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गोवाः पर्रीकर की बीमारी को भुनाने में लगी कांग्रेस

भाजपा नेतृत्व पर्रीकर की गैर-मौजूदगी में गोवा का कामकाज चलाने के लिए वरिष्ठ मंत्रियों की एक संचालन समिति बनाने पर विचार कर रहा है. पर इस पूरे अफसाने ने गोवा में नेतृत्व की दूसरी कतार विकसित करने में भाजपा की नाकामी को उजागर कर दिया है.

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aajtak.in
किरण डी. तारेनई दिल्ली, 03 October 2018
गोवाः पर्रीकर की बीमारी को भुनाने में लगी कांग्रेस सेहत ठीक नहीं अमेरिका से लौटने के बाद जून में गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर

अमित शाह ने 23 सितंबर को जब ऐलान किया कि बीमार मनोहर पर्रीकर गोवा के मुख्यमंत्री बने रहेंगे, तो भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने इसका खुशी के साथ स्वागत किया. इसके साथ ही भाजपा के लिए राज्य सरकार की स्थिरता को लेकर चल रही अनिश्चितता खत्म हो गई. वहीं तीन निर्दलीय विधायकों समेत सहयोगी दलों ने इसे अपनी मांगों पर जोर देने के मौके के तौर पर देखा.

अमेरिका में लंबे इलाज के बाद दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती पर्रीकर ने मुख्यमंत्री पद छोडऩे की पेशकश की थी. शाह और उनके सलाहकारों ने उनके उत्तराधिकारी के विकल्पों पर चर्चा भी शुरू कर दी थी.

इनमें केंद्रीय आयुष मंत्री श्रीपाद नाईक और राज्य के पीडब्ल्यूडी मंत्री तथा महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी) के सुदीन धवलीकर के नाम शामिल थे. मगर नेतृत्व में बदलाव के बाद विधानसभा के पटल पर शक्ति परीक्षण की संभावना काफी परेशान करने वाली थी. 40 सदस्यों की विधानसभा में भाजपा के पास केवल 14 विधायक हैं. उसे एमजीपी और गोवा फॉरवर्ड पार्टी (जीएफपी) के तीन-तीन विधायकों के अलावा तीन निर्दलीयों का समर्थन भी हासिल है.

पर्रीकर के अलावा दो और मंत्री फ्रांसिस डी'सूजा और पांडुरंग मडकईकर भी (अमेरिका और मुंबई में) इलाज करवा रहे हैं. लिहाजा, गद्दीनशीन गठबंधन के प्रभावी विधायकों की तादाद 20 रह गई—जो कुल विधायकों की ठीक आधी थी.

यही नहीं, एमजीपी और जीएफपी दोनों को ही नाइक मंजूर नहीं थे, जबकि निर्दलीय और जीएफपी को धवलीकर एकदम नापसंद थे. शाह के सामने यह जाहिर हो गया कि अगर शिखर पर बदलाव किया जाता है, तो सरकार गिर सकती है. दिल्ली के एक वरिष्ठ भाजपा नेता कहते हैं, "पर्रीकर को बनाए रखने के अलावा हमारे पास कोई और चारा नहीं था.'' वहीं कांग्रेस इसे राफेल सौदे से जोड़ रही है. विपक्ष के नेता चंद्रकांत कावलेकर ने कहा, "शाह और (पीएम) मोदी में पर्रीकर से पद छोडऩे के लिए कहने की हिम्मत नहीं है, क्योंकि उनके पास राफेल सौदे की जानकारियां हैं.''

भाजपा को पहले ही इसके लिए बहुत आलोचनाएं झेलनी पड़ रही हैं कि मुख्यमंत्री के बीमार होने की वजह से राजकाज की अनदेखी हो रही है. नुक्सान की भरपाई के लिए पार्टी ने 24 सितंबर को डी'सूजा और मडकईकर को मंत्री पदों से हटा दिया.

उनकी जगह पार्टी विधायक नीलेश कबराल और मिलिंद नाईक को लाया गया. राज्य भाजपा प्रमुख विनय तेंडुलकर ने दावा किया कि मंत्रिमंडल में फेरबदल पर्रीकर की इजाजत से हुआ. उन्होंने कहा, "भाई स्वस्थ भले न हों, पर वे अस्पताल से नजर रखते हैं.''

कहानी यहीं खत्म नहीं होती. एमजीपी के प्रमुख दीपक धवलीकर कहते हैं कि पर्रीकर के भला-चंगा होने तक मंत्रिमंडल के दूसरे सबसे वरिष्ठ मंत्री को अंतरिम मुख्यमंत्री के तौर पर कमान सौंप दी जानी चाहिए. विजय सरदेसाई की अगुआई में निर्दलीय और जीएफपी इसका विरोध कर रहे हैं. भाजपा नेतृत्व पर्रीकर की गैर-मौजूदगी में गोवा का कामकाज चलाने के लिए वरिष्ठ मंत्रियों की एक संचालन समिति बनाने पर विचार कर रहा है.

पर इस पूरे अफसाने ने गोवा में नेतृत्व की दूसरी कतार विकसित करने में भाजपा की नाकामी को उजागर कर दिया है. 2015 में जब पर्रीकर को रक्षा मंत्री के तौर पर दिल्ली भेजा गया था, तब लक्ष्मीकांत पार्सेकर को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी गई थी.

पर वे प्रभावित करने में नाकाम रहे. इसकी कीमत भाजपा को 2017 के विधानसभा चुनावों में चुकानी पड़ी, उसकी सीटें 24 से घटकर 13 हो गईं (बाद में कांग्रेस विधायक विश्वजीत राणे के पार्टी बदलने से यह 14 पर पहुंची). विश्लेषकों के मुताबिक, पर्रीकर जल्दी भले-चंगे होकर नहीं लौटे, तो अगले साल गोवा की दो लोकसभा सीटों के लिए भाजपा को फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरोसे रहना होगा.

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