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बीकानेर: जेल या तस्करी केंद्र

पिछले साल हुए गैंगवार से सरकार ने कोई सबक नहीं लिया. बीकानेर जेल में हथियारों की तस्करी का हुआ खुलासा.

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लक्ष्मण राघव 24 February 2015
बीकानेर: जेल या तस्करी केंद्र

राजस्थान की  बीकानेर  पुलिस बीते दिनों उस दौरान दंग रह गई, जब उसने एक मोबाइल नंबर को निगरानी में लिया. बीकानेर के कोटगेट थानाधिकारी और नाल थानाधिकारी को भनक लगी थी कि बिहार से हथियारों की खेप मंगाई जा रही है. पुलिस ने एक संदिग्ध मोबाइल नंबर को ट्रेस किया तो पता चला कि उसका इस्तेमाल बीकानेर जेल में बंद कैदी 25 वर्षीय करनी सिंह और बिहार के मधुबनी निवासी 28 वर्षीय दिलीप शाह कर रहे हैं. दिलीप अपने ही गांव के विकास चौधरी से हथियार और कारतूस बेचने के लिए मंगवा रहा था. इसकी जानकारी मिलते ही बीकानेर पुलिस अधीक्षक संतोष चालके ने सिटी एएसपी ममता गुप्ता के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी. इस टीम को जानकारी मिली कि विकास और उसका एक अन्य साथी 13 फरवरी को ट्रेन से लालगढ़ पहुंचने वाले हैं. लेकिन ये शातिर उन्हें स्टेशन पर चकमा देकर बच निकलने में कामयाब हो गए.

बाद में पुलिस ने दीनदयाल सर्किल से 22 वर्षीय विकास और उसके साथी बिहार के मुंगेर के 36 वर्षीय शोहराब को गिरफ्तार किया. उनके पास से मैगजीन वाली पांच पिस्टल और 7.65 एमएम के 35 कारतूस बरामद हुए. जाहिर है आठ माह पहले बीकानेर जेल में हुए गैंगवार के बाद सब कुछ दुरुस्त होने के सरकारी दावे की पोल खुल गई है. 24 जुलाई, 2014 को बीकानेर जेल में कैदियों के बीच गैंगवार में तीन कैदियों की हत्या कर दी गई थी. उसके बाद सरकार और जेल प्रशासन ने कई दावे किए थे.

विकास चौधरी और शोहराब से पूछताछ में पुलिस को पता चला कि खाजूवाला में भी हथियार भेजे गए हैं. इसके बाद खाजूवाला पुलिस भी हरकत में आई और उसने कालूवाला माइनर के रहने वाले 31 वर्षीय देवी सिंह को दो पिस्टल के साथ गिरफ्तार किया. पुलिस की सूचना के बाद बीकानेर जेल में भी चेकिंग की गई और इस्तेमाल किए गए मोबाइल फोन को जब्त कर लिया गया. वैसे पुलिस ने इस बार कामयाबी हासिल करते हुए हथियारों के सौदे को नाकाम कर दिया है लेकिन कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं. सवाल मुंह बाए खड़ा है कि आखिर जेल के भीतर हथियारों के ये सौदागर मोबाइल फोन का इस्तेमाल कैसे कर रहे थे और यह सब कितने अरसे से चल रहा था? पुलिस को यह भी जानकारी जुटानी होगी कि इन्होंने इससे पहले किन-किन लोगों को हथियार बेचे हैं. दिलीप हत्या और डकैती के मामले में जेल में बंद है और माना जाता है कि हथियार सौदागरों से उसकी नजदीकियां हैं. इसके बावजूद जेल प्रशासन उसके प्रति लापरवाह बना रहा कि वह बाहर संपर्क बनाए हुए था. इससे पहले भी संगीन वारदातों में बीकानेर से मुहैया कराए गए हथियारों का इस्तेमाल होने की जानकारी मिली थी. अजमेर में पूर्व विधायक नाथूराम सिनौदिया के बेटे की हत्या में इस्तेमाल हुआ हथियार बीकानेर के हथियार तस्कर आमीन  के जरिए ही मुहैया हुआ था. आमीन फिलहाल अजमेर जेल में बंद है. ऐसे में साफ है कि  सरहदी जिले बीकानेर की जेल अपराधियों के लिए अरामगाह बन गई है. वे वहां से साजिश रच रहे हैं और हथियारों का सौदा कर रहे हैं. 

पूरे मसले पर जेल अधीक्षक प्रीता भार्गव का कहना है, ''हम लगातार कोशिश कर रहे हैं कि जेल में सख्ती और अनुशासन रहे. यहां लगातर चेकिंग की जा रही है. पुलिस की जांच में साफ हो जाएगा कि जेल में कैदियों को मोबाइल कौन पहुंचा रहा है.'' लेकिन जुलाई में हुए गैंगवार की जांच में जिस तरह कैदियों के प्रशासनिक और राजनैतिक गठजोड़ का पता चला था और उसकी जांच अटकी पड़ी है, उससे नहीं लगता कि सरकार और जेल विभाग  इसको लेकर गंभीर है.

जांच की कछुआ चाल
बीकानेर जेल में 24 जुलाई, 2014 को कैदी जय प्रकाश, रामपाल और आनंद पाल गुट के बीच गैंगवार हुआ था. उसमें आनंद गुट के बलबीर बानूड़ा और जय प्रकाश तथा रामपाल भी मारे गए थे. जेल में हथियार पहुंचाने में एक जेल प्रहरी को दोषी माना गया. हनुमान जाखड़ पर जय प्रकाश और रामपाल को हथियार पहुंचाने का आरोप है. इसमें तत्कालीन डीआइजी (जेल) दिलीप जाखड़ पर भी सवाल उठे थे. तत्कालीन जेलर महावीर मीणा और योगेंद्र सिंह चौहान ने कहा था कि डीआइजी के कहने पर उन्होंने हनुमान को दोनों से मिलने दिया था. तब डीआइजी का तबादला कर दिया गया, पर उन्होंने कहा कि पूर्व सांसद बद्री जाखड़ के फोन आने पर हनुमान को मिलने की अनुमति दी थी. पूरे प्रकरण में कैदियों, प्रशासन और नेताओं की मिलीभगत का संकेत मिला पर इसकी एसओजी जांच बेहद सुस्त है. जांच अधिकारी कैलाश सांदु का तबादला भी सवाल खड़े करता है.

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