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अर्थव्यवस्थाः साख पर लगा बट्टा

मूडीज ने रेटिंग घटाकर भारत को सबसे निचली निवेश श्रेणी में खड़ा कर दिया है और भारत के बारे में नजरिया एसऐंडपी और फिच जैसी एजेंसियों की तरह कर लिया है

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aajtak.in
एम.जी. अरुणनई दिल्ली, 12 June 2020
अर्थव्यवस्थाः साख पर लगा बट्टा इलस्ट्रेशनः सिद्धांत जुमडे

सरकारी और व्यावसायिक इकाइयों के बॉन्ड की रेटिंग करने वाली मूडीज इन्वेस्टर सर्विसेज ने 1 जून को भारत की विदेशी मुद्रा और स्थानीय मुद्रा में दीर्घकालिक इशूअर रेटिंग एक अंक घटाकर 'बीएए2' से 'बीएए3' कर दिया है और यह भी कहा है कि नजरिया 'नकारात्मक' बना हुआ है. यह मूडीज के आकलन में निवेश के मामले में सबसे निचली रेटिंग है. बॉन्ड की क्रेडिट रेटिंग कॉर्पोरेट या सरकारी हुंडियों की साख का पता चलता है.

रेटिंग घटाने की वजह मूडीज ने 2017 से आर्थिक सुधारों पर कमजोर अमल, लगातार अपेक्षाकृत कमतर आर्थिक वृद्धि दर, सरकारों (केंद्र और राज्य) की काफी पतली वित्तीय हालत, और देश के वित्तीय क्षेत्र पर बढ़ते दबाव को बताया है.

मूडीज के भारत की रेटिंग को घटाकर बीएए3 करने से वह स्टैंडर्ड ऐंड पूअर्स (एसऐंडपी) और फिच की रेटिंग (बीबीबी-) के बराबर आ गई है, जो 'कचरा' वाली स्थिति से एक अंक ही ऊपर है. मूडीज ने नवंबर 2019 में ही 'नकारात्मक' नजरिया जाहिर कर दिया था, जो आज भी कायम है, जबकि एसऐंडपी और फिच का भारत के बारे में नजरिया फिलहाल 'स्थिर' बना हुआ है.

एडेलवाइस सेक्यूरिटीज की प्रमुख अर्थशास्त्री माधवी अरोड़ा कहती हैं, ''हमारी राय में यह तो होना ही था कि मूडीज रेटिंग घटाए और यह मोटे तौर पर यह बाजारों की ही स्थिति है. इसलिए विदेशी मुद्रा और रेट मार्केट में कोई अचानक उछाल थोड़े समय के लिए ही रहने की संभावना है.'' वाकई, शेयर बाजारों ने रेटिंग घटाए जाने को तवज्जो नहीं दी क्योंकि इसे पहले से इसकी उम्मीद थी. दरअसल, 2 जून को बॉम्बे शेयर बाजार का सेंसेक्स 522 अंक बढ़कर 33,826 पर पहुंच गया. दुनिया भर के बाजारों का रुझान सकारात्मक था, क्योंकि लंबे लॉकडाउन के बाद अर्थव्यवस्थाएं खुल रही थीं.

अरोड़ा के मुताबिक, बड़ा खतरा एसऐंडपी और फिच की रेटिंग में कमी की संभावना है. अरोड़ा कहती हैं, ''उनकी 'कचरा' श्रेणी की रेटिंग से नीचे होना बड़ा जोखिम (बाजारों के लिए) हो सकता है, लेकिन इससे पहले उनका नजरिया मौजूदा 'स्थिर' से 'नकारात्मक' होगा, जो अमूमन बड़ी बात होती है.'' केयर रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का कहना है कि रेटिंग घटाए जाने का वक्त ''थोड़ा सही नहीं है'' क्योंकि कई देशों में असामान्य स्थितियां हैं. हालांकि सरकार को रेटिंग एजेंसियों की चिंताओं पर गौर करने की जरूरत है. सबनवीस कहते हैं, ''भारत सरकार पर इसका असर नहीं होगा क्योंकि वह विदेशी बाजारों से रकम नहीं उठाती. यह साख का सवाल है. लेकिन बाहर के व्यावसायिक बाजारों से रकम उठाने वाली भारतीय कंपनियों के लिए फंड की लागत बढ़ जाएगी.''

रेटिंग घटने का यह वाकया उसी वक्त हुजा, जब वित्त वर्ष 2020 की चौथी तिमाही के जीडीपी आंकड़े आए. चौथी तिमाही में वृद्धि दर घटकर 3.1 फीसद पर आ गई, जो 17 साल में नहीं दिखी थी. यानी निजी निवेश और मैन्युफैक्चरिंग में काफी गिरावट है. यह मंदी इस तथ्य के मद्देनजर काफी अहम है कि कोविड संक्रमण की रोकथाम के लिए लॉकडाउन तो मार्च में गिने-चुने दिनों तक ही थी. इससे जाहिर होता है कि वृद्धि दर घटने की वजहें लॉकडाउन के अलावा दूसरी थीं. वे वजहें अभी दूर नहीं हुई हैं और लॉकडाउन की रुकावटों के अलावा वे वजहें भी वृद्धि दर को नीचे खींचती रहेंगी.

मूडीज की रेटिंग घटाने के क्रम में इन कुछ गहरी वजहों की ओर इशारा किया गया है. पिछली कुछ तिमाहियों से वृद्धि दर गोता लगाती जा रही है. वित्त वर्ष 2020 की तीसरी तिमाही में देश की जीडीपी वृद्धि दर 4.5 फीसद थी जबकि दूसरी तिमाही में 4.8 फीसद. पर चौथी तिमाही में हालात बदतर हो गई. केयर रेटिंग्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ''वित्त वर्ष 2020 की चौथी तिमाही में सभी प्रमुख क्षेत्रों में वृद्धि की कुल रफ्तार धीमी हुई है.'' सरकारी क्षेत्र को ही इस तिमाही में आर्थिक उत्पादन और मांग को बढ़ावा देता देखा गया और वह मैन्युफैक्चरिंग तथा निर्माण जैसे क्षेत्रों में नकारात्मक वृद्धि के दौर में कुछ साज-संभाल करता दिखा.

हाल की तिमाहियों में एक अहम समस्या मांग में भारी गिरावट रही है. सरकार के हाल के दौर में उठाए ज्यादातर कदम (केंद्रीय बजट की घोषणाओं सहित) आपूर्ति पक्ष के लिए रहे हैं. खर्च या निवेश करने की कोई ख्वाहिश नहीं दिखती. अर्थव्यवस्था का इंजन माने जाने वाली निजी खपत (जो जीडीपी का 60 फीसद है) पिछले साल चौथी तिमाही में 6.2 फीसद से घटकर वित्त वर्ष 2020 की चौथ तिमाही में 2.7 फीसद पर आ गई. इस चौथी तिमाही में 6.5 फीसद की तेज सिकुडऩ देखी गई. केयर रेटिंग्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ''इससे आशंका होती है कि देश वायरस के प्रकोप की रोकथाम में नाकाम रहा तो आने वाले महीनों में घरेलू अर्थव्यवस्था की हालत बेहद बुरी होने वाली है.'' वैसे, सरकार की खर्च और कृषि की वृद्धि से भी मदद मिली.

लगातार अधिक सरकारी खर्च से एक समस्या यह है कि सरकार का वित्तीय गणित गड़बड़ा सकता है. आखिर, वित्त वर्ष 2020 में देश का राजकोषीय घाटा सरकार के 3.8 फीसद के संशोधित लक्ष्य को पीछे छोड़कर 4.6 फीसद पर पहुंच गया. यही नहीं, सरकारी राजस्व में कमी की वजह से वित्त वर्ष 2021 के 7.96 लाख करोड़ रु. राजकोषीय घाटे के लक्ष्य का 35 फीसद तो अप्रैल महीने में ही हो गया. लॉकडाउन से अर्थव्यवस्था थमी तो सरकारी राजस्व में भारी गिरावट आई है. सरकार को अप्रैल महीने में कुल राजस्व प्राप्ति 21,412 करोड़ रु. हुई जो पिछले साल में अप्रैल के मुकाबले 70 फीसद कम है. ये तमाम मुद्दे आने वाले दिनों में दुश्वारियों की आशंका जता रहे हैं.

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