर्क में आए.

इनमें मुस्लिम नेता भी शामिल थे, जो उस वक्त जेलों में बंद थे. इसने आरएसएस के भीतर भी यह इच्छा पैदा की कि बाहर निकलकर लोगों से मिला-जुला जाए और उसी का नतीजा ये तमाम किस्म के जनसंपर्क कार्यक्रम हैं जो बीते सालों के दौरान खास मौकों पर आयोजित किए गए हैं.

मगर, जैसा कि वैद्य ने कहा, सरसंघचालक की तीन दिन की व्याख्यानमाला साफ तौर पर पहले के आयोजनों से हटकर है और मेलजोल की दिशा में एक बड़ा कदम है. ''व्याख्यान के पहले दिन 10 लाख से ज्यादा लोगों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर यह कार्यक्रम देखा और 1.70 लाख लोग इसे सीधे देखने-सुनने आए. 62,000 लोगों ने लाइव प्रोग्राम में हिस्सेदारी की. इसमें शिरकत करने वाले लोग 25 से 35 साल की उम्र के थे.''

साफ तौर पर आरएसएस को लगता है कि आज जब उसका एक स्वयंसेवक देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा है और इसके साथ ही संगठन ज्यादा ताकत की स्थिति में भी है, ऐसे में यही वक्त है जब उसे अपना प्रभाव बढ़ाने की खातिर अपने घेरे से बाहर निकलकर लोगों तक और यहां तक कि अपने विरोधियों तक भी पहुंचना चाहिए. भाजपा के महासचिव राम माधव कहते हैं, ''इसमें कोई शक नहीं कि एक वक्त आरएसएस चुप्पा और कम बोलने वाला संगठन था. मगर बदलते वक्त के साथ बदलने के प्रति यह हमेशा खुला रहा है.'' माधव ने ही आरएसएस में काम के अपने समय के दौरान यह विशेष मेलजोल कार्यक्रम शुरू किया था और 2011 में अलग-अलग देशों के 38 राजदूतों के साथ भागवत की बैठक आयोजित की थी.

आरएसएस के कई नेता मानते हैं कि अपनी तरफ से आगे बढ़कर पहल करने का यह तरीका आंदोलन को बहुत अच्छा लाभांश दिलाएगा. यह सच भी है. इनके जरिए संगठन विपक्ष के हमलों की धार भोथरी कर रहा है. यह पहले से बहुत अलग है जब उसके कछुए सरीखे तौर-तरीकों को गलत समझा जाता था और उसे अक्सर रहस्यमय संगठन के तौर पर देखा जाता था.

भागवत ने इस मौके का इस्तेमाल खालिस मेलजोल के मकसद के लिए किया. उन्होंने कहा कि आरएसएस का काम लोगों को ऊंचे मूल्यों और चरित्र से ओतप्रोत करके राष्ट्र का निर्माण करना है. उन्होंने यहां तक कहा कि आरएसएस किसी एक पार्टी से जुड़ा नहीं है क्योंकि किसी भी पार्टी के अच्छे लोग आरएसएस को स्वीकार्य हैं. भाजपा के 'कांग्रेस मुक्त भारत' को कम अहमियत देते हुए उन्होंने कहा कि हम 'युक्त भारत' (समावेशी भारत) के हक में हैं, न कि मुक्त भारत के हक में.

जमीनी हालत अलबत्ता अलग है. अतीत में ऐसे मौके जरूर रहे हैं जब आरएसएस या उसके नेताओं ने खास जन मुद्दों पर कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया था. 1982 में जब 200 दलितों ने धर्म बदलकर इस्लाम अपनाया था और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी इसे लेकर बराबर से विचलित थीं, तब दोनों के बीच अस्थायी गठबंधन हुआ था. इसी के नतीजतन हिंदू संगठन ने विराट हिंदू परिषद का आयोजन किया था जिसमें कांग्रेस नेता डॉ. कर्ण सिंह इसके अध्यक्ष और विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल सचिव बने थे.

1984 में जब भाजपा ने गांधीवादी समाजवाद का दामन थामा, तब आरोप लगाया जाता है कि आरएसएस ने कांग्रेस का समर्थन किया था. अलबत्ता इस किस्म के उदाहरण उंगलियों की पोरों पर गिनने लायक हैं. हकीकत यह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में आरएसएस के स्वयंसेवकों ने देश भर में खुलेआम भाजपा के लिए काम किया था.

भागवत का मुस्लिमों तक पहुंचना भी अहम था. उन्होंने बताया कि वे हरेक देशवासी को, फिर चाहे उसका धर्म कोई भी क्यों न हो, हिंदू मानते हैं. उन्होंने कहा कि अगर मुसलमान खुद को हिंदू की बजाए भारतीय कहना पसंद करते हैं तो इसमें भी आरएसएस को कोई परेशानी नहीं है.

उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का उदाहरण दिया, जिसने मुस्लिम समुदाय का पहला डॉक्टर बनने पर उनका अभिनंदन कर रहे आर्य समाज के एक जमावड़े से कहा था कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं जबकि वे भी तो एक हिंदू ही हैं. भारतीय संविधान पर आरएसएस के रुख को लेकर छाए संदेहों को भी उन्होंने दूर किया और कहा कि संविधान आरएसएस के लिए परमपावन है जिसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता. कुल मिलाकर यह व्याख्यानमाला दुनिया के बारे में आरएसएस के नजरिए को बदलने में भारी और दूरगामी महत्व की साबित हुई.

भागवत ने आरएसएस की धर्म की बजाए राष्ट्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और कहा कि आरएसएस के लिए संविधान पावन है

सम्मानः नई दिल्ली के विज्ञान भवन में भागवत को सुनने के लिए विभिन्न वर्गों के लोग मौजूद थे

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