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जांच की आंच में तपती परीक्षाएं

यूपी में आयोग से चयनित विभिन्न प्रशासनिक पदों, न्यायिक सेवा, इंजीनियरिंग सेवा, उच्च शिक्षा और मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत अधिकारियों का भविष्य सीबीआइ जांच के परिणाम पर निर्भर हो गया है.

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aajtak.in
आशीष मिश्र/ संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 21 February 2018
जांच की आंच में तपती परीक्षाएं फरियादः सीबीआइ अधिकारी को इलाहाबाद में घोटाले से जुड़ी जानकारी देते अभ्यर्थी

सुल्तानपुर के रहने वाले 27 वर्षीय साकेत सिंह इलाहाबाद के मम्फोर्डगंज में रह कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं. वे पिछले दो महीनों से रोज इलाहाबाद में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) के दफ्तर के चक्कर लगा रहे हैं.

साकेत ने पिछले वर्ष प्रवक्ता राजकीय इंटर कालेज (स्क्रीनिंग) परीक्षा-2017 के लिए आवेदन किया था. तय कार्यक्रम के अनुरूप परीक्षा 25 फरवरी को होनी थी लेकिन यूपीपीएससी की भर्तियों की सीबीआइ जांच के आदेश होते ही यह स्थगित हो गई.

साल 2017 में सीबीआइ जांच के आदेश योगी सरकार ने दिए थे. 31 जनवरी की सुबह ठीक साढ़े दस बजे एसपी राजीव रंजन के नेतृत्व में सीबीआइ के नौ सदस्यीय दस्ते के यूपीपीएससी दफ्तर पहुंचते ही सन्नाटा पसर गया. पिछली समाजवादी पार्टी (सपा) सरकार के दौरान अप्रैल 2012 से मार्च 2017 के बीच हुई भर्तियों के रिकॉर्ड कब्जे में लेकर सीबीआइ दल 9 फरवरी को वापस दिल्ली लौट गया.

सीबीआइ जांच की जद में आए आयोग ने 11 फरवरी को प्रस्तावित अपर निजी सचिव (कंप्यूटर ज्ञान) परीक्षा-2013 को स्थगित करने के साथ सम्मिलित राज्य-प्रवर अधीनस्थ सेवा (पीसीएस) परीक्षा-2017 की मुख्य परीक्षा को भी दो महीने के लिए टाल दिया.

साकेत कहते हैं, ''सीबीआइ जांच के बाद से आयोग ने कई परीक्षाएं स्थगित कर दी हैं, जिससे लाखों अभ्यर्थियों का भविष्य अधर में है.'' हालांकि आयोग के सचिव जगदीश परीक्षा टालने की वजह सीबीआइ जांच नहीं मानते. चूंकि केवल इंटरव्यू के जरिए होने वाली सीधी भर्ती की परीक्षाओं में लगे भ्रष्टाचार के आरोप सीबीआइ की सघन जांच के दायरे में हैं. ऐसी स्थिति में आने वाले समय में आयोग की कई और परीक्षाओं के टलने के आसार बन गए हैं.

अत्याधुनिक तकनीकी से जांच

यूपी में आयोग से चयनित विभिन्न प्रशासनिक पदों, न्यायिक सेवा, इंजीनियरिंग सेवा, उच्च शिक्षा और मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत अधिकारियों का भविष्य सीबीआइ जांच के परिणाम पर निर्भर हो गया है.

हाइकोर्ट में सपा शासनकाल में हुई नियम विरुद्ध भर्तियों के खिलाफ याचिका दाखिल करने वाले प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के पदाधिकारी अविनीश पांडेय ने सूचना के अधिकार के जरिए कुछ आंकड़े जुटाए हैं. अविनीश बताते हैं, ''सपा के शासन काल में कुल 580 भर्ती परीक्षाएं हुईं जिनमें 40,000 लोग चयनित हुए है.''

जाहिर है कि आयोग की भर्तियों की सीबीआइ जांच शुरू होते ही इन अधिकारियों में हड़कंप है. सीबीआइ ने आयोग के दफ्तर के कंप्यूटर में मौजूद पिछली भर्तियों का डाटा अपनी हार्डडिस्क में जमा करने के लिए 'फोरेंसिक रिकवरी ऑफ एवीडेंस डिवाइस' (फ्रेड) का इस्तेमाल किया. यह किसी कंप्यूटर में दर्ज डाटा को निकालने का सबसे अत्याधुनिक तरीका है.

सीबीआइ ऐसी चार मशीनें अपने साथ लेकर आई थी. सीबीआइ में तैनात रहे एक डिप्टी एसपी बताते हैं, ''फ्रेड मशीन से यह भी पता लगाया जा सकता है कि कंप्यूटर में दर्ज डाटा से किसी प्रकार की छेड़छाड़ तो नहीं की गई है.''

सीबीआइ टीम ने जब आयोग के कंप्यूटरों की फोरेंसिक जांच गोपनीय विभाग से शुरू की लेकिन शुरुआत में ही कुछ गड़बड़ियों के संकेत मिलने पर इसका दायरा अन्य विभागों तक फैल गया. कंप्यूटर की स्कैनिंग के दौरान सीबीआइ टीम ने संबंधित विभाग के कर्मचारियों से भी गहन पूछताछ की, जिसमें भर्ती प्रक्रियाओं में हुई गड़बडिय़ों की जानकारी भी मिली है.

पूछताछ में सीबीआइ को तीन दलालों के नाम मिले हैं, जो आयोग के प्रतिनिधियों के काफी करीब थे. इसमें शहर का एक कोचिंग संचालक और एक निजी चिकित्सक शामिल है. आयोग से मिले भर्ती संबंधी दस्तावेजों को कब्जे में लेने के बाद सीबीआइ की जांच कई बिंदुओं पर केंद्रित हो गई है. इनमें मुख्य रूप से वे निर्णय जांच के घेरे में आ गए हैं, जो आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अनिल यादव ने परीक्षा प्रक्रिया को दुरुस्त करने के नाम लिए थे.

कर्मचारी से लेकर अधिकारी जांच के दायरे में इलाहाबाद में आयोग के दफ्तर में जांच शुरू करने के बाद सीबीआइ के अधिकारी सीधे मम्फोर्डगंज पहुंचे. यहां फव्वारा चौराहा के पास चाय की दुकान पर बैठकर अधिकारियों ने प्रतियोगियों से आयोग की भर्तियों में गड़बडिय़ों के साक्ष्य मुहैया कराने को कहा.

इसके बाद गोविंदपुर स्थित सर्किट हाउस में बने सीबीआइ के कैंप ऑफिस में अभ्यर्थियों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया. प्रतियोगियों ने सीबीआइ को साक्ष्य के साथ एक शिकायत पत्र सौंपा है जिसमें जिक्र है कि आयोग में अनिल यादव के अध्यक्ष रहने के दौरान इंटरव्यू में सदस्यों से पेंसिल से नंबर देने को कहा गया था.

छात्रों ने सीबीआइ को उस कर्मचारी का नाम बताया जो बाद में पेंसिल से लिखे नंबरों को मिटाकर बदल देता था. उन्होंने इसके अलावा एक अन्य कर्मचारी का नाम भी बताया है जो कंप्यूटर में दर्ज नंबरों के साथ छेड़छाड़ करता था.

छात्रों ने इन कर्मचारियों के साथ आयोग से जुड़े कई अन्य लोगों की संपत्ति का ब्यौरा भी दिया है, जो उनकी आय से बिल्कुल भी मेल नहीं खाता है. आयोग के दो पूर्व सचिव अनिल कुमार यादव और रिजवानुर्रहमान भी सीबीआइ के निशाने पर हैं.

प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के पूर्व अध्यक्ष अयोध्या सिंह बताते हैं, ''आयोग के सचिव का पद आइएएस स्तर का है लेकिन सपा सरकार ने काफी जूनियर अधिकारी को इस पर तैनात किया. इसके विरोध के बावजूद जब सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की तो कोर्ट के आदेश पर रिजवानुर्रहमान को हटना पड़ा था.''

सीबीआइ को आयोग में परीक्षकों की मनमानी नियुक्ति कर मूल्यांकन में गड़बड़ी की जानकारी भी मिली है. प्रतियोगियों से मिली सूचनाओं को भी केंद्र में रखकर अब सीबीआइ आयोग से मिले डाटा का विश्लेषण करेगी. इस प्रक्रिया में एक माह तक का समय लग सकता है. इसके बाद सीबीआइ आयोग के पूर्व अध्यक्षों और सचिवों से पूछताछ शुरू करेगी.

इस तरह कस रहा जांच का शिकंजा

आरक्षण

यूपीपीएससी की भर्ती परीक्षाओं में आरक्षण प्रक्रिया जा ंच के दायरे में है. अगर आरक्षण तय करना कार्मिक विभागों की जिम्मेदारी हैतो उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग किस आधार पर लंबे समय तक

यह काम खुद करता रहा. कई बार आरक्षित पदों की संख्या मेंअचानक फेरबदल भी हुए. इसका आधार क्या था?

इंटरव्यू

सीबीआइ को इंटरव्यू में गड़बड़ी के साक्ष्य मिले हैं. पीसीएस-2011 की मुख्य परीक्षा में त्रिस्तरीय आरक्षण पर हुए विवाद के बाद दोबारा परिणाम घोषित हुआ. सामान्य वर्ग के 151 नए अभ्यर्थी सफल घोषित हुएलेकिन इन अभ्यर्थियों को इंटरव्यू में काफी कम नंबर मिलेजिससे इनमें से कोई सफल नहीं हुआ.

स्केलिंग

यूपीपीएससी की परीक्षाओं में लागू स्केलिंग से एक ही विषय में एक समान अंक पाने वाले दो परीक्षार्थियों के अंक किस प्रकार से घट-बढ़ जाते हैं? घटे और बढ़े अंकों में ज्यादा अंतर क्यों होता है? इसमें भी गड़बड़ी की आशंका है. जटिल स्केलिंग को समझने के लिए सीबीआइ दस्ता दूसरी संस्थाओं के विशेषज्ञों की मदद लेगा.

ओटीपी

यूपीपीएससी की परीक्षाओं में पहले कोई भी अभ्यर्थी दूसरे अभ्यर्थी का अंकपत्र देख सकता था. वर्ष 2013 में लागू नई व्यवस्था के अनुसार अंकपत्र देखने के लिए अभ्यर्थी को 'वन टाइम पासवर्ड' (ओटीपी) दिया जाने लगा. दो वर्ष तक लागू रही इस व्यवस्था के जरिए गड़बड़ियों को छिपाने के साक्ष्य सीबीआइ को मिले हैं.

कोडिंग

उत्तर पुस्तिकाओं की कोडिंग में भी हेरफेर के संकेत मिले हैं. पीसीएस-2015 की मुख्य परीक्षा के परिणाम में सुहासिनी बाजपेयी को असफल घोषित किया गया. आरटीआइ के तहत जानकारी मांगने पर

पता चला कि कोडिंग की गड़बड़ी के चलते सु हासिनीकी कॉपी दूसरे अभ्यर्थी से बदल गई थी.

जाति

वर्ग—वर्ष 2014 से 2016 के बीच यूप यूपीएससी की पर परीक्षाओं के अंतिम परिणाम में सफल अभ्यर्थियों के नाम के आगे जाति-वर्ग न लिखकर पारदर्शिता से बचा गया. रोलनंबर और रजिस्ट्रेशन नंबर के आधारपर ही परिणाम घोषित होने से धांधली के आरोपों कीजांच पर सीबीआइ ने ध्यान लगाया है.

लंबी चलेगी जांच

पीसीएस-2015 की प्रारंभिक परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होने की जांच एसटीएफ अभी तक पूरी नहीं कर पाई है. वहीं आयोग की आरओ-एआरओ प्रारंभिक परीक्षा का आयोजन 27 नवंबर, 2016 को हुआ था. इसमें दो लाख से अधिक अभ्यर्थी शामिल हुए थे. परीक्षा का पेपर लीक होने की जांच सीबीसीआइडी कर रही है. वह भी अभी तक इस पर अपनी जांच रिपोर्ट नहीं दे पाई है और परीक्षा परिणाम भी रुका हुआ है.

अविनीश पांडेय ने सीबीआइ अधिकारियों से प्रश्नपत्र लीक प्रकरण की जांच करने का निवेदन किया था. अब प्रतियोगी छात्र इस प्रकरण की सीबीआइ जांच के लिए भी शासन का दरवाजा खटखटाने जा रहे हैं. उधर, समाजवादी छात्र सभा ने भी सीबीआइ को ज्ञापन देकर वर्ष 1990 से अब तक आयोग की सभी भर्तियों की जांच करने को कहा है.

इलाहाबाद में सपा के युवा नेता अभिषेक यादव कहते हैं, ''यह जांच होनी चाहिए कि आयोग में मंडल कमीशन की सिफारिशों के अनुरूप आरक्षण लागू किया गया है कि नहीं.'' बहरहाल सीबीआइ ने जिस तरह से तैयारी की है उससे जांच के लंबे खिंचने के आसार हैं. सीबीआइ के सामने सबसे बड़ी चुनौती आयोग की भर्ती प्रक्रियाओं में हुई गड़बडिय़ों की सारी कडिय़ां आपस में मिलाने की है.

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