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लड़बो, जीतबो

सूबे में अगले साल विधानसभा चुनावों के मद्देनजर भाजपा ममता बनर्जी को अस्थिर करने के लिए जोरदार हमले कर रही है. मुख्यमंत्री पलटवार तो कर रही हैं लेकिन उन्हें अपनी पार्टी के भीतर से उभरते असंतोष के स्वरों को भी शांत करना है.

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aajtak.in
रोमिता दत्ताकोलकाता, 17 June 2020
लड़बो, जीतबो संकट की घड़ी चक्रवात प्रभावित 24 परगना जिले के दौरे पर गईं ममता बनर्जी

पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता के एक प्रसिद्ध पार्क में नीम का पौधा रोपा और चक्रवात अम्फान से तबाह हो गए सुंदरवन में 5 करोड़ मैंग्रोव के नए पौधे लगाने वाले सरकार के एक बड़े वनीकरण अभियान की घोषणा की. अम्फान ममता के एक और मकसद में काम आ रहा है.

उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि बंगाल की सत्ता को हासिल करने के लिए भाजपा इतनी ज्यादा आतुर हो गई है कि उसे चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं और कोविड-19 महामारी जैसी बड़ी विपत्तियों का भी राजनीतिकरण करने से कोई परहेज नहीं है. उन्होंने कहा, ‘‘जहां हम (तृणमूल कांग्रेस) लोगों को बचाने के लिए काम कर रहे हैं, वहीं एक राजनैतिक दल हमारी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए काम कर रहा है. क्या मैं यह कह रही हूं कि नरेंद्र मोदी को दिल्ली की सत्ता से उखाड़कर फेंक दिया जाना चाहिए? यह राजनीति करने का समय नहीं है.’’

लेकिन बंगाल के राजनैतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि ममता भाजपा के खिलाफ रक्षात्मक हो रही हैं. भाजपा, जिसने 2019 के आम चुनाव में राज्य की 42 में 18 लोकसभा सीटें जीत ली थीं, ममता के लिए एक स्पष्ट और आसन्न खतरा है. महामारी और चक्रवात जैसी दो बड़ी आपदाओं से जूझने में ममता सरकार की सांसें फूल रही हैं और भाजपा, ममता की इस घबराहट का फायदा उठाने में बिल्कुल नहीं चूक रही.

अपनी सरकार के आपदाओं से निपटने में अक्षमता को लेकर भाजपा की आलोचनाओं से आहत, ममता बेहद कमजोर दिख रही हैं. कोलकाता के प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एमेरिटस और राजनैतिक विश्लेषक प्रशांतो रे कहते हैं, ‘‘ममता को एक साल से भी कम समय में चुनाव का सामना करना है और भाजपा से उन्हें कड़ी चुनौती मिलने वाली है. इसलिए उनकी घबराहट समझ आती है. महामारी प्रभावित लोगों के लिए राशन वितरण में खामियों और भ्रष्टाचार को लेकर उनकी स्वीकृति, पारदर्शिता दिखाने की हताश कोशिश भर दिखती है.’’

घमासान की तैयारी

लेकिन ममता जुझारू राजनेता हैं और टीएमसी प्रमुख ने भाजपा की छवि पर सीधा प्रहार शुरू कर दिया है. बंगाल के वन मंत्री राजीव बनर्जी कहते हैं, ‘‘हम पहले सोशल मीडिया और छोटी टीमों के जरिए लोगों तक पहुंच रहे हैं और उन्हें यह बता रहे हैं कि भाजपा किस प्रकार मानवीय त्रासदियों पर राजनीति कर रही है.’’

ममता, भाजपा की छवि एक ऐसे ‘सत्तालोलुप आक्रमणकारी’ की बनाने की कोशिश कर रही हैं, जो बंगाल की संस्कृति और उसके धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण को नष्ट कर देगी. उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को चेतावनी दी कि वह अगर बंगाल को भी भाजपा के पिछले विजय अभियानों की तरह ही देख रहे हैं तो यह उनकी भूल है. ममता ने कहा, ‘‘आप (अमित शाह) ने बहुत से किले जीत लिए, भारत सरकार बन गए, कई राज्यों पर विजय प्राप्त कर ली... लेकिन बंगाल को विजेता वाली उसी सोच से मत देखिए. यह शानदार जगह है. अगर आप बंगाल से प्यार करते हैं, तो बंगाल की जनता आपसे प्यार करेगी.’’

रे के अनुसार, ममता की रणनीति भाजपा को एक ऐसी बाहरी ताकत के रूप में पेश करना है जो बंगाल के विशिष्ट सांस्कृतिक लोकाचार को नष्ट कर देगी. वे कहते हैं, ‘‘बंगाल को एक बौद्धिक केंद्र बताने के उनके आग्रह के पीछे की सोच, शिक्षित बंगाली मध्य वर्ग को चेताना है कि हिंदीपट्टी की एक पार्टी यहां आकर बंगाल की संस्कृति के मौलिक स्वरूप और अस्मिता को नष्ट कर देगी. रामनवमी और हनुमान जयंती समारोहों और पिछले साल मई में कोलकाता में समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर के स्मारक पर हुई तोडफ़ोड़ को इसके प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है.’’

प्रांतीय भावना से मेल खातीं ममता की बातें, चुनाव से पहले मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने की भाजपा की पुरानी और सफल राजनैतिक चाल का मुकाबला कर सकती हैं. भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में इसका सफलतापूर्वक प्रयोग किया है और न सिर्फ 40 फीसद वोट शेयर हासिल करने में कामयाब रही जो कि न केवल इसका बंगाल में अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था बल्कि बंगाल में टीएमसी की तुलना में सिर्फ चार लोकसभा सीटें ही पीछे रही. भाजपा का मानना है कि यह प्रदर्शन उसे 2021 के राज्य विधानसभा चुनावों में 294 सीटों में से 120 पर बढ़त दिलाएगा.

भाजपा अपने ध्रुवीकरण अभियान को आगे बढ़ाने के लिए दृढ़ है. वह ममता पर कोलकाता के मुस्लिम बहुल इलाकों में कोविड लॉकडाउन को लागू कराने में नरमी बरतने और मार्च महीने में दिल्ली में हुए तब्लीगी जमात में भाग लेकर भारी संख्या में बंगाल पहुंचे लोगों की जानकारी छिपाने का आरोप लगा रही है. ममता ने इसे बंगाल के लोगों के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण अभियान करार दिया है. अम्फान को लेकर मीडिया के कवरेज को पक्षपाती बताते हुए ममता ने 5 जून को एक कार्यक्रम में कहा, ‘‘यह सब दिल्ली (केंद्र) के उकसाने पर हो रहा है—केवल बंगाल को अपमानित करो, केवल बंगाल के साथ भेदभाव करो, बंगाल की छवि खराब करो.’’

हालांकि, भाजपा के समर्थकों का कहना है कि मतदाता अब ममता के झांसे में नहीं आने वाले. जादवपुर विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर और राज्य भाजपा के शरणार्थी सेल के सदस्य मोहित रे पूछते हैं, ‘‘ममता बनर्जी एक ‘बंगाली-जगाओ’ कथ्य गढऩे की कोशिश कर रही हैं, लेकिन लोगों ने खुद महसूस किया है कि कोविड और अम्फान जैसी आपदाओं में उनकी सरकार कितनी विफल साबित हुई है. क्या वे भूल जाएंगे कि कैसे उन्हें 100-160 घंटे तक बिना बिजली और पानी के रहना पड़ा था. क्या अन्य राज्यों से लौटकर आए बंगाली क्वारंटीन केंद्रों का बुरा अनुभव भूल जाएंगे? क्या कोविड के कारण जान गंवानेवाले लोगों के रिश्तेदार भूल पाएंगे कि ममता सरकार ने उन्हें कैसे अंधेरे में रखा?’’

अंदरूनी कलह

ममता को चुनौती केवल भाजपा से नहीं मिल रही है बल्कि टीएमसी की आंतरिक कलह से भी उन्हें निपटना है. पार्टी के दिग्गज और उपभोक्ता मामलों के मंत्री साधन पांडे ने पिछले महीने कोलकाता के पूर्व महापौर फरहाद हकीम पर अम्फान की चुनौतियों से निपटने की बेकार योजना बनाने और राहत कार्यों में नाकामी की सार्वजनिक रूप से आलोचना की.

हकीम, जो अब कोलकाता नगर निगम के प्रशासक मंडल के अध्यक्ष हैं, ममता के चहेतों में गिने जाते हैं. पांडे ने सार्वजनिक रूप से कहा कि हकीम को योजना बनाने में शहर के पूर्व महापौर और अनुभवी सोवन चटर्जी, जो कि पिछले साल अगस्त में टीएमसी से बगावत करके भाजपा में शामिल हो चुके हैं, से परामर्श करना चाहिए था. उनके इस बयान को ममता के लिए एक चुनौती भी माना गया है.

पार्टी ने उन्हें कारण बताओ नोटिस भेजा लेकिन पांडे रत्तीभर भी पीछे हटने को तैयार नहीं दिखते. वे कहते हैं, ‘‘मैं पिछले 40 वर्षों से राजनीति में हूं और टीएमसी के गठन से पहले से ही ममता बनर्जी के साथ था. 2004 में जिसे पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए (सुदीप बंद्योपाध्याय) निलंबित कर दिया गया था वह मुझे नोटिस कैसे भेज सकता है?’’

पांडे अकेले व्यक्ति नहीं हैं जिन्होंने आवाज उठाई हो. 5 जून को पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी ने चक्रवात प्रभावित इलाकों में खराब राहत और पुनर्वास के लिए सुंदरवन मामलों के कनिष्ठ मंत्री मंटूराम पाखिरा को निशाना बनाया. कई टीएमसी मंत्री सरकार के कोविड संकट से निपटने के प्रयासों से नाखुश हैं, खासकर केंद्र सरकार के अंतर-मंत्रालय टीम (आइएमसीटी) के साथ हुए टकराव को लेकर वे नाराज है. केंद्रीय टीम ने अप्रैल में राज्य का दौरा किया था और कहा था कि बंगाल सरकार पूर्व की बीमारियों की आड़ में कोविड की मौतों का आंकड़ा छुपा रही है.

राजीव बनर्जी ने माना कि यह छेड़छाड़ ‘टीएमसी को नुक्सान पहुंचाएगी’ और टीएमसी के पास पहले से ही दुश्मनों की कमी नहीं है. हालांकि, राज्यसभा में टीएमसी के नेता डेरेक ओ’ब्रायन पार्टी के भीतर किसी विद्रोह की खबरों को खारिज करते हैं. वे पूछते हैं, ‘‘टीएमसी के 35 सांसद और 215 विधायक हैं. बस एक विधायक (पांडे) ने लाइन से हटकर बयान दिया. पार्टी के भीतर बगावत के सुर की बात कहां से आती है?’’

पांडे के अगले कदम पर अटकलों के बीच, एक राज्य भाजपा नेता कहते हैं कि पार्टी के पास उनके लिए ‘फिलहाल कोई बड़ी योजना नहीं’ है और पांडे को ‘रोज वैली (एक चिटफंड कंपनी) के साथ अपनी बेटी के जुड़ाव के कारण एक कवर की जरूरत महसूस हो रही है.’ रोज वैली की कथित रूप से की गई 40,000 करोड़ रु. की धोखाधड़ी की जांच केंद्रीय एजेंसियां कर रही हैं.

हो सकता है कि पांडे भाजपा के लिए बहुत जरूरी न हों, लेकिन उसे पता है कि अपने ‘ईबार बांग्ला (अबकी बार बंगाल)’ अभियान के लिए टीएमसी के कुछ प्रभावशाली चेहरों की जरूरत होगी. लोकसभा चुनाव में भाजपा ने टीएमसी के पांच नेता तोड़े थे; उनमें से तीन चुनाव जीतकर संसद भी पहुंचे. उत्तर बंगाल के एक भाजपा नेता का कहना है, ‘‘हम विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार चुनते समय जीतने की क्षमता पर बहुत गौर करेंगे. यदि इसके लिए हमें दूसरी पार्टी से नेताओं की आवश्यकता है, तो हम उन्हें लाने में संकोच नहीं करेंगे.’’

टीएमसी के बड़े नेताओं में से परिवहन मंत्री सुवेंदु अधिकारी पर भाजपा की खास नजर है. अधिकारी का ग्रामीण बंगाल में मजबूत आधार है. वे ओजस्वी वक्ता और भीड़ जुटाने वाले नेता हैं. नाम न छापने की शर्त पर एक टीएमसी सांसद का कहना है, ‘‘अगर भाजपा उन्हें रिझा पाई तो यह उसके लिए एक बड़ी कामयाबी होगी. ममता बनर्जी को भी इसकी हवा मिली है कि अधिकारी पाला बदलने का मन बना रहे हैं, इसलिए उन्होंने अधिकारी को महत्वपूर्ण जिक्वमेदारियों से अलग करना शुरू कर दिया है.’’

इस बाबत सुवेंदु का जवाब था, ''क्या कोई सबूत है? मैं काल्पनिक सवालों का जवाब नहीं देता.’’ उनके पिता और लोकसभा सांसद शिशिर अधिकारी ने हालांकि इन अफवाहों का खंडन किया. उन्होंने कहा, ''हम भाजपा में क्यों शामिल होंगे? व्यक्तित्व और अहम का टकराव हो सकता है, लेकिन हम नेतृत्व के प्रति वफादार हैं.’’ लेकिन आशंकित ममता सुवेंदु से उनके प्रभार वाले सात में से पांच जिलों—मालदा, दक्षिण दीनाजपुर, पश्चिम मिदनापुर, पुरुलिया और बांकुड़ा—का प्रभार वापस ले चुकी हैं. इनकी जिक्वमेदारी ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी के करीबी नेताओं को सौंप दी गई है.

सुवेंदु और अभिषेक के बीच प्रतिद्वंद्विता रहती है. माना जाता है कि सुवेंदु की नाराजगी की वजह पार्टी में अभिषेक का अचानक तेज उभार और विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत की संभावनाओं को बढ़ाने के लिए पिछले साल चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर को लाने में अभिषेक की भूमिका रही है. इसी कारण सुवेंदु ने कोलकाता में किशोर की 2 मार्च की टीएमसी बैठक का बहिष्कार किया था. बंगाल भाजपा के अध्यक्ष दिलीप घोष का दावा है, ''नेताओं के अन्य दलों से भाजपा की ओर रुख करने का मौसम शुरू हो गया है. हमें सेंध लगाकर किसी को लाने की जरूरत नहीं है. नेता टीएमसी को खुद ही छोड़ रहे हैं क्योंकि पार्टी पतन के रास्ते पर है.’’

हालांकि शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी अब भी बहुत आशावादी हैं. वे कहते हैं, ''लोग ममता बनर्जी और टीएमसी को वोट देते हैं, इसलिए पार्टी छोडऩेवाले नेताओं से पार्टी की सेहत को खास फर्क नहीं पड़ता.’’ ममता अपनी ओर से खुद और अपनी पार्टी के लिए जनता का समर्थन जुटाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही हैं. ओ’ब्रायन कहते हैं, ‘‘हमारा ध्यान राज्य को कोविड और चक्रवात की दोहरी चुनौतियों से उबारने पर है. अगर आपदाकाल में भी भाजपा की प्राथमिकता राजनीति और चुनावी जुमलेबाजी की है, तो यह उनकी मर्जी है.’’

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