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आवरण कथा-हुकूमत की कुंजी

देश में सियासी रूप से सबसे अहम राज्य ही यह तय करने जा रहा है कि दिल्ली में अगली सरकार किसकी होगी

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aajtak.in
अजीत कुमार झा/ संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली,उत्तर प्रदेश, 02 May 2019
आवरण कथा-हुकूमत की कुंजी चंद्रदीप कुमार

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी-समाजवादी पार्टी—राष्ट्रीय लोक दल के गठबंधन की बेमिसाल तस्वीर तो वही है, जब 19 अप्रैल को मैनपुरी में सपा दिग्गज मुलायम सिंह के साथ बसपा सुप्रीमो मायावती ने मंच साझा किया. दोनों नेता लखनऊ के कुख्यात गेस्ट हाउस कांड के 24 साल बाद एक मंच पर दिखे. मैनपुरी सपा का गढ़ है और 2019 के लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण में 23 अप्रैल को मतदान हुआ. बसपा की नेता मुलायम सिंह के लिए प्रचार करने पहुंची थीं. उन्होंने मुलायम को ''असली, वास्तविक, जन्म जाति से पिछड़े वर्ग का नेता्य्य बताया, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 'नकली, फर्जी पिछड़े वर्ग का नेता' कहा और उन पर आरोप लगाया कि उन्होंने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते वक्त अपनी मोढ़-घांची जाति को पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल करवा लिया था.

मुलायम को मैनपुरी में प्रचार के लिए मायावती की जरूरत नहीं थी. सपा यह सीट लगातार छह बार से जीतती आ रही है, जिसमें चार बार तो मुलायम ही जीते हैं. यहां तकरीबन 35 फीसदी वोटर यादव और 20 फीसदी राजपूत हैं, जबकि दलित, ब्राह्मण, शाक्य और मुसलमान दूसरे दबदबे वाले समुदाय हैं. यही वजह है कि भाजपा मैनपुरी कभी जीत नहीं पाई. यहां तक कि 2014 की मोदी लहर में भी मुलायम ने यह सीट रिकॉर्ड अंतर से जीती थी.

तो, फिर सपा के इस मजबूत गढ़ में मुलायम के लिए मायावती के वोट मांगने के क्या मायने हैं? सपा के राष्ट्रीय सचिव अभिषेक मिश्र कहते हैं, ''मायावती-मुलायम का फिर से एक होना वह ऐतिहासिक लक्वहा है जो लंबे वक्त से दमन के शिकार दो समुदायों को एक दूसरे के साथ जुडऩे का संदेश देता है. पूर्व प्रतिद्वंद्वियों का एक साथ आना उत्तर प्रदेश में एक ताकतवर विकल्प के उभरने का संकेत है."

दरअसल दोनों पूर्व प्रतिद्वंद्वियों का यह ऐतिहासिक गठजोड़ उत्तर प्रदेश में भाजपा के ताकतवर समीकरण की काट के मकसद से कायम हुआ है. 2014 में भाजपा प्रदेश की कुल 80 संसदीय सीटों में से 71 जीत गई थी और उसके सहयोगी अपना दल ने दो सीटें जीत ली थीं. मोदी की अगुआई में भाजपा ने राज्य में सबका सूपड़ा साफ कर दिया था. इस तरह लोकसभा में सबसे अधिक सांसद भेजने वाले राज्य ने ऐसा जनादेश सुना दिया था, जो 1984 में कांग्रेस के अलावा किसी को नहीं मिला था. भाजपा की इस जीत ने राज्य में सपा और बसपा को भी हाशिए पर धकेल दिया था.

इसलिए सपा और बसपा दोनों के लिए 2019 अपना वजूद बचाने की लड़ाई बन गया है. अलग-अलग ये दोनों बियाबान में समा सकते थे लेकिन साथ मिलकर वे राख से जी उठने का करिश्मा कर सकते थे. 'करो या मरो' की यह चुनौती सिर्फ इन्हीं दोनों पार्टियों के लिए नहीं है. मोदी और भाजपा को यह शिद्दत से एहसास है कि अगर 2019 में उत्तर प्रदेश में पार्टी 2014 का अपना प्रदर्शन नहीं दोहरा पाई तो केंद्र में गठजोड़ सरकार ही बन पाएगी, जिससे न सिर्फ पार्टी अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने का दमखम खो बैठेगी, बल्कि उसे गठबंधन की मजबूरियों के आगे झुकना पड़ेगा. 2014 में अप्रासंगिक होने की हद तक सिमट आई कांग्रेस के लिए भी दांव ऊंचे हैं. पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए अपनी परंपरागत सीट अमेठी को कायम रखने के अलावा बहन प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश में केंद्रीय भूमिका में उतारने के साहसिक कदम की भी परीक्षा देनी होगी, जिसे कुछ लोग मजबूरी में उठाया कदम भी मानते हैं. हालांकि भाजपा के गढ़ को असली खतरा सपा और बसपा के गठजोड़ से है.

विकल्पों का गठबंधन

सपा-बसपा गठजोड़ को औपचारिक शक्ल भले 12 जनवरी, 2019 को मिली, लेकिन इसके बीज उसी दिन पड़ गए थे जब सपा-बसपा-रालोद ने 2018 के उपचुनावों में गोरखपुर, फूलपुर और कैराना की लोकसभा सीटें जीत ली थीं. इनमें से पहली दो सीटों की नुमाइंदगी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य करते थे. ये नतीजे 2014 और 2017 में भारी जीत दर्ज कर चुकी भाजपा के लिए पहला बड़ा झटका थे.

गठजोड़ का ऐलान होते ही पूरे उîार प्रदेश में लाल टोपी और बिना बांह की काली जैकेट में अखिलेश यादव और क्रीम कलर के सलवार कुर्ते में मायावती के नए पोस्टर लग गए. एक पोस्टर में दावा है, ''सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं," तो दूसरे में कहा गया है, श्श्हमारे पास गठबंधन है, ''भाजपा के पास सीबीआइ," बुआ-भतीजे का तीसरा पोस्टर ऐलान करता है, ''हमारा काम बोलता है, भाजपा का झूठ बोलता है."

2019 में गठबंधन की पार्टियों के बीच सीटों का बंटवारा प्रदेश के चुनावी भूगोल में हर पार्टी की ताकत को ध्यान में रखकर किया गया है. बसपा की झोली में पश्चिमाबाद (पश्चिमी उत्तर प्रदेश) और पूर्वांचल (उत्तर-पूर्वी उत्तर प्रदेश) की सीटों का बड़ा हिस्सा आया है. सपा को ज्यादा सीटें दोआब पट्टी में मिली हैं. रालोद को जाटों के दबदबे वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तीन सीटें मिलीः मथुरा, बागपत और मुजफ्फरनगर. दलितों की नुमाइंदगी वाली पार्टी होने के नाते बसपा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 10 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि सपा सात सीटों पर.

फिर, सपा ने यादव परिवार के बड़े नामों को मैदान में उतारा है—अखिलेश आजमगढ़ से, उनकी पत्नी डिंपल कन्नौज से, चचेरे भाई अक्षय (रामगोपाल यादव के बेटे) फिरोजाबाद से (जहां उनका मुकाबला चाचा शिवपाल यादव से है जिन्होंने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी-लोहिया—पीएसपी-एल—बनाई है), मुलायम मैनपुरी से और तेजतर्रार नेता आजम खान रामपुर से (जहां वे भाजपा की तरफ से बॉलीवुड की पूर्व अदाकारा जयाप्रदा के साथ मुकाबले में घिरे हैं).

लोकसभा चुनाव के पहले दो चरणों के बाद सपा-बसपा-रालोद गठबंधन पश्चिमी उत्तर प्रदेश की गन्ने, पीतल और फर्नीचर पट्टी में बेहतर प्रदर्शन करता लग रहा है. इस पट्टी में दलितों, मुसलमानों, जाटों और यादवों का दबदबा है, जो गठबंधन के मूल वोट बैंक हैं.

हवा का झोंका

गठबंधन के विकल्प के तौर पर उभरने से पहले तक लखनऊ में हर कोई केवल 'हवा' की चर्चा में मशगूल था. या ठीक-ठीक कहें तो इन बातों का जिक्र कर रहा था कि हवा किस ओर बह रही है. इसे चाहे भगवा हवा या मोदी हवा कहें. हवा यानी एक किस्म की लहर जो पिछले पांच साल तक एक व्यक्ति, एक पार्टी, एक रंग, एक विचारधारा की राजनीति को शह दे रही थी. पूरे प्रदेश में बड़े-बड़े होर्डिंग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आजू-बाजू मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और चश्माधारी राज्य भाजपा अध्यक्ष महेंद्र पांडेय की तस्वीरों के ही नजर आते थे.

उत्तर प्रदेश की 2019 की लड़ाई में अहमियत का अंदाजा इस बात से लग सकता है कि प्रधानमंत्री ने इन आम चुनावों के अपने प्रचार अभियान का श्रीगणेश पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ से किया, क्योंकि, ''क्रांतिकारी शहर मेरठ 1857 की भारत की आजादी की पहली लड़ाई का अगुआ था." जून 2018 में मोदी ने एनएचएआइ की परियोजनाओं में सबसे चौड़े 14 लेन के दिल्ली-मेरठ हाइवे का उद्घाटन किया था. अपनी 'उपलब्धियों' का बेहिसाब डंका पीटने वाले मोदी ने कहा कि मेरठ जल्दी ही दिल्ली एनसीआर का हिस्सा बन जाएगा. उसी मंच से उन्होंने सपा-बसपा-रालोद महागठबंधन को महामिलावट करार दिया था. अखिलेश ने इसका तुर्शी-ब-तुर्शी यह कहकर जवाब दिया कि यह गठबंधन महापरिवर्तन के लिए है.

भाजपा को 2014 में इस राज्य से मिलीं 71 सीटें उसकी कुल सीटों 282 का 25 फीसदी थीं. इस बार मोदी के वाराणसी से लडऩे के अलावा गृह मंत्री राजनाथ सिंह लखनऊ से, कैबिनेट मंत्री सतपाल सिंह बागपत से और महेश शर्मा गौतमबुद्ध नगर से, पूर्व सेना प्रमुख तथा केंद्रीय मंत्री वी.के. सिंह गाजियाबाद से, केंद्रीय राज्यमंत्री मनोज सिन्हा गाजीपुर से और बॉलीवुड की पूर्व अदाकारा हेमा मालिनी तथा जयाप्रदा क्रमशः मथुरा और रामपुर से लड़ रही हैं.

भाजपा की 2019 की रणनीति चार-सूत्री हैरू तमाम जातियों के बीच हिंदू ध्रुवीकरण, मोदी सरकार की गरीब समर्थक नीतियों-कार्यकर्ताओं और वादों का प्रचार-प्रसार, पहली बार वोट देने वाले युवा-महिला वोटरों के बीच बड़े पैमाने पर गोलबंदी करने की कोशिश और आखिर में, राष्ट्रवाद को आर्थिक जरूरतों के ऊपर हवा देना क्योंकि आर्थिक मोर्चे पर सरकार की उपलब्धियां कमजोर हैं.

 

अब भाजपा की तमाम जातियों के बीच हिंदू ध्रुवीकरण की रणनीति पर बात-पारंपरिक तौर पर पार्टी के मूल वोट बैंक का बड़ा हिस्सा ऊंची जातियों—ब्राह्मण, बनिया, भूमिहार, कायस्थ और ठाकुरों—का रहा है. 2014 से मोदी के नेतृत्व में संघ परिवार ने अन्य पिछड़े वर्गों और दलितों के बीच अपनी पैठ काफी बढ़ाई है. उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री मौर्य के मुताबिक यह 'मंडल और कमंडल का मिश्रण है, खासकर इसलिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद ओबीसी नेता हैं. दरअसल, पारंपरिक ऊंची जातियों के साथ उभरती हुई पिछड़ी जातियों का नया सामाजिक समीकरण तैयार करना मोदी का सबसे बड़ा योगदान है." शायद ओबीसी जातियों के बीच मोदी की लोकप्रियता के कारण ही मायावती उन्हें 'नकली और फर्जी' पिछड़े वर्ग का नेता कहने को मजबूर हुई हैं.

अलबत्ता भाजपा आइटी सेल के मुखिया अमित मालवीय इससे इत्तेफाक नहीं रखते. वे कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश में जाति ही असरदार नहीं है. बिहार के उलट यहां मोदी को किसी जाति से ज्यादा हिंदू नेता के तौर पर देखा जाता है. यहां हिंदू ध्रुवीकरण से जाति के बंधन टूट रहे हैं. हिंदू समाज का व्यापक पैमाना उत्तर प्रदेश में जाति की पारंपरिक जकड़बंदियों को ढीला कर चुका है." भाजपा के रणनीतिकार इसके जबरदस्त उदाहरण के रूप में 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिले भारी जनादेश को पेश करते हैं. भाजपा की अगुआई वाले एनडीए को 2014 में 42.3 फीसदी और 2017 में 41.35 फीसदी वोट मिले थे. बकौल भाजपा के रणनीतिकार, ''इतना जबरदस्त जनादेश तमाम जातियों के बीच हिंदू ध्रुवीकरण के बगैर मुमकिन नहीं है."

पार्टी के महासचिव सुनील बंसल कहते हैं, ''भाजपा वोटरों से मोदी सरकार की पिछले पांच साल की उपलब्धियों पर वोट मांगेगी. हम दिसंबर से लेकर अब तक संगठन की सैकड़ों बैठकों में और मई के आखिर तक अपने धुआंधार वोटिंग अभियान के दौरान मोदी सरकार की उपलब्धियों का सामने रख रहे हैं."

मोदी सरकार के मुख्य विकास कार्यक्रमों—उज्ज्वला योजना, मुद्रा योजना, जन धन योजना और प्रधानमंत्री आवास योजना कृका सबसे अधिक फोकस उत्तर प्रदेश में ही रहा है. इनका फायदा उठाने वालों में जाटवों सहित दलित, यादवों सहित ओबीसी, मुसलमान और ऊंची जातियों के बनिस्बतन गरीब तबके शामिल हैं. बंसल के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में इन योजनाओं से करीब दो करोड़ लोग लाभान्वित हुए हैं. पार्टी के रणनीतिकारों के मुताबिक, इससे 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का वोट आधार बढऩा तय है.

बंसल कहते हैं, ''रणनीति यह है कि ताकतवर नारे 'सबका साथ, सबका विकास' के जरिए अगड़ों, पिछड़ों, दलितों और दूसरे तमाम समुदायों का एक सामाजिक गठजोड़ बनाया जाए और यह पक्का किया जाए कि हर कोई आपको वोट दे." वे यह भी मानते हैं कि ''ऊंची जातियों के आर्थिक तौर पर गरीब लोगों के लिए 10 फीसदी आरक्षण और किसानों को 6,000 रु. सालाना मुहैया कराने वाली पीएम-किसान योजना ने 2019 के लोकसभा चुनाव अभियान में चमत्कारिक असर डाला है."

प्रियंका और न्याय की राजनीति

अगर सपा-बसपा-रालोद गठबंधन को चुनावी गणित पर भरोसा है और भाजपा अपने कामकाज के आसरे हैं, तो कांग्रेस अपनी स्टार प्रचारक प्रियंका गांधी वाड्रा और 'गरीबी पर वार, बहत्तर हजार' के न्याय एजेंडे से उम्मीद लगाए बैठी है. पार्टी ने अपने घोषणा-पत्र में 5 करोड़ 'सबसे गरीब परिवारों को 6,000 रु. मासिक और 72,000 रु. सालाना मुहैया कराने का वादा किया है. 'न्याय' का मकसद यह भी है कि वादे पूरे करने और कृषि संकट तथा बेरोजगारी सरीखे आर्थिक मुद्दों पर मोदी सरकार की नाकामियों को उजागर किया जाए, जो इसके बदले दबंग राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा को मुद्दा बना रही है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 2 अप्रैल को दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय में पार्टी का घोषणा पत्र जारी करते वक्त कहा, ''मैंने घोषणा पत्र समिति को हिदायत दी थी कि इसमें जो कुछ भी रखा जाए, वह सच्चा होना चाहिए. इसमें एक भी ऐसा नहीं हो चाहिए जो झूठा हो. वैसे भी हम बहुत सारे झूठ सुन रहे हैं जो प्रधानमंत्री खुद बोल रहे हैं."

ज्यादा संभावना यही है कि 'न्याय' योजना पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बदले पूर्वी उत्तर प्रदेश के वोटरों में अधिक लोकप्रिय होगी. हालांकि राज्य की आर्थिक वृद्धि दर 2003-2004 से दोगुनी हो गई है लेकिन अभी भी वह राष्ट्रीय औसत से नीचे है. राज्य के भीतर पूरब के गरीब धान उपजाऊ क्षेत्र और दिल्ली से लगे अधिक समृद्ध पश्चिमी हिस्से के बीच आर्थिक वृद्धि की गहरी खाई बनी हुई है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी पूरबी हिस्से से दोगुनी है. दरअसल, गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर जैसे जिलों को बाहर कर दिया जाए तो राज्य देश में सबसे गरीब हो जाएगा. यह हालत तब है जब मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की प्रयागराज में कुंभ मेला या प्रधानमंत्री मोदी के क्षेत्र वाराणसी की विकास परियोजनाओं के दौरान आर्थिक वृद्धि पर काफी जोर दिया गया.

जिस पूर्वी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस हाशिए का खिलाड़ी बनकर रह गई थी और राष्ट्रीय स्तर पर खुद को जिलाने के लिए जहां कामयाब होना उसके लिए बेहद अहम है, प्रियंका को वहां का प्रभारी महासचिव बनाने के कांग्रेस के फैसले से उसकी आक्रामकता और हर हाल में कामयाब होने की भूख उजागर हुई, जो 2014 के चुनाव में पार्टी में नदारद थी. दबी जबान चर्चाएं हैं कि प्रियंका वाराणसी से मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ सकती हैं. यह पूछे जाने पर कि क्या उनका ऐसा इरादा है, प्रियंका ने रहस्यमय अंदाज में जवाब दिया, ''अगर मेरे भाई राहुल गांधी जोर देंगे तो मुझे वाराणसी से चुनाव लडऩे में खुशी होगी."

प्रियंका को आगे बढ़ाने से कांग्रेस का कौन-सा मकसद पूरा होता है? उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता वीरेंद्र मदन कहते हैं, ''जंग सैनिकों की मदद से जीती जाती है, इसी तरह चुनाव—यानी वोटों की जंग—कार्यकर्ताओं की मदद से जीता जाता है. प्रियंका के आने से पार्टी के कार्यकर्ताओं में नया जोशो-खरोश आ गया है, वे अब पूरे प्रदेश में लड़ाई की मुद्रा में आ गए हैं."

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