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पाकिस्‍तान की जेलों में बंद पतियों के अंतहीन इंतजार में सुहागिनें

बाड़मेर की कई सुहागनें दशकों से अपने-अपने 'सरबजीत' के लौटने की राह ताक रहीं हैं. इनके पति लंबे समय से पाकिस्‍तान के जेलों में कैद हैं.

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aajtak.in
aajtak.inराजस्‍थान, 24 May 2013
पाकिस्‍तान की जेलों में बंद पतियों के अंतहीन इंतजार में सुहागिनें

बाड़मेर की कई सुहागनें दशकों से अपने-अपने 'सरबजीत' के लौटने की राह ताक रहीं हैं.

माथे पर बिंदी, मांग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र, हाथों में चूडिय़ां और पैरों में बिजुरिया. बाड़मेर के चौहटन उपखंड के धनाउ गांव की लक्ष्मी कंवर को देखकर कोई भी नहीं कह सकता कि वह सुहागन नहीं है. पर कोई उनके दिल से पूछे तो पता चलेगा कि वे पिछले तीन दशक से सुहाग का सिंदूर किस तरह भर रही हैं. पति भगु सिंह 28 साल पहले पाकिस्तान की सीमा में चले गए थे. उसके बाद से आज तक उनकी न कोई खबर मिली, न ही कोई संदेश. पथराई आंखों से वे तब से बस बाट ही जोह रही हैं. इतने अरसे बाद भी उनका भरोसा नहीं टूटा है अभी. पर लक्ष्मी कंवर ऐसी कोई अकेली सुहागन नहीं हैं. पाकिस्तान इंडिया पीपल्स फॉर पीस ऐंड डेमोक्रेसी के सचिव भुवनेश जैन के मुताबिक, बाड़मेर-जैसलमेर के ऐसे चार कैदी पाकिस्तान की जेलों में हैं.

लक्ष्मी कंवर ने हिम्मत न हारते हुए परिवार को संवारने की कोशिश की है. अरसे तक तो जरूर वे बदहवास रहीं लेकिन फिर जीवन से तालमेल बिठा लिया. गांव में मेहनत मजदूरी और खेती कर चार संतानों का पालन-पोषण ही नहीं किया, बल्कि दो बेटियों के हाथ पीले कर उन्हें ससुराल भेजा. दो बेटों की शादी करके घर में बहुएं भी ले आईं. भगु सिंह खेती और मजूदरी करते थे. किसी का खेत बटाई पर लेने के लिए वे बाड़मेर जिले में ही अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे गौहड़ का तला इलाके में गए थे. बंटाई पर खेत देने वालों के बारे में पूछताछ करते-करते वे दिशाभ्रमित होकर पाकिस्तान की सीमा में चले गए, जहां पाक रेंजर्र्स ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. बस तभी से लक्ष्मी उनके इंतजार में हैं. वे कहती हैं, ''मेरे पति जहां भी हैं, वे लौटकर जरूर आएंगे. इसी आस में आज तक मैंने चूडिय़ां पहन रखी हैं. ईश्वर पर मुझे भरोसा है. वे मेरे साथ जरूर न्याय करेंगे. ''

लक्ष्मी बताती हैं कि कुछ साल पहले पाकिस्तान की हैदराबाद सेंट्रल जेल में उनके होने की खबर मिली थी. वहां पर वे टोपियां बनाते थे. लेकिन अब वे कहां हैं, इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. ''परिवार को मैंने किस तरह से पाला है, मैं ही जानती हूं. पति की रिहाई के लिए हमने कहां-कहां चक्कर नहीं लगाए, लेकिन कहीं से भी दिलासा नहीं मिली. अब तो बस भगवान का भरोसा है. ''

लक्ष्मी की ही तरह हनीफा भी 27 साल से हाथों में चूडिय़ां और पैरों में चांदी के कड़े पहनकर शौहर की राह ताक रही हैं. उन्हें यह भी नहीं पता कि उनके शौहर जमालदीन पाकिस्तान की कौन-सी जेल में बंद हैं. हनीफा के अलावा पिता मिश्री खान, मां चांदनी, पुत्र असम, कासम, पुत्री मीयण और खातू, भाई कमालदीन और बहन रेशमा, जामा तभी से उनके इंतजार में हैं. जिले के बांधा गांव के रहने वाले जमालदीन खान 1986 में मवेशी चराते भूलवश सीमा पार चले गए थे, जहां पाकिस्तान की पुलिस ने पकड़ कर उन्हें जेल में डाल दिया. परिवार को 1991 में जाकर कराची जेल से लिखा एक खत मिला था, जिसमें उन्होंने यह भी लिखा था कि 15 दिन बाद उन्हें रिहा कर दिया जाएगा. लेकिन उसके बाद उनका न कोई संदेश आया, न ही कोई खत. उनका परिवार इन दिनों मुख्य नहर की 314 आरडी पर स्थित एक ढाणी में रह रहा है. उनके दोनों बेटे खेती कर परिवार चला रहे हैं. पिता मिश्री खान लंबे समय से बीमार हैं, चल-फिर नहीं सकते लेकिन खोए बेटे से मिलने की चाह उन्हें जिंदा रखे हुए है. हनीफा ने दूसरी शादी न करने का फैसला करके हौसला रखते हुए बच्चों को पालना शुरू किया.

पर हाल ही में पाकिस्तान की एक जेल में सरबजीत पर हमले के बाद से जमालदीन का परिवार ङ्क्षचतित है. सरकार को कई चिट्ठियां भेजी गईं लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. फिर भी परिजनों को उम्मीद है कि सरकार के प्रयासों से जमालदीन वतन लौट सकता है.एक सुहागन ने तो कई साल तक पति की राह देखते-देखते प्राण त्याग दिए. बाड़मेर के सरूपे का तला निवासी साहूराम परिवार के भरण-पोषण के लिए 31 मई, 1989 को सीमा सुरक्षा बल की सीमा चौकी पर लकड़ी आपूर्ति के लिए लकड़ी काट रहे थे. इसी दौरान रास्ता भटककर वे पाकिस्तान सीमा में चले गए, जहां रेंजर्स ने उन्हें पकड़ लिया. पत्नी लक्ष्मी ने हिम्मत न हारी. एक बेटा और चार बेटियों को पाला-पोसा, शादी-ब्याह किया और साथ ही पति की रिहाई के लिए भी प्रयास करती रहीं.

एक बार पाकिस्तान की हैदराबाद सेंट्रल जेल से खत आया पर उसके बाद फिर कोई खबर नहीं. बिछोह की चिंता में करीब छह साल पहले उनकी मृत्यु हो गई. 4-5 महीने बाद एक बेटी भी चल बसी. बेटे मगाराम बताते हैं, ''मां ने पूरी तरह से एक सुहागन की जिंदगी जी. ''स्थानीय सांसद हरीश चौधरी ने बताया है कि उन्होंने इन कैदियों की रिहाई के लिए केंद्रीय विदेश मंत्री और गृह मंत्री से बात की है. ''मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी है. ''

पतियों के जेल में होने के बावजूद इन सुहागनों ने लंबी जिंदगियां गुजार दीं. इसी तरह सुहाग की राह देखती हुई, परिवार को पालती हुई, हर कर्तव्य निभाते हुए. इंतजार की भी इंतिहा होती है, कोई इनसे पूछे.

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