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क्या कायम रह पाएगा राहुल गांधी का यह जलवा?

दो महीने की छुट्टी के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी नए जोश और जज्बे के साथ लौटे हैं, लेकिन उनका यह बदला रूप क्या आगे भी बरकरार रह पाएगा.

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aajtak.in
कौशिक डेका 05 May 2015
क्या कायम रह पाएगा राहुल गांधी का यह जलवा? राहुल ट्रेन में आम लोगों के बीच पंजाब की यात्रा पर

खामोशी शायद बोलने की काबिलियत को और बढ़ा देती है. राहुल गांधी के समर्थकों को शायद यह पहले से पता होगा. लेकिन कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष को विपश्यना का सहारा लेना पड़ा और म्यांमार में दिवंगत सत्यनारायण गोयनका के आध्यात्मिक केंद्र में 56 दिन की छुट्टी में 34 दिन एक शब्द बोले बिना ही बिताने पड़े. बौद्ध धर्म की ध्यान परंपरा में आस्था रखने वाले लोगों की तरह उन्होंने भी वहां खुद को खोजने की कोशिश की. यह उनके और उनकी पार्टी के लिए बहुत उपयोगी नजर आ रहा है.

इस बदलाव से उनके समर्थक और विरोधी दोनों हैरान हैं. 16 अप्रैल को उनकी वापसी के बाद दो हफ्ते से भी कम समय में आधे-अधूरे मन से राजनीति करने वाला यह नेता एकाएक धुआंधार बोलने वाले सांसद और विपक्ष के तेजतर्रार नेता के रूप में तब्दील हो चुका है. वे इस दौरान चार बार लोकसभा और कई बार उससे बाहर बोल चुके हैं. वे अपने घर के बाहर किसानों से मिल चुके हैं, दिल्ली में आयोजित रैली में उन्हें संबोधित कर चुके हैं, किसानों से मिलने के लिए पंजाब जा चुके हैं और खेत, जमीन और श्रम सुधारों पर मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ महाराष्ट्र के विदर्भ से देश भर में पदयात्रा शुरू कर चुके हैं. इस बीच उन्होंने केदारनाथ मंदिर की यात्रा करने का भी समय निकाल लिया. पहाड़ की इस मुश्किल यात्रा में उनके शारीरिक दमखम से ज्यादा और भी बहुत कुछ देखने को मिला.

भविष्य के लिए राहुल गांधी का रोडमैपराहुल अगर लंबी दूरी की राजनैतिक रेस दौड़ रहे हैं तो अचानक ही वे तेजी के साथ पीछे से भागते हुए तेज दौडऩे वाले दूसरे धावकों के बीच पहुंच गए हैं. इस प्रक्रिया में वे किसानों के अधिकारों से लेकर नेट निरपेक्षता तक का रास्ता तय कर चुके हैं और केदारनाथ के दर्शन करके उन्होंने पार्टी के उन हिंदू मतदाताओं का मन दोबारा जीतने का भी सूक्ष्म राजनैतिक संदेश दे दिया है, जो परंपरागत रूप से कांग्रेस के समर्थक हुआ करते थे. उन्होंने सरकार पर निशाना साधने के नए तरीके भी खोज लिए हैं. अब वे राजनैतिक विरोधियों को चतुराई भरा जवाब देने की कला में भी माहिर हो गए हैं. मसलन, 29 अप्रैल को उन्होंने यह कहते हुए मोदी सरकार के महत्वाकांक्षी मेक इन इंडिया अभियान की आलोचना की कि सरकार उन किसानों की अनदेखी कर रही है, जिन्होंने भारत में पसीना बहाकर फसल पैदा की और अभी तो यह शुरुआत है. यह उत्तराधिकारी पिछले लोकसभा चुनाव में करारी हार देखने के बाद पार्टी को दोबारा खड़ा करने की योजना बना चुका है. यह योजना पिछले साल के अंत में दो महीने तक कांग्रेस के 400 से ज्यादा नेताओं से की गई चर्चा का नतीजा है. इस योजना में चार-स्तरीय रणनीति बनाई गई  है—जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करो, उन मुद्दों को उठाओ, जिनसे ज्यादा से ज्यादा लोग जुड़े हों ताकि कांग्रेस के परंपरागत समर्थकों का मन फिर से जीता जा सके, जिन राज्यों में कांग्रेस विपक्ष में हो, वहां की सरकार के खिलाफ मुद्दे उठाकर सड़कों पर लगातार विरोध प्रदर्शन करो, और मुसलमानों के तुष्टिकरण जैसी उन गलतियों को सुधारो, जिनकी वजह से 2014 के चुनाव में पार्टी की दुर्दशा हुई थी.

हालांकि राहुल फरवरी में ही अपनी योजना बना चुके थे, लेकिन उसे कब शुरू किया जाए, इस बात को लेकर निश्चित नहीं थे. उनके कुछ सुधारों को लेकर पुराने नेताओं के कड़े विरोध और सोनिया गांधी के मन में पार्टी के भीतर विद्रोह के शुरुआती भय की वजह से राहुल की योजना अमल में लाने में देरी होती गई. कांग्रेस के एक महासचिव कहते हैं, "राहुल की लंबी छुट्टी ने उनकी मां को पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक करने और राहुल को कमान सौंपने के लिए अनुकूल माहौल बनाने का मौका दिया."

सोनिया ने अचानक जब सामने आकर किसानों का मुद्दा उठाया और भूमि अधिग्रहण कानून का विरोध किया तो निराशा के दौर से गुजर रहे कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उम्मीद की लहर दौड़ गई और उनमें नया जोश पैदा हो गया. उन्होंने अपने बेटे को भी संगठनात्मक बदलाव करने की उनकी योजना टालने के लिए राजी कर लिया और उन्हें भरोसा दिलाया कि पार्टी के बड़े नेता उनके रास्ते में रोड़ा नहीं खड़ा करेंगे. इन कदमों का नतीजाः राहुल अब कुछ युवा नेताओं को उसमें शामिल करने के अलावा अखिल भारतीय कांग्रेस समिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं करेंगे. सिर्फ एक ही बड़ा बदलाव होने की उम्मीद यह है कि सोनिया के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल को 86 वर्षीय मोतीलाल वोरा की जगह पार्टी का कोषाध्यक्ष बनाया जा सकता है. सोनिया ने अपना संदेश स्पष्ट कर दिया हैः राहुल को अपना काम करने दो और वे खुद पुराने बड़े नेताओं का ख्याल रखेंगी. पिछले साल राहुल से मिलने वाले कांग्रेस के कुछ नेताओं ने उन्हें सलाह दी थी कि वे पूरे देश में यात्रा करें और एक राज्य में कम से कम दो दिन गुजारें. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुख्य विपक्षी नेता के रूप में उन्हें जब नए सिरे से उतारा जाने वाला था, तभी भूमि अधिग्रहण कानून और कुछ राज्यों में बेमौसम बरसात की वजह से फसलों की बरबादी का मुद्दा खुद ब खुद उनके हाथ लग गया.

किसानों का बढिय़ा मुद्दा
30 अप्रैल को उन्होंने किसानों, जमीन और श्रम सुधारों पर मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ महाराष्ट्र के विदर्भ से पदयात्रा शुरू कर दी. उनका यह फैसला पूर्व प्रधानमंत्रियों—इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की रणनीति से प्रेरित है, जिनके नेतृत्व में क्रमशः 1977 और 1989 में पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा था. उन दोनों ही नेताओं ने तब जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं से दोबारा जुडऩे के लिए देश की यात्रा की थी.

राहुल के करीबी कांग्रेसी नेताओं का कहना है कि उनका यह नया अवतार अपरिहार्य था क्योंकि राजनीति में कदम रखने के बाद पहली बार वे विपक्ष में हैं. पार्टी के मुंबई इकाई के अध्यक्ष संजय निरुपम कहते हैं, "2004 में जब वे पार्टी में आए, तब से कांग्रेस सत्ता में रही है. इसके बावजूद उन्होंने जब भी कोई कमी देखी तो सरकार की आलोचना की और भट्टा-पारसौल में किसानों और नियामगिरि में आदिवासियों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई. अब वे विपक्ष में हैं और वे अपनी इस नई भूमिका में जमकर लड़ाई करेंगे." राहुल अपने नए रूप में कुछ गिने-चुने सलाहकारों पर निर्भर नहीं हैं. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के एक नेता कहते हैं, "अब वे सबकी बात सुनते हैं, लेकिन फैसला उनका अपना होता है. वे हर क्षेत्र से आए लोगों की बात पर गौर करते हैं, चाहे वह शिक्षा, एनजीओ, राजनीति से जुड़ा कोई भी व्यक्ति हो." इसलिए केदारनाथ की यात्रा करने का सुझाव पिछले साल नवनियुक्त प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की ओर से दिया गया था तो नेट निरपेक्षता का मुद्दा पूर्व सांसद मिलिंद देवड़ा के लिखे अखबार के एक लेख से प्रेरित था. पुराने दिनों के उलट अब वे फैसले लेने में आगे रहते हैं. 22 अप्रैल को जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की जनसभा में एक किसान ने कथित रूप से आत्महत्या कर ली तो उन्होंने राम मनोहर लोहिया अस्पताल, जहां किसान का शव रखा था, जाने से पहले राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट को तुरंत फोन लगाया और उन्हें उस किसान के परिवार से मिलने का निर्देश दिया. इससे साफ है कि वे किसी भी अन्य पार्टी को विपक्ष की जगह हथियाने से रोकने के लिए पूरी तरह कटिबद्ध हैं.

राहुल की पसंदीदा टीमसोशल मीडिया का दांव
कांग्रेसी नेता मानते हैं कि राहुल को अपनी कुछ निजी रणनीतियां बदलने की जरूरत है. मसलन, संवाद स्थापित करने का उनका तरीका. दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं ने उनसे खुलकर अपील की है कि वे सोशल मीडिया से जुड़ें, लेकिन गांधी परिवार का यह वारिस अभी तक इसकी अनदेखी करता आया है. नवंबर में कांग्रेस के एक नेता ने जब उन्हें बताया कि वे ट्विटर से जुड़कर किस तरह लाखों लोगों से संपर्क बना सकते हैं तो राहुल ने उनसे कहा कि उन्हें यह सब बड़ा जटिल लगता है और इसके लिए उनके पास पर्याप्त समय नहीं है. लेकिन राहुल की यह बात पचने वाली नहीं है, क्योंकि उन्हें अक्सर ही अपने स्मार्ट फोन में उलझे हुए देखा गया है.

लेकिन उत्तर प्रदेश पर जिस तरह ध्यान दिया जा रहा है, वह इस बात को जाहिर करता है कि राहुल को अब अच्छी तरह एहसास हो गया है कि पार्टी को प्रदेशों में मजबूत करना होगा और इसी वजह से वे प्रदेश इकाइयों के अध्यक्षों का चुनाव कर रहे हैं और उनकी नियुक्तियां कर रहे हैं. जिन लोगों की नियुक्ति की जा चुकी है, उनके लिए निर्देश साफ हैं—बूथ स्तर से ही सच्चे कार्यकर्ताओं को पार्टी में शामिल करें, हताश कार्यकर्ताओं के मन में उम्मीद का संचार करें और अनुशासन स्थापित करें.

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या राहुल इस जज्बे और जोश-खरोश को आगे बरकरार रख पाएंगे, खासकर यह देखते हुए कि अगला लोकसभा चुनाव होने में अभी चार साल बाकी हैं. या उनका यह जज्बा कड़ाही में तड़के की तरह है, जैसा उनके मामले में पहले भी देखा जा चुका है, जब उन्होंने भट्टा-पारसौल और नियामगिरि में आदिवासियों का मुद्दा बढ़-चढ़ कर उठाया था. उन्होंने इसी तरह का जोश दिखाते हुए सजायाफ्ता नेताओं को बचाने वाले अध्यादेश को सबके सामने फाड़ दिया था और फिर अचानक कहीं गायब हो गए थे. हर कोई इस बात पर यकीन करने को तैयार नहीं है कि इस बार ऐसा नहीं होगा. यहां तक कि खुद उनकी पार्टी में कुछ लोग ऐसा मानते हैं. महाराष्ट्र के एक दिग्गज नेता कहते हैं, "वे इस समय जो कर रहे हैं, वह बहुत अच्छा है. पर उनमें पार्टी का नेतृत्व संभालने की काबिलियत नहीं है. वे पार्टी की कमान थामने के लिए सही नहीं हैं." इस धारणा को गलत साबित करना राहुल की सबसे बड़ी चुनौती होगी.

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