एडवांस्ड सर्च

आवरण कथाः बेहतर सच की तलाश

पिछले साल सोशल मीडिया ने नए-नए तरीकों से मुख्यधारा के अफसानों की चीरफाड़ जारी रखी. 2018 की किस्मत से जुड़ी कुछ भविष्यवाणियां.

Advertisement
aajtak.in
मंजीत ठाकुर/ संध्या द्विवेदी 15 January 2018
आवरण कथाः बेहतर सच की तलाश यह बात प्रतिबंधित किताब या लेख पर भी लागू होती है.

सैम बोर्न का 2017 का एक थ्रिलर है—टु किल द प्रेसिडेंट. यह व्हाइट हाउस में जबरदस्त हंगामे के साथ शुरू होता है. इसका स्टार उत्तर कोरिया और चीन पर परमाणु हमला करने जा रहा है—उत्तर कोरिया ने उसे 'कायर और ओछा आदमी' कहकर ताना मारा है. बोर्न का यह काल्पनिक प्रेसिडेंट अजीबोगरीब आदमी है—भारी-भरकम, बड़बोला, ट्विटर पर फट पडऩे वाला, औरतों का रसिया और फॉक्स न्यूज को पसंद करने वाला. असल दुनिया में डोनाल्ड ट्रंप छुट्टियां मनाकर लौटे हैं और उन्होंने 2018 के अपने शुरुआती कुछ दिन ट्विटर पर विदेशी सरकारों पर हमले करते हुए बिताए हैं.

वे पाकिस्तान की, उसके 'झूठ और धोखाधड़ी' और दहशतगर्दों की हिमायत के लिए भत्र्सना करते हैं. वे ईरान और फलस्तीनियों की लानत-मलानत करते हैं. उसके बाद राष्ट्रपति उत्तर कोरिया की तरफ नजर घुमाते हैं, जिसके नेता ने अभी-अभी अपनी डेस्क पर 'न्यूक्लियर बटन' होने की बात कही है. वे कहते हैं—हे, मेरा बटन तुम्हारे बटन से बहुत बड़ा है. फिर वे फोन की तरफ हाथ बढ़ाते हैं.

''क्या उसकी तार-तार होती और भूखों मरती सरकार में कोई उसे मेहरबानी करके बताएगा कि मेरे पास भी एक न्यूक्लियर बटन है, पर ये उनके बटन से कहीं ज्यादा बड़ा और ज्यादा ताकतवर है, मेरा बटन काम भी करता है!'' ये वो ट्वीट था, जो बिल्कुल असल अमेरिकी राष्ट्रपति ञ्चह्म्द्गड्डद्यष्ठशठ्ठड्डद्यस्रञ्जह्म्ह्वद्वश्च, ने किया था. इसने स्टेट डिपार्टमेंट को हमेशा की तरह अपना सिर धुनते और दुनिया को अविश्वास और हैरानी से आंखें मलते छोड़ दिया था.

आधुनिक सोशल मीडिया के उत्तर-सत्य युग ने हकीकत और किस्से-कहानी, असलियत और नकल के बीच की लकीरों को बुरी तरह धुंधला कर दिया है. मगर यह तय हैः सोशल मीडिया केंद्रीय मंच बन गया है. मुख्यधारा का मीडिया (अपने उदारवादी विमर्श के साथ) हमले की जद में है. विश्व नेता ट्विटर के जरिए अपनी बात कहते हैं, राष्ट्रपति ट्रंप से लेकर प्रधानमंत्री मोदी तक—जिन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस को पूरी तरह तिलांजलि दे दी है और रेडियो और ट्विटर की मार्फत प्रसारण की मुद्रा में 'सीधे लोगों से' बात करते हैं.

सोशल मीडिया एक वैकल्पिक आभासी फलक मुहैया करता है. विकल्प मुक्चयधारा के मीडिया का, मुख्यधारा के अफसानों का, यहां तक कि मुख्यधारा के नारीवाद का, जिसे 'जागृत' नव-नारीवादीकृद लिस्ट ऑफ 2017 की ताकत से लैस—वामपंथी-उदारवादी और सवर्ण कहकर खारिज कर देते हैं. 2017 की वह सूची विद्यार्थियों ने तैयार की थी जिसमें यौन प्रताडऩा के आरोपी, ज्यादातर गुमनाम, पुरुष अध्येताओं के नाम (शुरुआत में 60) थे. उदार (तर्कशील?) नारीवादी आवाजों ने गुमनाम आरोपों के जरिए प्रमुख अध्येताओं पर किसी सबूत या तफसील या असल शिकायत के बगैर कालिख पोतने पर सवाल खड़े किए. भारतीय नारीवाद का तार-तार होना मुखर और उसे सुनना तकलीफदेह था. 

हमारे गहमागहमी से भरे सोशल मीडिया के समूचे फलक पर 2018 में और भी अफसाने इसी तरह तार-तार होंगे, चाहे अच्छे के लिए हों या बुरे के लिए. क्योंकि हिंदुस्तान के पास सबसे बड़ी मोबाइल आबादी के साथ सबसे व्यस्त सोशल मीडिया फलक भी है.

2019 की जंग का मैदानः एक साल पहले हिंदुस्तान के महा चुनाव का तीखा और सरगर्म मुकाबला डिजिटल मीडिया पर छिड़ जाएगा, जिसमें ज्यादातर भिडंत व्हाट्सएप, ट्विटर और फेसबुक पर होंगी. इन भिड़ंतों और कार्रवाइयों में फेक न्यूज, ट्रोल फौजें, धुर-राष्ट्रवाद और वे तमाम आजमाए हुए तरीके भी शामिल होंगे, जिन्होंने 2017 में दक्षिणपंथ को अमेरिका और हिंदुस्तान सहित हमारे छोटे-से ग्रह पर उभरने और फूलने-फलने में मदद की थी.

ये भिड़तें पूरे सियासी फलक के इर्दगिर्द होंगी, जिसमें पिछले पांच साल में हमेशा की तरह सत्ताधारी पार्टी की डिजिटल ताकत के खिलाफ जद्दोजहद करता हमारा कमजोर विपक्ष होगा. 2018 में चुनाव-पूर्व हिंदुस्तान पर जबरदस्त ध्यान देने वालों में फेसबुक होगा, जिसके पास दुनिया भर में अपने प्लेटफॉर्मों पर सियासी दलों को प्रशिक्षण देने वाली समर्पित टीमें हैं. इनमें ट्विटर भी होगा, जिसके वैश्विक यूजर की तादाद और राजस्व में बढ़ोतरी पिछले साल धीमी पड़ गई और जिनके लिए हिंदुस्तान बेहद अहम है.

फेक न्यूज के कारखानों की बहार आ जाएगी—वे सुनियोजित और रुपए-पैसे की गतिविधियां भी चलाएंगे और अनौपचारिक कामकाज भी, जिसे कुटीर-उद्योग के मानिंद वितरण नेटवर्क का समर्थन हासिल होगा. मगर ध्यान धीरे-धीरे हटकर वीडियो पर आ जाएगा. छोटे-छोटे गति अवरोधकः फैक्ट-चेकर्स यानी तथ्यों की जांच-पड़ताल करने वाली वेबसाइटेंकृञ्चक्चशशद्वरुद्ब1द्ग-द्बठ्ठ, ञ्च्रद्यह्लहृद्ग2ह्य, और ऐसी ही दूसरी—और ज्यादा व्यस्त हो जाएंगी. तथ्यों की पड़ताल करने वालों के लिए 2019 का असल महामुकाबला बेजोड़ होगा जब उन्हें और ज्यादा खिंचाव, रोमांच और यहां तक कि माली इमदाद भी हासिल हो सकती है.

अगले 10 करोड़ यूजर हिंदुस्तान में मार्च 2019 तक ऑनलाइन आ जाएंगे. सामाजिक-आर्थिक पिरामिड पर और नीचे उतरते हुए 2020 तक तकरीबन 7.30 करोड़ रास्ते पर होंगे. नए यूजर में से एक-तिहाई स्मार्टफोन वाले नौजवान होंगे; बाकी उम्रदराज, कम साक्षर, कम खर्च करने वाले यूजर होंगे. वे ज्यादातर वीडियो में रमेंगे, टेक्स्ट या लिखी हुई इबारतों में नहीं: इसलिए व्हाट्सएप और मेसेंजर की प्रासंगिकता बनी रहेगी. लाइव स्ट्रीमिंग वीडियो 2018 में हिंदुस्तान के सोशल मीडिया का शीर्ष रुझान होगा, जो साक्षरता के तमाम स्तरों और हर उम्र के हिस्सों में फैला होगा. 

सोशल मीडिया के जरिए निगरानी और जासूसी में इजाफा होगा. भारतीय खुफिया एजेंसियां और कानून लागू करने वाली एजेंसियां सोशल मीडिया पर कड़ी नजर रखती हैं, मगर वे यूजर की बातों पर नजर रखने के लिए औजारों के इस्तेमाल में चीन और यहां तक कि अमेरिका से भी बहुत पीछे हैं. चीन सियासी नियंत्रण के लिए उन पर नजर रखता है और अमेरिका कथित तौर पर कानून लागू करने को होमलैंड सुरक्षा के लिए.

चीन के व्हाट्सऐप जैसे वीचैट के 90 करोड़ से ज्यादा यूजर हैं. मगर इस ऐप की मालिक टेनसेंट यूजर डाटा इकट्ठा, मॉनिटर और चीन की सरकार के साथ साझा करती है. आलोचना वाली पोस्ट को ब्लॉक या डिलीट कर दिया जाता है और सरकार की आलोचना करने वाले संदेश पोस्ट करने के लिए पुलिस ने वीचैट के यूजरों को गिरफ्तार भी किया है. 

भारत के पास अपने सोशल मेगा-प्लेटफॉर्म नहीं हैं और सरकार को व्हाट्सऐप पर (जिसके मेसेज एनक्रिप्टेड हैं) यह सब करने का न तो नियंत्रण हासिल है और न ही ये उसके अधिकार क्षेत्र में है. हमारी एजेंसियां फेसबुक पर ढेर सारा वक्त बिताती हैं और वे सोशल मीडिया पर (खुद अपने फैलाव के लिए इन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने के अलावा) सर्च और विश्लेषण के लिए डिजिटल औजारों (और एजेंसियों) का इस्तेमाल भी करती हैं. 2017 के पहले छह महीनों में फेसबुक को डाटा के लिए 9,853 अर्जियां मिलीं, जो एक साल पहले की तुलना में 56 फीसदी ज्यादा हैं.

और समापन मैं सोशल मीडिया की एक पुरानी कहावत से करूंगा, जिसकी हुकूमत जारी रहेगी (और कॉर्पोरेट या सियासी सत्ताधारी जिससे कुछ नहीं सीखेंगे). स्ट्राइजेंड सोशल मीडिया का फेनोमेना है, जिसमें किसी चीज को दबाने का अनिवार्य असर यह होता है कि वह और ज्यादा दूर तक फैल जाती है. नए साल की शुरुआत के साथ करीब आधा दर्जन मीडिया घरानों ने एक साथ वे स्टोरीज वापस ले लीं जिनमें बताया गया था कि ट्विटर यूजरों ने एक दिग्गज कॉर्पोरेट कंपनी के चेयरमैन के बेटे के उत्साही और जोशीले भाषण का किस तरह मखौल उड़ाया. 

देखते ही देखते, 10 दिन पुराना वह भाषण, जो तब तक इंटरनेट के अंधेरे डिजिटल कोनों में गुम हो चुका था, धमाके के साथ सुर्खियों में लौट आया. इंटरनेट के जमाने में यह बात प्रतिबंधित किताब या लेख पर भी लागू होती है. कोई भी चीज उन्हें ऑनलाइन उछालकर उतना ऊंचा नहीं लाती जितना उन्हें जमींदोज करने की कोशिशें लाती हैं. अगर आप अपनी 2018 की फिल्म को हिट करवाना चाहते हैं, तो उसे थोड़ा-सा प्रतिबंधित करवा लीजिए.

प्रशांत के. रॉय पूर्व टेक्नोलॉजी पत्रकार और अब नैस्कॉम के साथ हैं.  यहां व्यक्त विचार पूरी तरह उनके अपने हैं

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay