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अब योगी का निकाय राजयोग

नगर निकाय चुनावों में भाजपा के शानदार प्रदर्शन ने योगी आदित्यनाथ को अपने विकास एजेंडे को आगे बढ़ाने का अवसर दिया

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aajtak.in
आशीष मिश्र/ संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर उत्तर प्रदेश, 15 December 2017
अब योगी का निकाय राजयोग मनीष अग्निनत्री

एक दिसंबर को उत्तर प्रदेश के 652 शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव परिणाम घोषित किए गए. यह एक दुर्लभ अवसर था, जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लखनऊ के अपने 5, कालिदास मार्ग निवास से बाहर नहीं निकले. तीन बजे के बाद तक नहीं, वे तब बाहर निकले, जब 16 बड़े शहरों के नगर निगमों में से 14 में भाजपा को आधिकारिक रूप से विजयी घोषित किया गया. उसके बाद ही मुख्यमंत्री अन्य पार्टी नेताओं के साथ जीत का जश्न मनाने के लिए बाहर निकले.

चुनाव प्रचार के दौरान योगी आदित्यनाथ ने पूरे राज्य को छान डाला और 30 से ज्यादा सार्वजनिक सभाओं को संबोधित किया. लखनऊ, वाराणसी, इलाहाबाद, कानपुर, गोरखपुर, आगरा, बरेली, गाजियाबाद, मुरादाबाद और झांसी जैसे पुराने निगमों के अलावा भाजपा ने चारों नए निगमों—अयोध्या, सहारनपुर, फिरोजाबाद और मथुराकृमें जीत दर्ज की. भाजपा के ऋषिकेश उपाध्याय ने अयोध्या के पहले महापौर चुनाव में सपा के गुलशन बिंदु को पछाड़ा. हालांकि महत्वपूर्ण बात यह है कि बसपा मेरठ और अलीगढ़ के दंगल में सफल रही, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इन दोनों महत्वपूर्ण निगमों पर पहले भाजपा का कब्जा था.

हालांकि पार्टी कहीं भी ''भारी जीत' के करीब नहीं पहुंची, लेकिन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने दावा किया कि भाजपा ने निश्चित रूप से स्थानीय निकाय चुनाव में अपने प्रदर्शन में सुधार किया है. महापौर के 14 पदों के अलावा 1,299 नगर पार्षद के पदों में से 596 अब भाजपा के पास हैं. निगम के कुल पदों के 45.9 फीसदी पदों पर अब भाजपा काबिज है, जो 2012 के नगर निकाय के चुनावों में भाजपा की जीती गई सीटों से करीब 15 फीसदी ज्यादा है.

उल्लेखनीय है कि भाजपा ने बड़े शहरों में अच्छा प्रदर्शन किया है. यहां तक कि 2012 में भी भाजपा ने 12 नगर निगमों में से 10 पर जीत हासिल की थी. लेकिन छोटे शहरों की नगर परिषदों, नगरपालिकाओं या नगर पंचायतों में तस्वीर इतनी गुलाबी नहीं है और इससे मुख्यमंत्री आदित्यनाथ और पार्टी नेतृत्व, दोनों वाकिफ हैं. भाजपा के लिए राहत की बात यह है कि वह बिखरी हुई विपक्षी पार्टियों से मीलों आगे है. यह सच है कि बसपा ने महत्वपूर्ण दखलअंदाजी की है, खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में और यहां तक मायावती ने भी स्थानीय नेताओं को प्रचार अभियान चलाने की अनुमति दी, लेकिन बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के समाज विज्ञानी अजित कुमार का तर्क है, ''यह दलित-मुस्लिम कार्ड खेलकर और अनिवार्य रूप से समाजवादी पार्टी की कीमत पर मिली सफलता है.''

न तो अखिलेश यादव की अगुआई वाली सपा और न ही राहुल गांधी की अनुपस्थिति में चुनाव लड़ रही कांग्रेस से किसी पार्टी को कोई फायदा हुआ. राहुल के लोकसभा क्षेत्र की दो नगर परिषदों-जायस और गौरीगंज में कांग्रेस की शर्मनाक हार पर तंज कसते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा, ''जो लोग गुजरात में भाजपा को हराने की बात करते हैं, वे अमेठी में चुनाव हार गए.'' 45 नगरपालिका परिषदों में अध्यक्षता और नगर पंचायतों में 83 सीटें जीतने के बावजूद समाजवादी पार्टी को भी राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव के पुत्र अक्षय यादव के लोकसभा में प्रतिनिधित्व वाले फिरोजाबाद में मेयर का चुनाव हारने की शर्मिंदगी झेलनी पड़ी.

उत्तर प्रदेश के पूर्व हर नगर निकाय चुनावों की तरह निर्दलीयों ने अच्छा प्रदर्शन किया, खासकर नगर परिषदों और नगर पंचायतों में. 224 पार्षदों के अलावा 225 निर्दलीय उम्मीदवार नगरपालिका परिषद और नगर पंचायत के अध्यक्ष निर्वाचित हुए और 7,255 पार्षद और पंचायत सदस्य के रूप में चुने गए. हालांकि उनमें से कई राजनीतिक दलों से ताल्लुक रखते थे. अब निर्दलीय किस करवट बैठेंगे, इसकी तस्वीर आने वाले कुछ हफ्तों में सामने आएगी.

परिणाम घोषित होने के अगले दिन आदित्यनाथ प्रधानमंत्री से मिलने दिल्ली चले गए, यह जानने के लिए कि भाजपा के अंदरूनी सूत्रों ने 'अच्छे काम के यश' के रूप में क्या कहा. माना जाता है कि इस जीत से मुख्यमंत्री प्रोत्साहन मिलेगा, राष्ट्रीय नेतृत्व अब उन पर और ज्यादा भरोसा करेगा और राज्य चलाने के लिए उन्हें और स्वतंत्रता मिलेगी. इसका तात्कालिक प्रभाव यह है कि वे शीघ्र ही कैबिनेट के तेरह खाली पदों को भरने के लिए मंत्रिमंडल विस्तार कर सकते हैं. इस जीत से उन्हें स्थानीय निकाय चुनावों में अपने मौजूदा मंत्रियों के प्रदर्शन की समीक्षा करने का भी अवसर मिला है, जिन्हें चुनाव में जिम्मेदारी सौंपी गई थी. इसमें इन चुनावों में असंगत प्रदर्शन का विश्लेषण भी शामिल होगा और उन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जा सकेगा, जहां भारतीय जनता पार्टी ने बुरा प्रदर्शन किया है.

लोकसभा चुनाव 2019 के लिए मुश्किल से एक वर्ष से थोड़ा ज्यादा समय बचा है, सो आदित्यनाथ छोटे नगरपालिका शहरों पर ध्यान केंद्रित करने में कोताही की भरपाई के लिए तेजी से कदम उठा रहे हैं. विभिन्न प्रदर्शन मापदंडों (जिनमें केंद्र की तर्ज पर व्यापार सुगमता भी शामिल है) पर प्रतिस्पर्धात्मक रूप से अलग-अलग जिलों को खरा उतारने की योजना के अलावा उन्होंने अधिकारियों को अर्ध शहरी क्षेत्रों के लिए विस्तृत विकास योजनाएं तैयार करने का निर्देश दिया है. उन्होंने राज्य के लोक निर्माण विभाग को ऐसे क्षेत्रों में सड़कों की स्थिति पर एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा है. लगता है, योगी राज्य प्रशासन के मजबूत पहलुओं और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के प्रबंधन की चुनौती के विरोधाभासों से निबटने की ठान चुके हैं.

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