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कला के ये कद्दावर

इंडिया टुडे आर्ट अवॉर्ड्स के चौथे संस्करण में ऐसे कलाकारों को सम्मानित किया गया जिन्होंने सियासी सवाल खड़े किए और आलोचना तथा विरोध करने वाली कलाकृतियां रचीं

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी नई दिल्ली, 24 December 2018
कला के ये कद्दावर सुबीन हलदर

इस महीने में इंडिया टुडे आर्ट अवॉर्ड्स का चौथा संस्करण लोकतंत्र के जज्बे का, "सहमत, असहमत होने और चर्चा करने'' का जश्न था. इंडिया टुडे ग्रुप के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ अरुण पुरी ने कहा कि जब "हमारे ऊपर ज्यादा कड़ी नजर रखी जा रही है कि हम क्या खाते हैं, कैसे इबादत करते हैं और किससे प्यार करते हैं'', ऐसे समय में ये कलाकार सच्चे विजेता हैं क्योंकि वे "वही कहते हैं जो हम नहीं कह सकते, वही करते हैं जो करने की हम जुर्रत नहीं कर पाते और वह रचते हैं जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते.''

उन्होंने कला की दुनिया के खरे, दिलेर और खूबसूरत अफसानों की तारीफ  और कई सारी सृजनात्मक कृतियों की सराहना की और कहा, "महान लोकतंत्र महान कला को जन्म देते हैं, जबकि निरंकुश राज्यसत्ताएं महज प्रोपेगैंडा पैदा करती हैं.''

यह उस कला के जश्न का दिन था जिसने पहचान के संकट की, विस्थापित और बेदखल लोगों की, मारे गए एक्टिविस्टों की, बंटवारे की, धर्म की राजनीति की और ऐसी ही तमाम चीजों की बात की. चाहे वे नारीवादी आंदोलन की अभिव्यक्तियां हों, जिन्हें बेंगलूरू में रहने वाली एन. पुष्पमाला (परफॉर्मेंस आर्टिस्ट ऑफ द ईयर अवॉर्ड की विजेता) ने राष्ट्रवादी संघर्ष में भारत माता की प्रतीक बनी रक्तपिपासु जिह्वा लपलपाती काली में और भारत माता के परिधानों में सजी सारू पकाती गौरी लंकेश में चित्रित किया है, या वह दलित पहचान की खोज हो, जिसे राज्यश्री गूडी (इमर्जिंग आर्टिस्ट ऑफ द ईयर) ने अपनी कच्ची मिट्टी की रसोई में अंजाम दिया है. यहां ये कलाकार जरूरी तौर पर सियासी टिप्पणीकार हैं जो आज की दुनिया को आईना दिखा रहे हैं.

मौत के घाट उतार दी गई पत्रकार गौरी लंकेश अपनी दोस्त पुष्पमाला की कला में जिंदा हैं. अपनी 45 मिनट की लाइव प्रस्तुति में पुष्पमाला देवी गौरी के वस्त्र धारण करके आईं. उनके चार हाथ थे, जिनमें से दो हाथों में उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज थाम रखा था, जैसा कि लंकेश को प्यार से "आंटी नेशनल'' पुकारा जाता था, और उनके दूसरे दो हाथ सारू बना रहे थे. उनकी आंखें भीगी हुई थीं और साथ ही क्रोध और आक्रोश से जल भी रही थीं. पुष्पमाला ने कहा, "गौरी को खाना पकाना बहुत अच्छा लगता था. हम एक-दूसरे को रेसिपी देते थे.'' लंकेश के प्रति श्रद्धांजलि से कहीं ज्यादा यह इस बात पर एक टिप्पणी थी कि विरोध और असहमति की आवाजों को दबाया जा रहा है.

राज्यश्री गूडी पुणे की हैं और दलित व्यंजनों में इस्तेमाल मसालों की खोज में नृतत्वशास्त्री से कलाकार बनी हैं. वे दलित साहित्य की खाक छान रही हैं और लजीज दलित खानपान की उन सुगंधों तथा जायकों को सामने ला रही हैं जो सवर्ण जातियों के खानपान के दबदबे के आगे खत्म होते जा रहे हैं और इन फरमानों की वजह से भी कि हमें क्या खाना चाहिए. वे जान-बूझकर श्उप-संस्कृत्यि का जश्न मनाती हैं क्योंकि आज भी "कई लोग अल्पसंख्यकों की आवाजों को अनदेखा करते रहते हैं.'' उनका "स्काइस्पेस'' स्थापत्य जाति और वर्ग की सियासत का नजारा था. इसके बारे में बताते हुए उन्होंने कहा, "मैंने छत से 300 जोड़ी जूते लटका दिए हैं, जो मैंने धूल भरी सड़कों और गंदी गलियों से उठाए थे.

मैंने चप्पलों और जूतों की इस छत के नीचे से प्रेक्षकों को गुजारा. लोग जब-तब ऊपर देख रहे थे, ताकि ये जूते कहीं उनके ऊपर न गिर पड़ें. इसका असर जबरदस्त था. खौफनाक डर की भावना, हमारे ऊपर जाति का दबदबा होने का रूपक.'' अपना अवॉर्ड स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें "पता नहीं था कि कोई (उनके काम का) नोटिस ले रहा है.''

सोलो एग्जिबिशन अवॉर्ड की विजेता रंजनी शेट्टार ने कुदरत पर हमलों और पौधों, कीड़ों-मकोड़ों तथा जानवरों के लिए सिकुड़ती जगहों को अपनी कला का विषय बनाया. उनकी प्रदर्शित कलाकृति "सेवन पॉन्ड्स ऐंड ए न्यू रैनड्रॉप्स'' इस बात पर मुखर टिप्पणी थी कि हम किस तरह कुदरत के साथ छेड़छाड़ करते हैं. इस्पात और धातुई ढांचे में ढला उनका मधुमक्खी का छत्ता इस बात का प्रतीक था कि मशीनें किस तरह हरेक कुदरती चीज पर हक जमाती जा रही हैं.

बेस्ट आर्टिस्टिक कोलैबोरेटर ऑफ द ईयर अवॉर्ड गौरी गिल और लुगदी तथा मुखौटों की कला के साथ उनकी भागीदारी को दिया गया. उनकी "एक्ट्स ऑफ एपियरेंस'' कलाकृति, जिसमें अलहदा जानवरों के लुगदी के मुखौटे धारण किए हुए इनसानी शरीरों की तस्वीरें थीं, आज की दुनिया में अमानवीकरण की प्रक्रिया की शिनाख्त करती थी. चीते का मुखौटा पहने एक औरत जमीन पर झाड़ू लगाती दिख रही थी, एक हाथी एक इनसान के दिल की धड़कन की जांच कर रहा था और मोबाइल के सिर वाला आदमी मूंगफली के दाने बिखेर रहा थाः यह ब्लैक ह्यमूर के तड़के के साथ महाराष्ट्र के जव्हार की जनजातीय जिंदगी का चित्रण था.

रेट्रोस्पेक्टिव अवॉर्ड ऑफ द ईयर विवान सुंदरम को दिया गया जो चित्रकार, मूर्तिकार और स्थापत्य कलाकार के रूप में उनके 52 बरस के बहुआयामी करियर का सम्मान था.

सुबोध गुप्ता की कलाकृति में घर की तलाश में एक नाव में भरे हुए कड़ाही और तवे और स्टेनलेस स्टील के बर्तन दिखाए गए, जो विस्थापन तथा अपनी जड़ों से उखडऩे की तकलीफों का उदाहरण थे. गुप्ता को आर्टिस्ट ऑफ द ईयर अवॉर्ड से नवाजा गया.

कलेक्टर ऑफ द ईयर अवॉर्ड बेंगलूरू के अभिषेक पोद्दार ने जीता. उनके संग्रह में महान और समकालीन कलाकारों, गणेश पाइन, तैयब मेहता और मीरा मुखर्जी की कलाकृतियों की मिली-जुली मौजूदगी है, जो लोक कलाकृतियों, आदिवासी शिल्पों, समकालीन दस्तकारी और एथनिक कपड़ों के साथ जगह साझा कर रही हैं. अपने ऑडियो विजुअल संदेश में उन्होंने कहा, "लेने से ज्यादा देने में खुशी महसूस होती है.''

शिल्पा गुप्ता की कलाकृति "फॉर, इन हर टंग, आइ कैननॉट हाइड'' ध्वनि कला का प्रदर्शन थी, जो 100 लोगों की आवाजों से मिलकर बनी थी, जिनमें म्यांमार के लेखक माउंग सउनखा की आवाज भी थी जिन्हें 2016 में गिरफ्तार कर लिया गया था.

अर्शिया लोखंडवाला की इंडिया रिवर्ल्डेड ने क्यूरेटर ऑफ द ईयर अवॉर्ड जीता. मुंबई में लोखंडवाला की गैलरी में हत्याओं, दंगों और ईंटों के दृश्य हैं जिन पर "प्राम'' उत्कीर्ण है और इनके साथ ही अकबर पद्मसी और जरीना हाशमी सरीखे कलाकारों की कलाकृतियां रखी गई हैं.

बेस्ट पब्लिक इनिशिएटिव ऑफ  द ईयर अवॉर्ड जयपुर के जवाहर कला केंद्र ने जीता. डायरेक्टर-जनरल पूजा सूद और एडिशनल डायरेक्टर-जनरल अनुराधा सिंह ने रचनात्मक आजादी और स्थान दोनों देने के लिए सरकार की तारीफ  की.

लाइफटाइम एचीवमेंट अवॉर्ड गणेश हलोई को दिया गया. इस दिग्गज कलाकार ने लैंडस्केप पेंटिंग और अमूर्त कला के बारे में अपने अनुभव प्रेक्षकों के साथ साझा किए.

यह वाकई एक ऐसा आयोजन था, जैसा कि पुरी ने कहा, जिसका असर मन को शांत भी करता था और भावनाओं को झिंझोड़ता भी था,ऐसी कला, जो "प्रेरित, मंत्रमुग्ध, हमारी आत्मा को पोषित और कल्पना को प्रज्ज्वलित'' कर सकी.

सबसे अव्वल यह लोकतंत्र में, सहिष्णुता की भावना में, मुख्तलिफ राय और बेमेल सुरों की बहुतायत में और खामोश कर दिए गए लोगों के लिए आवाज उठाने में हमारी आस्था की तस्दीक था.

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