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20 साल बाद: वक्त से आगे बढ़ा अयोध्या

मंदिर का मसला धार्मिक से कहीं ज्यादा सियासी था. अब सियासी तौर पर तो यह खत्म हो चुका है, लोगों की जिंदगी में भी अब इसके मायने नहीं.

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aajtak.in
संदीप उन्नीथन नई दिल्‍ली, 20 July 2016
20 साल बाद: वक्त से आगे बढ़ा अयोध्या

शंख, पीतल की घंटियां, गदा और ऐसे ही धार्मिक उपयोग की चीजें बेचने वाले 45 वर्षीय रामजी मिश्र पालथी मारे बैठे हैं. 100 मीटर की दूरी पर ही राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का परिसर है, जहां जाने वाले श्रद्धालुओं को वे यह सामान बेचते हैं. 6 दिसंबर, 1992 की वह दोपहर मिश्र को अच्छी तरह से याद है. कारसेवकों की गर्जना, उनकी कुदालों की आवाज और आखिरकार बाबरी मस्जिद के ढह चुके गुंबदों से उठती लाल धूल.

वे कहते हैं, ''हमारी तो दोहरी दीवाली मन गई थी.” खैर वह 20 साल पहले की बात थी. आज मिश्र कहीं ज्यादा समझदार हैं. इस साल मार्च में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने वह काम किया, जिसके बारे में पहले कभी सोचा भी नहीं था. उन्होंने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार पवन पांडे को वोट दिया. बीजेपी से लगातार चार बार यहां से विधायक रहे लल्लू सिंह से सपा ने यह सीट छीन ली.

मिश्र का परिवार उनके इस फैसले को नहीं समझ पाया. आखिरकार, उसकी आजीविका का स्रोत ही भगवान राम थे. मिश्र कहते हैं, ''मैंने ऐसे प्रत्याशी को वोट दिया जिसने नागरिक सुविधाओं का वादा किया था, उन्हें नहीं जिन्होंने वादे के बावजूद इतने बरसों में मंदिर नहीं बनवाया.”

विवादित ढांचे के विध्वंस के बाद से वक्त काफी बदल चुका है. अब चार लेन वाले राजमार्ग से दो घंटे के अंदर लखनऊ से अयोध्या पहुंचा जा सकता है. पहले इससे दोगुना समय लगता था. यरूशलम की अल अक्सा मस्जिद के बाद इस धरती पर शायद सबसे ज्यादा विवादित धार्मिक स्थलों में से एक अयोध्या की 2.77 एकड़ जमीन पर 8,000 से ज्यादा सुरक्षाबलों का पहरा लगता है. यहां आने वालों को चार स्तरों की सुरक्षा जांच से गुजरना होता है, जिसमें मोबाइल फोन से लेकर कलम और बेल्ट तक निकलवा ली जाती है.

इसके बाद उन्हें स्टील और तारों से घिरे एक गलियारे में जाने दिया जाता है जहां से वे एक अस्थायी मंदिर तक पहुंच पाते हैं, जहां कारसेवकों ने जल्दबाजी में तीन मूर्तियां स्थापित कर दी थीं. करीब 30 फुट की दूरी पर एक टीले पर रखे मंदिर की पूजा श्रद्धालु सकुचाते हुए करते हैं. अधिकतर तो खड़े होकर तिरपाल से घिरे ढांचे को ही निहारते रहते हैं. पीछे से उन पर एक गुंबद के आकार का सीसीटीवी कैमरा नजर रखता है. यहां मौजूद एक पुलिसकर्मी का कहना है, ''अयोध्या में पत्ता भी हिलता है तो देश भर में उसकी आवाज होती है.”

विध्वंस के बाद हुए दंगों में देश भर में 2,000 से ज्यादा लोग मारे गए थे. अब तो यह मसला अदालत में घिसट रहा है. पिछले साल 9 मई को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाइकोर्ट के सितंबर 2010 में दिए गए एक फैसले पर रोक लगाते हुए हिंदुओं, मुसलमानों और निर्मोही अखाड़े के बीच विवादित स्थल के तीन हिस्से में बंटवारे के फैसले पर यथास्थिति कायम रखने को कहा था.

विवादित स्थल से दूर बैठे एक पटरी वाले सुरेश कुमार (45) की छोटी-सी पुरानी-धुरानी टीवी के परदे पर विध्वंस की फुटेज एक लूप में लगातार चमक रही है. सुरेश उस कांड की एक घंटे की सीडी बेचते हैं, जिसमें कमल हासन की फिल्म 'हे राम’ का साउंडट्रैक लगा है. वे कहते हैं, ''यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह प्रसाद की तरह है. अगर यह गैरकानूनी होता तो पुलिस मुझे रोकती.” उनकी दुकान पर राम नाम के सामान रखे हैं. हनुमान और राम की होलोग्राफिक तस्वीरें और 1987 के रामानंद सागर वाले टीवी सीरियल से लिया गया एक ढांचे में गढ़ा पोट्र्रेट भी मौजूद है.

बीजेपी को जब कभी राजनैतिक जरूरत होती है, उसके नारों में राम का आह्वान चमक उठता है. अयोध्या के इस विस्थापित भगवान को बहाल करने के लिए मचाया गया हल्ला ही था जिसने बीजेपी को भारतीय राजनीति की मुख्यधारा में और अंतत: केंद्र की सत्ता में लाने का काम किया. भले ही पार्टी का कोई भी वरिष्ठ नेता इस बात को अब खुले तौर पर न स्वीकार करे, लेकिन पार्टी जानती है कि राम का नाम अब उसके काम का नहीं रह गया है.

आज आर्थिक विकास और सुशासन का बोलबाला है. पुराने नेता लालकृष्ण आडवाणी या मुरली मनोहर जोशी तो अब भी गाहे-बगाहे इस मुद्दे की चर्चा कर देते हैं, लेकिन नितिन गडकरी, अरुण जेटली और सुषमा स्वराज जैसे नेता खुद को इससे दूर ही रखते हैं. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है, ''लोग हमसे उम्मीद करते हैं कि हम ऐसा करें. यदि हम बात न करें, तो वे कहेंगे कि पार्टी अपना वादा भूल गई. यदि हम इसका जिक्र करते हैं, तो वे कहते हैं कि हम अब भी पिछले जमाने में जी रहे हैं.” babri demolistion

कुल मिला कर दो लाख से ज्यादा की आबादी वाले जुड़वां शहर अयोध्या और फैजाबाद में हालांकि यह मुद्दा अब एक दर्दनाक अतीत की स्मृति बन कर रह गया है. तत्कालीन शाही परिवार के 200 कमरों वाले घर राजसदन में बैठे राजपरिवार के वंशज यतींद्र मिश्र (35) उस तारीख को याद नहीं करना चाहते, ''6 दिसंबर सुन कर हमारा दम घुटता है.” कवि और लेखक यतींद्र के शब्दों में, ''एक बार यह तारीख गुजर जाने पर अयोध्या और उसके लोगों को भुला दिया जाता है. यहां कोई पर्यटन नहीं, न कोई निवेश या कारोबार है.”

जब विवादित ढांचे को ढहाया गया था उस वक्त आदिल मुस्तफा (30) दस वर्ष के थे. उन्हें याद है कि उन्होंने जब उसका विरोध करने की बात कही थी, तो मां ने उन्हें एक थप्पड़ मारा था. आज वे फैजाबाद में दंत चिकित्सक हैं और अपना क्लीनिक चलाते हैं. रोजाना कम-से-कम पांच नए मरीजों को अपने क्लीनिक में देखने के अलावा वे कैंटोनमेंट बोर्ड की डिस्पेंसरी को भी नि:शुल्क सेवाएं देते हैं. वे कहते हैं, ''बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि स्थल से कोई धार्मिक भावना नहीं जुड़ी है. यह तो एक सियासी मसला था और अब तो सियासत भी इससे बाहर चली गई है. अदालतों को ही फैसला करने दीजिए.”

फैजाबाद मेडिकल कॉलेज में डॉक्टर मधु मिश्र (30) कहती हैं, ''साल भर रोज-रोज हमें जब 4-4, 5-5 बार सुरक्षा जांच के लिए रोका जाता है तो हमें 6 दिसंबर बार-बार याद आता है.” दोनों शहरों में इस तारीख को बिना कहे ही एक तरह की छुट्टी ही होती है. बच्चे स्कूल-कॉलेज नहीं जाते. दुकानदार दुकान नहीं खोलते, लोग खाना-पानी और दवा-दारू का पहले ही इंतजाम कर लेते हैं. विवादित स्थल पर आम दिनों में लगने वाला श्रद्धालुओं का मजमा इस दिन नदारद रहता है. लेकिन एक अदृश्य-अज्ञात के प्रति यह भय बहुत लंबे समय तक नहीं टिकता.

सांप्रदायिक सद्भाव का प्रचार करने वाले एक उर्दू-हिंदी अखबार आप की ताकत के संपादक मंजर मेंहदी कहते हैं, ''युवा आज इलेक्ट्रॉनिक युग की ओर देख रहे हैं. वे भारत को महाशक्ति मानते हैं. वे रामजन्मभूमि-बाबरी विवाद के इतिहास या रहस्य के बारे में कुछ भी नहीं जानते.’’

इस मुद्दे को भड़काने की सबसे ताजा कोशिश पिछली बार पाकिस्तानी संगठन लश्करे-तैयबा ने की थी. उसने 1992 में बाबरी विध्वंस के वीडियो का इस्तेमाल हिंदुस्तानी युवाओं को अपने शिविरों में उन्माद भरने के लिए किया था. जुलाई 2005 में लश्कर के पांच फिदायीन हमलावर राइफल, हथगोले और बारूद लेकर विवादित स्थल की बाहरी सीमा को पार कर भीतर घुस गए थे. कोई भी नुकसान पहुंचाने से पहले सुरक्षाबलों ने पांचों को मार गिराया था.

आम तौर पर फैजाबाद का अमनपसंद और सेकुलर ताना-बाना जो कि दिसंबर, 1992 के दंगों में भी नहीं बिखरा, इस साल 24 अक्तूबर को दंगों से टूट गया. दुर्गा की मूर्ति के विसर्जन के दौरान यह दंगा भड़का था. मुसलमानों की करीब 40 दुकानें जला दी गईं और 1992 के बाद पहली बार यहां कर्फ्यू लगाना पड़ा. दंगास्थल से 7 किमी दूर विवादित स्थल का हालांकि इससे कोई लेना-देना नहीं था. मुस्लिम नेताओं का मानना है कि 2014 के आम चुनावों से पहले निजी हितों के लिए कुछ लोगों ने सांप्रदायिक विभाजन पैदा करने की साजिश रची थी.

उनका मानना है कि बीजेपी अपने हिंदू वोटों को समेटे रखने और समाजवादी पार्टी से मुसलमानों को तोडऩे को दो नावों पर एक साथ सवारी कर रही है. शायद पार्टी को नया संदेशवाहक मिल भी गया है. पार्टी की अयोध्या इकाई अब भगवान् राम की तस्वीर वाले बैनरों की जगह नरेंद्र मोदी के बैनर टांग रही है.

बीजेपी की फैजाबाद जिला इकाई के अध्यक्ष राम कृष्ण तिवारी ने मेल टुडे को बताया, ''हम चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश गुजरात की तरह विकास करे. हमें यहां मोदी की जरूरत है. देखते हैं, ऐसा कैसे हो पाता है.” छह दिसंबर को शौर्य दिवस के रूप में मनाने वाली विश्व हिंदू परिषद ने नारा दिया है, ''यूपी में गुजरात होगा, फैजाबाद से शुरुआत होगा.”

विध्वंस की 20वीं बरसी से एक दिन पहले 5 दिसंबर को हालांकि दोनों शहरों की सबसे बड़ी खबर यहां की परेशान करने वाली सुरक्षा व्यवस्था नहीं रही. खबर यह थी कि राज्य सरकार इस साल 72,825 प्राथमिक अध्यापकों की भर्ती करेगी. फैजाबाद के राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय में वाणिज्य संकाय के प्रमुख मिर्जा शहाब शाह कहते हैं, ''बेरोजगारी व्यापक है और छठे वेतन आयोग के लागू होने के बाद आकर्षक वेतनमान के चलते युवाओं को सरकारी नौकरी में सुकून नजर आ रहा है.” जाहिर है, समूचे भारत की तरह अयोध्या भी बीस बरस में काफी आगे जा चुकी है.

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