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जमा के भरोसे

आरबीआइ की चेतावनी है, मार्च 2018 में कुल कर्ज की तुलना में वापस न होने वाले कर्ज का अनुपात बढ़ जाएगा

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aajtak.in
श्वेता पुंज/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 15 December 2017
जमा के भरोसे इलेस्ट्रशनः तन्मय चक्रव्रर्ती

फाइनेंशियल रिजोल्युशन ऐंड डिपॉजिट इंश्योरेंस विधेयक संसद में बिना किसी अड़चन के पारित हो गया होता, अगर उसमें 'बेल-इन' वाला नियम न जोड़ा गया होता. इस नियम ने इस बात पर जोरदार बहस छेड़ दी है कि क्या यह जमाकर्ता के अधिकारों का हनन तो नहीं. इसके चलते सरकार जमा बीमा को मौजूदा 1 लाख रु. से ऊपर बढ़ाने का भी फैसला कर सकती है. यह नियम संकटग्रस्त बैंकों को जमाकर्ता के पैसों से 'उबरने' की इजाजत देता है, न कि करदाताओं के पैसों के साथ सरकारी मदद से.

भारत में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के सहायक संगठन डिपॉजिट इंश्योरेंस ऐंड क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन (डीआइसीजीसी) की ओर से 1 लाख रु. तक के जमा का बीमा किया जाता है. एफआरडीआइ विधेयक दिवालिएपन की आशंका वाले खस्ताहाल बैंकों को अपने यहां जमा पैसों का पुनर्गठन करने की इजाजत देता है जिसके तहत वह उन जमा राशियों को घोर संकट की स्थिति में इक्विटी, सावधि जमा या किसी अन्य स्वरूप में बदल सकता है.

यह विधेयक इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्ट्सी कोड, 2016 जैसा ही है और वित्तीय क्षेत्र में कंपनियों पर केंद्रित है. यह बैंकों, बीमा कंपनियों और वित्तीय सेवा क्षेत्र की अन्य कंपनियों में दिवालिएपन से बचने के लिए फैसला लेने का एक ढांचा मुहैया कराता है. इसमें 'रिजोल्युशन कॉर्पोरेशन' और डीआइसीजीसी की जगह जमा पर बीमा के लिए कॉर्पोरेशन इंश्योरेंस फंड, गठित करने की बात कही गई है. डीआइसीजीसी का गठन दो बैंकों के बर्बाद हो जाने के बाद 1960 के दशक के शुरू में किया गया था.

भारत में बैंकों में पर्याप्त रकम और नगदी होने के लिए बनाए गए नियमों में शुरुआती चेतावनी का भी प्रावधान है ताकि आरबीआइ समय रहते दखल दे सके और संकट से बचा सके. व्यावसायिक बैंकों के बर्बाद होने के मामले बहुत कम हैं. गंभीर समस्या पैदा होने का संकेत मिलने पर आरबीआइ ने आगे बढ़कर सहायता की है और कमजोर बैंकों का विलय मजबूत बैंकों में कर दिया है. 2014 में जब यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया का संकट सामने आया, जब उसकी टियर-1 पूंजी वैधानिक रूप से निर्धारित सीमा से कम हो गई थी, तो आरबीआइ ने जमाकर्ताओं के हित की रक्षा के लिए उसे कर्ज देने से प्रतिबंधित कर दिया था. लेकिन हाल के वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की वित्तीय सेहत में तेजी से गिरावट आई है. जून में आरबीआइ की वित्तीय स्थायित्व रिपोर्ट चिंताजनक हैः इसमें चेतावनी है कि मार्च 2018 में कुल कर्ज की तुलना में वापस न होने वाले कर्ज का अनुपात बढ़कर 10.2 प्रतिशत हो जाएगा जो मार्च 2017 में 9.6 प्रतिशत था. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए यह अनुपात 11.4 प्रतिशत से बढ़कर मार्च 2018 में 14.2 प्रतिशत तक पहुंच सकता है.

केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2016-17 के अपने बजट भाषण में वित्तीय कंपनियों में दिवालिएपन की स्थितियों के संबंध में एक व्यवस्थागत रिक्तता की बात कही थी. एफआरडीआइ विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए आर्थिक मामलों के विभाग में अतिरिक्त सचिव अजित त्यागी के अधीन एक समिति गठित की गई थी और वित्त मंत्रालय ने बिल को संसद मं् पेश करने के लिए कैबिनेट की मंजूरी मिलने से पहले 31 अक्तूबर तक इस मसौदे पर प्रतिक्रियाएं मांगी थीं. विधेयक के अन्य मुद्दों के साथ यह सवाल भी खड़ा हुआ है कि प्रस्तावित रिजोल्युशन कॉर्पोरेशन, जो बैंकों की सेहत पर नजर रखने वाला एक समांतर संगठन होगा, आरबीआइ को मिले निगरानी के अधिकार में दखल कैसे दे सकता है.

इसमें संशोधित जमा बीमा की सीमा का कोई उल्लेख नहीं है, और मौजूदा 1 लाख रु. का बीमा बहुत कम है.आलोचकों का कहना है कि सरकार संकटग्रस्त बैंकों के संबंध में जल्दबाजी में कुछ ज्यादा ही करने की कोशिश कर रही है. मुंबई के एक अर्थशास्त्री कहते हैं, ''वर्षों की निष्क्रियता के बाद छह महीने में ही एनपीए की समस्या को हल करने का प्रयास बहुत जल्दबाजी भरा कदम है.'' लेकिन सरकार की नजर शायद 'कारोबार में आसानी' की रैंकिंग सुधारने पर है. अब सरकार ने इस विधेयक की समीक्षा करने का संकेत दिया है. संभावना है कि इस बिल को सेलेक्ट कमिटी के पास भेज दिया जाएगा, या फिर यह ठंडे बस्ते में चला जाएगा.

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