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बाढ़ के शहर में सूखे की नौबत

चेन्नै में जल संकट पानी की कमी के कारण नहीं है, बल्कि पानी की मांग और आपूर्ति के खराब प्रबंधन के कारण है.

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राज भगत पलानीचामीनई दिल्ली, 02 July 2019
बाढ़ के शहर में सूखे की नौबत एक अनार, सौ बीमार चेन्नै में भूजल स्तर गिरने से पानी संकट बदतर हो गया है

चेन्नै में 2015 में आई बाढ़ से जान-माल का भारी नुक्सान हुआ था. अब शहर में पानी की ऐसी किल्लत हो गई जिससे यहां के लोग और प्रशासन दोनों भारी मुश्किल में हैं. चेन्नै को पेयजल आपूर्ति करने वाली चार प्रमुख झीलें सूख गई हैं, कृष्णा नदी योजना से भी राहत नहीं मिल पाई और वीरानम परियोजना शहर की पानी की मांग को पूरा करने के लिए अपर्याप्त साबित हुई है. भूजल स्तर बहुत नीचे चला गया है, जिससे चेन्नै अब समुद्री जल से लवण अलग करने वाले संयंत्रों पर निर्भर है.

चेन्नै के जल संकट का एक बड़ा कारण पानी की मांग और आपूर्ति का खराब प्रबंधन है. पिछली सदी में देश के अन्य शहरों की तरह तेजी से शहरीकरण और औद्योगिक और कृषि विकास के कारण चेन्नै की पानी की मांग काफी बढ़ी है. इसलिए, आपूर्ति में मामूली उतार-चढ़ाव भी संकट का कारण बन सकता है. 2018 में चेन्नै में 835 मिलीमीटर बारिश हुई जो औसत 1,400 मिमी से काफी कम थी और यही इस साल के संकट की जड़ है. सरकारी डिसैलिनेशन संयंत्रों पर ध्यान केंद्रित करने और अन्य जलक्षेत्रों से पानी लाने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता. इन संयंत्रों में निवेश और उनकी परिचालन लागत बहुत है और कृष्णा और कावेरी नदियां भी पानी की कमी से प्रभावित हैं. शहर में जल संकट को रोकने के लिए व्यापक योजना की आवश्यकता है.

पहला कदम चेन्नै में वर्षा जल संचयन पर मौजूदा कानूनों के अमल में सुधार लाना हो सकता है. तीव्र शहरीकरण के कारण पक्के रास्ते बन रहे हैं जो वर्षाजल को भूमि में अवशोषण और भूजल स्तर को फिर से बढऩे से रोकते हैं. ग्रीन स्पेस और वेटलैंड्स—रिचार्ज पॉइंट्स—पूरे शहर भर में बनाए जाने चाहिए. बस स्टैंड और सड़कों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर बारिश के पानी से भूजल स्तर सुधारने के इंतजाम बेहतर करने की जरूरत है. शहर की कॉर्पोरेट फर्में अपने कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी कार्यक्रमों के अंश के रूप में इन प्रयासों के लिए फंड दे सकती हैं.

एक दूसरा कदम अपशिष्ट जल का पुन: उपयोग होगा. सीवेज डंपिंग से शहर की झीलें और नदियां प्रभावित हुई हैं. अपार्टमेंट स्तर के सीवेज ट्रीटमेंट सिस्टम के साथ संयुक्त छोटे ट्रीटमेंट प्लांट पानी का शोधन कर सकते हैं ताकि अधिक भूमि का उपयोग किए बगैर इस पानी का गैर-पीने योग्य प्रयोजनों (एचवीएसी सिस्टम, भूनिर्माण) में उपयोग किया जा सके. कई भारतीय स्टार्ट-अप राजस्व मॉडल के साथ ऐसे समाधान देने पर काम कर रहे हैं और उन्हें सरकार से प्रोत्साहन की आवश्यकता है.

तीसरा, चेन्नै की योजना में झीलों और संबंधित बाढ़ के मैदानों का संरक्षण भी शामिल होना चाहिए जो कि भूजल के प्रमुख पुनर्भरण बिंदु हुआ करते हैं और बाढ़ को रोकने में भी मदद करते हैं. बाढ़ के मैदानों में तेजी से निर्माण हुआ और इससे चेन्नै बाढ़ और सूखे दोनों का सामना करने में पंगु हो गया है. चेन्नै मेट्रोपॉलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी को ऐसे निर्माण पर तत्काल रोक लगानी चाहिए. और बाढ़ के मैदानों पर दबाव घटाने के लिए उनके किनारे आवागमन उन्मुख विकास को बढ़ावा देने पर विचार करना चाहिए. बड़े पैमाने पर परिवहन सिस्टम के लिए लैंड वैल्यू कैप्चर की अनुमति दें जिससे राजस्व पैदा होगा.

चौथा, सरकार को जल संसाधनों और उनके उपयोगों पर स्पष्ट और पारदर्शी आंकड़े, जैसे-पानी की पाइप की क्षमता और रोज उनसे कितना पानी बहता है, जारी करने चाहिए. यह विशेषज्ञों और शिक्षाविदों को विचार और सुझाव प्रस्तुत करने में उपयोगी होगा. स्मार्ट सिटी प्रोग्राम और डेटा पहल के अंग के रूप में चेन्नै को अपने भविष्य की पुनर्कल्पना के लिए खुद को डिजिटल बनाने की आवश्यकता है.

अंत में, चेन्नै को सिंचाई दक्षता में सुधार करना होगा. भारत में कृषि में सबसे ज्यादा पानी की खपत है और चेन्नै की नदी पर पांच लाख हेक्टेयर में खेती होती है. सिंचाई क्षमता में सुधार से जल संसाधनों में वृद्धि होगी. हम छोटे स्तर के किसानों से उच्चस्तरीय सिंचाई प्रणाली अपनाने की अपेक्षा नहीं कर सकते. लेकिन सरकारों और बैंकिंग-बीमा क्षेत्रों को नए वित्तीय मॉडल तलाशने चाहिए जो उन्हें ग्रामीण सिंचाई प्रणालियों में निवेश करने और उसे सुधारने के मौके पैदा कर सकें.

यह पांच-सूत्री फॉर्मूला किसी भी हितधारक—सरकार, किसानों, शहर के निवासियों और कॉर्पोरेट—पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं डालेगा और रहन-सहन की स्थिति में सुधार होगा. नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि 2020 तक 21 भारतीय शहरों का भूजल समाप्त हो जाएगा इसलिए स्थायी समाधानों को अपनाने की जरूरत है.

राज भगत पलानीचामी, सस्टेनेबल सिटीज वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट इंडिया के मैनेजर हैं.

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