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हिमाचल प्रदेशः देर से जागी सरकार

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने मामले के संज्ञान में आने पर एनडीआरएफ को चॉपर भेजने के आदेश दिए तब जाकर राहत मिली. बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन के जोरदार बचाव कार्य के कारण ही मामला संभल गया.

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डी.डी. गुप्तानई दिल्ली, 10 October 2018
हिमाचल प्रदेशः देर से जागी सरकार आपदा की मार हाल में हिमाचल में बारिश और भूस्खलन का कहर

हिमाचल प्रदेश में भारी बारिश और पर्वतीय क्षेत्र में हिमपात की वजह से जीवन अस्त-व्यस्त हो गया. लेकिन भारी नुक्सान को रोका जा सकता था. मौसम विभाग और सैटेलाइट सूचनाओं के मिलने के बाद राज्य राजस्व महकमे ने करीब सप्ताह भर पहले ही प्राकृतिक आपदा की संभावना जता दी थी. इसके सर्कुलर भी जारी हो गए थे, लेकिन फिर भी पर्यटक स्थलों, खास कर बर्फबारी संभावित इलाकों में लोगों की आवाजाही को मॉनिटर नहीं किया गया, खासकर कुल्लू-मनाली जैसे जिलों में, जहां अक्सर सितंबर के महीने में पर्यटक जाते हैं.

22 और 23 सितंबर को मूसलाधार बारिश से अनुमान लग गया था कि आने वाले दो दिन और खतरनाक हो सकते हैं. इसके दो कारण थे. पहला, यह कि प्रदेश में इन दिनों बहुत जगहों पर सड़कों के फोर लेन बनाने का काम हो रहा है, लिहाजा पहाडिय़ां तो दरकेंगी ही. वहीं थोक में बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं के डैम खोलने ही होंगे. ऐसे में नुक्सान की पूरी आशंका थी.

मूसलाधार बारिश के बीच 23 सितंबर को शिमला के ऐतिहासिक रिज मैदान में समर फेस्टिवल के दौरान गीतकार मोहित चौहान की धुनों के बीच मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और उनकी सरकार मुग्ध हो रही थी, दूसरी ओर पहाड़ बारिश से तहस-नहस हो रहे थे. उसी रात भारी बर्फबारी से रोहतांग दर्रा बंद हो गया और कबायली क्षेत्र लाहुल घाटी में पर्यटक फंस गए. वहां रॉग-टॉग ग्लेश्यिर में शोध करने गए पर्यटक और बंगाल के ट्रेकर भी फंस गए.

शिमला परवाणू निर्माणाधीन फोरलेन सहित कुल्लू-मनाली, लेह, हिंदुस्तान-तिब्बत मार्ग और नाहन-शिमला रोड भी बंद हो गया. पूरा चंबा जिला बंद रहा और कई बसें फंस गईं. जिस रात शिमला में जलसा चल रहा था तब मंडी के पंडोह, चंबा के चमेरा भाखड़ा व्यास बांध और कांगड़ा के सानन में डैम का स्तर खतरे के निशान से ऊपर बहने लगा. तब तक यह किसी भी जिला प्रशासन को पता नहीं था कि पर्यटक कहां-कहां फंसे हैं. बाद में पता चला कि आइआइटी के कुछ छात्र और बौद्ध भिक्षु भी केलांग और चंद्रताल में फंस गए हैं. इस बीच 25 सितंबर तक 5 लोग मर चुके थे.

ऐसे हाल में भी सड़क किनारे के मकानों को खाली नहीं करवाया गया और गाडिय़ों को नदी किनारों से नहीं हटाया गया. स्थिति बिगड़ गई, तब जाकर सरकार को होश आया और केंद्र सरकार के समक्ष यह मुद्दा पहुंचा. केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने मामले के संज्ञान में आने पर एनडीआरएफ को चॉपर भेजने के आदेश दिए तब जाकर राहत मिली. बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन के जोरदार बचाव कार्य के कारण ही मामला संभल गया. 27 सितंबर को स्पीति में 74 लोग एयरलिफ्ट किए गए तो 400 लोगों को रोहतांग टनल से निकाला गया. कुल मिलाकर, 6 दिन की जदोजहद में काफी कुछ बचा लिया गया.

दरअसल, हिमाचल में आपदाएं आना काई नई बात नहीं है. कुछ साल के अंतराल के बाद राज्य में आपदा आती रहती है. प्रदेश सरकार ने 4 अगस्त 2018 को प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा था कि उन्हे एनडीआरएफ की बटालियन दी जाए. राज्य के डिजास्टर मैनेजमेंट प्लान में लिखा है कि जुलाई, 2000 में सतलुज में बाढ़ आने से 140 लोग मारे गए थे. अगस्त, 2004 में भी सतलुज किनारे से 1,400 लोग हटाए गए थे. 2005 में कृत्रिम झील पारछू के टूटने से 5 पुल बह गए थे. यह क्रम दो दशको से चल रहा है. फिर भी प्रदेश में लोग नदियों के किनारे बस रहे हैं. नदियों में खनन होता है, वहीं सड़क निर्माण और फोर लेन का काम चल रहा है, ऐसे में पहाड़ दरक रहें है लेकिन फिर भी इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है.

इसके अलावा, सरकारी विभागों में भी सामंजस्य की कमी है. राज्य के जिला उपायुक्तों की टीम के जरिए पीडब्ल्यूडी व आइपीएच या विद्युत विभाग के साथ समन्वय और सूचना प्राप्त करने की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है. वहीं भू-स्खलन संभावित क्षेत्र को दुरुस्त नहीं किया गया और नदियों के तटीकरण की व्यवस्था सही नहीं थी. ऐसे में दुर्घटनाएं हुई तो राज्य को एनडीआरएफ और केंद्र सरकार की मदद मांगनी पड़ी.

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर कहते हैं, ''केंद्र ने हिमाचल को आपदा के वक्त मदद पहुंचाई. हम उनके आभारी हैं.'' वहीं बारिश के दौरान 15वां वित्त आयोग हिमाचल के दौरे पर था. उसने राज्य के बढ़ते कर्ज पर चिंता तो जताई, पर राज्य को उसकी सहानुभूति भी मिल गई कि राज्य में आपदाएं आती रहती हैं. मुख्य सचिव बी.के. अग्रवाल कहते हैं, ''हमने आपदा से निपटने को हर संभव प्रयास किए. तीन सप्ताह में सभी मार्ग शुरू हो जाएंगे.'' पर जाहिर है, सरकार को आपदा से निबटने के लिए अपनी मशीनरी दुरुस्त करने और स्थायी समाधान निकालने की जरूरत है.

आपदा की वजह से कुल्लू मनाली के होटल कारोबारी भी परेशान हैं. उनके होटलों की लाखों रुपये की बुकिंग रद्द हो गई हैं.

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