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"भाजपा की नफरत की राजनीति ने देश को बर्बाद कर डाला है''

"केंद्र पब्लिसिटी में उस्ताद है. उन्होंने सभी रज्यों में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर 600 करोड़ रु. खर्च किया. वहीं मैंने लड़कियों के सशक्तीकरण पर 5,500 करोड़ रु. खर्च किए हैं.''

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राज चेंगप्पा/ संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर कोलकत्ता, 09 July 2018
"भाजपा की नफरत की राजनीति ने देश को बर्बाद कर डाला है'' यासिर इकबाल

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का जुझारू स्वभाव कोलकाता के उनके दफ्तर में ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा से बातचीत में साफ नुमायां हो गया.

केंद्र और भाजपा से तीखी टकराहट, सत्ता में अपने दूसरे कार्यकाल, विपक्षी गठजोड़ बनाने की कोशिशों, सोनिया तथा राहुल गांधी से अपने रिश्तों और इस आरोप पर भी कि उन्होंने अपनी पार्टी में नेतृत्व की दूसरी पांत नहीं उभरने दी, उन्होंने खुलकर बातचीत की. पेश हैं खास बातचीत के कुछ अंशः

आपकी जिंदगी बचपन से लेकर बाद के दौर में राजनीति तक निरंतर संघर्षों की दास्तान है. अपनी जिंदगी के किस संघर्ष को आप सबसे बड़ा मानती हैं?

संघर्ष तो मेरी जिंदगी का अभिन्न अंग बन चुका है. मेरे पिता की मृत्यु के बाद हमने काफी कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया. हम आत्मनिर्भर थे. छात्र जीवन में मुझे सीख मिली कि कभी किसी के आगे सिर न झुकाओ, जो कुछ करो, ईमानदारी और पूरे साहस के साथ करो.

फिर, मैंने 34 साल वामपंथियों का कुशासन, उनका अत्याचार झेला. अगर आप मेरी सेहत की रिपोर्ट देखेंगे तो पाएंगे कि मेरा पांच से छह बार ऑपरेशन हुआ, दिमाग, पेट, हाथ, आंख, सबका. मैं कई बार मरते-मरते बची. यह तो मेरा जज्बा था (जिसने मुझे जिंदा रखा). मैं कभी नहीं घबराई, कभी नहीं डरी.

तो क्या माकपा को हराना सबसे कड़ा संघर्ष था?

हमने 34 साल तक उससे लड़ाई लड़ी, अपने छात्र जीवन से ही. आज भी जब हम सरकार में हैं, हमें वामपंथी कुशासन से जूझना पड़ रहा है. अपनी सरकार के सात साल में हम 2,14,000 करोड़ रु. तो कर्ज चुकाने में अदा कर चुके हैं (जो वे छोड़ गए थे).

अब हम कैसे सरकार चलाएं, कैसे समाज कल्याण और विकास के काम करें? केंद्र सरकार से हमें कोई मदद नहीं मिली. हमने कई बार कहा कि यह हमारी गलती नहीं है, यह विरासत में हमें मिली है. कर्ज का पुनर्संयोजन करें, कम से कम हमें अदा करने की कुछ मोहलत दें.

पर वे कुछ नहीं कर रहे हैं. इस साल भी हमें ब्याज के रूप में 47,700 करोड़ रु. अदा करने पड़े. हम विकास करना चाहते हैं, पर हमें केंद्र से कोई मदद नहीं मिल रही है. चूंकि हम उनका समर्थन नहीं करते, इसलिए वे हमारे लिए कुछ नहीं कर रहे.

उस सहकारी संघवाद के बारे में क्या है, जिसकी चर्चा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार करते रहते हैं?

सहकारी संघवाद को तो भूल ही जाइए, अब तो कोई संघीय ढांचा ही नहीं बचा है. वे (भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार) सब कुछ बर्बाद करने पर तुली हुई है. उनकी नफरत की नीति देश, समाज और अर्थव्यवस्था को तबाह कर चुकी है.

अब तो कुछ अपवादों को छोड़कर मीडिया भी बिकाऊ माल है. हाल में भाजपा इमरजेंसी का हल्ला कर रही है लेकिन वह खुद क्या कर रही है? हर कोई खौफजदा है, हर कोई डरा हुआ है कुछ बोलने से. बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है क्योंकि वे अपनी एजेंसियों को आपके पीछे लगा देंगे. उन्होंने हमारे लोगों को भी गिरफ्तार किया, लेकिन हम अपनी लड़ाई जारी रखेंगे.

क्या आप केंद्र पर अपने राज्य के लिए कुछ न करने का आरोप लगा रही हैं?

हां, दरअसल हम पर हर रोज अत्याचार हो रहा है, मानसिक, शारीरिक, आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक उत्पीडऩ हो रहा है. बंगाल का प्रदर्शन देखिए. देश की जीडीपी वृद्धि दर 6.5 फीसदी है, हमारी 11.46 फीसदी है.

अगर आप सकल मूल्य योग (जीवीए) देखें तो देश का 6.1 फीसदी है जबकि हमारा 11.8 फीसदी है. उद्योग के मामले में भी देश की वृद्धि दर 4.4 फीसदी है जबकि हम 11.4 फीसदी पर हैं.

सेवा क्षेत्र में भी देश 8.3 फीसदी पर है, हम 15.6 फीसदी पर हैं. कृषि क्षेत्र में देश की वृद्धि दर 2.1 फीसदी है, हमारी 2.3 फीसदी है. हम इकलौते राज्य हैं जहां किसान की आमदनी तिगुनी (टीएमसी के कार्यकाल में) हो गई है, प्रधानमंत्री तो अभी दावा ही कर रहे हैं कि किसान की आमदनी दोगुनी कर देंगे.

क्या आपने प्रधानमंत्री से संपर्क किया?

हम भीख नहीं मांगेंगे. केंद्र सरकार हमारे खिलाफ भेदभाव करती है, वह हमें कोई पैकेज नहीं दे रही. मैं कुछ और तथ्य बताती हूं. क्या आप जानते हैं कि बंगाल में सामाजिक सुरक्षा की योजनाएं सबसे ज्यादा हैं?

हम अपने 9 करोड़ लोगों को 2 रु. प्रति किलो की दर से गेहूं और चावल मुहैया कराते हैं. हम सभी को मुफ्त इलाज, मुक्रत दवाइयां और अस्पताल में मुफ्त बिस्तर मुहैया कराते हैं. हमारे यहां कन्या सशक्तीकरण की योजना है, लड़कियां 18 बरस की होती हैं और वे विवाह करने के बदले अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती हैं तो हम उनके खाते में 25,000 रु. डाल देते हैं.

फिर सालाना 1.5 लाख रु. से कम आमदनी वाले परिवारों को लड़की की शादी में खर्च के लिए 25,000 रु. दिया जाता है. हम अलपसंख्यकों, आदिवासियों, अनूसूचित जातियों को छात्रवृत्ति मुहैया कराते हैं. हमारे यहां अंतिम संस्कार के लिए भी योजना है. हर जाति, हर संप्रदाय, हर जरूरत के लिए यहां कोई न कोई योजना है.

इन योजनाओं के लिए आप पैसे का प्रबंध कैसे करती हैं? राज्य के राजकोषीय घाटे पर क्या सोचती हैं?

हम इसका प्रबंधन करते हैं. हमने अपना राजस्व बढ़ाया है, करीब-करीब दोगुना कर लिया है. हम अपने खर्च में संतुलन रखते हैं. हमने कई सुधार शुरू किए हैं. हमने विकेंद्रीकरण और कार्य-सक्षमता बढ़ाने पर काम किया है.

हमने जब सत्ता संभाली तो 63 विभाग और मंत्रालय थे. हम उसे 51 पर ले आए. हमें ई-गवर्नेंस के लिए अवॉर्ड मिला. कौशल विकास में हम देश में पहले नंबर पर हैं. लघु उद्योगों और अल्पसंख्यकों के विकास के मामले में भी हम पहले नंबर पर हैं.

हमने रोजगार के अवसर 40 फीसदी तक बढ़ाए हैं, जिसे केंद्र सरकार ने संसद में बताया. हमने इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए 18,000 करोड़ रु. आवंटित किए, जिसका इस्तेमाल सिर्फ फ्लाइओवर और सड़कें बनाने में ही नहीं, 43 मल्टीस्पेशिएलिटी अस्पताल, 48 नए कॉलेज और 22 नए विश्वविद्यालय और मेडिकल कॉलेज बनाने में किया गया है. हमने हर मामले में सुधार किया है. इसी वजह से हमारी जीडीपी आसमान छू रही है.

फिर भी 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसी प्रधानमंत्री की योजनाओं की चर्चा आपकी योजनाओं से ज्यादा है.

वे पब्लिसिटी में उस्ताद हैं, उस पर उन्होंने खूब पैसा खर्च किया है, हमने ऐसा नहीं किया. हमारा मानना है कि एक-एक पाई कीमती है, यह हमारे लोगों का पैसा है. "बेटी बचाओ, बेटा पढ़ाओ'' योजना की बात करें.

पिछले चार साल में केंद्र सरकार ने 29 राज्यों और केंद्र प्रशासित प्रदेशों के लिए 600 करोड़ रु. आवंटित किए. मैं अपने राज्य में लड़कियों के सशक्तीकरण योजना कन्याश्री के लिए 5,500 करोड़ रु. खर्च कर चुकी हूं, जिससे 50 लाख लड़कियों को लाभ मिला है. और केंद्र ने क्या खर्च किया? प्रति राज्य महज 20 करोड़ रु. तो, इससे क्या हासिल हो सका?

नीतियों के मामले में आप वामपंथियों से भी अधिक वामपंथी लगती हैं...

मैं वाम या दक्षिणपंथी नहीं हूं. मैं राष्ट्रवाद, देशभक्ति, संघीय ढांचे, लोकतंत्र और गरीबों पर यकीन करती हूं. अगर एक लाइन में अपनी पार्टी की विचारधारा बताऊं तो यह लोगों के लिए, लोगों के द्वारा, लोगों की सरकार है. यह हमारे नाम तृणमूल कांग्रेस से भी जाहिर है, जिसका अर्थ एकदम जमीनी स्तर होता है.

मुख्यमंत्री के बतौर यह आपका दूसरा कार्यकाल है, इस बार आप अलग क्या कर रही हैं?

सरकार लगातार चलने वाली प्रक्रिया है और हमने जो परियोजनाएं शुरू कीं, उस पर अमल कर रहे हैं. इस कार्यकाल में, मैं बेरोजगारी और उद्योगों पर ध्यान दे रही हूं. जैसा कि मैंने पहले कहा, रोजगार के अवसर 40 फीसदी बढ़ गए हैं.

औद्योगीकरण के मामले में हम इन्फ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने पर ज्यादा जोर दे रहे हैं. बंगाल में सिलिकन वैली जैसी एक योजना लाई जाएगी. हमने जमीन चिन्हित कर ली है और सितंबर में उसका उद्घाटन करेंगे.

और भी कई परियोजनाएं हैं. मैं दो बंदरगाह बनाना चाहती हूं, मगर केंद्र सरकार सिर्फ एक पर राजी है. हमने निवेश आकर्षित करने के लिए वैश्विक बंगाल औद्योगिक सम्मेलन भी शुरू किया है.

मुख्यमंत्री बनने के पहले आपकी छवि सुधार और उद्योग विरोधी की रही है. क्या इसमें बदलाव आया है?

कोई बदलाव नहीं है. जो मैं शुरू में थी, वहीं आज भी हूं. विकास मेरा सपना है. यह एक संघर्ष भी है. मैंने ऐसे अत्याचार किसी केंद्र सरकार में नहीं देखे. विकास के मामले में मैं सिर्फ एक उदाहरण दूंगी.

उन लोगों ने हड़बड़ी में जीएसटी लागू किया, असंगठित क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ. यहां तक कि नोटबंदी से भी. जिस दिन इसका ऐलान हुआ, मैंने कहा कि नोटबंदी सबसे बड़ा घोटाला है. और अब जीएसटी.

हर राज्य नकारात्मक वृद्धि (कुछ मामलों में) शून्य से 18 फीसदी नीचे लुढ़क गया, सिर्फ बंगाल सरप्लस रहा. आपको क्या लगता है, यह कैसे हुआ? अगर सुधार नहीं होते, सक्रियता नहीं होती, कार्रवाई नहीं होती, पुनर्संयोजन नहीं होता, तो आप वित्तीय तौर पर आगे कैसे बढ़ते? मैं चुनौती देती हूं कि कोई ऐसा करके दिखाए.

वह धारणा जो सिंगूर में टाटा के कारखाने और दूसरे मामलों से बनी थी.. ..

अब राज्य में टाटा के कई कारखाने चल रहे हैं. टाटा घराना भी सरकार के साथ काम कर रहा है. हम किसी कंपनी के खिलाफ नहीं हैं. लोगों को जमीन बेचने पर मजबूर करने की नीति गड़बड़ थी.

अब हमारी नीति देखिए. हमने जमीन बैंक, जमीन के इस्तेमाल और खरीद की नीति बनाई. हम उद्योग को जमीन दे रहे हैं. अगर कहीं सड़कों, फ्लाइओवर, रेलवे का मामला है तो हम समझौते करते हैं. लोगों को जबरन निकालते नहीं हैं.

उद्योग के मामले में आपकी नीति क्या है? आप निजी-सरकारी साझेदारी (पीपीपी) में यकीन करती हैं?

हां, हमने कई पीपीपी करार किए हैं. हमने विलय का भी फैसला किया. यहां कई बीमार उद्योग हैं. विलय से मदद मिली, कर्मचारी काम कर रहे हैं और खुश हैं. अतिरिक्त जमीन का इस्तेमाल नए उपक्रम के लिए करूंगी, कर्मचारियों को विभिन्न क्षेत्रों में काम दे दिया गया है.

क्या आप एयर इंडिया के विनिवेश के समर्थन में हैं?

मैं इसका समर्थन नहीं करती. आपके घर में गरीबी है तो क्या अपने घर का सब कुछ बेच देंगे? अपनी बेटी, बेटे, पत्नी, मां-बाप? एयर इंडिया राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ब्रांड है. आप पहले ही एयर इंडिया के महत्वपूर्ण रूट बेच चुके हो, उसे बर्बाद कर डाला है. पर कृपया, देश की इज्जत मत बेचिए.

उड्डयन उद्योग में काफी निजीकरण हो गया है. अब कई निजी एयरलाइन हैं. हम उनके खिलाफ नहीं हैं. निजी और सरकारी क्षेत्र, दोनों में कारोबार होने दीजिए. सरकारी कंपनियों को बेचने के बदले तीन या चार को एक में मिलाया जा सकता है.

प्रधानमंत्री मोदी का मानना है कि सरकारों को वह नहीं करना चाहिए, जो कारोबारी कर सकते हैं.

कारोबार अलग है, सामाजिक जरूरतें अलग हैं. यूरोपीय देशों में सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रम क्यों हैं? अगर किसी की मृत्यु हो जाती है तो क्यों हर कोई अंतिम संस्कार में शामिल होता है? यह किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि दोस्ती, एक रिश्ते की वजह से होता है.

यह हर मामले में अलग होता है. आप जहां जरूरी हो, निजीकरण कीजिए. पर नोटबंदी की क्या जरूरत थी? देश को उससे क्या लाभ हुआ? सिर्फ उनकी पार्टी को लाभ हुआ. अब भाजपा चुनावों में करोड़ों रु. खर्च कर रही है. वे भाजपा कार्यकर्ताओं को बाइक, कार दे रहे हैं. पैसे लूट रहे हैं और अपने पार्टी के लोगों को दे रहे हैं. कोई गरीब कैसे चुनाव लड़ेगा? अगर आप देश में सुधार चाहते हैं तो चुनाव सुधार कीजिए.

आप अपने विचार केंद्र से साझा क्यों नहीं करतीं?

वे बड़े लोग हैं, मैं उन्हें सलाह नहीं दे सकती. मैं बहुत साधारण हूं. बंगाली में एक कहावत है, "बोऊ, बुद्धि आर बोई काउ के देबे ना'', यानी पत्नी, बुद्धि और किताब किसी को न दो, ये कभी वापस नहीं मिलेंगे. यदि संघीय ढांचे में बदलाव होता है और क्षेत्रीय दल सत्ता में आते हैं तो मैं उनसे अपने विचार साझा करूंगी.

आप विपक्ष के गठजोड़ में आधार के तौर पर उभरी हैं. क्या आपको लगता है कि ऐसा गठजोड़ संभव है?

हां, यह संभव है. मैं बहुत आशावादी हूं. यह बहुत आसान है. हर किसी को मिलकर काम करना है. मेरा मानना है कि जो भी मजबूत है, उसे चुनाव लड़ने दीजिए. जहां कांग्रेस मजबूत है, वहां उसे लड़ने दिया जाए, जहां क्षेत्रीय दल मजबूत हैं, वहां उन्हें लड़ने दिया जाए.

आपका कहना है कि एक साझा उम्मीदवार ही खड़ा किया जाना चाहिए?

मैं यह नहीं कह रही हूं. अगर 75 सीटों पर भी ऐसा किया जा सका तो खेल खत्म हो जाएगा. अगर मायावती और अखिलेश साथ काम करते हैं तो खेल खत्म हो जाएगा. फिर चुनाव के बाद एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाया जा सकता है. यह बड़ा परिवार है और फैसले सामूहिक होने दीजिए.

तो आप सभी मोदी विरोधी, भाजपा-विरोधी साझा वोट पर काम कर रहे हैं?

वे उत्पीड़न और अत्याचार कर रहे हैं. यहां तक कि कुछ भाजपा के लोग भी उनका समर्थन नहीं करते. वे तो सैकड़ों हिटलर की तरह बर्ताव कर रहे हैं.

आप मोदी को भी हिटलर कह रही हैं?

मैं नहीं कह रही हूं. मैं कोई टिप्पणी नहीं करती, आम लोगों को फैसला करने दीजिए. भाजपा के बारे में मेरी जो भी राय है, वह मैं आपको बता चुकी हूं.

जब आप भाजपा को हराने के लिए वोट मांगेंगी, तो आप क्या कहेंगी?

मैं आपको अभी क्यों बताऊं? हमने सब तैयार कर लिया है, चुनाव आने दीजिए तब देखिएगा. अगर आपको संगीत सुनना है तो उत्सव तक इंतजार करिए. हम अपने नारे लोकतंत्र के उत्सव, अगले चुनावों में जाहिर करेंगे.

कुछ विपक्षी दल कांग्रेस के बगैर संघीय मोर्चा चाहते हैं?

कुछ पार्टियां कांग्रेस का समर्थन नहीं करतीं, उनकी अपनी क्षेत्रीय मजबूरियां हैं. मैं उन्हें दोष नहीं देती. मैं कहती हूं, आइए, भाजपा के खिलाफ मिलकर काम करें. अगर कांग्रेस मजबूत है और कुछ जगहों पर ज्यादा सीटें पाती है तो वह अगुआई करे.

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