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ताज को बचाना हैः हाथ से निकलता ताज

ताज के चारों ओर खतरे के निशान दिख रहे हैं. क्या आपको त्रासदी का इंतजार है? ताजमहल को बचाने की हमारी मुहिम से जुड़िए, इसे बचाने में भागीदार बनिए

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर 23 July 2018
ताज को बचाना हैः हाथ से निकलता ताज वजूद बचाने को संघर्षरत ताज

वह जैसे जिंदा रहते आकर्षण का केंद्र रहा, मौत के बाद भी उसी तरह लोग खिंचे चले आते हैं. पांचवां मुगल बादशाह शाहजहां 30 वर्षों तक हर सुबह शाही लिबास में सज-धजकर, सिर पर ताज पहने झरोखे में खड़ा होता और नीचे खड़ी रियाया का अभिवादन किया करता था. शाहजहां की मौत के लगभग 352 साल बाद आज भी दर्शन की प्यासी भीड़ उमड़ती है.

बादशाह ने अपनी महबूबा की याद में जो बेमिसाल मकबरा बनवाया था, उसके सामने खड़े होकर एक अदद ताज महल सेल्फी के लिए लोग कभी मुस्कराते, कभी इतराते तो कभी अजीबोगरीब चेहरे बनाते हैं.

उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि प्रदूषण घना है, ताज महल को टिकाने वाली लोहे की मचान जंग खा रही है या जगह-जगह दरारें उभर आई हैं. कौन जाने उनकी जिंदगी में आगे क्या होगा? कौन जाने ताज महल कितने दिन कायम रहेगा?

"आप ताज महल को बंद कर सकते हैं. आप चाहें तो उसे ध्वस्त भी कर सकते हैं. आप उससे पल्ला भी झाड़ सकते हैं.'' 11 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी ने देश की सर्वाधिक लुभावनी और सबसे ज्यादा देखी जाने वाली इस धरोहर के संरक्षण को लेकर गजब की दिलचस्पी को हवा दे दी.

कोर्ट में 31 जुलाई से इस मामले की नियमित सुनवाई शुरू होगी. न्यायपीठ ने कहा, "ताज महल को संरक्षित जरूर किया जाना चाहिए.'' 16 जुलाई से केंद्रीय मंत्रियों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी ताज पर संभावित खतरों से निपटने के लिए काफी सक्रिय हो गए हैं.

यह आज की हकीकत है. वास्तुकार और संरक्षक ए.जी. कृष्णमेनन कहते हैं, "अब हमें बातचीत शुरू करनी चाहिए.'' वे बताते हैं, ताज महल आज जिन समस्याओं से जूझ रहा है, वे बेहद जटिल हैं, लेकिन शायद रोम के सिस्टाइन चैपल, मिस्र में पिरामिड या एथेंस में एक्रोपोलिस, पहले ही ऐसी चुनौतियों का सामना कर चुके हैं.

वे कहते हैं, "आइए, दुनिया से जानें-समझें, सीखें और ऐसे तरीके तलाशें, ताकि हम अगली पीढ़ी के लिए वैसा ही स्मारक छोड़कर जा सकें जैसा हमने विरासत में पाया था.''

इस मध्ययुगीन इमारत का आधुनिकता के साथ साबका कई खतरे लेकर आया है. हर रोज नए खतरे उभर रहे हैं. एक नए शोध से पता चलता है कि इतने वर्षों के दौरान समस्या और उसके स्रोतों के साथ-साथ समाधान के तरीके भी नाटकीय रूप से बदल गए हैं.

पिछले 35 साल से इंडिया टुडे देश में स्थित "दुनिया का अजूबा'' कहलाने वाले इस इकलौते नमूने को बचाने के लिए लगातार रिपोर्ट छापता आ रहा है, जब से प्रदूषण से इसकी रक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय में शायद सबसे लंबा और कठिन कानूनी संघर्ष शुरू हुआ है.

इतिहास शायद ही कभी दूसरा मौका देता है. और हम इस अवसर को गंवाना नहीं चाहते इसलिए हम फिर से खड़े हैं तथ्यों का सामना करने के लिए, आवाज उठाने के लिए और शायद हालात बदलने के लिए.

यह एकजुटता का क्षण है. गलतियां ढूंढने का नहीं बल्कि समाधान खोजने के लिए एकजुट होने का अवसर है. राजनीति को अलग करके और इस वक्त की अहमियत समझकर आगे बढ़ने का अवसर है. हमारे लोकतंत्र में अभिनव प्रयोगों और सकारात्मक परिवर्तन लाने में सामूहिक प्रयासों की ताकत दिखती है. तो, क्या हम सब मिलकर ताज को बचा सकते हैं?

खस्ताहाल संरक्षण

बहस के केंद्र में एक बार फिर से पर्यावरणविद् और वकील एम.सी. मेहता हैं जिनकी 1980 के दशक में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद अदालत ने ताज महल के आसपास की आबोहवा को प्रदूषित करने के लिए मथुरा तेलशोधक कारखाने को फटकार लगाई थी (एम.सी. मेहता बनाम केंद्र, 1996).

तब से सुप्रीम कोर्ट ने ताज महल के आसपास 10,400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ताज ट्रैपेज़ियम जोन (टीटीजेड) घोषित कर दिया और इस क्षेत्र में प्रदूषण वाली इकाइयों को बंद करने या फिर कहीं और स्थानांतरित करने का आदेश दिया था.

एक नए आवेदन में मेहता ने आरोप लगाया है कि ताज महल के रखरखाव में घोर लापरवाही बरती जा रही है. संगमरमर का रंग मटमैला हो रहा है, दरारें दिख रही हैं, मीनारें झुकने लगी हैं, पच्चीकारी उखड़ने लगी है, झूमर झड़ने लगे हैं, सीसीटीवी काम नहीं करते, ताज महल के चारों ओर की नालियां जाम पड़ी हैं, करीब के इलाकों में अतिक्रमण बढ़ा है, आसपास के क्षेत्र में उद्योगों और कारखानों की भरमार हो गई है.

फिर लगातार मरती यमुना ताज की नींव कमजोर कर रही है और कई तरह के कीट-पतंगे पैदा हो रहे हैं. मेहता कहते हैं, "प्रदूषण सबसे बड़ी समस्या है लेकिन इसके स्रोत और प्रकृति बदल गए हैं.''

पिछले एक साल से ताज महल को लेकर सुप्रीम कोर्ट के चार नंबर कोर्टरूम में गहमागहमी तेज हो गई है. जस्टिस मदन बी. लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता ने ताज के "बदरंग'' होने पर चिंता जताई और इसे एक चेतावनी के रूप में लेने को कहा, ताज को लेकर श्एक विजन डॉक्युमेंट्य के अभाव पर फटकार लगाई, "वास्तविक विशेषज्ञों'' के साथ "निरंतर वार्ता'' की मांग की और ताज की भव्यता की "क्षति'' पर सरकार को चेताया.

अगस्त 2017 में भी, न्यायाधीशों ने केंद्र और उत्तर प्रदेश की नौकरशाही के रवैये पर उंगली उठाई और कहा, "यह विश्वप्रसिद्ध स्मारक है और आप इसे नष्ट करना चाहते हैं?'' नवंबर 2017 में उन्होंने संगमरमर के इस बेमिसाल स्मारक की खस्ताहाली की ओर सबका ध्यान खींचा था.

"अगर ताज तबाह हो गया तो आप इसे फिर नहीं बना सकेंगे.'' इस साल मई में अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) को आड़े हाथों लिया और टिप्पणी की थी, "आप के अनुसार, आप ताज की अच्छी तरह से देखभाल कर रहे हैं और कुछ करने की जरूरत नहीं है? आप तो यह स्वीकार करने तक को तैयार नहीं कि कोई समस्या भी है?''

मौत की लपटें

एक और जज ने ताज महल की दुर्दशा पर सवाल खड़े किए थे. सितंबर 2015 में जब जस्टिस जोसेफ कुरियन परिवार के साथ ताज महल देखने गए तो अचानक उन्हें काला धुआं उठता दिखा. यह धुआं ताजमहल और आगरा किले के बीच स्थित एक श्मशान मोक्षधाम से निकल रहा था.

जस्टिस जोसफ ने प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के दखल की मांग कीः क्या श्मशान को कहीं और स्थानांतरित कर देना चाहिए या फिर श्मशान में शवदाह के लिए लकडिय़ां जलाने की जगह विद्युत शवदाह गृह की व्यवस्था करा देनी चाहिए, ताकि कार्बन उत्सर्जन बंद हो सके?

लेकिन श्मशान स्थल को स्थानांतरित करने के प्रयासों का कोई नतीजा नहीं निकला (यह तब भी नहीं हो पाया था जब वायु गुणवत्ता और ताज महल के संरक्षण पर डॉ. एस. वरदराजन समिति ने 1994 में भी इसे हटाने का सुझाव दिया था).

अंतिम संस्कार के लिए सामग्री प्रदान करने वाले एक स्वैच्छिक संगठन क्षेत्र बजाज समिति के एक सदस्य के अनुसार, आगरा के चार सरकारी श्मशान घाटों में से यह सबसे लोकप्रिय है, जहां रोजाना करीब 100 शवों का दाह-संस्कार लकड़ी से होता है. प्रत्येक शव को जलाने के लिए लगभग 300 किलोग्राम लकड़ी की आवश्यकता होती है. नई तकनीक पिछले चार साल से बस "स्थापित होने ही वाली'' है.

एक सूखती हुई नदी

दिल्ली से 200 किलोमीटर तक नदी सड़क के साथ-साथ चलती है. आगरा के ऐतमादपुर में नदी और सड़क एक दूसरे को काटते हुए गुजरते हैं. यह प्राचीन नदी यहां आते-आते रेत और तलछट से भरे बियाबान में बदल जाती है.

पांच साल पुराना एक्सप्रेसवे आगे बढ़ता जाता है और ताज महल के करीब आता जाता है. ताज आदमी की बदसूरती का दंश हर दिन झेलता रहता है. नदी सिकुड़ती जाती है और खामोशी ओढ़ लेती है. उसे बखूबी पता है कि अगर वह मर गई तो ताज भी मर जाएगा. इसलिए नदी को नजरअंदाज करने की बड़ी सजा भुगतनी पड़ सकती है.

सिक्किम यूनिवर्सिटी, गंगतोक में भूगर्भ विज्ञानी अनिल कुमार मिश्र कहते हैं कि शाहजहां ने कभी सपने में भी न सोचा होगा कि एक दिन यमुना सूखी और इतनी मैली हो जाएगी. अपने उद्गम स्थल यमुनोत्री ग्लेशियर से निकलने वाला पारदर्शी नीला पानी आगरा पहुंचते-पहुंचते एक गंदे नाले का पानी बन जाता है.

हरियाणा के हथिनीकुंड बराज पर यमुना का 99 प्रतिशत पानी हड़प लिया जाता है. पानीपत और आगरा के बीच कई नालों का काला अशोधित जल नदी में गिरता है. दिल्ली में यमुना सबसे ज्यादा प्रदूषित होती है. 17 सीवेज से 3,296 एमएलडी नालों का पानी यमुना में गिरता है.

ताज नगरी भी यमुना पर रहम नहीं खाती और आगरा जिले में 122 किमी के सफर में इसमें करीब 90 नालों का पानी गिरता है जिनमें केवल 29 नालों में ही पानी छानने वाले  जाले हैं.

इतने पर भी कहां रुके. सबसे संवेदनशील पर्यावरण जोन के इर्दगिर्द नदी के हजारों एकड़ की भूमि पर अवैध बस्तियां बसा दी गई हैं, जिसे कॉलोनियों का नाम दिया गया है जिसमें घर, अपार्टमेंट, व्यावसायिक परिसर, फार्महाउस और औद्योगिक इकाइयों की बाढ़ आ गई है.

ताज से अगर यमुना को देखें तो बड़ी भयावह सूरत दिखती है. किसी भी दिन में कोई भी ट्रकों में भरकर लाए गए बदबूदार कूड़े को उस प्रवाहहीन, पतली, काली यमुना नदी में फेंकते देख सकता है जिसमें पहले से ही प्लास्टिक की थैलियों का अंबार है और जिसकी सतह पर चमड़े की कतरनें, फूल-पत्तियां, कंकाल तथा लाशें तक तैरती दिख जाती हैं.

दबाव में शहर

मुगलों की तीन पीढिय़ों ने आगरा में नगर सञ्जयता के विकास की दिशा में असाधारण प्रयास करते हुए वास्तुकला की दृष्टि से कई भव्य निर्माण कराए जिसमें किले, महल, गुंबद, बगीचे और सराय शामिल हैं.

आज भी, नक्काशीदार जाली वाली खिड़कियां, खंभों वाले बरामदे और छत के ऊपर बनाई जाने वाली छतरी को इस शहर में देखा जा सकता है जो इसके पुराने दौर की याद दिलाती हैं. 16वीं और 17वीं शताब्दी के यात्रियों ने अपने लेखों में इसे "एक शानदार भव्य शहर'' बताया है.

एएसआइ के पूर्व महानिदेशक, देबाला मित्र के शोधों से पता चलता है कि कैसे आगरा शहरी परिदृश्य के लिहाज से एक अध्ययन केंद्र जैसा था जिसे बड़े स्तर पर बसाया गया था और जिसमें सिंचाई, रेडियल रोड नेटवर्क और नदी के किनारे के विशाल बागों में सिंचाई के लिए भारी हाइड्रोलिक व्यवस्था भी मौजूद थी.

आज घूमने के लिए आने वाले पर्यटकों के लिए आगरा कोई अच्छा अनुभव नहीं देता. सार्वजनिक सुविधाओं की कमी से लेकर सूचना केंद्रों, प्रदूषण और उबड़-खाबड़ सड़कें, परेशान करने वाले फेरीवाले, खोमचेवाले, दलालों, गाइड और फोटोग्राफरों की भीड़ और कोई रात्रिजीवन का न होनाकृआगरा पर्यटकों को हर तरह से निराश ही करता है.

दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट, आगरा के प्रबंधन विभाग के शोधकर्ता शिव कुमार शर्मा और अन्य के एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि आखिर "ताज महल सबसे पहले और आगरा बाद'' में जैसी स्थिति क्यों है. यह दौर तो "अनुभव से सीखी अर्थव्यवस्था'' का है जहां एक अर्थव्यवस्था के अनुभवों से दूसरी अर्थव्यवस्था सीखती है.

अपने शहरों की सूरत बदलने के लिए भारत को अन्य देशों से काफी कुछ सीखने की जरूरत है. उदाहरण के लिए इंग्लैंड, जहां विरासत पर्यटन अर्थव्यवस्था के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में विकसित हुआ है और यह देश की जीडीपी में 20.2 अरब पाउंड का योगदान करता है और 3,86,000 नौकरियां भी पैदा कर रहा है.

प्लास्टिक कहर

रविवार, 3 जून. हर ओर एक ही चर्चा है. राजू रिक्शावाले ने कहा, "आ रहा है.'' मां कैला देवी ढाबा के मालिक नंद किशोर ने झाड़ू से कूड़ा हटाते हुए इसमें जोड़ा, "दिल्ली के एक मंत्री'' आ रहे हैं. दिन की अपनी कुल्हड़ चाय के इंतजार में खड़े एक कूरियर एजेंट अहमद पूछते हैं, "क्या योगीजी (यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ) भी आएंगे.''

जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया खबर फैल गईः केंद्रीय संस्कृति और वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री डॉ. महेश शर्मा सांसदों, विधायकों, राज्य सरकार के अधिकारियों, स्थानीय प्रशासन, जन प्रतिनिधियों और एनजीओ के साथ मिलकर ताज के आसपास के 500 मीटर के क्षेत्र को प्लास्टिक मुक्त करने का संकल्प ले रहे थे.

लेकिन ताज में, पानी की बोतलें, पॉलीथीन बैग, जूते के कवर और पर्यटकों के फेंके स्नैक्स के रैपर दिखना आम बात है. एएसआइ के अधिकारियों के मुताबिक, यहां हर दिन फेंकी गई 12,000-20,000 बोतलें हटाई जाती हैं. इतना ही नहीं, शहर प्रति माह लगभग 180 टन प्लास्टिक अपशिष्ट पैदा करता है.

जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर में केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर एच.के. थापक और पी. राजाराम ने एक शोध के जरिए दिखाया कि विघटित प्लास्टिक कचरा मीथेन गैस पैदा करता है जो ताज के संगमरमर के रंग के पीला पडऩे में योगदान देता है.

यह सब तब है जब 2014 से ही शहर में प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है. जब जिला प्रशासन और नगरपालिका अधिकारियों ने यमुना घाटों में बैरिकेड बनाने की एक योजना की भी घोषणा की ताकि स्थानीय लोगों को नदी में कचरा और पॉलीथीन फेंकने से रोका जा सके.

आगरा पर्यटक कल्याण चैंबर के सचिव विशाल शर्मा कहते हैं, "ताज महल देश के सबसे खराब प्रबंधन वाले स्मारकों में से है. करोड़ों रुपए इसके संरक्षण पर खर्च किए जाते हैं, फिर भी पर्यटकों की परेशानियां खत्म नहीं होतीं.''

कीड़े-मकोड़ों का तांडव

संगमरमर पर हरे दाग-धब्बों ने ताज महल की सेहत को लेकर सबसे ज्यादा भय और चिंता पैदा कर दी. आगरा के सेंट जॉन्स कॉलेज में स्कूल ऑफ एंटोमोलॉजी (कीटविज्ञान) के प्रमुख, प्रोफेसर गिरीश माहेश्वरी और उनकी टीम के मुताबिक, ये दाग-धब्बे बहुत ही छोटे-छोटे कीड़ों या मच्छरों की देन हैं, जो काटते नहीं हैं और जिन्हें काइरोनोमस कहा जाता है.

ये नर और मादा कीड़े शाम 6 से 8 बजे के बीच लाखों की तादाद में यमुना से निकलते हैं, हवा में सहवास और मैथुन करते हैं और फिर ताज महल के चमकदार संगमरमर से आकर्षित होकर उसकी दीवारों पर बैठ जाते हैं. वे 2-3 दिन जिंदा रहते हैं और मरने से पहले अपनी खाई हुई शैवालों के अधपचे क्लोरोफिल को हरे रंग की विष्ठा या मल की शक्ल में छोड़ जाते हैं. ताज के संगमरमर पर इसी के दाग-धब्बे होते हैं.

वे कहते हैं, "उनका अचानक निकलना इस बात का इशारा है कि यमुना के पानी में ज्यादा गहरे बदलाव हो रहे हैं. ताज महल के नजदीक पानी बेहद यूट्रोफिक या पोषक तत्वों से भरपूर पानी में बदल रहा है. उसमें फॉस्फोरस और सतह के नीचे की तलछट का जमाव बढ़ रहा है.

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