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आवरण कथा-रेशा-रेशा बिखरा

2015-16 में भीतर ही भीतर कुतरने वाली अनिश्चितता मंतिरासलम के सामने मुंह बाए खड़ी थी जब उन्हें महीने में केवल 15 दिन काम मिला. वे याद करते हैं, ''हममें से कुछ ने कहा कि हम कॉलेज पूरा करना चाहते हैं तो मैनेजमेंट ने हमें कोई कारण बताए बगैर एक ही दिन में निकाल दिया.

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श्वेता पुंज/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 14 May 2019
आवरण कथा-रेशा-रेशा बिखरा मंतिरासलम, कोयंबतूर, तमिलनाडु

हिंदुस्तान के कपड़ा उद्योग में यार्न, फैब्रिक और रेडीमेड परिधान शामिल हैं. 2017 में यह 108 अरब डॉलर (करीब 7.5 लाख रुपए) का उद्योग था और देश के जीडीपी में 2 फीसदी का योगदान देता था. रोजगार देने के मामले में भी यह कृषि के बाद दूसरे नंबर पर था—2017-18 में इसमें सीधे 5.1 करोड़ लोग और परोक्ष तौर पर 6.8 करोड़ लोग काम-धंधों में लगे थे.

मगर हाल के दिनों में इस क्षेत्र की हालत खस्ता हुई है. उद्योग के आकलन के हिसाब से रेडिमेड परिधानों के निर्यात में 2015 में 17.1 अरब डॉलर (करीब 1 लाख करोड़ रु.) की और 2017 में 12.25 अरब डॉलर (करीब 85,000 करोड़ रु.) की गिरावट आई है. गिरती बिक्री और घटते मुनाफे का मतलब है कि बड़ी तादाद में नौकरियों का जाना और उसके साथ सहायक उद्योग-धंधों में गिरावट आना. इससे बेशक बड़े पैमाने पर रोजगार प्रभावित हुए. बीते तीन वित्त वर्षों में देश भर से सूती और कृत्रिम फाइबर क्षेत्र की 67 इकाइयां बंद होने की खबरें हैं जिससे 17,600 कामगार प्रभावित हुए हैं.

2016 में हुई नोटबंदी और उसके कुछ महीनों बाद जीएसटी इस उद्योग को तहस-नहस कर देने वाली दो वजहें थीं. हिंदुस्तान में मजदूरी की लागत बांग्लादेश से ज्यादा और वियतनाम तथा चीन से थोड़ी कम है. पूंजी की लागत भी बहुत ज्यादा है—चीन, वियतनाम, तुर्की 5-7 फीसद पर पूंजी मुहैया करते हैं जबकि भारत में यह 11-12.5 फीसद है. इसकी वजह से ज्यादा कीमती परिधान बनाने और टेक्नोलॉजी को बेहतर बनाने में देरी हुई. सरकार का 7,000 करोड़ रुपए का विशेष पैकेज भी बहुत धीमी रफ्तार से आया. ठ्ठ

आर. मंतिरासलम, 51 वर्ष, कोयंबत्तूर, तमिलनाडु

मंतिरासलम जब किशोर थे, 1993 में कोयंबत्तूर की एक कपड़ा मिल में दिहाड़ी मजदूरी पर काम करने के लिए अपने गांव मेत्तुवावी से कोयंबत्तूर आ गए. मगर मिल का प्रबंधन उन्हें नियमित कर्मचारी के रूप में रखने को तैयार नहीं था. 2015-16 में भीतर ही भीतर कुतरने वाली अनिश्चितता मंतिरासलम के सामने मुंह बाए खड़ी थी जब उन्हें महीने में केवल 15 दिन काम मिला. वे याद करते हैं, ''हममें से कुछ ने कहा कि हम कॉलेज पूरा करना चाहते हैं तो मैनेजमेंट ने हमें कोई कारण बताए बगैर एक ही दिन में निकाल दिया.'' छह महीने बेरोजगार रहने के बाद मंतिरासलम ग्राइंडर बनाने वाली एक कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड बन गए जहां उनकी कमाई पहले के मुकाबले कम थी. वे कहते हैं, ''मिल में मुझे 12,000 रुपए महीना मिला करता था. अब मुझे 10,000 रुपए मिलते हैं.''

—अमरनाथ के. मेनन

विशेषज्ञ की राय

''विभिन्न सरकारी उपायों का आखिरकार फल दिखने लगा है...हालांकि सरकारी योजनाओं और पैकेज से मुद्रा का प्रवाह बेहद

धीमा है.''

राहुल मेहता

प्रेसिडेंट और चेयरमैन,

क्लोदिंग मैन्युफेक्चरर्स एसोसिएशन

ऑफ इंडिया

संकट की वजहें

नोटबंदी और जीएसटी

क्योंकि 60 फीसदी खुदरा बाजार नकदी से चलता है; 60-80 फीसदी असंगठित क्षेत्र में है

पुराने श्रम कानून, बुनियादी ढांचे की चुनौतियां, मजदूरी की बहुत ऊंची लागत, सबसे ऊंची पूंजी की लागतों में से एक

शुल्क वापसी दर में कटौती,

जो निर्यात पर 1 अक्तूबर, 2017 से लागू हुई, प्रतिस्पर्धा के लिहाज से कीमतों पर असर डाल रही है, जिससे निर्यात में गिरावट आ रही है

हिंदुस्तान के कपड़ा उद्योग में यार्न, फैब्रिक और रेडीमेड परिधान शामिल हैं. 2017 में यह 108 अरब डॉलर (करीब 7.5 लाख रुपए) का उद्योग था और देश के जीडीपी में 2 फीसदी का योगदान देता था. रोजगार देने के मामले में भी यह कृषि के बाद दूसरे नंबर पर था—2017-18 में इसमें सीधे 5.1 करोड़ लोग और परोक्ष तौर पर 6.8 करोड़ लोग काम-धंधों में लगे थे.

मगर हाल के दिनों में इस क्षेत्र की हालत खस्ता हुई है. उद्योग के आकलन के हिसाब से रेडिमेड परिधानों के निर्यात में 2015 में 17.1 अरब डॉलर (करीब 1 लाख करोड़ रु.) की और 2017 में 12.25 अरब डॉलर (करीब 85,000 करोड़ रु.) की गिरावट आई है. गिरती बिक्री और घटते मुनाफे का मतलब है कि बड़ी तादाद में नौकरियों का जाना और उसके साथ सहायक उद्योग-धंधों में गिरावट आना. इससे बेशक बड़े पैमाने पर रोजगार प्रभावित हुए. बीते तीन वित्त वर्षों में देश भर से सूती और कृत्रिम फाइबर क्षेत्र की 67 इकाइयां बंद होने की खबरें हैं जिससे 17,600 कामगार प्रभावित हुए हैं.

2016 में हुई नोटबंदी और उसके कुछ महीनों बाद जीएसटी इस उद्योग को तहस-नहस कर देने वाली दो वजहें थीं. हिंदुस्तान में मजदूरी की लागत बांग्लादेश से ज्यादा और वियतनाम तथा चीन से थोड़ी कम है. पूंजी की लागत भी बहुत ज्यादा है—चीन, वियतनाम, तुर्की 5-7 फीसद पर पूंजी मुहैया करते हैं जबकि भारत में यह 11-12.5 फीसद है. इसकी वजह से ज्यादा कीमती परिधान बनाने और टेक्नोलॉजी को बेहतर बनाने में देरी हुई. सरकार का 7,000 करोड़ रुपए का विशेष पैकेज भी बहुत धीमी रक्रतार से आया.

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