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अकालियों की नई राजनीति

सिखों की सर्वोच्च संस्था एसजीपीसी में आमूलचूल बदलाव होता दिख रहा है

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aajtak.in
मंजीत ठाकुर/ संध्या द्विवेदी पंजाब, 15 December 2017
अकालियों की नई राजनीति प्रजोत गिल

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर के सुदूर छोर पर स्थित ऐतिहासिक तेजा सिंह समुंदरी हॉल में 29 नवंबर को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के सालाना चुनाव के समय ज्यादा चहल-पहल दिख रही थी. एसजीपीसी सिखों की सर्वोच्च संस्था है, जो कि ज्यादातर सिख धर्मस्थलों और संस्थाओं का संचालन करती है. सभी को चकित करते हुए एसजीपीसी की 170 सदस्यीय आमसभा ने आमूलचूल बदलाव का कदम उठाते हुए 15 सदस्यीय कार्यकारी समिति में से 2 के अलावा बाकी सभी को बाहर कर दिया. इनमें अध्यक्ष किरपाल सिंह बाडुंगर भी शामिल हैं, जो लंबे समय से बादल परिवार के वफादार हैं.

गोविंद सिंह लोंगोवाल को नया अध्यक्ष बनाया गया, जो कि 1980 के दशक में अकाली दल के अध्यक्ष रहे हरचंद सिंह लोंगोवाल के दत्तक पुत्र हैं. हालांकि 60 वर्षीय लोगोंवाल को सिखों की इस सबसे ताकतवर संस्था का अध्यक्ष बनाने से समस्या खड़ी हो सकती है. वे 1997 से 2002 तक अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी की सरकार में मंत्री रहे हैं, लेकिन उन्हें सिख गुरुद्वारों के संचालन का वास्तव में कोई अनुभव नहीं है.

इसके अलावा, एसजीपीसी के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि समुदाय की सर्वोच्च संस्था अकाल तख्त से 'तनखैया' घोषित किसी जत्थेदार को इस संस्था का प्रमुख बनाया गया हो. फरवरी में हुए विधानसभा चुनाव में सुनाम (संगरूर) सीट पर हार का स्वाद चखने वाले लोगोंवाल शिरोमणि अकाली दल, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के उन कुछ नेताओं में से थे जिन्हें डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम से समर्थन मांगने के आरोप में 'समाज से बहिष्कृत' कर दिया गया था. असल में अकाल तख्त ने बाकायदा एक हुक्मनामा जारी किया था कि कोई भी सिख डेरा सच्चा सौदा से संपर्क नहीं रखेगा, इसके बावजूद इन नेताओं ने राम रहीम से संपर्क किया.

दिलचस्प यह है कि जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह, लोंगोवाल को इस पद पर बैठाने के कदम का बचाव करते हुए दावा करते हैं कि उन्होंने ''माफी मांग ली थी और उन्हें माफ कर दिया गया है.'' नए एसजीपीसी प्रमुख भी इस बात पर जोर देते हैं कि उन्होंने ''कभी भी डेरा सच्चा सौदा से सहयोग नहीं मांगा है.''

अब इस नियुक्ति के बाद इस बात को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं कि अकाली दल के नेतृत्व नेकृपूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उनके बेटे सुखबीर बादल का एसजीपीसी में काफी दखल है—आखिर लोंगोवाल का चयन क्यों किया. राजनीतिक विश्लेषक जगतार सिंह का मानना है कि यह बादल परिवार का सोचा-समझा कदम है ताकि विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी सिख राजनीति पर उसकी पकड़ बनी रहे. शिरोमणि अकाली दल के सूत्रों के अनुसार, विधानसभा चुनाव में हार के ठीक बाद बादल गांव में पार्टी की कोर कमेटी की एक बैठक हुई थी, जिसमें पूर्व केंद्रीय मंत्री और संगरूर जिले के नेता सुखदेव सिंह ढींढसा ने यह मांग की थी कि सुखबीर बादल को चुनाव में हुई हार की जिम्मेदारी लेनी चाहिए.

जगतार सिंह कहते हैं, ''लोंगोवाल भी संगरूर के हैं और शायद ढींढसा के पर कतरने के लिए यह सुखबीर बादल का दांव हो.'' लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि राजनीतिक बागियों को निबटाने से भी ज्यादा सत्ता से बाहर हो चुके अकाली दल नेतृत्व के लिए यह जरूरी हो गया था कि वह एसजीपीसी में किसी 'दब्बू' आदमी को रखे. बताया जाता है कि लंबे समय तक बादल परिवार का वफादार रहने के बावजूद पिछले अध्यक्ष 75 वर्षीय किरपाल सिंह बाडुंगर ने अपनी रीढ़ सीधी रखनी शुरू कर दी थी.

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