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भारत-पाकिस्तान: नवाज शरीफ की शराफत के सोचे-समझे जोखिम

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के पांव अब जमे हुए हैं, वे मोदी की ओर हाथ बढ़ाने के खतरे झेलने को भी तैयार हैं. उफा से आगे की राह इस पर निर्भर करती है कि दोनों पक्ष कितनी मजबूती से उस पर टिके रहते हैं

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aajtak.in
जाहिद खान 20 July 2015
भारत-पाकिस्तान: नवाज शरीफ की शराफत के सोचे-समझे जोखिम शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन समिट उफा में नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ

भारत के साथ रिश्तों को आगे बढ़ाने का मामला हो तो पाकिस्तानी नेताओं के लिए वह अग्निपथ के समान हो जाता है. इस बात को प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से बेहतर भला और कौन समझ सकता है. वे एक बार सत्ता खो चुके हैं और उन्होंने एक बार फिर उसे दांव पर लगा दिया है. उन्होंने तय किया है कि रिश्तों की डोर को 1999 में उन्होंने जहां छोड़ा था, वहीं से आगे बढ़ाएंगे. अपने देश में घोर संशय को दरकिनार करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने का न्योता स्वीकार किया. उसके बाद सब बेकार चला गया. विदेश सचिव स्तर की बातचीत की बहाली में रुकावट आ गई और सख्त बयानों ने माहौल को खट्टा कर दिया.
उफा शिखर बैठक के दौरान दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच मुलाकात की भारत की तरफ से की गई पहल ने इस गतिरोध को तोड़ा. लेकिन दोनों ओर की गरमागरमी की वजह से पिछले एक साल से कायम तनाव की पृष्ठभूमि ने इस बैठक से उम्मीदें बनने नहीं दीं. पाकिस्तान में माहौल में खासा बदलाव है और यह धारणा लगातार बढ़ रही है कि नए भारतीय नेता को आगे बढऩे में कोई दिलचस्पी नहीं है.

जून में ढाका में मोदी के भाषण और फिर पाकिस्तान की एक अदालत के 2008 के मुंबई हमलों के कथित मास्टरमाइंड जकीउर रहमान लखवी की रिहाई साफ तौर पर रिश्तों में आई गिरावट का संकेत थे. खास तौर पर पाकिस्तानी लोग भारतीय नेतृत्व के हमलावर तेवरों से आशंकित थे. जाहिर था, इसलिए जब वे उफा शिखर बैठक के लिए गए तो शरीफ पर काफी दबाव था. इसलिए कोई हैरत की बात नहीं कि बैठक के नतीजे से पाकिस्तान में काफी गुस्सा उपजा है. वहां तमाम विपक्षी दलों ने शरीफ पर भारतीय इशारे पर चलने का आरोप लगाया है. भारतीय प्रधानमंत्री की ओर कई कदम बढ़कर जाने वाली उनकी चाल से लेकर संयुक्त वक्तव्य की शब्दावली तक, शरीफ पर कई गहरे निशाने साधे गए हैं.

तलवारें तो उसी समय खिंच गई थीं जब दोनों नेताओं ने हाथ मिलाए थे. पूर्व गृह मंत्री और अब पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) के सीनेटर रहमान मलिक का एक ट्वीट वायरल हो गया था. उसमें उन्होंने कहा, ''हमारे प्रधानमंत्री को लंबे गलियारे में चलकर जाना पड़ा और नरेंद्र मोदी ने इतनी भी शालीनता नहीं दिखाई कि वे आगे बढ़कर उनकी अगवानी करते.'' बैठक के बाद दोनों विदेश सचिवों के संयुक्त वक्तव्य से तो मानो हमलों की बौछार-सी हो गई. विपक्षी नेताओं ने शरीफ पर घुटने टेकने का आरोप लगाया. इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी की प्रवक्ता शीरीन मजारी भी कहां पीछे रहने वाली थीं. उन्होंने आरोप लगाया, ''वह भारतीयों का लिखा एक मसौदा था जिस पर हमारे प्रधानमंत्री ने दस्तखत कर दिए.'' मजारी ने महसूस किया कि भारतीय शासनाध्यक्ष को पाकिस्तान की यात्रा का शरीफ का न्योता गैर-जरूरी और ''कूटनीतिक शिष्टाचार की जरूरतों से आगे बढ़कर था'' क्योंकि वह सामान्य नियमित प्रक्रिया के तौर पर भी आगे जा सकता था. विपक्षी नेता कश्मीर मुद्दे पर खामोशी से भी उतने ही परेशान थे.

कई आलोचक जिस बात से गहरी निराशा जाहिर करते हैं, वह यह थी कि लंबित मसलों को निबटाने के साथ-साथ संयुक्त (कंपोजिट) बातचीत की फिर से शुरुआत के किसी संकेत का भी कोई जिक्र नहीं था. मोदी की कूटनीतिक कामयाबी का ढोल पीट रहे कई भारतीय टीवी विश्लेषकों ने इन भावनाओं को और भड़काया. इन टिप्पणियों से इस धारणा को मजबूती मिली कि बैठक के बाद का बयान पूरी तरह से एकतरफा था. भारत में पूर्व पाकिस्तानी उच्चायुक्त अशरफ जहांगीर काजी ने ऐलान कर डाला, ''संयुक्त बयान एक गैर-जरूरी त्रासदी था.''

इसलिए यकीनन उफा बैठक ने फिर से शरीफ को बैकफुट पर ढकेल दिया है. इसके बावजूद उनकी ओर से इस बात का कोई संकेत नहीं है कि वे आलोचनाओं से झुककर कदम पीछे खींचने पर विचार कर रहे हैं. उनका यकीन शायद इस पर टिका है कि उनकी सरकार राजनैतिक रूप से पिछले साल की तुलना में इस समय कहीं ज्यादा स्थिर है. सरकार पिछले साल इमरान खान और मौलवी ताहिरुल के समर्थकों के राजधानी इस्लामाबाद की घेराबंदी से उपजे संकट से पहले ही उबर चुकी है. पंजाब सूबे में ज्यादातर उपचुनाव में पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) की कामयाबी से भी सरकार की स्थिति मजबूत हुई है. अर्थव्यवस्था भी स्थिर दिखाई देती है, हालांकि उछाल लेना अभी बाकी है. लगभग चार फीसदी की आर्थिक विकास दर पिछले छह साल में सर्वाधिक है और मुद्रास्फीति भी आठ साल के न्यूनतम स्तर पर है.

चीन के साथ पाकिस्तान के बढ़ते आर्थिक रिश्तों और ढांचागत विकास में 46 अरब डॉलर के चीनी निवेश के समझौते ने शरीफ की सार्वजनिक हैसियत में और इजाफा किया है. इस बीच आतंकवादी हमलों में जाहिरी गिरावट आई है और उत्तरी वजीरिस्तान में तालिबान बागियों के खिलाफ चल रहा सैन्य अभियान भी अंतिम चरण में है. इस वजह से आतंकी सुरक्षा ठिकानों को निशाना बनाकर कोई बड़ी वारदात करने में नाकाम हो चुके हैं. हाल के महीनों में अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान के रिश्तों में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है जिससे हुकूमत पर से दबाव और कम हुआ है. पाकिस्तान ने तालिबान प्रतिनिधियों और अफगान सरकार के अधिकारियों के बीच ऐतिहासिक सीधी बातचीत की मेजबानी भी की, जिससे दोनों पक्षों के बीच कारगर शांति वार्ता की शुरुआत की उम्मीद जगी है.

अहम यह है कि सेना के साथ शरीफ के रिश्ते पिछले साल की तुलना में कहीं बेहतर हैं. यकीनन, इसकी वजहों में से एक सरकार का यह फैसला भी है कि वह जनरल परवेज मुशर्रफ के खिलाफ देशद्रोह का अभियोग नहीं लगाएगी, जो दरअसल सैन्य नेतृत्व के साथ तनाव की एक बड़ी वजह था. बड़ी बात यह है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे को जगह दे रहे हैं. यह बात सही है कि शरीफ ने खुद को ज्यादा झुकाया है लेकिन सेना ने भी खुद को राजनैतिक ताकत के खेल से बाहर ही रखा है.

यकीनन जब देश को बगावत की स्थिति और आतंकवादी खतरे का सामना करना पड़ रहा हो तो आंतरिक सुरक्षा में सेना की भी अहम भूमिका हो जाती है. लंबे समय तक सेना सुरक्षा और विदेश नीति के अहम पहलुओं में निर्णायक भूमिका निभाती रही है. यह भी एक मिथक ही है कि नागरिक सरकार की इन नीतियों को बनाने में कोई भूमिका नहीं होती.

यह सही है कि जब भारत के मामले में नीति की बात हो तो सेना को साथ लेना जरूरी है और शरीफ को उफा बैठक पर सेना के शीर्ष कमांडरों को भरोसे में लेना चाहिए था. यकीनन, नजरिए में थोड़ा मतभेद अब भी हो सकता है, लेकिन सेना रिश्तों को सामान्य बनाने की ऐसी किसी भी प्रक्रिया में कोई अड़ंगा नहीं लगाएगी जिससे तनाव कम हो और उसको बढ़ते आतंकवाद पर ध्यान केंद्रित करने का मौका मिल सके. और फिर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह करगिल की लड़ाई के सूत्रधार मुशर्रफ ही थे जिन्होंने 2004 में भारत के साथ शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाया था. कश्मीर के मुद्दे पर कोई अन्य पाकिस्तानी नेता इतना लचीलापन नहीं दिखा सकता था जितना एक सैन्य शासक ने दिखाया था. इसमें कोई संदेह नहीं कि मुंबई पर हुए आतंकवादी हमलों ने उस प्रक्रिया को उलट दिया लेकिन आगे बढऩे का एक मौका तो हमेशा मौजूद रहता है.

संयुक्त बयान पर हो रही आलोचनाओं से परे, इस बात पर तो सभी प्रमुख दलों में आम सहमति है कि दोनों देशों के लिए इस गतिरोध से बाहर आने का एकमात्र रास्ता बातचीत का ही है. भारत एक कदम आगे बढ़ाए तो शरीफ दो कदम आगे आने को तैयार हैं. दोनों ही देशों के लिए ज्यादा सार्थक बातचीत की दिशा में बढऩे की जरूरत है. बहुत कुछ इस पर भी निर्भर करेगा कि उफा में जताई गई प्रतिबद्धताओं पर और दोनों देशों के बीच तनाव के मुख्य स्रोत पर ध्यान देने के लिए बातचीत को फिर शुरू करने की दिशा में कितनी तरक्की होती है.

(लेखक वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार और राजनैतिक विश्लेषक हैं)

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