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आयुर्वेदः निघंटु और रस शास्त्र पर शोध की आवश्यकता

भारत में आयुर्वेद से संबंधित प्राचीन ज्ञान पर रिसर्च का उचित डॉक्युमेंटेशन नहीं है.
आयुर्वेदः निघंटु और रस शास्त्र पर शोध की आवश्यकता आचार्य बालकृष्ण पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलपति हैं
आचार्य बालकृष्णनई दिल्ली, 23 October 2017

भारत में आयुर्वेद से संबंधित प्राचीन ज्ञान पर रिसर्च का उचित डॉक्युमेंटेशन नहीं है. पतंजलि ने अब इस काम को करने का बीड़ा उठाया है. पतंजलि प्रयोगशाला में सिंगल प्लांट मिनरल्स मेटल्स हर्ब्स, सिंगल कंटेंट और कंपाउंड कंटेंट पर काम हो रहा है. वर्ल्ड हर्बल एन्साइक्लोपीडिया का एक वॉल्यूम रिलीज भी हो गया है. दूसरे तैयार हो रहे हैं. इसमें विश्वभर में मौजूद लगभग चार लाख पौधों में से साठ हजार ऐसे पौधे चिन्हित किए गए हैं जो औषधीय गुणों से परिपूर्ण हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 20-22 हजार पौधों का एक कैटलॉग जरूर तैयार किया है लेकिन वर्ल्ड हर्बल एन्साइक्लोपीडिया का पहला वॉल्यूम पतंजलि विश्वविद्यालय द्वारा मेरे नेतृत्व में तैयार हुआ है. उसमें एक हजार पौधों के विश्व में अब तक प्रचलित सभी पर परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों में महत्व की पहचान कराई गई है. इन औषधीय पादपों का वानस्पतिक नाम एवं उनके स्थानीय नाम का भी उल्लेख किया गया है. इसी तरह के साठ वॉल्यूम में साठ हजार पौधों की विशेषताएं समेटी जानी हैं. वर्ल्ड हर्बल एन्साइक्लोपीडिया अपनी तरह का एक विशेष एवं विश्व का सबसे अधिक वॉल्यूम वाला ग्रंथ होगा. इस काम को छह साल पहले शुरू किया गया था. इस कार्य में 250 वनस्पतिशास्त्री, आयुर्वेदाचार्य, फार्मा विशेषज्ञ, संस्कृत विशेषज्ञ, आइटी विशेषज्ञ, लाइन ड्रॉइंग स्पेशलिस्ट एवं कैरिकेचर आर्टिस्ट लगे हैं.

हिमालय और आदिवासी क्षेत्र तथा अन्य जगहों की 15 से 20 हजार दुर्लभ वनस्पतियों को भी इस ग्रंथ में शामिल किया गया है. 60 वॉल्यूम में आने वाला यह ग्रंथ दुनिया में उपलब्ध सबसे बड़ा साहित्यों में होगा.

जड़ी बूटियों के बाबत विश्व के तमाम क्षेत्रों में फैला प्राचीन ज्ञान भी इसमें समेटने की कोशिश है. यह विश्वविद्यालय का औषधीय पौधों के बिखरे ज्ञान को एक जगह एकत्रित कर इसके वैश्विक महत्व को दर्शाने का एक प्रयास है. इसके लिए अब तक विश्व में कहीं भी उपलब्ध दुर्लभ पांडुलिपियों में दर्ज ज्ञान से लेकर तमाम किताबों एवं हस्तलिखित पांडुलिपियों में दर्ज वानस्पतिक ज्ञान को भी सहेजकर ग्रंथ में तमाम इलाजों के संबंध में दर्ज किए गए हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार मे एक ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी बनाने का काम शुरू हुआ. लगभग सवा लाख फॉर्मुले आयुर्वेद औषधि निर्माण के हैं. हद्ब्रर्स या अन्य तरीकों से मिलने वाली औषधियों की सूची का संकलन तथा उनके गुण, प्रभाव आदि और निर्माणविधि का वर्णन जिस ग्रंथ में होता है उसको औषधि कोष (फार्माकोपिया) कहा जाता है. भारत सरकार ने भी यह ग्रंथ तैयार किया है लेकिन यह प्रयास अब भी नाकाफी है. इनमे रिसर्च डेटा और रिसर्च की गहराई का नितांत अभाव दिखता है.

कई ऐसी आयुर्वेदिक पद्धतियां हैं जिन पर अब भी प्रामाणिकता से काम होना शेष है. आयुर्वेदिक भस्मों पर काम होना है. आयुर्वेद के बाबत महत्वपूर्ण निघंटु ग्रंथों, संहिता ग्रंथों पर काम किया जाना है. निघंटु वे ग्रंथ हैं जिनमें प्राचीन काल में एकल औषधीय पादकों से मिलने वाली जानकारी है. इसमें व्याधियों के लक्षण और उनके निदान को समझाया गया है. लगभग बीस निघंटु हैं जिनमे भावप्रकाश निघंटु, राज निघंटु, मदनपाल निघंटु, चंद्र निघंटु, धनवंतरी निघंटु जैसे निघंटु अति महत्वपूर्ण हैं. इसी तरह चालीस से पचास के बीच संहिताएं हैं, जिनमे चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, बाग्भट संहिता, अष्टांग हृदय आदि ग्रंथ हैं. भारतीय चिकित्साविज्ञान के तीन बड़े नाम हैं चरक, सुश्रुत और वाग्भट. चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा वाग्भट का अष्टांग संग्रह आज भी भारतीय चिकित्सा विज्ञान (आयुर्वेद) के मानक ग्रंथ हैं. इसमें किस फॉर्मुलेशन से किस रोग व्याधि का इलाज करें यह दर्ज है. इसके अलावा रस शास्त्र से संबंधी ग्रंथ हैं जिनमे मेटल-मिनरल संबंधी जानकारियां हैं. ऐसे भी चालीस से पचास ग्रंथ हैं.

आयुर्वेद के मूल ग्रंथों के भी ऊपर प्रमाणिकता के साथ काम किया जाना शेष है. आयुर्वेद के लिए इस काम को व्यवस्थित रूप से करने की जरूरत है. आज भी हिंदुस्तान के आयुर्वेद की प्राचीन जानकारी से युक्त ग्रंथ विश्व के विभिन्न भागों मे धूल खा रहे हैं. देश के बाहर विदेशों की लाइब्रेरीज में विभिन्न पांडुलिपियों को संग्रहीत करने का काम पतंजलि विश्वविद्यालय करने मे लगा है.

(आचार्य बालकृष्ण पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलपति हैं)

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