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एक 'जंगल' की जिंदगी

पेड़ों के हिमायती एक्टिवस्टों ने आरे कॉलोनी के पीवीटीजी आदिवासियों के प्रति कोई खास हमदर्दी नहीं दिखाई है

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी नई दिल्ली, 15 October 2019
एक 'जंगल' की जिंदगी काट डाले गए पेड़ आरे कॉलोनी में काट डाले गए पेड़ से लिपट कर रो पड़ा एक एक्टिविस्ट

गीतांजय साहू

हाल में विभिन्न गलत वजहों से मुंबई की आरे कॉलोनी खबरों में रही. चाहे वह आरे कॉलोनी को संरक्षित वन घोषित करने की याचिकाओं को खारिज करने का मुंबई हाइकोर्ट का फैसला हो या इस आदेश के कुछ ही घंटों के भीतर पेड़ों को काट डालना, या फिर पेड़ काटने का विरोध करने वालों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज करना हो. सुप्रीम कोर्ट ने 7 अक्तूबर को सरकार को आरे में और पेड़ काटने से रोक दिया, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी. मुंबई मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन ने कोर्ट को बताया कि वह काटने के लिए तय 2,185 पेड़ों में से 2,141 पेड़ काट चुकी है. इस बीच गिरफ्तार किए गए 29 प्रदर्शनकारियों को जमानत पर रिहा कर दिया गया, पर इसमें भी नुक्सान पहले ही हो चुका था. दरअसल, उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की चार धाराओं के तहत आपराधिक आरोप दर्ज हुए थे.

आरे कॉलोनी 1,287 हेक्टेयर इलाके में फैली है. इसमें 4,50,000 पेड़ हैं, जिनमें कई विलुप्तप्राय प्रजातियां हैं. यहां 27 आदिवासी गांव भी हैं. स्थानीय और राज्य के सत्ताधारियों ने बीते पांच दशकों में आरे की सैकड़ों हेक्टेयर जमीन विभिन्न व्यावसायिक और विकास परियोजनाओं के लिए चोरी-छिपे बांट दी है. मुंबई मेट्रो कार शेड परियोजना इनमें सबसे नया है जिसे 33 हेक्टेयर जमीन दी गई है. शहर में राय बंटी हुई है कि यातायात की जरूरत पूरी करना आर्थिक तौर पर कितना व्यावहारिक है और इसके लिए पर्यावरण की कितनी कीमत चुकानी चाहिए. चिंता की दूसरी बात यह है कि मेट्रो परियोजनाओं को झटपट पूरा करने के लिए अलोकतांत्रिक और अस्पष्ट तरीके अपनाए गए.

लोगों के आक्रोश और वैकल्पिक जगह होने के बावजूद, सत्ताधारियों ने सारे विरोध को धता बताकर आरे की 165 हेक्टेयर जमीन की अधिसूचना रद्द कर दी. इससे यह जमीन 'नो डेवलपमेंट जोन' से मुक्त हो गई और अब 'व्यावसायिक इस्तेमाल' के उपलब्ध है. सरकार ने जोर-शोर से दलील दी कि आरे जंगल नहीं है, पर इसके समर्थन में उसने जमीन के दर्जे को लेकर कोई दस्तावेज या रिकॉर्ड सामने नहीं रखा. बीएमसी के वृक्ष प्राधिकरण के विशेषज्ञ सदस्यों को फेहरिस्त के पेड़ों के ब्योरों की पूरी जांच करने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया. यही नहीं, साल 2012, 2014 और 2017 में परियोजना स्थल से इकट्ठा किए गए आंकड़ों में कई विसंगतियां थीं.

मुंबई हाइकोर्ट के 4 अक्तूबर के आदेश के कुछ ही घंटों में पेड़ काटने में जितनी फुर्ती दिखाई गई, उतनी तेजी पिछले कई आदेशों के पालन में नहीं बरती गई, बल्कि उन्हें लेकर सत्ताधारियों की सुस्ती साफ दिखाई दी थी. मसलन, हाइकोर्ट के उस आदेश को भी लागू करने में सुस्ती दिखी जिसमें उसने आरे कॉलोनी में 1861 से रह रहे हजारों वर्ली आदिवासियों—जो विशेष तौर पर अतिसंवेदनशील आदिवासी समूह (पीवीटीजी) हैं—को बुनियादी सुविधाएं मुहैया करवाने के लिए कहा था.

यहां तक कि पीवीटीजी को भेदभाव और दमन से बचाने वाले संवैधानिक प्रावधानों को भी दरकिनार कर दिया गया और यह इस वजह से संभव हो सका क्योंकि आरे की जमीन के दर्जे को लेकर स्पष्टता नहीं है. पर्यावरण कार्यकर्ताओं का ध्यान भी मुख्य रूप से आरे के हरे-भरे पेड़-पौधों पर है; आरे कॉलोनी के हजारों पीवीटीजी आदिवासियों के अधिकारों को लेकर कोई खास चिंता सार्वजनिक चर्चाओं और अदालतों में दिखाई नहीं देती.

इस बीच, मुंबई मेट्रो कॉर्पोरेशन ने पर्यावरण की चिंताओं को खारिज कर दिया है. उसका दावा है कि इस परियोजना का अच्छा असर होगा और कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में हर साल 2,61,000 टन की कमी आएगी. यह पेरिस जलवायु समझौते में भारत को राष्ट्रीय स्तर पर तय इच्छित योगदान की दिशा में संभावनाओं से भरा कदम नजर आता है, लेकिन मुंबई मेट्रो का यह बयान महज दिखावा है. खासकर इस बात को देखते हुए कि इस किस्म के आकलन की न कोई स्वीकृत पद्धति है और न ही कोई प्रामाणिक डेटा मौजूद है.

महाराष्ट्र सरकार भी इस मेट्रो परियोजना के पर्यावरण से जुड़े संभावित फायदों को लेकर खास नगाड़ा पीट रही है, पर राज्य में पर्यावरण कानूनों को लागू करने के मामले में इसका अपना रिकॉर्ड बहुत खराब है. राष्ट्रीय हरित पंचाट (एनजीटी) की पश्चिमी पीठ में महाराष्ट्र के पर्यावरण मामलों की भारी तादाद इसका सबूत है. सरकार को पेरिस समझौते की प्रस्तावना पर शायद ज्यादा ध्यान देना चाहिए. यह प्रस्तावना सभी देशों से ''मानवाधिकारों के प्रति अपने-अपने दायित्वों का सम्मान करने, उन्हें बढ़ावा देने और उन पर विचार करने'' के लिए कहती है. दूसरी ओर, आरे के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ धमकियां और हिंसा बढ़ गई हैं.

—गीतांजय साहू टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुंबई के स्कूल ऑफ हैबिटैट स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं.

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