एडवांस्ड सर्च

बॉइज लॉकर रूम: अंधेरी दुनिया

इस वायरल पोस्ट में दिल्ली के प्रमुख स्कूलों के छात्रों ने अपने यौन दुस्साहसों के बारे में डींगें हांकी थीं, लड़कियों की नग्न या मॉर्फ की हुई तस्वीरें डाली थीं और उनकी देह के बारे में भद्दी टिप्पणियां की थीं.

Advertisement
aajtak.in
कौशिक डेकानई दिल्ली, 20 May 2020
बॉइज लॉकर रूम: अंधेरी दुनिया इलस्ट्रेशनः नीलांजन दास

मार्च के अंत की बात है, जब दिल्ली के एक मशहूर निजी स्कूल का छात्र प्रशांत (बदला हुआ नाम) 12वीं की परीक्षा के बाद थोड़ी-बहुत 'मौज-मस्ती' करने की सोच रहा था. उसी समय कोविड-19 फैल गया और लॉकडाउन की वजह से 'मस्ती मारने' के उसके अरमानों पर पानी फिर गया. इससे बुरी बात यह हुई कि 'मस्ती' तो बरतरफ, अब उसे डर है कि कहीं पुलिस न उठा ले जाए.

प्रशांत अब बदनाम हो चुके इंस्टाग्राम ग्रुप 'बॉइज लॉकर रूम' का सदस्य था, जिसके बारे में लोगों को बीती 3 मई को पता चला जब दिल्ली की एक लड़की ने एक ग्रुप में खुले यौनिक वार्तालाप के स्क्रीनशॉट लोगों के साथ साझा किए. इस वायरल पोस्ट में दिल्ली के प्रमुख स्कूलों के छात्रों ने अपने यौन दुस्साहसों के बारे में डींगें हांकी थीं, लड़कियों की नग्न या मॉर्फ की हुई तस्वीरें डाली थीं और उनकी देह के बारे में भद्दी टिप्पणियां की थीं.

अगले कुछ महीनों में 18 साल का होने जा रहा प्रशांत कहता है, ''हमने जो किया वह नहीं करना चाहिए था. हमसे बड़ी गलती हुई, पर हम अपराधी नहीं हैं. किसी का बलात्कार करने की हमारी योजना नहीं थी.'' दिल्ली पुलिस की साइबर सेल के प्रमुख अन्येश रॉय इससे सहमति जताते हैं. उन्होंने पुष्टि की कि बलात्कार के बारे में बातचीत 'बॉइज लॉकर रूम' में नहीं हुई बल्कि वह स्नैपचैट पर हुई बातचीत का हिस्सा था. हैरानी यह कि वह बातचीत एक लड़की और एक लड़के के बीच हुई थी. लड़की ने एक लड़के की फर्जी आइडेंटिटी बना रखी थी और लड़के की 'चारित्रिक दृढ़ता' जांचने के लिए उसे अपने बलात्कार के लिए उकसा रही थी. शुक्र है कि लड़के ने मना कर दिया था.

'लॉकर रूम' में शामिल इन लड़कों ने भले ही किसी के बलात्कार की योजना न बनाई हो, लेकिन गंदी यौन बातचीत उन्हें कुछ दिनों के लिए देशभर की सुर्खियों में लाने के लिए काफी थी. इसने लोगों का ध्यान उस सामाजिक समस्या की ओर भी खींचा जिसके कई पहलू हैं: इंटरनेट पर यौन संबंधी मुखर सामग्रियों की बाढ़, उस तक किशोरों और युवा अल्प-वयस्कों की आसान पहुंच, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के जरिए इसकी अनियंत्रित वेब ट्रैफिक, अतिसंवेदनशील मस्तिष्क पर असर. और, यह भी कि किस तरह आरोपित पुरुष विशेषाधिकार लैंगिक रूढि़वाद को (बुरी तरह) गढ़ रहा है. दिसंबर, 2019 में, मुंबई के एक शीर्ष स्कूल के 13-14 साल के आठ छात्रों को उनकी व्हाट्सऐप चैट के कारण निलंबित किया गया था जिसमें क्लास की लड़कियों के सामूहिक बलात्कार की बातें शामिल थीं.

मतलब, एक बार फिर हमारे सामने वैसा ही सवाल आ खड़ा हुआ है कि क्या यह डिजिटल दुनिया और पोर्नोग्राफी की आसान उपलब्धता बच्चों में आक्रामकता भर रही है? निमहैंस, बेंगलूरू में फोरेंसिक साइकिएट्री के विभागाध्यक्ष डॉ. सुरेश बड़ामाथ के मुताबिक, कुछ अध्ययनों से संकेत मिलते हैं कि बच्चों के मुखर यौन सामग्री के प्रति ज्यादा संवेदनशील होने की संभावना है. इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर ऐंड एलाइड साइंसेज के अध्यक्ष डॉ. निमेष देसाई का कहना है कि व्यक्तिवादी आनंद की तलाश का प्रदर्शन करने वाले आचरण में कुछ भी नया नहीं है. आज जो बात बदल गई है, वह है आसान पहुंच, बार-बार सामने आने वाली संचार सामग्री और सभी ज्ञानेंद्रियों का प्रयोग.

इससे मानव मनोदशा तथा व्यवहार पर पहले से ज्यादा गहरा प्रभाव पड़ रहा है. बच्चों को पता भी नहीं होता कि ये चीजें स्वीकार्य और अस्वीकार्य के बारे में उनकी समझ को कैसे प्रभावित करती हैं. देसाई कहते हैं, ''यह नैतिक शिक्षा देने की बात नहीं, बल्कि समकालीन मूल्यों की बात है—निजता तथा सहमति के मुद्दे और यह समझना कि मेरी आनंदानुभूति की सीमा वहां खत्म हो जाती है, जहां से दूसरे की सीमा शुरू होती है. ये बातें बच्चों को जरूर सिखाई जानी चाहिए.''

साइबर कानूनों के विशेषज्ञ मांग करते हैं कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर आदि को ज्यादा उत्तरदायी बनाने के लिए आइटी कानूनों में बदलाव की जरूरत है. इस प्रकरण में इंस्टाग्राम ने संबंधित चैट ग्रुप को हटा दिया है, पर कई लोग इतना भर काफी नहीं मानते. साइबर कानून विशेषज्ञ पवन दुग्गल कहते हैं, ''ग्रुप खत्म करने भर से जिम्मेदारी खत्म नहीं होती. इंस्टाग्राम के खिलाफ उचित कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि इस सेवा प्रदाता ने इन उल्लंघनों को प्रोत्साहित किया.'' दिल्ली पुलिस की साइबर सेल ने 4 मई को भारतीय दंड संहिता, 1860 तथा सूचना तकनीक अधिनियम, 2008 की विभिन्न धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की, पर इंस्टाग्राम के विरुद्ध आरोप नहीं लगाए. पुलिस ने इस ग्रुप के 18 वर्षीय संचालक को गिरफ्तार किया और कुछ अन्य सदस्यों से पूछताछ की.

सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता नीला गोखले कहती हैं कि इन अपराधियों पर लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो), 2012 के तहत मुकदमा चलना चाहिए क्योंकि यह अपराध अवयस्कों के साथ वस्तुकरण से संबंधित है. दिल्ली महिला आयोग ने भी इंस्टाग्राम को नोटिस जारी किया है. इंस्टाग्राम की मालिक फेसबुक के एक प्रवक्ता ने इंडिया टुडे को बताया, ''हमने नोटिस का जवाब दिया है और दिल्ली महिला आयोग को सामग्री हटाने से लेकर हमारे सामुदायिक मानकों के उल्लंघन पर की गई कार्रवाइयों तथा इंस्टाग्राम यूजर्स के लिए सुरक्षित ऑनलाइन अनुभव के लिए चल रह प्रयासों की जानकारी दी गई है.''

इस स्कैंडल ने छात्रों, अध्यापकों और माता-पिता के बीच संवाद की कडिय़ों के टूटने को भी उघाड़कर रख दिया है. ऐसी घटनाओं के दौरान अधिकतर स्कूल प्रतिष्ठा के भय से उन्हें ढकने लग जाते हैं. बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल की प्राचार्य सुनीता जॉर्ज कहती हैं कि सभी स्कूलों में ये घटनाएं आम हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि हर बार यह कोई लैंगिक मुद्दा हो. सुनीता कहती हैं, ''मुद्दा है डिजिटल बर्ताव और दीर्घकालिक मूल्य-शिक्षा. बच्चे बिना कुछ सोचे-समझे या बिना दूसरों की चिंता किए चीजों को साझा करते हैं. डिजिटल फुटप्रिंट के बारे में वे जानते हैं पर ऑनलाइन आचरण की आदतें और उसके प्रति रवैया रातोरात नहीं बदला जा सकता.'' प्रशांत ने इस बात से अनभिज्ञता जाहिर की थी कि उसका कृत्य आपराधिक श्रेणी में आता है. वह कहता है, ''हम दोस्तों के बीच बातचीत हो रही थी. हमें उम्मीद नहीं थी कि यह बात बाहर जाएगी, इसीलिए हमें जो महसूस होता, हम लिखते थे.''

दिल्ली के जिस स्कूल का यह मामला है उसके प्राचार्य और अन्य लोग भले यह तर्क दे रहे हों कि छात्र घर पर जो कर रहे हों, उसके लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, पर अब इस बारे में सहमति है कि शिक्षकों और अभिभावकों को मिलकर बच्चों को यौन-व्यवहार के बारे में संवेदनशील बनाने और आभासी दुनिया के खतरों के बारे में जानकारी देने की जरूरत है. सुनीता कहती हैं, ''माता-पिता को इसमें काफी ज्यादा भागीदारी की जरूरत है. अगर आप बच्चों को फोन दे रहे हैं तो आपको इसके दुरुपयोग के बारे में उन्हें बताना भी आना चाहिए.''

विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि यौन संबंधी सामग्री के प्रभावों को कम करने में माता-पिता की प्रमुख भूमिका है. माता-पिता को बच्चों के साथ यौन व्यवहार, यौनिकता, लिंगभेद संबंधी विषयों पर बात करनी चाहिए और घर में ऐसे उपाय किए जाने चाहिए कि इस बारे में संवेदनशील नजरिए का निर्माण हो. दिल्ली स्थित मनोविज्ञानी डॉ. उपासना चड्ढा कहती हैं, ''बच्चे सोशल मीडिया की गंभीरता के बारे में नहीं समझते. विपरीत लिंग, यौनकर्म, इंटरनेट व्यवहार आदि उतने ही अहम प्रश्न हैं जितने कि खाना-पीना और पढ़ाई-लिखाई.'' वे यह भी जोड़ती हैं कि फूहड़ अपमानों, भयादोहन तथा यौन दुर्व्यवहार के पीडि़त बच्चे ही चिकित्सा के लिए आते हैं.

किसी अपराधी का चिकित्सा के लिए आने का मामला बहुत मुश्किल से दिखाई पड़ता है क्योंकि उन्हें लोग हमेशा बचाते हैं और वे नहीं समझते कि उनकी हरकत ने दूसरों को कितनी पीड़ा पहुंचाई है. कानून अपना काम करेगा, फिर भी हर माता-पिता को चाहिए, वे बच्चों को बताएं कि वास्तविक और आभासी, दोनों स्तरों पर क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं. और, सिर्फ लड़कियों को ही नहीं, लड़कों को भी.

—साथ में सोनाली अचार्जी

***

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay