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बिहार-राजनीति में माहिर पासवान

छोटे-से वोट बैंक के सहारे लोक जनशक्ति पार्टी प्रमुख ने अब तक छह प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने का अनोखा रिकॉर्ड कायम किया

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अमिताभ श्रीवास्तवबिहार, 12 June 2019
बिहार-राजनीति में माहिर पासवान चंद्रदीप कुमार

पटना में पिछले हफ्ते पत्रकारों से मुखतिब लोक जनशक्ति पार्टी के मुखिया राम विलास पासवान ने कुछ तंज के लहजे में कहा, ''हम तो पहले ही कह रहे थे कि एनडीए सभी 40 सीटें जीत सकती है. आप लोग ही नहीं मान रहे थे.'' लोजपा प्रमुख मानो शिकायत कर रहे थे कि राजनैतिक मौसम विज्ञानी कहे जाने वाले दिग्गज नेता की बात को पहले मीडिया ने उतनी तवज्जो नहीं दी. लोकसभा चुनावों में राज्य की कुल 40 सीटों में 39 एनडीए की झोली में आईं.

दरअसल, राजनैतिक हवा को पढऩे की पासवान की क्षमता ने ही उन्हें देश का एकमात्र ऐसा नेता बना दिया है जिसे छह प्रधानमंत्रियों—विश्वनाथ प्रताप सिंह (9वीं लोकसभा 1989-90), एच.डी. देवेगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल (1996-98, 11वीं लोकसभा), अटल बिहारी वाजपेयी (13वीं लोकसभा), मनमोहन सिंह (14वीं लोकसभा, 2004) और अब दो बार नरेंद्र मोदी (16वीं और17वीं लोकसभा में) के साथ केंद्रीय मंत्री के रूप में काम करने का अवसर मिला है.

पासवान पहली दफा 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में मंत्री बने थे. तब से केंद्र में बनी 12 सरकारों में से सात में पासवान शामिल रहे हैं. गौरतलब यह भी है कि बिहार में सिर्फ 6 से 8 प्रतिशत का सीमित वोट बैंक और कभी भी लोकसभा सीटों की संख्या कभी दोहरे अंकों में न छू पाने वाली पार्टी के नेता के लिए ये उपलब्धियां असाधारण हैं.

पिछले दो दशक में पासवान सिर्फ 2009 से 2014 में केंद्र में यूपीए-2 सरकार का ही हिस्सा नहीं थे. 2009 के आम चुनाव से पहले पासवान ने लालू के साथ गठबंधन करने और कांग्रेस को गठबंधन सहयोगी के रूप में छोडऩे की गलती की. तब वे न केवल लोकसभा चुनाव हार गए थे बल्कि नाराज कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा में प्रवेश करने के बाद भी मंत्री पद देने से इनकार कर दिया था. लेकिन यह भी उनके लिए फायदे की बात रही क्योंकि इससे 2014 के लोकसभा चुनावों से ऐन पहले नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के साथ गलबहियां डालने के रास्ते खुल गए.

पासवान ने शुरू से ही भविष्य को देखने की अद्भुत क्षमता का परिचय दिया है. युवा पासवान को पुलिस उपाधीक्षक के पद के लिए चुना गया था, लेकिन उन्होंने नौकरी नहीं की, जिसे तब बहुत सुरक्षित माना जाता था। 1969 में राजनीति का रुख किया. वे 1969 में बिहार विधानसभा चुनाव लड़े और जीते. उसके बाद 1977 में उन्होंने लोकदल के उम्मीदवार के रूप में अपना पहला लोकसभा चुनाव जीता.

तब से उन्होंने लोगों को दोस्त बनाने में लचक दिखाई है. उनके मित्र सबसे पहले दीवार पर लिखी इबारत पढऩे की उनकी क्षमता की प्रशंसा करते हैं. यहां तक कि उनके कटु आलोचकों के पास भी उनके खिलाफ कहने को ज्यादा कुछ नहीं होता है. पासवान मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह के साथ खड़े थे और दलित आइकन के रूप में उभरे. इन वर्षों में वे लोकदल से जनता दल में गए और फिर अपनी पार्टी बनाई. फिर भी काफी हद तक अपने प्रतिबद्ध मतदाताओं के बूते वे बिहार की राजनीति में अपरिहार्य बने रहे हैं.

गठबंधन की राजनीति का दौर फला-फूला तो इसका सबसे ज्यादा फायदा पासवान ने उठाया. पूरी सूझबूझ के साथ अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि गढऩे की कवायद के बीच उन्होंने राजनीति में हर अवसर का पूरा लाभ भी लिया. उन्होंने 2002 के गुजरात दंगों के बाद वाजपेयी सरकार को अलविदा कह दिया. फिर  जिस नरेंद्र मोदी की खुलकर आलोचना कर चुके थे, 2014 में उन्हीं मोदी के साथ आ मिले. वाजपेयी सरकार को छोड़कर कांग्रेस के साथ जाने का उनका आकलन भी सटीक सिद्ध हुआ. सरकार छोडऩे के फैसले ने उन्हें कांग्रेस का एक स्वाभाविक मित्र बना दिया जो 2004 में एनडीए को हराने के बाद सत्ता में आई थी. इतने वर्षों में उन्होंने रेलवे, संचार और आइटी, खनन, रसायन तथा उर्वरक और उपभोक्ता मामले जैसे बड़े मंत्रालयों को संभाला है.

अनुभवी दलित नेता ने 1977 से हाजीपुर से 11 बार लोकसभा चुनाव लड़ा है और उन्हें नौ बार इस सीट पर जीत मिली है. उनकी एक जीत तो इतनी प्रचंड थी कि उनका नाम सबसे अधिक अंतर से संसदीय चुनाव जीतने के लिए गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शामिल हुआ. वे हाजीपुर से केवल दो बार हारे. 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर में और 2009 में जब लालू प्रसाद के राजद के साथ उनके गठबंधन का फैसला उलटा साबित हुआ.

2019 में जब इस 73 वर्षीय नेता ने चुनावी राजनीति से अलग होने का निर्णय लिया तो अपनी परंपरागत सीट से अपने छोटे भाई पशुपति कुमार पारस को जीत दिलाई. अब वे राज्यसभा के जरिए संसद में जाने की तैयारी कर रहे हैं.

हालांकि पासवान सीमित वोट बैंक पर पकड़ वाले नेता के रूप में जाने जाते रहे हैं और उन्होंने किसी और वोट बैंक में भले ही सेंध न लगाई हो, लेकिन रुझानों से संकेत मिलते रहे हैं कि राजनैतिक सहयोगी के रूप में लोजपा सभी के लिए फायदेमंद साबित हुई है. 1999 के चुनावों में एनडीए के साथ गठबंधन किया तो उसे राज्य की 54 सीटों में से 41 सीटें मिलीं. पांच साल बाद 2004 में वे यूपीए खेमे में गए तो यूपीए की झोली में 29 सीटें आ गईं. 2014 और 2019 में एनडीए की झोली भर गई.

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