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मैं या मेरा बेटा सीएम: शिबू सोरेन

झारखंड में राष्ट्रपति शासन लागू हो चुका है लेकिन सत्ता में वापसी की शिबू सोरेन की आस अब भी बरकरार है.

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aajtak.in
अमिताभ श्रीवास्तवरांची, 11 March 2013
मैं या मेरा बेटा सीएम: शिबू सोरेन शिबू सोरेन

जब पिछले हफ्ते केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) ने कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में शिबू सोरेन से पूछताछ की तो झारखंड के राजनैतिक हलकों में इसे मुख्यमंत्री पद के लिए बेताब बुजुर्ग के लिए एक सख्त चेतावनी की तरह देखा गया. यह पूछताछ 2006 में सोरेन के केंद्रीय कोयला मंत्री रहने के दौरान हुए आवंटन के बारे में की गई. झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के एक नेता के मुताबिक असल में यह कांग्रेस का सोरेन को यह संदेश देने का तरीका है कि वे हद में रहें और झारखंड में सरकार बनाने के लिए किसी अन्य दल से हाथ मिलाने का ख्याल छोड़ दें.

जेएमएम के 69 वर्षीय मुखिया सोरेन को उनके राजनैतिक जीवन के पतझड़ में कांग्रेस ने एक बार फिर गच्चा दिया है. सोरेन की वजह से झारखंड लंबे समय तक राष्ट्रपति शासन के रास्ते पर कदम बढ़ा चुका है. इस साल 7 जनवरी को अर्जुन मुंडा के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार से समर्थन खींचने के बाद सोरेन ने जोर देकर कहा था कि वे जरूरी बहुमत जुटा लेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

मुंडा सरकार के गिरने के बाद कांग्रेस ने राज्य की सत्ता से बीजेपी को बाहर करने का अपना प्राथमिक लक्ष्य हासिल कर लिया. लेकिन कांग्रेस को लगता है कि आम चुनाव में सिर्फ एक साल रहने की वजह से निर्दलीय विधायकों के समर्थन से जेएमएम के नेतृत्व वाली सरकार बनाकर 'दागियों के साथ जुडऩे’ का जोखिम उठाने की जगह झारखंड में राष्ट्रपति शासन ज्यादा सहज रहेगा.

15 नवंबर, 2000 को झारखंड के गठन के बाद से यहां आठ सरकारें आ चुकी हैं. हर बार सत्ता बदलने में सोरेन या तो वजह होते हैं या उन्हें इससे फायदा होता है. रांची स्थित विशाल सरकारी बंगले में जाड़े की गुनगुनी धूप का आनंद लेते हुए सोरेन से जब हमने यह पूछा कि क्या कांग्रेस पर भरोसा करने के मामले में वे बहुत भोले साबित हुए हैं, तो उन्होंने व्यंग्यपूर्ण हंसी के साथ कहा, ''मैंने हमेशा उनका समर्थन किया, लेकिन बदले में कांग्रेस ने कभी ऐसा व्यवहार नहीं किया जैसा उसे करना चाहिए था.”

कांग्रेस के साथ सोरेन का यह खेल 1993 से ही चल रहा है, जब उन्होंने अपनी पार्टी के तीन सांसदों के साथ वोट देकर संसद में हुए बहुमत परीक्षण में पी.वी. नरसिंह

राव सरकार को गिरने से बचाया था. 2008 में भी सोरेन ने मनमोहन सिंह सरकार को बचाया, जब भारत-अमेरिका परमाणु करार के विरोध में वाम दलों ने उससे समर्थन वापस ले लिया था.

लेकिन दोनों ही मौके उनके लिए अचानक हुए लाभ से ज्यादा साबित नहीं हुए. अपने पूर्व सचिव शशिनाथ झा की हत्या के आरोप में दोषी साबित होने पर सोरेन को 2006 में केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा था. लेकिन अगस्त, 2007 में इसी मामले से बरी होने के बावजूद उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया. मनमोहन सरकार को बचाने के बदले सोरेन ने कांग्रेस से झारखंड के मुख्यमंत्री का पद मांगा, जो उन्हें मिल भी गया.

राजनैतिक अवसरवाद से अकसर उन्हें सत्ता तो मिली लेकिन थोड़े समय के लिए ही. सोरेन ने कभी भी कार्यकाल पूरा नहीं किया, चाहे वह केंद्र में रहे हों या राज्य में. विभिन्न पदों पर रहने के दौरान उन्हें छह बार इस्तीफा देना पड़ा है—तीन बार केंद्रीय मंत्री पद से और इतनी ही बार झारखंड के मुख्यमंत्री पद से. पहली बार वे मुख्यमंत्री पद पर सिर्फ नौ दिन तक ही रह पाए क्योंकि वे बहुमत साबित करने में नाकाम रहे थे. उनका दूसरा कार्यकाल 144 दिनों तक चला, तमाड़ उप-चुनाव में हार जाने की वजह से उन्हें जनवरी, 2009 में इस्तीफा देना पड़ा. सोरेन का पिछला कार्यकाल सबसे लंबा 152 दिनों का था, जब लोकसभा में उनके कांग्रेस को बचाने से नाराज बीजेपी ने मई, 2010 में राज्य सरकार से समर्थन वापस ले लिया.

सोरेन ने झारखंड की कमान अपने हाथ में रखने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता लालू प्रसाद यादव का समर्थन हासिल करने से लेकर बीजेपी से पींगें बढ़ाने तक. राज्य के गठन से 11 दिन पहले उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी से मिलकर उनके पांव भी छुए, लेकिन झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बनने के लिए वे बीजेपी का समर्थन हासिल करने में नाकाम रहे. उन्होंने बार-बार मनमोहन सिंह सरकार को बचाया है. राज्य बनाने के लिए संघर्ष का नेतृत्व करने वाले इस व्यक्ति को बिहार से अलग हुए झारखंड में सत्ता का ज्यादा फायदा मिलता रहा है.

राज्य की 82 सदस्यों वाली विधानसभा में जेएमएम के 18 विधायक हैं. सरकार बनाने के किसी जोड़-तोड़ में अब भी पार्टी की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी. अब जबकि झारखंड के सभी राजनैतिक दल सोरेन को अविश्वसनीय, मनमौजी, और कृतघ्न मान रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सोरेन खुद को कभी न हारने वाला मानते हैं. उनका कहना है, ''हमें झारखंड के लिए संघर्ष करते रहना होगा. मैं आपको अगली सरकार का स्वरूप नहीं बता सकता. लेकिन हम दोनों में से कोई (वह या उनके बेटे हेमंत) मुख्यमंत्री बन सकता है.”

झारखंड में पासा अब भी फेंका जा रहा है. कांग्रेस चाहती है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन बना रहे. बीजेपी भी इसके पक्ष में है, लेकिन वह चाहती है कि विधानसभा भंग कर दी जाए और नए चुनावों की घोषणा की जाए.

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