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ममता बनर्जी के लिए सियासत के सबक

रामलीला मैदान में अण्णा हजारे का ममता बनर्जी की रैली में न आना ममता के लिए झटका. इससे पहले भी ममता खा चुकी हैं सियासी झटके.

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aajtak.in
टोनी रायनई दिल्ली, 24 March 2014
ममता बनर्जी के लिए सियासत के सबक

बुधवार को दिल्ली के रामलीला मैदान में जब अण्णा हजारे नहीं आए तो ममता बनर्जी के लिए 2012 की पुरानी दुखद यादें शायद एक बार फिर ताजा हो गईं. तब समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को समर्थन देने के मुद्दे पर ममता बनर्जी के भरोसे को धक्का पहुंचाया.

और अब 2014 में अण्णा हजारे ने ममता बनर्जी को उस मुकाम पर अकेला छोड़ दिया, जहां से उनकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं की शुरुआत होने वाली थी. उन्हीं अण्णा हजारे ने पिछले महीने ममता बनर्जी को यह कहकर समर्थन दिया था कि ‘‘हम उनमें उम्मीद की किरण देखते हैं. अगर लोग इस तरह के नेताओं को समर्थन देना शुरू कर दें तो देश को बदलने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा.’’

इन दोनों घटनाओं को देखकर लगता है कि  जहां तक राजनैतिक शुभचिंतकों और विरोधियों के दिमाग को पढऩे का सवाल है तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को इस बारे में अभी और सबक सीखने की जरूरत है. उनके राजनैतिक करियर का ज्यादातर समय उग्र प्रतिपक्ष की भूमिका निभाते हुए बीता है. दांव-पेंच और रणनीतियों की कुटिल राजनीति कभी उनका क्षेत्र नहीं रहा, वरना वे दोनों के इरादे भांप लेतीं.

इतने सालों में ममता ने जनता का जितना समर्थन और सद्भावना बटोरी थी, उनके राज्य में कानून-व्यवस्था की बिगड़ी हालत के कारण तीन साल में सब हवा हो गई. अब अगर दीदी राष्ट्रीय राजनीति में प्रासंगिक बनी रहना चाहती हैं तो उन्हें जयललिता और मायावती से सीखना चाहिए.

जयललिता भी ममता की तरह दिल्ली में ज्यादा प्रभावी भूमिका निभाना चाहती हैं और उन्होंने राजनीति की असली जमीन पर पहले ही वार में लेफ्ट को करारी पटखनी दे दी. वाम मोर्चे के साथ गठबंधन की घोषणा करने के बाद जब एआइएडीएमके सुप्रीमो को समझ में आया कि तीसरा मोर्चा अभी बहुत दूर की कौड़ी है तो उन्होंने बिना किसी शोर-शराबे के लेफ्ट का दामन छोड़ दिया. ठीक उसी तरह मायावती ने अभी तक अपने पत्ते खोले ही नहीं हैं. मुलायम जैसे चतुर नेता भी इस बात को लेकर परेशान हैं कि मायावती की अगली चाल क्या होगी. आखिरकार राजनीति संभावनाओं का ही तो खेल है.

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