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असहमति पर उठा दी उंगली

मुंबई में राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय (एनजीएमए)में पिछले हफ्ते चित्रकार प्रभाकर बर्वे की स्मृति में हो रही एक चर्चा के दौरान दिग्गज अभिनेता और निर्देशक अमोल पालेकर को अपने विचार रखने के दौरान बार-बार टोका गया

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aajtak.in
चिंकी सिन्हा/ संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर 21 February 2019
असहमति पर उठा दी उंगली मंच पर विरोध अमोल पालेकर (बाएं) और जेसल ठक्कर (बीच में)

मुंबई में राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय (एनजीएमए)में पिछले हफ्ते चित्रकार प्रभाकर बर्वे की स्मृति में हो रही एक चर्चा के दौरान दिग्गज अभिनेता और निर्देशक अमोल पालेकर को अपने विचार रखने के दौरान बार-बार टोका गया. इसी के साथ अभिव्यक्ति की आजादी पर एक बार फिर बहस चल पड़ी.

पालेकर को अपने विषय पर ही केंद्रित रहने को कहा गया. एक आमंत्रित वक्ता को वह नहीं बोलने दिया गया जो वे कहना चाहते थे बल्कि उनकी बात का मजमून उन लोगों ने तय करने की कोशिश की, जिन्होंने उन्हें बोलने के लिए आमंत्रित किया था. और फिर जैसे ही उनकी बात जबरिया समाप्त करवाई गई, एनजीएमए के निदेशक ने माइक्रोफोन पर उन्हें याद दिलाया कि वे 'एक सरकारी गैलरी' में बोल रहे थे, मानो उन्होंने संस्थान को पालेकर के हाथों होने वाले किसी अपराध से बचा लिया.

बर्वे के सिंहावलोकन की क्यूरेटर जेसल ठक्कर औपचारिक रूप से एनजीएमए से संबद्ध नहीं हैं. पर उन्होंने जोर देकर कहा कि कार्यक्रम बर्वे को याद करने के लिए किया गया था और पालेकर का भाषण विषय से बहुत भटक रहा था. वे कहती हैं, ''मैं कला और कलाकारों के लिए खड़ी हूं और मैं पालेकर का विरोध कतई नहीं कर रही थी. मेरा इरादा उन्हें अपना भाषण पूरा करने से रोकना बिल्कुल नहीं था. यह केवल उनसे निवेदन करने के लिए था कि वे एक ऐसे कलाकार के बारे में ज्यादा से ज्यादा किस्से या यादें हम सबके साथ साझा करें जिनके निधन के 24 साल बाद यह कार्यक्रम किया जा रहा था.'' एक कलाकार और मुंबई में एनजीएमके की सलाहकार समिति के पूर्व अध्यक्ष सुहास बाहुलकर की बातों का भी कुछ ऐसा ही लब्बोलुबाब था.

पालेकर की शिकायत का लब्बोलुबाब यह था कि उन्होंने सुना था, एनजीएमए सलाहकार समितियों को खत्म करने की योजना बना रहा है और वास्तव में समितियां पहले ही भंग हो चुकी हैं, इसलिए अब सरकारी अधिकारी संभवतः वैचारिक या नैतिक आधार पर निर्णय करेंगे. फोन पर बात करते हुए बाहुलकर कहते हैं कि उन्होंने सरकार को कथित प्रक्रियात्मक बदलावों के बारे में लिखा था, लेकिन ''बर्वे की प्रदर्शनी को कलाकार की निष्ठा और ईमानदारी के लिए समर्पित होना चाहिए था.'' वे कहते हैं कि यह 'वास्तव में दुखद' है कि इस मुद्दे का राजनीतिकरण किया गया है.

सरकार की ओर से एनजीएमए का दावा है कि सलाहकार समितियों की व्यवस्था को समाप्त नहीं किया गया है. हुआ बस इतना है कि उन समितियों का कार्यकाल पूरा हो गया है और वे अब 'पुनर्गठन की प्रक्रिया में' हैं.

पालेकर की चिंता का एक पक्ष एनजीएमए की उस नीति के प्रति भी है जिसमें संस्था ने अपने स्थायी संग्रह के ही ज्यादा से ज्यादा प्रदर्शन की स्पष्ट इच्छा दर्शाई है, जिससे नए काम के लिए कम जगह मिलती है. इसी वजह से पहले ही सुधीर पटवर्धन और मेहली गोभाई जैसे कलाकारों के काम को प्रदर्शित करने की जगह उसकी दीर्घा में नहीं मिल सकी और कार्यक्रम को रद्द करना पड़ा. शायद पालेकर के उठाए गए विषयों पर प्रतिक्रिया देते हुए एनजीएमए ने कहा है कि किराए के लिए कितनी जगह उपलब्ध होगी, इस पर निर्णय होना अभी बाकी है.

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस और विभिन्न साक्षात्कारों में पालेकर ने कहा कि उनके औचित्य पर जिस प्रकार प्रश्न खड़े करके उन्हें परेशान किया गया था, उससे वे हतप्रभ थे. एक कलाकार के सिर्फ काम पर चर्चा करने के अलावा कलाकार की उपलब्धियों पर चर्चा के अन्य तरीके भी हैं. उन्होंने कहा कि यदि उन्हें यह पता होता कि क्या बोलना है और क्या नहीं, यह उन्हें ठक्कर के साथ पहले ही चर्चा करके तय करना होता तो उन्होंने निमंत्रण को स्वीकार ही नहीं किया होता.

पालेकर ने कहा कि वे उनकी बात में लगातार खड़ी की जा रही रुकावटों और कमरे में बैठे 'वरिष्ठ कलाकारों' की चुप्पी से 'आहत' थे. इस बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है कि वे भाषण समाप्त क्यों नहीं कर सके. हालांकि आयोजकों का मानना था कि वे जो बातें कह रहे थे वे कार्यक्रम के अनुरूप नहीं थीं. एक आमंत्रित वक्ता जो खुद भी एक बड़े कलाकार हैं और जो बर्वे को व्यक्तिगत रूप से जानते थे, उसे अपनी बात खुलकर कहने की आजादी क्यों नहीं दी जा सकती भले ही वह विषय से थोड़ा भी इतर जा रही हो.

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