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महाबांध पर टूटा नाराजगी का तटबंध

भारत-नेपाल सीमा पर महाकाली नदी पर प्रस्तावित पंचेश्वर बांध के लिए जन-सुनवाई में भड़का विरोध, पर्यावरण की चिंताएं भी हुईं मुखर

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अखिलेश पांडे 27 September 2017
महाबांध पर टूटा नाराजगी का तटबंध तैयारी पंचेश्वर में बांध की तैयारी के सिलसिले में बन रही सुरंग

भारत-नेपाल के बीच बहने वाली महाकाली नदी पर दोनों देशों के संयुक्त उपक्रम से पंचेश्वर बांध बनना है जो टिहरी से तीन गुना बड़ा होगा. लेकिन इस प्रस्तावित बांध के विरोध में स्थानीय लोगों को गुस्सा फूट पड़ा है. नाराजगी की हालिया वजह तो बांध से डूब क्षेत्र में पडऩे वाले तीन जिलों के करीब डेढ़ सौ गांवों के लोगों के लिए जन-सुनवाई का का सरकारी आयोजन बना, जिसमें विस्थापन के खिलाफ लोगों की आवाज अनसुनी करने के आरोप लगे और सियासी दल हरकत में आए. लेकिन इससे भी बड़े सवाल बड़े बांधों के निर्माण के खिलाफ पर्यावरणविद उठा रहे हैं जिसमें हिमालय के पारिस्थितिक तंत्र के बिगडऩे के खतरे के प्रति आगाह किया जा रहा है. इस सिलसिले में 2013 की केदारनाथ आपदा को भी याद किया जा रहा है. लेकिन सरकारी योजनाएं तो कुछ और ही हैं.

भारत-नेपाल की सीमा पर प्रस्तावित इस बांध पर तकरीबन 40,000 करोड़ रु. की लागत से बनने वाली पंचेश्वर जल विद्युत परियोजना से तकरीबन 5,000 मेगावाट बिजली के उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है. भारत और नेपाल दोनों देशों की जमीन पर बनने वाली इस परियोजना का बड़ा हिस्सा उत्तराखंड में होगा. 2018 से बांध का निर्माण शुरू होना है. यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बांध होगा. अभी शंघाई स्थित थ्री गॉर्गस डैम दुनिया का सबसे बड़ा बांध है.

 ऐसे में सरकार ने 8 अगस्त को चंपावत, 11 अगस्त को पिथौरागढ़ और 13 अगस्त को अल्मोड़ा में जनसुनवाई की, जिसमें बांध को लेकर लोगों की आपत्तियां और शिकायतें सुनने की महज औपचारिकता निभाई गई. जन-सुनवाई के तरीके को लेकर स्थानीय लोगों से लेकर राजनैतिक दलों तक ने विरोध किया है. स्थानीय लोग इस बात का विरोध कर रहे हैं कि जन-सुनवाई की सूचना प्रभावित इलाकों तक ढंग से नहीं पहुंचाई गई. जन-सुनवाई सिर्फ तीनों जिला मुख्यालयों में रखी गई. वक्त भी बारिश का चुना गया है. इस मौसम में कई गांवों का संपर्क ही कट जाता है. जन-सुनवाई के दौरान भूस्खलन होता रहा और यातायत प्रभावित रहा. ऐसे में गांववालों के लिए जिला मुख्यालय पहुंचना असंभव था. गांववालों की शिकायत थी कि सरकारी इरादे साफ होते तो जन-सुनवाई ग्रामपंचायत स्तर पर रखी जाती.

शायद इसी नाराजगी को भांपकर जन-सुनवाई के बाद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बांध प्रभावित क्षेत्र के सांसदों और मंत्रियों के साथ बैठक की. बांध के डूब क्षेत्र में पिथौरागढ़, चंपावत और अल्मोड़ा के कुछ हिस्से आएंगे. इससे सीधे तौर पर करीब 33,000 तो अप्रत्यक्ष तौर पर कुल डेढ़ लाख आबादी प्रभावित होगी.

पंचेश्वर बांध की डिटेल प्रॉजेक्ट रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 से बांध का काम शुरू हो जाएगा और 2026 तक काम पूरा करके बांध में पानी भरना शुरू हो जाएगा. पानी पूरा भरने में दो साल लगेंगे और 2028 तक यह पूरा हो जाएगा. पंचेश्वर बांध के साथ ही एक और छोटा रूपाली गाड़ बांध भी बनना है.

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के दौरान चुनावी रैली में पीएम नरेंद्र मोदी ने पंचेश्वर बांध का जिक्र करते हुए कहा था कि इससे मिलने वाली बिजली से न सिर्फ उत्तराखंड को फायदा होगा बल्कि देश के दूसरे इलाकों का अंधेरा भी दूर होगा. पंचेश्वर और रूपाली गाड़ बांध बन जाने से 5,000 हजार मेगावॉट से ज्यादा बिजली पैदा होगी. इसमें 13 फीसदी बिजली उत्तराखंड को मुफ्त मिलेगी. सिंचाई के लिए इतना पानी मिलेगा जिससे 16 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई हो सकेगी. सिंचाई का पानी यूपी को भी मिलेगा और नेपाल को भी.

भारत और नेपाल के बीच संबंधों को पुख्ता करने के लिए विदेश मंत्रालय के अधीन दो साल पूर्व बनी एमिनेंट पर्सन ग्रुप के भारतीय चैप्टर के अध्यक्ष तथा भाजपा सांसद भगत सिंह कोश्यारी कहते हैं, ''इस बांध निर्माण के जरिए नेपाल भारत के और करीब आएगा. कुछ वक्त पहले नेपाल में चले मधेसी आंदोलन के दौरान नेपाल में भारत के खिलाफ गुस्सा दिखा था लेकिन इस बांध के जरिए भारत-नेपाल की दोस्ती और मजबूत हो सकेगी.''

लेकिन स्थानीय राजनैतिक दल और सामाजिक संगठनों का मानना है कि इससे हिमालय के पारिस्थितिक तंत्र को काफी खतरा है. उनका यह भी कहना है कि बांध निर्माण से सिर्फ वर्तमान ही प्रभावित नहीं होता बल्कि पीढिय़ां प्रभावित होती हैं. बांध केवल जल जंगल जमीन को ही नहीं निगलते बल्कि संस्कृति, विरासत और परंपराओं को भी निगल जाते हैं. बांध भ्रष्ट तंत्र को जन्म देता है बांध से ठेकेदार, दलाल और सफेदपोश गठजोड़ ही पनपता रहा है. इसीलिए सरकारें, कॉर्पोरेट, नेता और ठेकेदार बांधों के कट्टर समर्थक रहे हैं.

उत्तराखंड में बांध निर्माण से जुड़ा अनुभव यह बताता है कि जल विद्युत परियोजनाओं का विरोध और निर्माण कार्य एक साथ चलता रहता है. एक समय ऐसा आता है जब आंदोलन निर्माणकार्यों पर भारी पडऩे लगता है. उत्तरकाशी जिले में शुरू हुए पाला मनेरी समेत अन्य बांध इसके उदहारण हैं. मगर तब सरकारें बांध के बचाव में यह दलील देती हैं कि जिन बातों को लेकर आंदोलन किया जा रहा है, वे बातें शुरुआत में नहीं उठाई गईं. पंचेश्वर में तो शुरुआत से ही मुद्दे उठाए जा रहे हैं, मगर सवाल यही है कि सुनेगा कौन?

अब तक बांध की डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट में प्रभावितों के लिए पुनर्वास में जमीन या मकान देने का प्रावधान नहीं है. उत्तराखंड क्रांति दल नेता काशी सिंह ऐरी के अनुसार इस बांध की डीपीआर में प्रभावितों के लिए 6 लाख रु. प्रति हेक्टेयर जमीन का प्रावधान रखा है और प्रति मकान दो लाख रु. का प्रावधान है. उन्होंने कहा कि पहाड़ों में किसी के पास एक हेक्टेयर जमीन नहीं होती है. किसी के पास बहुत ज्यादा है तो भी वह आधी हेक्टेयर ही होगी. ऐसे में जमीन और मकान डूबने पर उन्हें 4-5 लाख रु. ही मिलेंगे. इस राशि से आज के इस महंगाई के दौर में कैसे कोई दूसरी जगह बस सकता है.

पर्यावरणीय दृष्टि से भी यह बांध सुरक्षित नहीं है. पर्यावरणविद और पहाड़ पत्रिका के संपादक शेखर पाठक कहते हैं, ''जब अमेरिका जैसे विकसित देश पर्यावरणीय दुष्प्रभावों और जलजीवों को नुक्सान के मद्देनजर बड़े बांधों को तोड़ रहे हैं तो यहां विरोध के बाद भी इतना बड़ा बांध बनाने की जरूरत क्या है.'' सवाल यह भी है कि टिहरी बांध बनने के 10 साल बाद भी लोगों का पुनर्वास सही से नहीं हो पाया. टिहरी की झील के लगातार फैलने से आसपास के पहाड़ कच्चे हो रहे हैं और भूस्खलन बढ़ रहा है.

प्रस्तावित बांध का हिस्सा मध्य हिमालय का वह हिस्सा है जो अभी भी बनने के दौर में है. यहां जितनी बड़ी झील बनेगी तो उससे कुमाऊं का मौसम चक्र भी बदलेगा. उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी का कहना है, ''हिमालय को बचाने की शपथ लेने वाली सरकार को पहले पंचेश्वर जैसे बड़े बांध का विरोध करना चाहिए. यह पहाड़ के विकास के लिए नहीं विनाश के लिए बनाया जा रहा है.''

 पंचेश्वर बांध डूब क्षेत्र प्रभावित संघर्ष समिति के बैनर तले डूब क्षेत्र के लोगों ने अगस्त मे प्रभारी जिलाधिकारी से मुलाकात की. समिति ने इस बांध को लेकर वाप्कोस लिमिटेड की ओर से डीपीआर तैयार करने के लिए जुटाए गए आंकड़ों पर भी सवाल खड़े करते हुए कहा कि आउटसोर्सिंग से जुटाए गए ये आंकड़े विश्वसनीय नहीं हैं, इसलिए इसे खारिज किया जाए. डीपीआर में पर्यावरणीय नुक्सान की भरपाई का कोई जिक्र नहीं है.

क्षेत्र के अंतर्गत मौजूद 89 मंदिरों में से सिर्फ तीन को ही प्रमुखता दी गई है. इस डीपीआर मे भूमि अधिग्रहण पुनरुद्धार और पुनर्वास अधिनियम की कोई जानकारी नहीं दी गई है. प्रभारी जिलाधिकारी को पंचेश्वर बांध डूब क्षेत्र प्रभावित संघर्ष समिति के सौंपे गए ज्ञापन में भूमि और भवनों का मुआवजा दस गुना बढ़ाने, प्रभावितों को एक-एक हेक्टेयर भूमि उपलब्ध कराने सहित कई मांगें की गई हैं.

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