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एकता की चुनौती

जेएमएम प्रत्याशी ने सिल्ली और गोमिया विधानसभा सीटों पर अपना कब्जा बरकरार रखा था और यहीं से अगले साल होने वाले आम चुनावों से पहले सत्तारूढ़ भाजपा के लिए चेतावनी की घंटी बजनी शुरू हुई थी.

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aajtak.in
अमिताभ श्रीवास्तवनई दिल्ली, 23 October 2018
एकता की चुनौती एकता की शक्ति झामुमो के हेमंत सोरेन (बीच में) कांग्रेस नेता अजोय कुमार और बंधु टिर्की के साथ एक प्र

अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले विपक्षी दल सत्तारूढ़ भाजपा के सामने नई-नई चुनौतियां पेश कर रहे हैं. झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने जमशेदपुर के सर्किट हाउस में पिछले दिनों विपक्षी दलों के प्रस्तावित महा-गठबंधन को 'अवसरवादियों का एक समूह' बताया. मुख्यमंत्री ने कहा, ''यह कोई गठबंधन नहीं, बल्कि एक ठगबंधन है.''

हालांकि भाजपा विरोधी वोटों का विभाजन रोकने के लिए झारखंड के विपक्षी दलों के आपस में हाथ मिलाने की हालिया पहल को बेअसर बताते हुए दास यही कहते रहे हैं कि विपक्षी दल मिलकर भी भाजपा को चुनौती नहीं दे पाएंगे. पर दास जैसा कह रहे हैं, हकीकत शायद वैसी है नहीं. विपक्षी वोटों का ध्रुवीकरण भाजपा के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकता है.

झारखंड में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं जो लोकसभा चुनावों के साथ या उसके तुरंत बाद हो सकते हैं. झारखंड के विपक्षी दल हेमंत सोरेन की जेएमएम की अगुआई में एक संयुक्त विपक्षी मोर्चा तैयार करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं.

वास्तव में, कांग्रेस ने झारखंड में औपचारिक रूप से जेएमएम के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया है जबकि राजद और बाबूलाल मरांडी की झारखंड विकास पार्टी भी इसका हिस्सा बनने की इच्छुक हैं. अगर सहमति बन जाती है तो पूजा की छुट्टियों के बाद इसकी औपचारिक घोषणा की उम्मीद है और निश्चित रूप से यह महागठबंधन झारखंड में दास के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को कड़ी चुनौती दे सकता है.

कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने झारखंड विकास मोर्चा और राजद के साथ एक व्यावहारिक सीट साझेदारी समझौते पर चर्चा शुरू कर दी है. इसके पीछे आगामी लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनावों के लिए बड़ा गठबंधन बनाने का विचार है.

झारखंड में विपक्ष को एकजुट होने के नए कारण मिल गए हैं. इस साल मई में हुए विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस, बाबूलाल मरांडी के झारखंड विकास मोर्चा और राजद समर्थ‌ित जेएमएम प्रत्याशी ने सिल्ली और गोमिया विधानसभा सीटों पर अपना कब्जा बरकरार रखा था और यहीं से अगले साल होने वाले आम चुनावों से पहले सत्तारूढ़ भाजपा के लिए चेतावनी की घंटी बजनी शुरू हुई थी. उत्साहित जेएमएम प्रमुख हेमंत सोरेन ने जीत का श्रेय विपक्षी एकता को दिया था और कहा था कि इन परिणामों के प्रभाव राज्यभर में महसूस किए जाएंगे.

मई में गोमिया और सिल्ली में जेएमएम की उप-चुनावों में जीत से पहले, जेएमएम और जेवीएम ने मार्च में राज्यसभा चुनावों में कांग्रेस उम्मीदवार धीरज साहू को समर्थन दिया था. बदले में कांग्रेस ने घोषणा की थी कि जेएमएम के नेतृत्व में विपक्षी दल मिलकर 2019 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव लडेंग़े. 2014 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने सीट बंटवारे पर असहमति के कारण चुनावों से पहले संबंध तोड़ दिए थे. दरअसल, उनके अलग-अलग चुनाव लडऩे की वजह से ही 2014 में विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत का रास्ता तैयार हुआ था.

उसके बाद इन दोनों विपक्षी दलों ने अपनी अकड़ कम की और तल्खी मिटाई. कांग्रेस और जेएमएम दोनों ही अब एक-दूसरे के प्रति ज्यादा अनुकूल बनने को तैयार दिखते हैं. अगस्त में, जब झारखंड के कांग्रेस प्रभारी आरपीएन सिंह राज्य के दौरे पर आए तो उन्होंने राज्य में महागठबंधन को मजबूत करने के लिए जेवीएम अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी और राजद की प्रदेश अध्यक्ष अन्नपूर्णा देवी के साथ चर्चा की. जाहिर है, विपक्षी दल भाजपा को तगड़ी चुनौती दिए बगैर अपनी हैसियत नहीं बढ़ा पाएंगे और भाजपा की आगे की राह आसान नहीं दिखती.

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