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बैंकिंग: बंद होगा कर्ज लेकर घी पीना

कर्ज लेने वालों की आदत बिगड़ती जा रही है. कर्ज न चुकाने के नए-नए तरीके ढूंढे जा रहे हैं लेकिन यह सब बदलने वाला है.

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aajtak.in
आनंद अधिकारीनई दिल्‍ली, 11 March 2013
बैंकिंग: बंद होगा कर्ज लेकर घी पीना

बात दो साल पहले की है. एक सुबह एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी ऑफ इंडिया लि. (एआरसीआइएल) के अधिकारी एक डिफाल्टर (कर्ज न चुकाने वाले) के मकानों पर कब्जे के लिए जब बंगलुरू के एक हाउसिंग कॉम्प्लेक्स में दाखिल हुए तो वे हैरान रह गए. इस डिफॉल्टर के सभी किराएदार प्रभावशाली लोग थे-पुलिस इंस्पेक्टर, नेता और कारोबारी. बैंकों के फंसे कर्जों (बैड लोन) की खरीद-फरोख्त करने वाली कंपनी एआरसीआइएल के अधिकारियों ने पाया कि सामने के दरवाजे की कुंडियां ही खोलकर गायब कर दी गई हैं.

चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के आदेश और पुलिस की टीम के साथ रहने के बावजूद अधिकारी किराएदारों से दरवाजा खोलने के लिए बार-बार अनुरोध करने के अलावा और कुछ नहीं कर पा रहे थे. सुबह से दोपहर हो गई और आखिरकार पुलिस ने दरवाजा तोडऩे का फैसला लिया. शोर-शराबा सुनने के बाद किराएदार ने दरवाजा खोला. दूसरे किराएदार ने एआरसीआइएल की टीम को इसके गंभीर नतीजे भुगतने की चेतावनी दी तो तीसरे किराएदार ने आत्महत्या करने की धमकी तक दे डाली. इन लोगों ने कानून का हवाला देते हुए अधिकारियों को फ्लैट के अंदर घुसने से रोकने की कोशिश की. काफी बहस के बाद उन्होंने कहीं और जाने के लिए 10 दिन की मोहलत मांगी और मकान खाली करने की बात लिखकर देने का यकीन दिलाया. कहानी यहीं खत्म नहीं होती.

एआरसीआइएल के अधिकारी बताते हैं, ‘‘हमने पुलिस की सलाह पर उन्हें मोहलत दे दी.’’ अगले ही दिन किराएदारों ने रीपजेशन (दोबारा कब्जा करने) ऑर्डर पर डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल से अस्थायी स्टे हासिल कर लिया. फ्लैट्स पर कब्जे के लिए एआरसीआइएल के अधिकारी अब भी कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं.

ऐसे किस्सों की कमी नहीं है जिनमें डिफॉल्टर (कर्ज न लौटाने वाले) कानूनी प्रक्रिया की धज्जियां उड़ा देने के लिए हरसंभव रास्ता अख्तियार करते हैं. एक जुअलरी निर्यातक ने लोन के लिए जमानत के तौर पर तांबे की मिश्रित धातु को जमा करा दिया और बाद में अपने ‘‘गायब’’ सोने के लिए बैंक पर मुकदमा ठोक दिया. एक अन्य मामले में एआरसीआइएल को कपड़ा बनाने वाली एक कंपनी के कारखानों पर रीपजेशन के लिए 200 पुलिस कर्मियों और निजी सुरक्षा गार्डों की टुकड़ी की व्यवस्था करनी पड़ी तब जाकर वे वहां पहुंच पाए.

एआरसीआइएल के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ पी. रुद्रन का कहना है, ‘‘अब सिर दर्द पैदा करने वाले कर्जदार ज्यादा मिलने लगे हैं.’’ उन्होंने बताया कि बैंक जो कर्ज खुद नहीं वसूल पाते, उसे बेच देना पसंद करते हैं. बेचने का मतलब यह है कि वे एक निश्चित रकम ले लेते हैं और उसके बाद कर्ज वसूलने की जिम्मेदारी कर्ज खरीदने वाली कंपनी की हो जाती है. बैंकों की मदद के लिए नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) की वसूली करने वाली एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों ने 2000 के दशक के शुरुआती वर्षों में जन्म लिया था. मुंबई के सबअर्बन इलाके में एक टावर की दसवीं मंजिल पर स्थित ऑफिस में बैठने वाले 63 वर्षीय रुद्रन का काम तय है, जिसे बैंकिंग सिस्टम में बढ़ते एनपीए से आंका जा सकता है. बैंकिंग इंडस्ट्री में 2012-13 में सकल एनपीए कुल उधारी के 3.5 फीसदी और कॉर्पोरेट डेटरिस्ट्रक्चरिंग 5.7 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान है.

बैंकिंग सिस्टम ने 2011-12 में 50.74 लाख करोड़ रु. का कर्ज और उधार दिया था. पिछले एक दशक में रुद्रन की एआरसीआइएल ने करीब 50,000 करोड़ रु. मूल्य का एनपीए वसूल किया है. दक्षिण दिल्ली में चार्टर्ड एकाउंटेंसी फर्म चलाने वाले और आइडीबीआइ बैंक के बोर्ड में बैठने वाले एस. रवि कहते हैं, ‘‘कोई भी उधार पैसा न चुकाने के लिए नहीं लेता और सभी एनपीए जान-बूझकर किए गए डिफाल्ट नहीं होते. आपको गेहूं और घुन को अलग करना होगा.’’ रवि का तर्क सही हो सकता है क्योंकि अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव, ब्याज दरों में अचानक बढ़त, महंगाई और अपने नियंत्रण में न होने वाले अन्य कारकों से अच्छे कर्जदार भी एनपीए के दुष्चक्र में फंस सकते हैं. लेकिन भारतीय कर्जधारक भी लापरवाह हो सकते हैं. ट्रैक रिकॉर्ड देखने से पता चलता है कि परेशानी वाले एसेट का एक हिस्सा अडिय़ल डिफाल्टरों में बदल जाता है. डिफाल्टरों के खिलाफ किए जाने वाले मुकदमों के माध्यम से वसूली का मूल्य पिछले पांच साल में दोगुने से ज्यादा बढ़ते हुए 2011-12 में 23,439 करोड़ रु. तक पहुंच गया है.  कर्जधारकों में एसेट को बेचने के चेतावनीपूर्ण तरीके से बढ़ते चलन को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक को ‘‘विलफुल डिफाल्टर’’ (जान-बूझकर कर्ज न चुकाने वाले) की परिभाषा का विस्तार करना पड़ा है. 2008 से पहले इसका मतलब ऐसा कर्जधारक होता था जिसके पास कर्ज चुकाने की क्षमता है, या जिसने उधार लिए हुए पैसे को कहीं और लगा दिया है या बेइमानी से उसका इस्तेमाल कर लिया है.

अब इस परिभाषा में उन प्रमोटरों को भी शामिल कर लिया गया है जो कर्ज देने वाले बैंक को बताए बिना जमानत पर रखी गई गिरवी को बेच देते हैं. खराब कर्ज आदतों का एक और संकेत देश में चेक बाउंस होने के (ज्यादातर छोटी राशि के) अदालतों में 40 लाख से ज्यादा लंबित मामले हैं. चेक बाउंस होने की संख्या तो अहमदाबाद, बंगलुरू या कोलकाता जैसे शहरों में हर माह जारी होने वाले चेकों की संख्या के बराबर हो गई है.

एजुकेशन लोन: कर्ज न चुकाने की शिक्षा

भुगतान में देरी की यह बुरी आदत बैंक लोन तक पहुंच गई है. यहां तक कि कई युवा कर्जधारक, जैसे छात्र, बैंक के साथ अपने पहले रिश्ते में ही डिफाल्टर हो जाते हैं. आज एजुकेशन लोन में सकल एनपीए कुल उधारी के सात फीसदी से ज्यादा है. यह मात्रा बढ़ती जा रही है जिसकी वजह से बैंकों को एजुकेशन लोन बांटने की रफ्तार को धीमा करना पड़ रहा है.

पूर्व वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने तो इस मामले में बैंकों की भरपाई के लिए एक क्रेडिट गारंटी फंड बनाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन बजटीय आवंटन के अभाव में इसे कभी मूर्तरूप नहीं दिया जा सका. रिलायंस मनी के पूर्व सीईओ और अब डेस्टिमनी सिक्यूरिटीज प्रा.लि. के नाम से फर्म चलाने वाले सुदीप बंद्योपाध्याय कहते हैं कि छात्र मैच्योर कर्जधारक नहीं होते. उनका कहना है, ‘‘कई बार ऐसा भी होता है कि कोर्स के लिए जितना पैसा खर्च होता है, प्लेसमेंट उसके बराबर नहीं होती.’’ उधर, बैंकर्स का कहना है कि कई बार तो छात्र कर्ज चुकाए बिना देश छोड़कर कहीं और चले जाते हैं.

आइडीबीआइ के रवि कहते हैं, ‘‘हमारे पास निगरानी की अच्छी व्यवस्था नहीं है, अभी यह विकसित ही हो रहा है.’’ कई जानकारों का सुझाव है कि बैंकों को ऐसे डिफाल्टरों तक उनके मां-बाप या इमिग्रेशन अधिकारियों के सहयोग से पहुंचना चाहिए.

क्रेडिट कार्ड का बुरा अनुभव
एक और क्षेत्र जिसमें कर्जधारकों ने अकसर अनियमित व्यवहार किया है, वह है क्रेडिट कार्ड. बैंक इस क्षेत्र में बहुत ज्यादा चौकन्ने हो गए हैं. रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार क्रेडिट कार्ड की संख्या में असल में गिरावट आई है और मार्च 2007 के 2.31 करोड़ के मुकाबले मार्च 2012 तक इनकी संख्या महज 1.77 करोड़ रह गई है. हालांकि, इस दौरान क्रेडिट कार्ड से होने वाला खर्च 41,400 करोड़ रु. से बढ़कर 96,600 करोड़ रु. तक पहुंच गया है. बंद्योपाध्याय कहते हैं, ‘‘ज्यादा बुरे ग्राहक रहने से बेहतर है कि कुछ ही अच्छे ग्राहक हों.’’ बैंकरों का कहना है कि अनियमित आय वाले गैर-नौकरीपेशा लोगों के डिफाल्टर बनने की संभावना ज्यादा होती है.

आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ मॉर्टगेज यानी गिरवी रखने वाले कर्जधारक ही अनुशासित कर्जधारक साबित हुए हैं. करीब 12 साल पुराने क्रेडिट इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (इंडिया) लिमिटेड या सिबिल के सीईओ अरुण ठकराल कहते हैं, ‘‘भारत में ऐसे लोग नहीं दिखते जो होम या कार लोन न चुका रहे हों.’’ यह ब्यूरो बैंकों से कर्ज लेने वाले सभी कर्जधारकों का रिकॉर्ड रखता है. ऐसे सभी कर्जधारकों को 300 से 900 के बीच अंक दिए जाते हैं, 900 अंक हासिल करने वाले को सबसे अच्छा भुगतान व्यवहार वाला माना जाता है.

इस अंक की मदद से कर्ज देने वाले नए बैंक या फर्म को किसी कंपनी या व्यक्ति के कर्ज चुकाने के व्यवहार का अंदाजा लगाने में मदद मिलती है. ठकराल बताते हैं कि भारतीय उस हद तक कर्ज नहीं लेते हैं जितने अमेरिका या ब्रिटेन के लोग. उनका कहना है कि उन देशों में कर्ज पर निगरानी रखने वाला ढांचा बहुत विकसित है, वसूली का तंत्र बहुत बढिय़ा है और कर्ज लेने वाले अपनी भूल स्वीकार करने के मामले में काफी मैच्योर हैं. बंद्योपाध्याय कहते हैं, ‘‘2008 के बाद वाले दौर में हम सब ने ऐसी बहुत-सी कहानियां सुनी हैं कि लोग बैंकों को वापस करने के लिए अपनी कारें सड़क पर छोड़ जाते हैं या अपने फ्लैट को छोड़कर चले जाते हैं.’’ लेकिन एआरसीआइएल के रुद्रन का कहना है कि उन्हें भारत में कम से कम निकट भविष्य में ऐसे व्यवहार की उम्मीद नहीं है.

क्रेडिट इन्फॉर्मेशन ब्यूरो यानी सिबिल अब भी कई ऐसी संस्थाओं को खड़ा करने के लिए जूझ रहा है जिससे कर्ज व्यवहार की सही तस्वीर मिल सके. सिबिल की स्थापना के दस साल बाद जाकर महाराष्ट्र के चार शीर्ष सहकारी बैंक संघ इससे जुड़े हैं. ग्रामीण भारत की गहनता से यात्रा करने वाले एक नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनी के अधिकारी कहते हैं, ‘‘नेता कर्जमाफी का झुनझुना बेचते हैं, किसानों को सीख देते हैं कि वे बैंकों को कर्ज न लौटाएं.’’ बैंक किसानों को कर्ज देने के मामले में चौकस रहते हैं क्योंकि इस सेगमेंट में कर्ज न लौटाने का पूरा इतिहास है.

कर्जा दबाने की महारत
एआरसीआइएल में रिटेल कारोबार के ग्रुप हेड संजय अग्रवाल कहते हैं कि भारत में इस तरह की प्रवृत्ति है कि वसूली प्रक्रिया को विफल करने के लिए लोग मुकदमेबाजी का सहारा लेते हैं. उदाहरण के लिए एआरसीआइएल ने जैसे ही एक बैंक का एनपीए खरीदा, कर्जधारक कोर्ट पहुंच गए और उन्होंने इस एसेट ट्रांसफर को चुनौती दी. एआरसीआइएल के रुद्रन कहते हैं, ‘‘ऐसे कई मामले हैं जो आठ साल से ज्यादा समय से अनसुलझे ही हैं. कर्ज वसूली बहुत सिर दर्दी वाला कारोबार है. आपको शातिर कर्जधारकों से निपटने के लिए नए-नए तरीके खोजने पड़ते हैं.’’ उन्होंने कहा कि डिफाल्टर कर्ज न चुकाने के लिए कोई भी बहाना नहीं छोड़ते और कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर वसूली को बाधित करने की कोशिश करते हैं.

सरकारी बैंक में एनपीए विभाग के एक अधिकारी का कहना है, ‘‘कर्जधारक प्रभावशाली लोगों से अप्रत्यक्ष तरीके से दबाव डलवाने की कोशिश भी करते हैं.’’ उनके बैंक को इसके लिए बहुत से नेताओं के फोन आते रहते हैं. कोटक बैंक-दूसरे बैंकों के एनपीए खरीदने की विशेषज्ञता रखने वाले कुछ बैंकों में से एक-के जॉइंट एमडी दीपक गुप्ता कहते हैं, ‘‘कॉर्पोरेट डिफाल्ट के ज्यादातर मामले सिर्फ कोर्ट के माध्यम से सुलझ पाते हैं.’’ कर्ज देने वालों की बहुतायत भी कर्जधारकों के खराब व्यवहार की एक वजह है. बैंकों के अलावा कर्ज देने वालों में कई आकार-प्रकार के एनबीएफसी, माइक्रोफाइनेंस संस्थाएं, जिला सहकारी बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक और बहुत से गैर रजिस्टर्ड स्रोत भी हैं. हाल में हुए सेमिनार में रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर आनंद सिन्हा ने आंध्र प्रदेश का हवाला दिया जहां माइक्रोफाइनेंस संस्थाओं (एमएफआइ) ने अंधाधुंध तरीके से कर्ज बांटे हैं. सिन्हा कहते हैं, ‘‘अगर एमएफआइ में आपस में सूचनाओं की साझेदारी की व्यवस्था होती तो यह इतने बड़े पैमाने पर नहीं होता.’’

ठकराल का कहना है कि उनका ब्यूरो देश में क्रेडिट कल्चर (कर्ज संस्कृति) में सुधार करने में लगातार मदद कर रहा है क्योंकि अब ज्यादा से ज्यादा लोग इस मामले में जागरूक हो रहे हैं कि खराब क्रेडिट हिस्ट्री उनको मुश्किल में डाल सकती है. बैंक कर्ज देने के मामले में चेकलिस्ट में क्रेडिट ब्यूरो की रिपोर्ट सबसे ऊपर रखते हैं.

ठकराल कहते हैं, ‘‘बुरे कर्जधारकों को अगर कोई नया लोन न मिले तो हालात में सुधार आ जाएगा.’’ क्रेडिट रिपोर्ट की भूमिका बढ़ते जाने से कई कारोबारी इसमें मौके भी देख रहे हैं. मुंबई के दो उद्यमियों ने क्रेडिट सुधार की एक फर्म बनाई है. यह नई कंपनी लोगों के क्रेडिट स्कोर को सुधारने के लिए सलाह देती है. पहले सिटीबैंक में काम कर चुके कंपनी के को-फाउंडर अरुण राममूर्ति कहते हैं, ‘‘हमारे ग्राहक सिर्फ वही नहीं हैं जिन्होंने पहले कभी भूल कर दी हो, हमारे पास ऐसे ग्राहक भी आते हैं जो अपना क्रेडिट स्कोर अच्छा बनाए रखना चाहते हैं.’’

अच्छा कर्जदार होने के फायदे
ठकराल का कहना है कि यह लोगों में बढ़ती जागरूकता का ही संकेत है कि बहुत से कर्जधारक अकसर अपनी निगेटिव रिपोर्ट के बारे में चर्चा करने के लिए सिबिल के दफ्तर आते हैं या हेल्पलाइन पर कॉल करते हैं. ठकराल ने कहा, ‘‘भारत की सांस्कृतिक बुनावट पश्चिम से काफी अलग है. हमारे मां-बाप और दादा-दादी अकसर यह नसीहत देते रहे हैं: जितनी चादर हो उतने ही पांव पसारने चाहिए.’’ समय पर कर्ज चुकाना कई तरह से फायदेमंद है.

भारत में काम कर रहे एक यूरोपीय बैंक ने नौकरी के आवेदकों को नौकरी देने से पहले उनसे अपनी क्रेडिट रिपोर्ट जमा कराने के लिए कहा. अपना नाम न जाहिर करने के अनुरोध पर प्राइवेट कंपनी में काम कर रहे एक प्रोफेशनल ने बताया कि उनके दोस्त जब अपने बेटी का एडमिशन दिल्ली के एक पब्लिक स्कूल में कराने गए तो उनसे उनकी क्रेडिट रिपोर्ट तलब की गई. अब शातिर कर्जधारकों के छिपे रहने की संभावनाएं लगातार घटती जा रही हैं. घर के दरवाजे पर ताला लगा देना या किसी और शहर चले जाना अब काम नहीं आने वाला है. इसलिए अब यह समय अपना क्रेडिट स्कोर चेक करने का है.

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