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अपने भी करने लगे सवाल

महंगाई, उत्पादन में गिरावट और रोजगार सृजन न होने से संघ के संगठनों ने उठाए सरकार पर सवाल

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सुजीत ठाकुरनई दिल्ली, 25 September 2017
अपने भी करने लगे सवाल विक्रम शर्मा

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अध्यक्ष अमित शाह 9 सितंबर को जिस वक्त दिल्ली में फिक्की के कार्यक्रम में अर्थव्यवस्था की घटती विकास दर को तकनीकी मामला बताकर खारिज कर रहे थे, उसी वक्त 11 अशोक रोड स्थित भाजपा मुख्यालय में उनके मातहत, महंगाई को लेकर पार्टी की हो रही आलोचना से बचने का तरीका तलाश रहे थे. उधर शाह, फिक्की के मंच से विकास में आए ठहराव के आंकड़े को नजरअंदाज करने की सलाह दे रहे थे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आर्थिक मुद्दों से जुड़े आधा दर्जन आनुषंगिक संगठन सरकार की आर्थिक नीतियों के खिलाफ रैली निकालने की योजना तैयार करने में लगे थे.

मोदी सरकार आर्थिक मोर्चे पर देश भर की आलोचनाओं की जद में है. इसकी छटपटाहट साफ दिख रही है. वजह साफ है कि मोदी के नेतृत्व में अभी तक अर्थव्यवस्था के चरम पर पहुंचने और जीडीपी विकास दर में चीन को पीछे छोडऩे के दावे किए जा रहे थे. मंत्री और पार्टी के नेता नोटबंदी और जीएसटी के 'फायदे' गिनाते नहीं थकते थे. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जीत को नोटबंदी पर जनता की मुहर बताया गया. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से इसके बताए. लेकिन रिजर्व बैंक ने बैंक में जमा पुराने नोटों की संख्या बताकर मानो हकीकत को उजागर कर दिया. हालांकि इससे पहले ही रिपोर्ट आ गई थी कि इसकी वजह से कितनी नौकरियां चली गईं और व्यापार, खासकर अनौपचारिक क्षेत्र को कितना बड़ा धक्का लगा है.

इससे पहले कि नोटबंदी का असर खत्म होता जीएसटी ने हालात और बिगाड़ दिया. इसका एहसास भाजपा नेताओं को भी हो गया और उनेलिए मानो अचानक स्थिति बदल गई. मंत्रियों के चेहरे मुरझा गए, दावे से परहेज किया जाने लगा और भाजपा को मानना पड़ा कि सियासी लिहाज से स्थिति प्रतिकूल हो रही है. नतीजतन, 25 सितंबर को दिल्ली में होने वाली राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में पार्टी के इतिहास में संभवतः पहली बार सभी सांसदों, विधायकों और यहां तक कि राज्यों की विधान परिषद के सदस्यों को भी चर्चा के लिए बुलाया गया है.

राष्ट्रीय कार्यसमिति में सबसे अधिक फोकस आर्थिक प्रस्ताव पर रहेगा. वित्त मंत्रालय, पेट्रोलियम और कृषि मंत्रालय से आंकड़े मंगाए गए हैं. प्रस्ताव वित्त मंत्री अरुण जेटली की देखरेख में तैयार हो रहा है. इसके बाद भाजपा अध्यक्ष शाह प्रधानमंत्री मोदी से चर्चा कर आर्थिक प्रस्ताव को अंतिम रूप देंगे.

भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति की यह बैठक पहले आंध्र प्रदेश में होने वाली थी. इसी साल मई में भुवनेश्वर (ओडिशा) में इसकी घोषणा औपचारिक रूप से की गई थी. कार्यसमिति के लिए विशाखापत्तनम या विजयवाड़ा का नाम सुझाया गया था. लेकिन, पिछले महीने अचानक तय किया गया कि कार्यसमिति दिल्ली में आयोजित की जाएगी. सूत्रों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां जिस बड़े पैमाने पर देश भर में आलोचना की जद में आई हैं, उसने भाजपा की चिंता बढ़ा दी है. इस साल गुजरात समेत तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं. अगले साल मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे प्रमुख राज्यों के चुनाव हैं. 2019 में लोकसभा चुनाव में भी सिर्फ डेढ़ साल बचे हैं. ऐसे में सिर्फ कार्यसमिति से काम नहीं चलेगा. इस तरह की बैठक में महज तीन- साढ़े तीन सौ पार्टी पदाधिकारी शामिल होते हैं. इसलिए कार्यसमिति के बहाने ही सभी जनप्रतिनिधियों को आर्थिक स्थिति से अवगत कराने की योजना बनी. आनन-फानन आंध्र प्रदेश की जगह दिल्ली में ही राष्ट्रीय कार्यपरिषद बुलाई गई.

पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम, घटता औद्योगिक उत्पादन, जीडीपी की गिरावट, नोटबंदी और जीएसटी की संदिग्ध सफलता पर सवाल हर ओर से उठ रहे हैं. इन सवालों का ठोस उत्तर न तो भाजपा सांसदों के पास है, न विधायकों के पास, न ही विधान परिषद के सदस्यों के पास. ऊपर से मोदी सरकार के मंत्री अपने ऊल-जलूल बयानों से आलोचकों को और मौका उपलब्ध करा रहे हैं. भाजपा मुख्यालय में बैठे महासचिव जब कार्यकर्ताओं को फोन कर सम्मेलन, सेमिनार, परिचर्चा आयोजित करके मोदी सरकार की उपलब्धि बताने का आग्रह करते हैं तो कार्यकर्ताओं की ओर से आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार का बचाव करने के तर्क पूछे जाने लगे हैं. परिचर्चा में जाने वाले पार्टी पदाधिकारी भी महासचिवों से फोन कर कुछ ऐसे तथ्य बताने का आग्रह कर रहे हैं जिस आधार पर अपनी सरकार का बचाव किया जा सके.

आर्थिक मुद्दे पर हो रही छीछालेदर चर्चा में इस कदर जा पहुंचा है कि पार्टी के पदाधिकारी भी एक-दूसरे से इसी मुद्दे पर हास-परिहास तक करने लगे हैं. मिसाल के तौर पर, महंगाई डायन में मारने का टोटका कौन तैयार करेगा? मीडिया में चर्चित होने के लिए कौन मंत्री ऊल-जुलूल बयान देने की कतार में हैं आदि की चर्चा भाजपा पदाधिकारी एक दूसरे से कर रहे हैं.

सोशल मीडिया पर भी आर्थिक मसले पर भाजपा बैकफुट पर दिख रही है. इस प्लेटफॉर्म पर सरकार की हो रही खिंचाई से पार्टी में चिंता है. भाजपा कार्यकर्ता भी सकते में हैं कि सोशल मीडिया हो या टीवी टॉक शो, सार्वजनिक मंच या गली-नुक्कड़, विरोधियों को क्या जबाव दिया जाए. नोटबंदी के दौरान जिस यकीन के साथ ताल ठोक कर विपक्ष को धूल चटा रहे थे अब उसी मुद्दे पर उठने वाले सवाल से बचने की नौबत आ गई है. अनौपचारिक बातचीत में भाजपा के सांसद और विधायक यह खुलकर स्वीकार करते हैं कि क्षेत्र की जनता को आर्थिक मुद्दे पर जवाब देकर संतुष्ट करना कठिन है. यह एक ऐसी कड़वी सचाई है जो मोदी सरकार की छवि को खराब कर रही है. आर्थिक मामले ऐसे हैं जिसका व्यापक असर समाज के हर तबके पर पड़ता है. गृहिणी, व्यापारी, किसान, मजदूर, छात्र और मध्यम वर्ग सभी जगह यह चर्चा है कि महंगाई की रफ्तार बाकी चीजों से कहीं ज्यादा है.   

भाजपा के एक महासचिव का कहना है कि राष्ट्रीय कार्यसमिति में इसलिए सभी सांसदों, विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को बुलाया गया है ताकि वे कार्यक्रम में प्रधानमंत्री के भाषण को सुनें. प्रधानमंत्री पर लोगों का भरोसा बरकरार है. ऐसे में महंगाई रोकने के लिए उनकी ओर से जो भी उपाय बताए जाएंगे, लोग उस पर भरोसा करेंगे. मोदी के भाषण के आलोक में जो आर्थिक प्रस्ताव पास किए जाएंगे, वह एक ऐसा डॉक्यूमेंट होगा जो महंगाई, नोटबंदी, जीएसटी से जुड़े तीखे से तीखे सवालों के उत्तर देने वाले होंगे. पार्टी पदाधिकारी भी आर्थिक प्रस्ताव पर माथापच्ची कर रहे हैं और वे ऐसा बेजा नहीं कर रहे हैं.

मामला गंभीर इसलिए है क्योंकि आर्थिक नीतियों पर विरोधियों से अधिक अपनों—राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषंगिक संगठनों—ने इस कदर मोर्चा खोला है कि भाजपा नेताओं के चेहरों पर हवाइयां उडऩे लगी हैं. संघ के कार्यकर्ताओं के बारे में माना जाता है कि उनका आम लोगों से ज्यादा वास्ता होता है और वे उनकी भावनाओं को बेहतर समझते हैं. इसी वजह से भाजपा में उनकी सलाह को तरजीह दी जाती है.

भाजपा के लिए स्थिति बिल्कुल करेला ऊपर से नीम चढ़ा कहावत जैसी है. इधर, भाजपा के लोग आर्थिक मोर्चे पर हो रही आलोचना से निकलने की जुगत में जुटे हैं तो उधर आरएसएस के आर्थिक प्रकोष्ठ से जुड़े आधा दर्जन संगठनों ने मोदी सरकार पर मजदूर विरोधी होने का आरोप लगाते हुए 17 नवंबर को 5 लाख लोगों की रैली निकालने का ऐलान कर दिया है. इन संगठनों ने बैठक कर आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार के प्रति निराशा जताई है. ऐसी ही रैली दत्तोपंत ठेंगड़ी के नेतृत्व वाले भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने वाजपेयी सरकार (एनडीए-1) के खिलाफ भी निकाली थी. वाजपेयी सरकार ने उस रैली को तवज्जो नहीं दी थी और खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ा था. खास बात यह है कि बीएमएस की 11 से 13 अगस्त के बीच रांची में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की जिस बैठक में मोदी सरकार के खिलाफ 5 लाख लोगों की रैली निकालने का निर्णय हुआ, उस बैठक में संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले भी मौजूद थे. होसबाले भारतीय मजदूर संघ के संरक्षक भी हैं. मतलब इस रैली को लेकर संघ भी सहमत है.

संघ के आर्थिक प्रकोष्ठ से जुड़े सभी आधा दर्जन संगठन भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ, लघु उद्योग भारती, स्वदेशी जागरण मंच, ग्राहक पंचायत और सहकार भारती के बैनर तले दिल्ली के रामलीला मैदान में बड़ी रैली निकालेंगे. रैली की आक्रमकता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसको लेकर बीएमएस कांग्रेस, वामपंथी दलों से जुड़े मजदूर संगठनों को भी रैली में आमंत्रित करने पर विचार कर रहा है. बीएमएस से जुड़े लोगों का कहना है कि जो भी संगठन मजदूर के हितों के लिए काम कर रहे हैं और रैली में शामिल होना चाहते हैं, उनका स्वागत है.

बीएमएस के महासचिव बिरजेश उपाध्याय कहते हैं, ''2014 के चुनाव में मजदूरों ने भी भाजपा को समर्थन दिया था. लगभग 50 करोड़ मजदूरों को उम्मीद थी कि मोदी सरकार पिछले 70 साल से चली आ रही श्रम क्षेत्र की विसंगतियां दूर करेगी. लेकिन मजदूर सरकार की प्राथमिकता में नहीं है, यह साबित हो गया है. हम रैली इसलिए कर रहे हैं क्योंकि मजदूरों की स्थिति अभी तक डिमांड करने वालों की थी लेकिन रैली के जरिए हम सरकार से डिमांड करने की जगह सरकार को कमांड करने वाले बन सकें.''

इन संगठनों से जुड़े लोगों का कहना है कि पिछली मई में जब हमारी मांगों और समस्याओं पर गौर किए बिना भाजपा ने नारा गढऩा शुरू किया कि साथ है, विश्वास है, हो रहा विकास है तो हमने रैली की योजना तैयार की. 50 करोड़ मजदूरों को साथ लिए बिना साथ है... जैसे नारे का कोई मतलब नहीं है. 50 करोड़ मजदूरों में अभी तक 93 फीसदी असंगठित क्षेत्र में हैं. सिर्फ 7 फीसदी संगठित क्षेत्र में हैं. इन 7 फीसदी में भी 67 फीसदी कॉन्ट्रैन्न्ट पर हैं, रेगुलर नहीं हैं. इन संगठनों का कहना है कि कॉन्ट्रैक्ट लेबर रेगुलेशन ऐंड एबोलिशन ऐक्ट 1970 में बना. नियम के मुताबिक, स्थायी प्रकृति का काम कॉन्ट्रैक्ट वाले लोगों को नहीं दिया जा सकता है. लेकिन सरकार खुद ही इसका उल्लंघन कर रही है. साथ ही नियमित प्रकृति वाले काम पर 'समान काम, समान वेतन' का उल्लंघन हो रहा है.

भाजपा इस कार्यसमिति में संघ के आर्थिक प्रकोष्ठ की नाराजगी और आम आदमी की परेशानियों के मद्देनजर निश्चित रूप से अपनी आर्थिक नीतियों पर पुनर्विचार करने को मजबूर होगी.

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