एडवांस्ड सर्च

आवरण कथा: 2019 की ढलान

ऑटो उद्योग जबरदस्त गिरावट की चपेट में, संकट को लंबा खिंचने से रोकने के लिए इस सेक्टर में और बड़े स्तर पर अर्थव्यवस्था में नीतिगत हस्तक्षेप बेहद जरूरी

Advertisement
aajtak.in
एम.जी. अरुण/ श्वेता पुंज नई दिल्ली, 07 August 2019
आवरण कथा: 2019 की ढलान शेखर घोष

वीरेंद्र सिंह चिंता में डूबे हैं. 49 वर्षीय वीरेंद्र सिंह मध्य प्रदेश में महिंद्रा ऐंड महिंद्रा (एमऐंडएम) की डीलरशिप की शृंखला चलाने वाले विन विन ग्रुप के मालिक हैं. उन्हें पिछले कुछ महीनों में अपने 31 में से आठ शोरूम बंद करने पड़े और 300 लोगों को काम से निकालना पड़ा. उनके हिसाब से बिक्री 10 फीसद गिर गई है और शोरूम में आने वाले लोगों की तादाद में 30 फीसद की चिंताजनक गिरावट आई है. वे कहते हैं, ''पहला धक्का तो नोटबंदी और माल तथा सेवा कर (जीएसटी) से लगा. फिर मध्य प्रदेश में गाडिय़ों पर रजिस्ट्रेशन शुल्क काफी बढ़ा दिए गए.

करीब 10 लाख रु. से कम कीमत की डीजल गाडिय़ों पर 8 से बढ़ाकर 10 फीसद कर दिया गया. 10-20 लाख रु. कीमत की गाडिय़ों पर 8 से बढ़ाकर 12 फीसद और 20 लाख रु. से अधिक कीमत की गाडिय़ों पर 8 से बढ़ाकर दोगुने 16 फीसद शुल्क लगा दिए गए. इसी तरह पेट्रोल की गाडिय़ों पर भी शुल्क में बढ़ोतरी की गई. इससे तो पहले ही संकट से जूझ रहे बाजार में कोई मदद नहीं मिलने वाली है.'' तिस पर, ग्रामीण अर्थव्यवस्था तो संकट में फंसी ही हुई है.

देश में करीब 3.2 करोड़ लोगों को (प्रत्यक्ष या परोक्ष) रोजगार देने वाले 8.33 लाख करोड़ रु. के ऑटोमोबाइल उद्योग में यह गिरावट तिमाही बिक्री के गिरते आंकड़ों और देश भर में करीब 300 डीलरशिप के बंद होने से जाहिर है.

यह सब उस उद्योग में घट रहा है जिसे कामयाबी की कहानी के तौर पर देखा गया था और पिछले साल ही कंसल्टेंसी फर्म मैकिंसे ऐंड कंपनी ने अनुमान जाहिर किया था कि भारत का सवारी वाहनों का बाजार 2021 तक दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाजार बन जाएगा. जाहिर है, यह ऑटो उद्योग के लिए ही नहीं, भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए जबरदस्त धक्का है.

ऑटोमोबाइल उद्योग का पूरा ढांचा खाली और बेकार जा रही उत्पादन क्षमता और अनबिके माल से बेजार है. इस ढांचे में बुनियादी मशीनें बनाने वालों (ओईएम, कार निर्माताओं के लिए उद्योग का लफ्ज) से लेकर कलपुर्जे सप्लाई करने वाले और डीलरशिप और आफ्टरमार्केट यानी बिक्री के बाद रख-रखाव सेवाएं देने वाले शामिल हैं.

यह उद्योग देश की मैन्यूफैक्चरिंग जीडीपी में 22-25 फीसद का योगदान देता है, लिहाजा यह सुस्ती देश की पहले ही डगमगाती अर्थव्यवस्था को और डांवांडोल कर रही है. इसी पर जोर देते हुए ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन (एसीएमए) के प्रेसिडेंट राम वेंकटरमणी ने 24 जुलाई को कहा कि सुधार नहीं आया, तो तकरीबन 10 लाख नौकरियां जा सकती हैं—यानी इस क्षेत्र में कुल रोजगार का 20 फीसद.

ताज्जुब नहीं कि इस घटनाक्रम ने नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली सरकार को बैकफुट पर ला दिया है, जिसने हाल ही में मैन्यूफैक्चरिंग सरीखे बड़े उद्योगों में निवेश के जरिए देश को 2022 तक 50 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का इरादा जाहिर किया था.

प्रधानमंत्री मोदी ने नौकरियों में बढ़ोतरी को अपने पहले कार्यकाल के अभियान का आधार बनाया था और बाद में भी यह वादा बार-बार दोहराया है. ऐसे में नौकरियों का इस तरह जाना खासा सियासी मुद्दा बन सकता है. मैन्यूफैक्चरिंग के बड़े केंद्र महाराष्ट्र और हरियाणा सरीखे बेहद अहम राज्यों में अगले कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.

खबर वाकई बुरी

सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्यूफैक्चर्स (सियाम) के आंकड़ों से पता चलता है कि यह गिरावट किस कदर उद्योग के हरेक क्षेत्र में पसर गई है. पिछले साल कुल बिक्री में तकरीबन 8 फीसद की गिरावट आई.

2017-18 के 18.2 लाख वाहनों के मुकाबले 2018-19 में 16.8 लाख वाहन ही बिके. निजी और व्यावसायिक दोनों वाहनों की बिक्री की वृद्धि दरें गोता लगा रही हैं—निजी वाहनों की वृद्धि दर 2018-19 की दूसरी तिमाही से गिर रही है, तो व्यावसायिक वाहनों की वृद्धि दर 2017-18 की तीसरी तिमाही से गिरावट की चपेट में है.

पिछले एक साल से दुपहिया वाहनों की बिक्री भी गिरावट की शिकार है, जो 2018-19 में उससे पिछले साल के मुकाबले 17 फीसद घट गई. सियाम के जून 2019 में जारी ताजातरीन आंकड़े बताते हैं कि मुश्किल दौर जारी है—जून में वाहनों की बिक्री पिछले साल के इसी महीने में बिके 1.8 लाख वाहनों के मुकाबले तकरीबन 22 फीसद गिरकर 1.4 लाख रह गई, जबकि इसी महीने में दुपहिया वाहनों की बिक्री 18.7 लाख इकाइयों से तकरीबन 12 फीसद घटकर 16.5 लाख इकाइयों पर आ गई.

ठहरी हुई उत्पादन क्षमता परेशानी को दुगुनी कर रही है. कार कंपनियों ने तेज वृद्घि और मांग की उम्मीद में उत्पादन क्षमता 2014 में प्रति तिमाही 56.60 लाख इकाइयों से बढ़ाकर 2019 में 72.1 इकाइयां कर दीं. इस बीच इस साल जून में नए वाहनों के रजिस्ट्रेशन में पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले 3.2 लाख की गिरावट आई. बनकर तैयार और अनबिके इन वाहनों ने सुस्ती के आलम को और बिगाड़ दिया— रिपोर्टों के मुताबिक, जून 2019 की शुरुआत में कंपनियों के डीलरों के पास 35,000 करोड़ रुपए की तकरीबन पांच लाख अनबिकी गाडिय़ां और 17,000 करोड़ रुपए के 30 लाख अनबिके दुपहिया वाहन पड़े थे.

फेडरेशन ऑफ ऑटोमोटिव डीलर्स एसोसिएशन (एफएडीए) के पूर्व प्रेसिडेंट निकुंज सांघी कहते हैं, ''इंडस्ट्री को पिछले साल अक्तूबर-नवंबर के त्यौहारी सीजन में भारी बिक्री की उम्मीद थी, लिहाजा लोग माल भरते गए. मगर बिक्री उम्मीद से बहुत कम रही.'' बदतर यह कि निर्यात भी गिर रहा है, जो घरेलू बिक्री में गिरावट की भरपाई कर सकता था.

मुंबई में सुजुकी के सबसे पुराने शोरूम में से एक विटेसी के जनरल मैनेजर कोलिन परेरा तस्दीक करते हैं कि डीलर पिछले एक साल से इस परेशानी से जूझ रहे हैं. वे कहते हैं, ''नई बुकिंग और सीधे बिक्री दोनों में पिछले साल के मुकाबले 20 फीसद की गिरावट आई है.'' इससे ज्यादा संजीदा हकीकत यह है कि मुंबई में तकरीबन 20 डीलरों ने अपने यहां ताले डाल दिए हैं, जिसका असर कार बनाने वाली कई कंपनियों पर पड़ा है.

एफएडीए के प्रेसिडेंट आशीष हर्षराज काले इत्तेफाक जाहिर करते हैं, ''यह भारी गिरावट है. सबसे बड़ा झटका तब लगा जब त्यौहारी सीजन में भी मांग नहीं उठी.''

परेशानी सारे देश में महसूस की जा रही है. दिल्ली के डीलरों के यहां से भी ऐसी ही खबरें हैं. होंडा से लेकर रॉल्स रॉयस तक कई ओईएम के वाहन बेचने वाली ड्यूश मोटरन के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर यदुर कपूर कहते हैं, ''मैंने बाजार की इतनी बुरी हालत पहले कभी नहीं देखी.

लोग नौकरियां मांगने के लिए मुझे कॉल कर रहे हैं—ऐसे लोग जिन्होंने हमारे साथ करियर की शुरुआत की थी. मगर यहां तो हम भी लागत में कटौती करके इसे दुरुस्त करने में लगे हैं.''

इस गिरावट की गूंज उद्योग के पूरे ढांचे में सुनाई दे रही है. देश की सबसे बड़ी सवारी वाहन निर्माता मारुति सुजुकी ने हाल ही में 2018-19 की चौथी तिमाही के बाद से खालिस मुनाफे में लगातार गिरावट दर्ज की है. कंपनी ने इस साल अप्रैल-जून की तिमाही में 4.02 लाख गाडिय़ां बेचीं, जो एक साल पहले के मुकाबले 17.9 फीसदी की गिरावट है.

इसके चेयरमैन आर.सी. भार्गव ने हाल ही में इंडिया टुडे से कहा, ''गिरावट की भयावहता आंकड़ों से जाहिर है. उम्मीद के कोई साफ संकेत नहीं हैं, नतीजतन (उत्पादन) क्षमता खाली और बेकार पड़ी है. देश को 2022 तक मैन्यूफैक्चरिंग का केंद्र बनाने का प्रधानमंत्री का विजन ऑटो सेक्टर के बगैर साकार नहीं किया जा सकता.''

ऑटो एंसिलरीज एसोसिएशन के प्रेसिडेंट और कार सीट तथा रूफ हेडलाइनर सरीखे हिस्सों की सप्लायर कृष्णा मारुति के चेयरमैन अशोक कपूर भी बहुत कुछ यही बात कहते हैं, ''हर कोई परेशान है क्योंकि हमें पता नहीं कि यह सुस्ती कब और कैसे खत्म होगी.'' वे कर्मचारियों की पालियां और तनख्वाहें घटाकर छंटनी से अभी तक तो बचते आए हैं, मगर कार से जुड़ी चीजें बनाने वाले दूसरे कई निर्माता इतने खुशकिस्मत नहीं रहे.

गिरावट की वजह?

वाहनों की बिक्री घटने की कई वजहें हैं, जिसमें गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) का संकट, ग्रामीण खस्ताहाली से लोगों की क्रय-शक्ति में सेंध, नौकरी और रोजगार को लेकर लोगों में आशंका, अप्रैल 2020 से प्रदूषण नियंत्रण मानकों में बड़े बदलाव से वाहन कंपनियों का कई वाहनों का उत्पादन रोकना वगैरह शामिल है.

क्रय-शक्ति: ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निरंतर संकट के कारण उपभोक्ता की क्रय-शक्ति में भारी गिरावट आई है. 2008-2012 के बीच मजदूरी वृद्धि के आंकड़ों पर नजर डालें तो चिंताजनक तस्वीरें दिखती हैं. ग्रामीण मजदूरी में प्रति वर्ष 6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

फिर, नवंबर 2013 में, यह ट्रेंड लडख़ड़ा गया. मई 2014 और दिसंबर 2018 के बीच, खेतिहर मजदूरों की मजदूरी केवल 0.87 प्रतिशत बढ़ी, गैर-कृषि श्रमिकों की मजदूरी तो उससे भी कम मात्र 0.23 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ी. सबसे बदतर स्थिति तो कृषि के बाद सबसे ज्यादा श्रमिकों वाले निर्माण क्षेत्र के श्रमिकों की रही जिनकी उस अवधि में मजदूरी में प्रति वर्ष 0.02 प्रतिशत की कमी आई. इसके मद्देनजर सांघी तेजी से बढ़ते उपभोक्ता वस्तुओं (एफएमसीजी) के बाजार में आने वाली गिरावट की ओर इशारा करते हैं.

वे कहते हैं, ''किसी को वाहन की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन उसके लिए वह इंतजार करने को तैयार है क्योंकि यह जरूरी खर्च नहीं है. हालांकि, लोग आम तौर पर जरूरी उत्पादों की खरीद को रोकते नहीं हैं—लेकिन वे ऐसा कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि क्रय-शक्ति वास्तव में गिर गई है.'' इसी के मद्देनजर, बाजार अनुसंधान फर्म नीलसन ने भारत के एफएमसीजी बाजार के लिए 2019 में वृद्धि का अनुमान 11-12 प्रतिशत कर दिया है जो 2018 में 13.8 प्रतिशत था.

एवेन्टम एडवाइजर्स के एमडी वी.जी. रामकृष्णन नवंबर, 2016 की नोटबंदी के असर की ओर इशारा करते हैं. वे कहते हैं, ''नोटबंदी से लोग गहरे प्रभावित हुए.'' इससे लोगों ने वाहन खरीदने की योजना छोड़ दी, या फिर सेकंड हैंड कार खरीदने लगे, जो सस्ती हैं. 2018-19 में 36 लाख नई कारें बिकीं, जबकि 40 लाख सेकंड हैंड कारों की बिक्री हुई.

उपभोक्ता वित्त: दूसरा बड़ा कारण कर्ज उपलब्धता की कमी है. हाल के वर्षों में, एनपीए संकट के बोझ से दबे बैंक, नए ऋण देने के पहले जैसे तैयार नहीं हैं. डीलरशिप की रिपोर्टों से अक्सर यह सुनने में आया है कि संभावित खरीदार शोरूम पर पहुंचे हैं और एक गाड़ी पसंद भी कर ली है, लेकिन कर्ज न मिलने से खरीद नहीं पाए. 2009-10 में स्थिति ऐसी थी कि ऑटो डीलर और बैंक अधिकारी, ग्राहकों के लिए तैयार मिलते थे. एक परेशानी यह भी है कि रिजर्व बैंक की दरों में कटौती के बावजूद ब्याज दरें अभी भी महंगी है.

पूंजी तक पहुंच: हाल के वर्षों में, आपूर्ति पक्ष पर वित्तपोषण भी दुर्लभ हो गया है. कारों और डीलरशिप के लिए कर्ज की एक बड़ी स्रोत गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) 2018 के अंत में नकदी संकट से जूझने लगीं, जब इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आइएलऐंडएफएस) को ब्याज के भुगतान में परेशानी आने लगी. आइएलऐंडएफएस के बाद एक अन्य प्रमुख एनबीएफसी दीवान हाउसिंग फाइनेंस भी ब्याज चुकाने में असमर्थ हो गई.

इन वजहों से एनबीएफसी के लिए वित्त पोषण के प्रमुख स्रोत म्युचुअल फंडों ने 60,000 करोड़ रु. से अधिक का अपना निवेश निकाल लिया. (जुलाई 2018 में, म्युचुअल फंड्स का एनबीएफसी में 2.66 लाख करोड़ रुपए का निवेश था. जून 2019 में, यह घटकर 2.02 लाख करोड़ रुपए हो गया) एनपीए संकट से जूझ रहे बैंकों ने कोलेटरल जरूरतों को बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया और एनबीएफसी के पास नकदी की किल्लत हो गई. ऑटोमोबाइल डीलरों के लिए कार्यशील पूंजी प्राप्त करना मुश्किल हो गया, जिससे उनके लिए नए स्टॉक की खरीद मुश्किल हो गई.

नियमों में बदलाव: व्यवधान का एक अन्य कारण नए नियम हैं. मसलन, अप्रैल 2020 से, सभी वाहनों को भारत स्टेज vi उत्सर्जन मानदंडों को पूरा करना होगा.

सभी वाहनों में ऐंटी-लॉक ब्रेकिंग सिस्टम (एबीएस) और एयर-बैग जैसी सुरक्षा सुविधाएं होना अनिवार्य हो गया है. सितंबर 2018 में सभी वाहनों के लिए थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस भी अनिवार्य हो गया है. भार्गव कहते हैं, ''नए नियमों को पूरा करने से लागत काफी बढ़ जाएगी, जिनमें बीएस vi और सुरक्षा मानदंड शामिल हैं.''

भारतीय स्टेट बैंक के समूह के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौक्वय कांति घोष ने हाल ही में एक शोध नोट में बताया है कि बीएस vi मानदंडों का पालन करने से ही कीमतों में लगभग 8 प्रतिशत की वृद्धि होगी. इससे मारुति जैसी कंपनियों ने 2019 के लिए उत्पादन लक्ष्यों को घटा दिया है.

मारुति ने डीजल इंजनों को बंद करने पर भी विचार किया है और भार्गव ने घोषणा की कि कंपनी मांग के आधार पर निर्णय लेगी. उद्योग के एक जानकार कहते हैं, ''संभावना है कि मारुति 1.3 लीटर डीजल इंजन को बंद कर दे, जिसके लिए वह फिएट को रॉयल्टी का भुगतान करती है.''

यही नहीं, नियमों में दूसरे परिवर्तन भी हैं जिन्होंने बाजार को परेशान किया है, जैसे नए एक्सल-लोड मानदंड और जीएसटी दरों में कटौती के जरिए बिजली चालित वाहनों का उपयोग बढ़ाने पर सरकार का जोर. 2018 में, सरकार ने परिवहन वाहनों पर अधिकतम भार सीमा 20-25 प्रतिशत बढ़ा दी.

इस तरह भार ढोने की क्षमता बढ़ाकर सरकार ने लॉजिस्टिक्स की लागत में कटौती कर दी, इससे नए कमर्शियल वाहनों की बिक्री में कमी आई है.

दूसरे, इस साल 28 जुलाई को इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए जीएसटी दर को 12 फीसद से घटाकर 5 फीसद कर दिया गया और इलेक्ट्रिक वाहन चार्जर्स के लिए कर को 18 फीसद से 5 फीसद कर दिया गया.

इन नियमों के अचानक आने से उद्योग अस्थिर हो गया. सांघी कहते हैं, ''इन परिवर्तनों ने ओईएम, उनके विक्रेताओं और उपभोक्ताओं को भ्रमित कर दिया है.'' भ्रम की स्थिति अप्रैल 2020 तक जारी रहेगी, जब बीएस vi नियम लागू हो जाएंगे. कुल मिलाकर, इनसे और बिना ढांचे के इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहित करने की बात ने इस क्षेत्र के पूरे अर्थ तंत्र को प्रभावित किया है.

इसने उद्योग के सबसे अनुभवी पेशेवरों को भी सकते में डाल दिया है. एमऐंडएम के प्रबंध निदेशक पवन गोयनका ने हाल ही में कहा, ''अगर मैं मंदी के सभी कारणों को जोड़ दूं तब भी संकट का खुलासा नहीं हो सकता. कुछ तो ऐसा है जिसने उपभोक्ताओं की भावना को प्रभावित किया है और जो मंदी का कारण बन रहा है. मेरी चिंता यह है कि सबसे बुरा दौर अभी खत्म नहीं हुआ है.'' बजाज ऑटो के प्रबंध निदेशक राजीव बजाज कहते हैं, ''नहीं मालूम कि चीजें क्यों धीमी हो गई हैं.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay