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जानवरों के हितैषी

करीब डेढ़ एकड़ क्षेत्र में फैले इस गैर-लाभकारी फार्म में पशु चिकित्सालय, गोशाला और कुत्ता घर हैं. तीन संस्थापकों के अलावा फार्म में आठ कर्मचारी हैं, जिनमें एक पशु चिकित्सक भी शामिल है.

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श्रीनाथ पेरुर नई दिल्ली, 12 December 2017
जानवरों के हितैषी पीपल फार्म 2014 में स्थापित यह संस्था धर्मशाला और आसपास के इलाकों में जीवों की देखभाल करती है

पहले मैं एक हैकर हुआ करता था, रोबिन सिंह बताते हैं. छह साल पहले वे अमेरिका में एक सफल ई-कॉमर्स कंपनी चलाते थे. आज वे धर्मशाला के पास एक पीपल फार्म पर रहते हैं, घायल जानवरों की देखरेख करते हैं, संज्ञाशून्य गायों को जूट से बनी चादर ओढ़ाते हैं और बिना जुताई वाली पद्धति से जैविक खेती करते हैं.

वे बताते हैं, ''असल में मैं अब भी हैकर ही हूं. बस उसका क्षेत्र बदल गया है.'' 2011 के करीब किसी समय रोबिन सफरिंग फुटप्रिंट नाम के एक उपक्रम में जुट गए, यह एक ऐसा विचार था, जिसे पर्यावरण और पशु अधिकारों की बढ़ती चिंता के साथ हाल ही में भारत में अमलीजामा पहनाया गया. रोबिन मानते हैं कि आप चाहे कितना भी सावधान क्यों न रहें, आप नुक्सान को टाल नहीं सकते. ''मैं पेड़ों पर नंगे रहूं तो भी कुछ नुक्सान तो पहुंचाऊंगा ही.'' इसकी भरपाई के लिए उन्होंने जहां संभव हो, पीड़ा को कम करने के लिए काम करने की कसम खाई. इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर रोबिन भारत लौटे और वे आवारा और परित्यक्त कुत्तों के साथ पहले ओरोविल में, फिर दिल्ली में काम करने लगे.

पर वे दूसरे लोगों को भी इसी तरह बनने के लिए प्रेरित करना चाहते थे. वे कहते हैं, ''ज्यादातर लोग भावुक होते हैं.'' अगर उन्हें जानवरों के साथ निकट संपर्क का मौका मिले तो, रोबिन के मुताबिक, वे अलग तरह से सोचने लगेंगे. ऐसा करने के लिए उन्होंने 2014 में सह-संस्थापक शिवानी और जोएलन के साथ पीपल फार्म की शुरुआत की. इसके लिए धर्मशाला का इलाका बिल्कुल सही था, क्योंकि पास ही दलाई लामा की मौजूदगी ने उदार आगंतुकों के आगमन की एक तरह से गारंटी दे दी.

करीब डेढ़ एकड़ क्षेत्र में फैले इस गैर-लाभकारी फार्म में पशु चिकित्सालय, गोशाला और कुत्ता घर हैं. तीन संस्थापकों के अलावा फार्म में आठ कर्मचारी हैं, जिनमें एक पशु चिकित्सक भी शामिल है. कुछ वर्षों में इस टीम ने करीब 300 कुत्तों, गायों, गधों, खच्चरों और घोड़ों को बचाया है. आवासीय इलाके ज्यादातर कच्ची ईंट, स्लेट और फिर से उपयोग की जाने वाली सामग्रियों (ध्वस्त कॉलेज के खंभों, हल्के छेद के लिए पुरानी बोतलें, मेज की सतह के लिए दरवाजे) से बने हैं.

रोबिन कहते हैं कि ''मुझे स्थान को सुंदर बनाना पसंद है'' लेकिन सौंदर्य व्यावहारिक भी होना चाहिए. ''यहां पर हमें इतने ज्यादा कष्ट हैं कि जब तक इसे सौंदर्यीकृत न किया जाए, लोग यहां अपना समय नहीं बिताएंगे.'' स्वयंसेवक अमूमन दो हक्रते ठहरते हैं. जो पशु चिकित्सक, किसान और लोग हमारे विचार फैलाते हैं, उनसे कोई शुल्क नहीं लिया जाता है. लेकिन अन्य लोग खाने और रहने का रोजाना साढ़े तीन सौ रुपए भुगतान करते हैं.

हाल ही में एक दोपहर जोएलन और दो अन्य लोग बांस के टुकड़े और रुई से एक गाय के अगले बाएं पैर को जोड़ रहे थे, जो सुअरों को खेतों से बाहर रखने के लिए लगाए गए तार के फंदे से घायल हो गई थी. ज्यादातर पशु उपचार के लिए खड़े हैं. किंग नाम का एक सांड जलने के कारण पिछले चार महीनों से यहां है, क्योंकि किसी ने गर्म पानी डालकर उसे खदेड़ दिया था. दिवा नामक गाय यहां कीड़े लगे थन के साथ आई थी, क्योंकि वह इतनी बूढ़ी थी कि दूध नहीं दे सकती थी. फार्म पर आने वाली ज्यादातर परित्यक्त गायें गर्भवती होती हैं और बछड़े के जन्म तक वह यहां रहती हैं, फिर टीम उसे छोड़ देती है.

रोबिन चाहते हैं कि वे किसानों को इस बारे में अलग तरह से सोचने के लिए प्रेरित करें कि जब उनके पशु उपयोगी न रह जाएं, तो वे उनके साथ कैसा सलूक करें. रोबिन कहते हैं कि इसके लिए वे कल्चर जैमिंग कर सकते हैं, ''जिसके तहत आप परिचित संगी-साथियों पर भरोसा कर सकते हैं.'' मसलन, मेहमान रूसी भित्ति चित्रकारों की मदद से उन्होंने एक अभियान चलाया, जिसमें भटकी गायों के लिए भगवान श्रीकृष्ण की छवि के साथ बोरी से स्वेटर तैयार किया गया और जिस पर नारा लिखा था-यह गाय मेरी है. ऐसा उन्होंने कुछ ही गायों के साथ किया, पर अखबारों की कवरेज ने इस छवि को व्यापक रूप से प्रचारित किया.

दूसरे अभियान के लिए फार्म ने रेस्तरां मालिकों को शाकाहार हितैषी स्टिकर लगाने के लिए मनाया-जिसमें यह लिखा गया था कि गैर-शाकाहारी भारतीय रेस्तरां भी ऐसे कई व्यंजन परोसते हैं, जिनमें मांस, डेयरी, अंडे या अन्य पशु उत्पाद नहीं होते. रोबिन कहते हैं कि रेस्तरां में जाने वाले सौ में से एक भी व्यक्ति शुद्ध शाकाहारी हुआ, तो स्टिकर अन्य 99 लोगों को भी शुद्ध शाकाहारी होने के लिए प्रेरित करेगा—''अरे यह वेगन (शुद्ध शाकाहारी) क्या होता है?''

पशुओं की सहायता करने के साथ-साथ पीपल फार्म बड़े पैमाने पर अनाज, फल, सब्जियों, साग और तिलहनों की खेती करता है, ज्यादातर जुताई के बिना खेती का प्रयोग करने के रूप में. थोड़ी-बहुत आय के लिए वे ताजा पुदीना, लेमनग्रास, करी पत्ते और सहजन के पत्ते के साथ-साथ चॉकलेट और मूंगफली का मक्खन बेचते हैं. वे एक प्रकार का चिवड़ा भी बेचते हैं. बाद में जब मैंने अपने सफर में खरीदा एक पैकेट खोला, तो ओप्पो नामक पिल्ले की प्यारी-सी तस्वीर के साथ मुझे एक कागज की स्लिप मिली, जिस पर पाठक के लिए यह संदेश था कि वे उसे अपनाएं. वहां लौटने के लिए यह एक और कारण था.

 —श्रीनाथ पेरुर

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