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अध्यक्ष पद के लिए माथापच्ची

उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट को यह जिम्मेदारी सौंपने के लिए कह रहे हैं. पायलट अमरिंदर के करीबी हैं. पायलट को राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपने से राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ चल रहा उनका सत्ता संघर्ष भी खत्म हो जाएगा.

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aajtak.in
कौशिक डेका नई दिल्ली, 17 July 2019
अध्यक्ष पद के लिए माथापच्ची नेता के पीछे कदमताल नई दिल्ली में 1 जुलाई को राहुल गांधी के साथ एक बैठक के बाद कांग्रेस नेता

राहुल गांधी ने ट्विटर पर जैसे ही तस्दीक की कि वे कांग्रेस अध्यक्ष नहीं हैं और अपने उत्तराधिकारी के चयन में भी हिस्सा नहीं लेंगे, वैसे ही पुराने दिग्गजों और युवा नेताओं में रस्साकशी के साथ पार्टी ज्यादा उथल-पुथल में धंस गई. कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) जुलाई के आखिर तक अगले अध्यक्ष का चयन कर सकती है—जो कांग्रेस महाधिवेशन में चयन पर आखिरी मोहर लगने तक अस्थायी व्यवस्था होगी—ऐसे में इस अहम पद को लेकर पार्टी में लॉबिइंग शुरू हो गई है.

पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने 6 जुलाई को ट्वीट किया कि पार्टी का नेतृत्व किसी 'युवा’ को सौंपा जाए. कई लोगों ने इसका अर्थ निकाला कि वे इशारों में राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट को यह जिम्मेदारी सौंपने के लिए कह रहे हैं. पायलट अमरिंदर के करीबी हैं. पायलट को राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपने से राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ चल रहा उनका सत्ता संघर्ष भी खत्म हो जाएगा. वैसे उस ट्वीट के बाद अमरिंदर से बात कर चुके सीडब्ल्यूसी के एक वरिष्ठ सदस्य ने दावा किया कि उनका इशारा उम्र के साठे में चल रहे एक नेता की ओर था. हरियाणा के एक अन्य बड़े नेता ने कहा कि अमरिंदर 53 वर्षीय मनीष तिवारी के पक्ष में बैटिंग कर रहे थे.

अगले दिन मुंबई में पार्टी के अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा और पश्चिमी यूपी के प्रभारी महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस्तीफे दे दिए. देवड़ा ने यहां तक कहा कि वे एक राष्ट्रीय ओहदे के लिए तैयार हो रहे हैं. कई युवा नेता दावा करते हैं कि राहुल गांधी ने इस उम्मीद में इस्तीफा दिया कि आम चुनावों में खराब प्रदर्शन के जिम्मेदार अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआइसीसी) के नेता उनके नक्शेकदम पर चलेंगे और नए चेहरों को आगे लाने का रास्ता साफ करेंगे. 25 मई को सीडब्ल्यूसी की बैठक में राहुल ने गहलोत, कमलनाथ और पी. चिदंबरम को धिक्कारा भी कि उन्होंने अपने बेटों को टिकट देने के लिए पार्टी पर दबाव डाला. एक कांग्रेस सांसद कहते हैं कि इसके बाद भी पुराने दिग्गजों में से किसी ने इस्तीफा नहीं दिया.

सीडब्ल्यूसी के एक सदस्य के मुताबिक, देवड़ा की नजर पार्टी के कोषाध्यक्ष पद पर है. पर इसकी संभावना नहीं है कि सोनिया गांधी यह ओहदा अपने भरोसेमंद अहमद पटेल के हाथों से फिसलने देंगी. कई युवा नेताओं को लगता है कि पटेल पुराने दिग्गजों की जमात के लिए संजीवनी का काम करते हैं क्योंकि वे सोनिया के नजदीक हैं और कोषाध्यक्ष होने के नाते खासा असर रखते हैं. सीडब्ल्यूसी के उन्हीं सदस्य का कहना है कि सिंधिया के अध्यक्ष पद के सर्वसम्मत उम्मीदवार के तौर पर उभरने की अच्छी संभावना है. वे कहते हैं, ''दिग्गज नेता राजी हो सकते हैं, पर सोनिया गांधी नहीं चाहेंगी कि राहुल का कोई हमउम्र और समकालीन नेता सबसे ऊंची कुर्सी पर विराजमान हो.''

सीडब्ल्यूसी के सदस्यों की औसत उम्र 67 साल है और उसके ज्यादातर बड़े सदस्य, अध्यक्ष के ओहदे के लिए कम जाने-माने बुजुर्ग को तरजीह दे रहे हैं, ताकि तपे-तपाए नेता तब तक पार्टी चलाएं जब तक कि उसे संभालने के लिए गांधी परिवार का कोई सदस्य तैयार नहीं हो जाता. वे 1991 का तजुर्बा दोहराने से बचना चाहते हैं, जब पी.वी. नरसिम्हा राव ने जल्दी ही पार्टी और सरकार पर पकड़ मजबूत कर ली थी और कई दिग्गज नेताओं को दरकिनार कर दिया था. उनके कार्यकाल में पार्टी दो-फाड़ हुई और माधवराव सिंधिया, अर्जुन सिंह और एन.डी. तिवारी सरीखे दिग्गज नेताओं ने पार्टी छोड़ दी थी. 1996 के आम चुनाव में कांग्रेस की शिकस्त के बाद कोषाध्यक्ष सीताराम केसरी को अध्यक्ष बनाया गया. पर 1998 में जब सोनिया ने पार्टी की कमान संभाली, तब केसरी को बेइज्जत करके हटा दिया गया. तभी से कांग्रेस के अध्यक्ष का ओहदा गांधी परिवार के पास ही रहा है.

1991 की तरह पटेल ही नए अध्यक्ष की चयन प्रक्रिया की अगुआई कर रहे हैं. कुछ दिग्गजों ने गहलोत को तरजीह दी, पर उन्होंने मना कर दिया. आखिर में समझौते के तौर पर पूर्व केंद्रीय मंत्री मुकुल वासनिक संभावित उम्मीदवार हो सकते हैं, जो सितंबर में 70 साल के हो जाएंगे. इन हालात में एक विकल्प यह हो सकता है कि किसी एक दिग्गज नेता को अस्थायी अध्यक्ष, कई युवाओं को उपाध्यक्ष बनाया जाए जो क्षेत्रों या संगठन की शाखाओं का स्वतंत्र प्रभार संभालें. या एक अस्थायी अध्यक्ष नियुक्त किया जाए जो सीडब्ल्यूसी की चुनी हुई एक कोर कमेटी के प्रति जवाबदेह हो—मगर इसके लिए पार्टी के संविधान में संशोधन करना होगा. आखिरी फैसला तो सोनिया ही लेंगी. और पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए सबसे ज्यादा संभावना इसी बात की है कि वे प्रदर्शन के बजाए वफादारी को चुनेंगी.

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