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नाजुक प्रेम को दर्शाते चित्र

एक डेटिंग ऐप के साथ बनाए इंदु हरिकुमार के चित्र इंटरनेट के जमाने में रिश्तों की बारीकियों की पड़ताल करते हैं

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फराह यामीननई दिल्ली, 11 September 2018
नाजुक प्रेम को दर्शाते चित्र मंदार देवधर

वर्ष 1995 में मुंबई के बाहरी छोर पर इंदु हरिकुमार का अपार्टमेंट शहर का 19वां मकान था जिसने इंटरनेट कनेक्शन लिया था. तभी से वे लोगों के साथ जुडऩे के लिए वेब का इस्तेमाल करती आ रही हैं. इसलिए यह स्वाभाविक था कि अपनी कला की रचना और प्रदर्शन के लिए उन्होंने इंटरनेट का सहारा लिया—वह कला, जो प्रेम, यौनिकता, इच्छा और नाजुकपन की पड़ताल करती है.

हिंदुस्तानी कथाकारों की कहानियों पर टिंडर पर बनाए उनके चित्र इन दिनों जर्मनी के कुंसथाली ब्रेमेन कला संग्रहालय में दिखाए जा रहे हैं. इनका शीर्षक ही है "100 इंडियन टिंडर टेल्स (100 आइटीटी)''.

हालांकि शुरुआत में उन्हें संदेह था. वे कहती हैं, "मुझे यह प्रोजेक्ट शुरुआत में ज्यादा चलने वाला नहीं लगता था. कोई भी अपनी अंतरंग कहानियां इंटरनेट पर मुझ अजनबी के साथ भला क्यों साझा करना चाहेगा?'' मगर 100 आइटीटी देखते ही देखते वायरल हो गया और लोग अपनी कहानियां साझा करने लगे.

इनमें रोमांटिक-कॉमेडी से लेकर जोखिम और खतरों की कहानियां थीं और हरिकुमार ने पाया कि उनके पास इन कहानियों को दर्शाने वाले चित्र बनाने की गुजारिशों का अंबार लग गया है. उनके फेसबुक और इंस्टाग्राम के पेज ऐसे प्लेटफॉर्म बन गए जहां उन्हें अपनी कला के कद्रदान हासिल हुए और उनके कहानीकारों को अपने तजुर्बों का कद्रदान मिला.

वे कहती हैं, "लोगों की कहानियां सुनना और उन्हें उनके अपने अनोखे अंदाज में लिखे जाते देखना ऐसा तजुर्बा है जिसमें अधपके विचार नए प्रोजेक्ट की वैचारिक बुनियादों में तब्दील हो जाते हैं.'' उन्होंने यह भी पाया कि संवेदनशील चीजों के बारे में बोलने की झिझक और रुकावट जब एक बार टूट जाती है, तो और भी ज्यादा चीजें निकलकर आने लगती हैं. इंस्टाग्राम का उनका पेज न केवल कलात्मक अभिव्यक्ति का ठिकाना बन गया है बल्कि मानव देह की सराहना और स्वीकार्यता, बदजुबानी, बेइज्जती और शर्मिंदगी का मंच भी बन गया है.

हरिकुमार का तरीका अलहदा है. लफ्फाजी और दकियानूसी उसूलों को बयान करने के बजाय उनके चित्र यौन और यौनिकता के बारे में ढेर सारे संवादों की जगह और मोहलत देते हैं. उन्हें लगता है कि यही प्रोजेक्ट प्रिंट में साकार नहीं हो सकता था, वे कहती हैं, सोशल मीडिया पर मैं बनिस्बतन आजाद हूं.'' शुरुआत में उनके किरदार अक्सर खाका भर होते थे. अब उन्हें ज्यादा साहसी ढंग से बयान किया जाने लगा है.

उनके बनाए गए चित्रों में बयान काम और इच्छा की कहानियों की अंतरराष्ट्रीय प्रेस में तारीफ भरी समीक्षाएं लिखी गई हैं. मगर इन समीक्षकों के लिए अरेंज्ड मैरिज की अपनी सरसरी जानकारी या कामसूत्र के बेहद इस्तेमाल किए गए पारस की समझ के साथ तालमेल बिठाना अक्सर मुश्किल होता है.

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