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पढ़ें, क्यों बढ़ रही है मॉब लिंचिंग, क्यों पकड़ में नहीं आते आरोपी?

हेटर्स इंकः मैसेजिंग ऐप जाने-अनजाने में नफरत और अफवाहें फैलाने का एक मंच बन गया है, जिससे कई राज्यों में भीड़ के हाथों लोगों की हत्या जैसी घटनाएं हो रही हैं. हम इसका मुकाबला कैसे करेंगे?
पढ़ें, क्यों बढ़ रही है मॉब लिंचिंग, क्यों पकड़ में नहीं आते आरोपी? इलेस्ट्रशनः नीलांजन दास
संदीप उन्नीथननई दिल्ली, 17 July 2018

मुंबई के 400 किमी उत्तर-पश्चिम में धुले जिले में एक जनजातीय गांव राइनपाडा में स्मार्टफोनों पर कई दिनों से बच्चे उठाने वाले गिरोह के बारे में चेतावनी वाले संदेश आ रहे थे. 1 जुलाई को ग्रामीणों ने डावरी गोसावी समुदाय के सात आदिवासी लोगों को एक बच्चे से बात करते हुए देखा.

लगभग 20 स्थानीय लोगों ने अंदाजा लगा लिया कि हो न हो, यही वह बच्चा चोर गिरोह है, जिसके बारे में व्हॉट्सऐप पर लगातार चेतावनियां आ रही हैं. बस, फिर क्या था, लोगों ने उन आदिवासियों की पिटाई शुरू कर दी.

उनमें से दो लोग जान बचाकर भागने में सफल रहे, जो भाग न पाए उन्हें लोगों ने ग्राम पंचायत कार्यालय में बंद कर दिया. थोड़ी देर बाद सैकड़ों की संख्या में एक भीड़ पंचायत दफ्तर पहुंच गई.

इसमें से ज्यादातर लोग आसपास के गांवों से राइनपाडा में लगने वाले साप्ताहिक बाजार के लिए आए थे. भीड़ ने कार्यालय का दरवाजा तोड़ दिया. जिसे जो मिला उसे लेकर ही वह भरत भोसले, दादाराव भोसले, भरत मालवे, अप्पा इंगोले और राजू भोसले पर टूट पड़ा.

भीड़ ने लाठी-डंडे, लोहे की रॉड, ईंट-पत्थर से इन बेकसूरों पर धावा बोल दिया. मौके पर पहुंचे दो पुलिस अधिकारियों ने हस्तक्षेप करने की कोशिश की, तो भीड़ ने उन पर भी हमला किया. भरत भोसले, राजू और दादाराव की मौके पर मौत हो गई. मलावे और अप्पा ने अस्पताल के रास्ते में दम तोड़ दिया.

धुले की घटना व्हॉट्सऐप-प्रेरित भीड़ के हाथों हत्या की घटनाओं की शृंखला में नवीनतम थी. इस साल देश भर में ऐसी कई घटनाएं घटी हैं, जिसमें 30 लोगों की जान चली गई.

अगर तकनीक को दोधारी तलवार कहा जाए तो फिलहाल भारत इसके हाइ-स्पीड नेटवर्क के जरिए अफवाहें फैलाने और आग लगाने की क्षमता वाले धारदार किनारे का दर्द महसूस कर रहा है.

महाराष्ट्र से लेकर त्रिपुरा तक, 10 मई से लेकर ऐसी 17 घटनाओं में अब तक 16 लोगों के मारे जाने की सूचना मिली है.

28 जून को बच्चा चोरी करने वाले गिरोह के सदस्यों के अंगों की तस्करी करने जैसी अफवाहों से लोगों को सचेत करने के लिए त्रिपुरा सरकार की तरफ से तैनात मुनादी करने वाले एक शख्स सुकांत चक्रवर्ती की भीड़ ने हत्या कर दी.

इससे पहले 10 जून को गुवाहाटी के दो युवकों को भीड़ ने असम के कार्बी आंगलोंग गांव में बच्चा चोर समझकर पीट-पीटकर मार डाला. अकेले कर्नाटक में पिछले तीन महीनों में ऐसी सात घटनाएं हुई हैं.

आखिरी घटना तो बेंगलूरू में ही हुई जिसमें भीड़ ने 27 साल के कालूराम को खंभे से बांधकर इतना पीटा कि उसकी जान चली गई. राजस्थान का रहने वाला यह प्रवासी मजदूर शहर के चामराजपेट इलाके में बच्चों के बीच मिठाई बांट रहा था और वह स्वयंभू रक्षकों की नजर में चढ़ गया.

पिछले तीन साल में गोरक्षकों ने जानवरों और बीफ ले जाने के आरोप में व्यापारियों पर कई हमले किए जिसमें कम से 50 लोग मारे जा चुके हैं. इस साल तो भीड़तंत्र और भी ज्यादा उन्मादी हो गया है. उसने व्हॉट्सऐप पर फैल रही अफवाहों और कही-सुनी बातों पर हिंसक रुख अख्तियार करके कई जानें ले ली हैं.

वास्तव में इससे जुड़ी हर घटना एक फील्ड टेस्ट की तरह प्रतीत होती है कि कैसे सोशल मीडिया का यह प्लेटफॉर्म देशभर में अफवाहें और भय फैलाने का हथियार बनता जा रहा है. अन्य सोशल मीडिया माध्यमों की तुलना में कहीं ज्यादा लोग इससे जुड़े हुए हैं और इसमें लोगों की पहचान छुपाना ज्यादा आसान है.

इसके जरिए किसी सूचना को फैलाना ज्यादा सरल भी है. इसका फायदा उठाकर नफरत और अराजकता तथा सामाजिक सौहार्र्द बिगाडऩे में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है. एक पूर्व सैन्य अधिकारी और सूचना तंत्र विशेषज्ञ पवित्रन राजन इसे "एक रणनीतिक खतरा'' बताते हैं. राजन कहते हैं, "भारत भाषायी, नस्लीय, जातीय और धार्मिक विविधता वाला देश है.

इसलिए यहां सोशल मीडिया के मीम जैसे "हथियारों'' का प्रयोग करके लक्ष्य साधना ज्यादा आसान हो जाता है और यह भारत के लिए एक बड़ा खतरा है.''

इतना ही क्यों, अफवाह फैलाने की इस साजिश के हाथ कई अन्य घातक हथियार भी लग गए हैं. फेस मैपिंग (चेहरे की नकल तैयार करके) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के टूल्स का इस्तेमाल करके ऐसे फर्जी वीडियो का सहारा लेकर किसी भी व्यक्ति को वे बातें कहते दिखाया जा सकता है जो वास्तव में उसने कभी कही ही नहीं. यह फर्जी वीडियो बनाने की अति है.

खासकर, जुलाई 2016 में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में हिज्बुल मुजाहिदीन के नेता बुरहान वानी के मारे जाने के बाद के महीनों में कश्मीर में लोगों को जुटाने और भर्ती करने में व्हाट्सऐप प्राथमिक हथियार बन गया. (देखें बॉक्स, एक पत्थर से निकले कई पत्थर).

इन संदेशों के तेजी से और बड़े हिस्से में प्रसार को देखकर इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के भी कान खड़े हो गए हैं. 2 जुलाई को मंत्रालय ने फेसबुक के स्वामित्व वाली कंपनी से कहा कि वह "गैर जिम्मेदार और विस्फोटक संदेशों'' पर लगाम लगाए.

मंत्रालय ने कहा कि उसने "इन गैर-जिम्मेदार संदेशों और ऐसे प्लेटफॉर्म पर उनके तेजी से प्रसार को गंभीरता के साथ'' लिया है और "व्हॉट्सऐप के वरिष्ठ प्रबंधन के साथ इस विषय पर चिंता जताते हुए उन्हें सलाह दी गई है कि ऐसी झूठी और सनसनीखेज खबरों को प्रसारित होने से रोकने की दिशा में तत्काल आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए.''

व्हॉट्सऐप ने 4 जुलाई को जारी एक प्रेस वक्तव्य में कहा कि वह "हिंसा के इन भयानक घटनाओं से भयभीत है.'' व्हॉट्सऐप ने उन सुरक्षा उपायों के बारे में भी विस्तार से बताया जो उसने ऐप के दुरुपयोग को रोकने के लिए बनाए हैं.

इन्हें जल्द ही इंस्टाल किया जाएगा. इसके साथ ही कंपनी ने जनचेतना के लिए राष्ट्रीय समाचारपत्रों में विज्ञापन भी दिया, जिसमें लोगों को इस ऐप के दुरुपयोग से बचने के तरीके सुझाए गए.

अफवाहों की जंग

व्हॉट्सऐप के दुनियाभर में एक अरब यूजर हैं जिनमें से एक-चौथाई अकेले भारत में हैं. रोज तकरीबन 20 करोड़ लोग नींद से जागते ही सबसे पहले स्मार्टफोन पर व्हॉट्सऐप चेक करते हैं और एक दूसरे के साथ "गुड मॉर्निंग संदेश'', तस्वीरें, वीडियो आदि शेयर करते हैं.

यह सरकार और जनता के इस्तेमाल में आ रही सूचनाओं के प्रसार का एक ताकतवर माध्यम है जिसके ग्रुप चैट फीचर से एक क्लिक के साथ ही ग्रुप के सभी सदस्यों तक कोई सूचना एक साथ भेजी जा सकती है. यह उस दौर में आया है जब भारत अफवाहों और जहरीली खबरों से सराबोर है और जहां अक्सर कोई जानकारी बिना सचाई का पता किए बस आगे बढ़ा दी जाती है.

व्हॉट्सऐप से अफवाहें फैलाना इसलिए भी सरल हो गया है कि लोग इसे महज सूचना साझा करने वाला मंच मानने की बजाए सूचना का स्रोत समझने की भूल कर बैठे हैं.

सूचनाओं की पड़ताल करने वाली साइट ऑल्ट न्यूज के संस्थापक प्रतीक सिन्हा कहते हैं कि बच्चा चोरी के कथित वीडियो में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि नाम और संदर्भ में मामूली बदलाव के साथ एक ही वीडियो आगे बढ़ता रहता है जिससे इन संदेशों के हथियार बनने की आशंका रहती है.

सिन्हा कहते हैं, "गुजरात में संदेश गुजराती में, ओडिशा में लोगों को बिहार और झारखंड के लोगों को बाहरी बताकर सचेत किया जाता है.'' उदाहरण के लिए, ऑल्ट न्यूज ने अपनी पड़ताल में पाया कि बच्चे चुराने की खबर फैलाने वाला वह वीडियो वास्तव में एक पाकिस्तानी एनजीओ ने लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से तैयार किया था, जिसमें बच्चों को चुराने की घटना का नाटकीय रूपांतरण किया गया था. लेकिन बड़े शातिराना तरीके से इसका गलत इस्तेमाल किया गया (महाराष्ट्र में तो इस वीडियो क्लिप को एडिट करके इसमें मराठी में एक संदेश जोड़ा गया है.)

बच्चा चोरी से जुड़ा उन्माद इसलिए भी तेजी से फैल जा रहा है क्योंकि बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध बढ़ रहे हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार, 2015 में बच्चों के खिलाफ अपराधों की 92,172 घटनाएं हुई थीं.

2009 के मुकाबले सिर्फ छह वर्षों में इसमें 300 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है. लेकिन तथ्य यह भी है कि जिन क्षेत्रों में मॉब लिंचिंग हुई, वहां बच्चों के अपहरण से जुड़ी कोई घटना प्रकाश में नहीं आई थी.

फिर वीडियो ने भीड़ को इतना उन्मादी कैसे बनाया? मुंबई के मनोचिकित्सक डॉ. हरीश शेट्टी कहते हैं, "बच्चों और विशेष रूप से उन पर अत्याचार की सूचनाएं लोगों को सबसे ज्यादा उद्वेलित करते हैं. बच्चे की क्षति, जीवनसाथी की क्षति से ज्यादा बड़ी मानी जाती है.''

अगर इस पर अंकुश नहीं लगाया गया तो झूठी खबरें आगे और खतरनाक साबित हो सकती हैं. सेना के मनोवैज्ञानिक और डीआरडीओ के लाइफ साइंस के पूर्व प्रमुख डॉ. मानस के. मंडल कहते हैं, "झूठी खबर जैसे दिमाग को भटकाने वाली बातों और सोशल मीडिया रूपी हथियारों के बूते ही तो मनोवैज्ञानिक युद्ध लड़े जाते हैं.

धीरे-धीरे इससे तर्कपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता में कमी, लोगों में चिड़चिड़ाहट, खुद को समाज से अलग-थलग कर लेने की प्रवृत्ति या फिर किसी भीड़ का हिस्सा बन जाने की प्रवृत्ति जन्म लेने लगती है. एक बार जब यह प्रवृत्ति उबलने की दशा में पहुंच जाती है तो फिर अनेक तरह के उग्र विकार पनपते हैं.''

वायरल वीडियो की चिंताओं का ताल्लुक हाइपर कनेक्टिविटी से भी है. स्मार्टफोन की विस्फोटक बढ़ोतरी, 4जी नेटवर्क का गांवों तक पहुंचना और सोशल मीडिया प्लोटफॉर्म की प्रकृति ने अफवाहों के प्रचार को खाद-पानी दिया है.

इंटरनेट और मोबाइल ऐसोसिएशन ऑफ इंडिया (आइएएमएआइ) का अनुमान है कि भारत में मोबाइल इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संक्चया इस वर्ष 47.8 करोड़ तक पहुंच जाएगी जिसमें से 18.7 करोड़ लोग ग्रामीण क्षेत्रों से होंगे.

किफायती सेवाएं, तेज कनेक्टिविटी और सस्ते स्मार्टफोन ने इस बदलाव को बढ़ावा दिया है. दरअसल, भारत के शहरी इलाकों में स्मार्टफोन के उपयोग में 18.6 फीसदी और ग्रामीण क्षेत्रों में 15 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है जो दुनिया में सबसे ज्यादा है.

ऐसा हैंडसेट के दाम में कमी और दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के बीच गलाकाट प्रतिस्पर्धा के कारण हुआ है. आज 2,500 रुपये से भी कम कीमत में स्मार्टफोन आ जाता है.

और व्हॉट्सऐप तो आज सबका चहेता सोशल मीडिया मंच बन गया है. याहू में काम करने वाले दो इंजीनियरों जेन कौम और ब्रायन ऐक्टन का यह मोबाइल मैसेजिंग प्लेटफॉर्म लॉन्च के बाद से ही, भारत में लगातार लोकप्रिय होता जा रहा है.

टेलीग्राम और स्नैपचैट जैसे प्रतिद्वंद्वियों को इसने बहुत पीछे छोड़ दिया है. व्हाट्सऐप संदेश पकडऩा इसलिए दुष्कर है क्योंकि इस ऐप में एंड टु एंड एनक्रिप्शन का इस्तेमाल होता है जिससे पुलिस और साइबर जांचकर्ता ये नहीं जान पाते कि मैसेज कहां से आया और कितने लोगों को फॉरवर्ड किया गया (देखें ग्राफिक्स -व्हॉट्ऐप संदेशों को ट्रैक क्यों नहीं किया जा सकता).

सोशल मीडिया के विपरीत, उन्हें ट्रैक करना, नियमित करना और उन्हें नियंत्रित करना मुश्किल होता है. उदाहरण के लिए, 2013 में जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश दंगों की चपेट में आ गया था, तो पुलिस ने फेसबुक और इंटरनेट पर मौजूद फर्जी वीडियो पर तुरंत कार्रवाई की लेकिन उनके पास व्हॉट्सऐप से हो रहे मैसेज के प्रसार को नियंत्रित करने का कोई साधन नहीं था.

पिछले साल, विभिन्न राज्यों के अधिकारियों ने इंटरनेट और 3जी सेवाओं को 70 बार बंद कर दिया था. इसी साल के पहले छह महीनों में कानून-व्यवस्था बिगडऩे की आशंका में मुक्चय रूप से अफवाहों को नियंत्रित करने के लिए 65 बार इंटरनेट बंद करना पड़ा.

यह वर्तमान परिदृश्य में असरदार नहीं होगा क्योंकि भीड़ की हिंसा पुलिस के ऐक्शन लेने से काफी पहले ही खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी होती है और पुलिस भी असहाय हो जाती है.

महाराष्ट्र पुलिस के साइबर क्राइम सेल के प्रमुख इंस्पेक्टर जनरल बृजेश सिंह कहते हैं, "एक मैसेज इतने अधिक नंबरों पर भेज दिया जाता है कि हर यूजर के पास जाना और इसका सत्यापन करना असंभव है.

आत्म-नियमन ही एकमात्र रास्ता है.'' लेकिन इन बुरे सोशल मीडिया कैंपेन के आगे आत्म नियमन भी कोई समाधान नहीं है.

मॉब लिंचिंग और स्वयंभू रक्षकों के हमलों के संदर्भ में 3 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून-व्यवस्था को बहाल रखना राज्य सरकारों का दायित्व है. इस बात की बहुत मांग उठ रही है फिर भी सरकार ने ऐंटी-लिंचिंग कानून बनाने से इनकार कर दिया है.

हालांकि पिछले हक्रते नागरिक उड्डयन राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने मीट कारोबारी की लिंचिंग में नामजद आठ आरोपियों को सम्मानित किया जो जमानत पर छूटे थे.

इस बीच, राज्यों ने ऑनलाइन झूठी खबरों के प्रसार से निपटने के लिए उपाय लागू करने शुरू कर दिए हैं. 25 जून को, राजस्थान पुलिस ने जन जागरूकता अभियान शुरू किया. प्तस्नड्डद्मद्गहृद्ग2ह्य के साथ मीडिया के दुरुपयोग पर प्रकाश डालते हुए लोगों को सिखाया गया कि वे सही और गलत जानकारी में फर्क कैसे कर सकते हैं.

कर्नाटक पुलिस की सोशल मीडिया सेल इंटरनेट और सोशल मीडिया मंचों के ऐसे मैसेज पर कड़ी नजर रख रही है जिनसे समाज में अशांति फैल सकती है. बेंगलूरू पुलिस, जिसके 10 लाख से अधिक फॉलोवर्स हैं, अब नियमित रूप से ऐसे मैसेज भेजती है जिसमें लोगों को अफवाहों से सचेत रहने की जानकारी होती है.

अचानक उमड़ी भीड़

व्हॉट्सऐप की व्यापकता कितनी हिंसा भड़का सकती है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. आखिर लोग क्यों अफवाहों को गंभीरता से लेकर इतने उग्र हो जाते हैं कि उनके सिर पर शैतान सवार हो जाता है और वे किसी अनजान शख्स का पीट-पीटकर कचूमर निकालने पर आमादा हो जाते हैं?

असम के कार्बी आंगलोंग जिले में भीड़ की हिंसा में मारे गए युवकों के केस में सबसे घृणित और वीभत्स पक्ष यह था कि मारे गए अभिजीत का फोन बजा तो हत्यारों में से एक ने फोन उठाया और कहा, "हमने उसे मार दिया है. कल के अखबार में खबर पढ़ लेना.''

मनोचिकित्सकों का कहना है कि भीड़ द्वारा किसी को मार दिया जाना एक गहरी मनोविकृति का सूचक है. सोशल मीडिया ही बातचीत या अभिव्यक्ति का बड़ा विकल्प हो गया है. किसी असत्यापित सामग्री को सबसे पहले लोगों तक पहुंचाने वाला व्यक्ति होने का गौरव हासिल करने की होड़ मची हुई है.

मुंबई के मनोचिकित्सक डॉ. हरीश शेट्टी कहते हैं, "लोग विरक्ति, क्रोध और अलग-थलग होने के भाव से भरे हैं. व्हॉट्सऐप ने उन्हें तुरत-फुरत संपर्क का जरिया प्रदान किया है. जैसे ही उनकी नजर में कोई चीज आती है वे इतनी उत्तेजना से भर जाते हैं कि वे उस जानकारी को अपने मस्तिष्क के प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स (मस्तिष्क का वह भाग जो निर्णय लेने में भूमिका निभाता है और दूसरों के प्रति हमारा व्यवहार कैसा हो इसका निर्णय करता है) तक पहुंचने की भी प्रतीक्षा नहीं करते.

उनकी प्रतिक्रिया वैसी ही होती है जैसी आदम युग में किसी गुफा में रहने वाले व्यक्ति की कोई जंगली जानवर को देखने के बाद होती होगी. मानवीय भावनाएं समाप्त हो रही हैं. उन्हें हिंसक भीड़ के नाम की आड़ में छुपने का मौका भी मिल जाता है.''

तथ्य यह भी है कि अन्य सोशल मीडिया भी इस हिंसा को भड़काने में मददगार होते हैं और सरकार ने इस पर बहुत कम काम किया है. यू ट्यूब पर गोरक्षकों के वीडियो और लोगों की पिटाई की पुरानी हो चुकी बात अब भी जारी है. इसमें सरकारों (केंद्र और राज्य) का रवैया या तो उदासीन, कम दंड देने का या दोषियों को बधाई देने का रहा है.

आरोप-प्रत्यारोप का खेल

व्हॉट्सऐप से अफवाहों पर जो बहस का दौर शुरू हुआ है उसके मूल में अब गोपनीयता, आपराधिक प्रवृति के लिए दंड और उत्तरदायित्व जैसे मुद्दे हैं और आने वाले समय में इन सबकी गहराई से पड़ताल होने वाली है. क्या व्हॉट्सऐप को लेकर सरकार का गुस्सा डेटा सुरक्षा बिल में भी दिखेगा जिस पर अभी काम चल रहा है?

इसी साल 25 मई को यूरोपीय यूनियन का सामान्य डेटा संरक्षण कानून (जीडीपीआर) अस्तित्व में आया जिसे दुनिया के सबसे कठोर डेटा संरक्षण कानूनों में से एक माना जा रहा है. जीडीपीआर का अगला बड़ा कदम व्हॉट्सऐप और स्काइप जैसे ओवर-द-टॉप मैसेजिंग (ओटीटी) ऐप्स के लिए उठाया जाएगा.

माना जाता है कि नए नियमों के तहत इन्हें भी पारंपरिक टेलीकॉम कंपनियों की तरह देखा जाएगा और इन ऐप्स के लिए उपयोगकर्ताओं से जुड़े डेटा एकत्र करना मुश्किल बना दिया जाएगा. लेकिन इससे समस्या और गहरी होगी क्योंकि भड़काऊ संदेश फैलाने वालों को कवच मिल जाएगा.

विशेषज्ञों की राय है कि भारत में हिंसा के लिए व्हॉट्सऐप को दोषी ठहराया जाना संभव नहीं होगा क्योंकि सूचना प्रौद्योगिकी कानून (आइटी ऐक्ट) की धारा 79 किसी मध्यवर्ती (इस मामले में व्हॉट्सऐप) को किसी तीसरे पक्ष से दी गई सूचनाओं या भेजे गए संदेशों के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराती.

डिजिटल अधिकार कार्यकर्ता और मीडियानामा के संस्थापक संपादक निखिल पहवा कहते हैं, "लिंचिंग का मुक्चय मुद्दा कानून लागू कराने का है न कि प्लेफार्म का. झूठी सूचना देना नहीं, कानून तोडऩा गैर-कानूनी है.''

सुप्रीम कोर्ट के वकील और साइबरलॉ एशिया के अध्यक्ष पवन दुग्गल का कहना है कि भारत का आइटी ऐक्ट सोशल मीडिया के अवतार से पहले का है इसलिए अपर्याप्त है. वे कहते हैं, "हमें भारत के नजरिए से विशिष्ट कानूनों की जरूरत है जो सोशल मीडिया और व्हॉट्सऐप जैसे ओटीटी एप्लिकेशंस द्वारा खड़ी की गई चुनौतियों से निपट सकें.''

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की प्रशासनिक व्यवस्था के सामने मैसेजिंग और सोशल मीडिया पर कार्रवाई के दौरान एक अजीब-सी उलझन सामने आ जाती है. साइबर कानून के विशेषज्ञ और सुप्रीम कोर्ट के वकील एन.ऐप.नप्पीनई कहते हैं, "एक तरफ तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म यह कहकर अपनी जान छुड़ा लेता है कि यह तो सूचना के प्रसार का मात्र एक मध्यवर्ती माध्यम है.

दूसरी तरफ इसी प्लेटफॉर्म के जरिए दुर्व्यवहार और हिंसा के प्रसार के अवसर पैदा होते हैं.''

इस बात की जागरूकता फैलाए जाने की जरूरत है कि इस तरह की अफवाहें कितनी खतरनाक हो सकती हैं.

इस समस्या से निपटने की दिशा में यह एक निवारक उपाय हो सकता है.

साथ ही यह बात भी प्रचारित किए जाने की जरूरत है कि अफवाहों को फैलने में मदद देने वाले हर व्यक्ति पर कानून की नजर है.

हालांकि आइटी ऐक्ट और आइपीसी के मौजूदा प्रावधान ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए पर्याप्त हैं.

यदि कानून प्रभावी तरीके से काम करने लगे और लोगों में यह भय पैदा हो जाए कि अफवाह फैलाने के कारण उन पर कानून का शिकंजा कसा जा सकता है, तो इस समस्या से निपटने में आसानी हो जाएगी.

नप्पीनई कहते हैं, "कानून और उसके प्रावधानों का तर्कसंगत प्रयोग होना चाहिए- सीमाओं के भीतर और जहां जरूरत हो वहीं न कि किसी की अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने के लिए होने लगे.

कानून का दायरा बहुत ज्यादा बढ़ा देने से इस बात की भी आशंका है कि इसका इस्तेमाल किसी को परेशान करने के लिए होने लगेगा.''

व्हॉट्सऐप प्लेटफॉर्म प्रदाता पर भी दुरुपयोग को रोकने की दिशा में कुछ प्रयास करने की आशा रखी जा सकती है.

व्हॉट्सऐप ने भी विस्तार से बताया है कि अपने प्लेटफॉर्म से अफवाहों को फैलने से रोकने की दिशा में उसने क्या कदम उठाए हैं.

उसने यह घोषणा भी की है कि वह सभी फॉरवर्डेड मैसेज के ऊपर "फॉरवॉर्डेड'' लिखना शुरू करने वाली है. व्हॉट्सऐप ने अपनी घोषणा में लिखा, "हम मानते हैं कि झूठी खबरें, गलत सूचनाएं और अफवाहें ऐसे मुद्दे हैं जिनका मुकाबला सरकार, सभ्य समाज और तकनीकी कंपनियों, सभी को साथ मिलकर करने की जरूरत है.'' इस मैसेज को वायरल किए जाने की जरूरत है.

—साथ में किरण डी. तारे, रोहित परिहार, रोमिता दत्ता, अरविंद गौड़ा और जीमॉन जैकब

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