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कोरेगांव भीमा जांचः असहमति पर सहमत नहीं

कोरेगांव-भीमा वह जगह है जहां 19वीं सदी की एक लड़ाई का दलितों ने जश्न मनाया था क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी बटालियन के महार योद्धाओं ने सवर्णों की पेशवा सेना को आगे बढऩे से रोक दिया था.
कोरेगांव भीमा जांचः असहमति पर सहमत नहीं असंतोष दबाने की कोशिश? (ऊपर बाएं से क्रमश:) अरुण फरेरा, वरवर राव, गौतम नवलखा और सुधा भारद्वाज
अमरनाथ के. मेनन और किरण डी. तारेनई दिल्ली, 03 September 2018

अगस्त की 28 तारीख को पुणे पुलिस ने बड़े ही सनसनीखेज अंदाज में अनेक शहरों में ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए कई नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों को गिरफ्तार कर उन्हें जेल में डालने की कोशिश की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए अगली सुनवाई तक उन्हें उनके घरों में ही नजरबंद रखने का आदेश जारी कर दिया. रोमिला थापर और प्रभात पटनायक सरीखे बुद्धिजीवियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए पांच जजों की बेंच में शामिल जस्टिस डी.वाइ. चंद्रचूड़ ने कहा कि ‘‘असहमति दरअसल लोकतंत्र का सेक्रटी वॉल्व है.’’

पुलिस का कहना है कि यह कार्रवाई 31 दिसंबर, 2017 को एल्गार परिषद के हुए एक सम्मेलन को आर्थिक मदद मुहैया कराने वालों के बारे में जारी जांच का हिस्सा थी. सम्मेलन में कथित रूप से भड़काऊ भाषण दिए गए थे.

कोरेगांव-भीमा वह जगह है जहां 19वीं सदी की एक लड़ाई का दलितों ने जश्न मनाया था क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी बटालियन के महार योद्धाओं ने सवर्णों की पेशवा सेना को आगे बढऩे से रोक दिया था. गिरफ्तार कार्यकर्ताओं—फरीदाबाद में सुधा भारद्वाज, हैदराबाद में वरवर राव, दिल्ली में गौतम नवलखा और मुंबई में वर्नान गोंजाल्वेज तथा अरुण फरेरा—पर जनवरी में हिंसा फैलाने का आरोप है.

जून में पुणे पुलिस ने कोरेगांव की लड़ाई के जश्न के लिए सम्मेलन करने वालों की ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां की थीं. पुलिस का कहना है कि आयोजकों ने कथित तौर पर चंदा उगाहा और तथाकथित माओवादियों को साजोसामान मुहैया करवाया. इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रचने की बात भी सामने आई. जून और पिछले हफ्ते हुई गिरफ्तारियों का साफ तौर पर आपस में संबंध है, लेकिन पुणे पुलिस हत्या की साजिश के पक्ष में कुछ भी ठोस तथ्य पेश नहीं कर पाई. इन गिरफ्तारियों का कारण रहस्य ही लग रहा था, जिससे सरकार के आलोचकों को इसे बदले की कार्रवाई बताने का मौका मिल गया.

सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद पुणे पुलिस को प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर कहना पड़ा कि उसके पास बातचीत के ऑडियो क्लिप और सनसनीखेज ई-मेल सरीखे पर्याप्त सबूत हैं. पुलिस सूत्रों ने यह भी कहा कि इन कार्यकर्ताओं के प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) से संबंध हैं और वे राज्य के खिलाफ साजिश में शामिल हैं.

पुणे पुलिस ने आश्चर्यजनक रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस में यहां तक कहा कि इन कार्यकर्ताओं ने मौजूदा राजनैतिक व्यवस्था के प्रति ‘गहरी असहिष्णुता’ दिखाई है. भाजपा के एक प्रवक्ता ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर शहरी नक्सलवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगा निंदा की और गिरफ्तार कार्यकर्ताओं की पृष्ठभूमि का जिक्र कर उन पर हमले किए.

लेखिका अरुंधती रॉय और इतिहासकार रामचंद्र गुहा सरीखी शख्सियतों ने पुणे पुलिस की कार्रवाई की व्यापक आलोचना की. मीडिया से बात करते हुए रॉय ने इन गिरफ्तारियों को इमरजेंसी के दिनों जैसा बताया और कहा कि ‘‘देश के हालात बहुत खतरनाक हैं. यह संविधान और हमें मिली स्वतंत्रता के पर आघात है.’’ वकील प्रशांत भूषण ने भी इसे इमरजेंसी से जोड़ा और दावा किया कि सरकार पुलिस के बल पर असहमति वाली आवाजों पर ताला लगाना चाहती है.

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि इन जाने-माने कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां, लगता है ‘‘असल मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने के लिए’’ की गई हैं, जबकि उन्होंने सरकार के लिए कोई खतरा पैदा नहीं किया है. कांग्रेस नेता एस. जयपाल रेड्डी ने कहा कि वे ‘‘हरेक व्यक्ति खासकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अधिकारों का बचाव करते हैं. वे निस्वार्थ कार्यकर्ता हैं और तानाशाही प्रवृत्तियों से गहराते अंधेरे के खिलाफ लड़ रहे हैं.’’

भाजपा समर्थक कांग्रेस की अनुदार प्रवृत्तियों पर उंगली उठाएंगे, लेकिन इससे मौजूदा गिरफ्तारियों से उपजी चिंता का समाधान नहीं होता. 3 जनवरी की जिस प्राथमिकी के आधार पर जून में पांच कार्यकर्ताओं—सुधीर धावले, सुरेंद्र गाड‌लिंग, शोमा सेन, महेश राउत और रोमा विल्सन—की गिरफ्तारियां हुईं, उसे तुषार दामगुड़े ने दायर किया था. दामगुड़े हिंदुत्व के विचारक संभाजी भिडे का समर्थक है, जिन पर कोरेगांव की हिंसा में सबसे पहले संदेह जताया गया था.

हालांकि मुंबई के पूर्व पुलिस आयुन्न्त जूलियो रिबेरो का कहना है कि पुणे पुलिस को ठोस सबूतों के आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए थी. पर पुणे पुलिस आयुक्त के. वेंकटेशम की मानें तो तलाशी और गिरफ्तारी के लिए सारी जरूरी प्रक्रिया पूरी की गई थी.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 6 सितंबर को होनी है और तब पुणे पुलिस को ये गिरक्रतारियां सही ठहरानी होंगी. सरकार के विरोधियों पर ‘शहरी नक्सल’ होने का आरोप जब-तब चस्पां कर दिया जा रहा है, जिससे सरकार का कोई आलोचक बचा नहीं है. इसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से लेकर उमर खालिद और कन्हैया कुमार जैसे छात्र नेता और मानवाधिकार कार्यकर्ता भी शामिल हैं.

पुणे पुलिस का कहना है कि इन कार्यकर्ताओं ने मौजूदा राजनैतिक तंत्र के प्रति ‘गहरी असहिष्णुता’ दिखाई है.

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