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कांग्रेस में नीतीश की दिलचस्पी बरकरार

राज्य के एक कांग्रेसी नेता ने मजेदार टिप्पणी की, ''चाहे डोसा हो या फिर धर्मनिरपेक्षता, इसमें कोई दो राय नहीं कि राहुल गांधी और नीतीश कुमार की रुचि एक जैसी है.'' बिहार में राजनैतिक अलगाव की स्थितियां साफ देखी जा सकती हैं.

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी नई दिल्ली, 16 July 2019
कांग्रेस में नीतीश की दिलचस्पी बरकरार बनेगा साथ? पटना में राहुल गांधी के साथ नीतीश कुमार (फाइल फोटो)

राहुल गांधी पिछली 6 जुलाई को जब अदालती मामले के सिलसिले में पटना गए, तो उन्होंने बिना किसी पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के एक स्थानीय रेस्तरां में जाकर ऑनियन डोसा और कॉफी का आनंद लिया. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी इसी रेस्तरां का यही डोसा पसंद है. इस संयोग को नजरअंदाज नहीं किया जा सका और राजधानी पटना में यह चर्चा का विषय हो गया.

राज्य के एक कांग्रेसी नेता ने मजेदार टिप्पणी की, ''चाहे डोसा हो या फिर धर्मनिरपेक्षता, इसमें कोई दो राय नहीं कि राहुल गांधी और नीतीश कुमार की रुचि एक जैसी है.'' बिहार में राजनैतिक अलगाव की स्थितियां साफ देखी जा सकती हैं. हालांकि, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के दलों—भाजपा, जनता दल (यूनाइटेड) और लोक जनशक्ति पार्टी ने मिल कर हाल ही में राज्य की 40 लोकसभा सीटों में से 39 सीटों पर जीत हासिल की है. एकमात्र बची हुई लोकसभा सीट विपक्षी खेमे की कांग्रेस को मिली.

लेकिन, कांग्रेस और जद (यू) दोनों की अपने-अपने सहयोगी दलों से खुलेआम तनातनी से बिहार के राजनैतिक हलकों में 2020 के विधानसभा चुनावों के पहले इन दोनों दलों के बीच नजदीकियों के कयास लगाए जा रहे हैं.

कांग्रेसी विधायकों का एक धड़ा सहयोगी दल राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की कमान संभाल रहे तेजस्वी यादव को 'राहुल गांधी के नक्शेकदम पर चलने' की सलाह देता रहा है (जिसका मतलब है कि वे विधानसभा में नेता विपक्ष का पद छोड़ें). यह बात लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी को अच्छी नहीं लगी है. उन्होंने अपने बारे में ऐसी अफवाहें फैलाने वालों के खिलाफ क्रम से दो बार बयान दिया है. एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता का कहना है, ''कांग्रेस और राजद के बीच आपसी भरोसे में कमी आई है.'' राहुल गांधी पटना में थे, लेकिन राजद के प्रथम परिवार से किसी ने उनसे मुलाकात नहीं की. उधर, नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार में नीतीश कुमार के जद (यू) के शामिल होने से इनकार करने से भाजपा काफी खिन्न है.

हाशिए पर पहुंच चुकी कांग्रेस के हित तो समझे जा सकते हैं, लेकिन राजग में ठीकठाक हैसियत रखने वाला जद (यू) अपने जिताऊ समीकरण क्यों छेडऩा चाहेगा? इस पर जनता दल (यू) के एक नेता ने कहा, ''अभी तो हमारे पास ऐसा कोई कारण नहीं है, लेकिन कोई जरूरत होने पर जद (यू) नेतृत्व के प्लान-बी में कांग्रेस की जगह हो सकती है.''

आने वाले समय में बिहार में भाजपा पर भारी बने रहना नीतीश कुमार के लिए चुनौतीपूर्ण होगा. अतीत में हुए चुनावों में, जद (यू) ने हमेशा ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ा और अधिक सीटें जीतीं. लेकिन हालिया लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियों ने बराबर सीटों पर चुनाव लड़ा. इन चुनावों में भाजपा ने अपनी सभी 17 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल करते हुए बिहार में जद (यू) की बराबरी पर आ गई. यह ऐसी बात है जिसको लेकर नीतीश कुमार सहज नहीं होंगे.

जद (यू) के लिए कांग्रेस क्यों हो सकती है उपयोगी

  • कांग्रेस अभी भी बिहार में प्रासंगिक है. 2015 के विधानसभा चुनाव में जद (यू) और राजद के साथ गठबंधन में कांग्रेस ने 41 सीटों पर चुनाव लड़ा था. उसे इनमें से 27 सीटों पर जीत मिली और जिन सीटों पर वह लड़ी वहां उसे करीब 40 फीसद मत मिले थे
  • केंद्रीय मंत्रिमंडल में जद (यू) के लिए सिर्फ एक सीट की भाजपा की पेशकश और उसके जवाब में जद (यू) की ओर से राज्य में की गई कार्रवाई से दोनों के रिश्तों पर आंच आई है. जद (यू) को दिख रहा है कि भगवा पार्टी पहले से ज्यादा मुखर हो रही है; हो सकता है कि 2020 के विधानसभा चुनावों में भाजपा जूनियर सहयोगी की हैसियत पर राजी न हो
  • बिहार के 17 फीसद मुसलमानों को राजद के बजाए नीतीश-कांग्रेस गठबंधन पसंद आ सकता है

हाल के दिनों में कांग्रेस और राजद के बीच आपसी भरोसे में कमी आई है

—अमिताभ श्रीवास्तव

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