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शिवराज बनाम महाराज

मध्य प्रदेश के चुनाव में दो व्यक्तित्व आमने-सामने हैं. बीजेपी का चेहरा विकास और सुशासन की दुहाई दे रहा है, तो कांग्रेसी चेहरा उसे छलावा करार देने में जुटा है. सिंधिया को कमान सौंपकर कांग्रेस ने इस बार चुनाव को रोचक बना दिया है. अब देखना है कि सिंधिया इस सियासी ड्रामे में खुद को नायक के रूप में स्थापित कर पाते हैं या...
शिवराज बनाम महाराज
संतोष कुमारभोपाल,नई दिल्ली, 15 November 2013

वाकया इसी साल के शुरू का है. 10 जनपथ पर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह और केंद्रीय ऊर्जा राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने बुलवाया. हाड़ कंपाती ठंड में सोनिया ने सियासी उबाल लाते हुए दिग्विजय से कहा, ‘‘मध्य प्रदेश में शिवराज को चुनौती देनी है, तो एक चेहरा देना ही होगा. आपको सिंधिया को सपोर्ट करना है.’’ दरअसल, यह कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की तैयार स्क्रिप्ट थी, जिसे वे सितंबर 2012 से ही तैयार कर रहे थे. लेकिन उसे उन्होंने सोनिया के जरिए अमलीजामा पहनाया.

उसी साल अक्तूबर में राहुल ने सिंधिया को प्रमोट कर प्रतीकात्मक ‘‘पावर’’ यानी ऊर्जा मंत्रालय की कमान सौंपी जिसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल ने आगे की बातचीत की कमान संभाली. राहुल को अपनी योजना को मूर्त रूप देने में एक साल लग गया. लेकिन इस योजना ने बीजेपी को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया तो राहुल की हांक ने सभी कांग्रेसी क्षत्रपों को एक मंच पर ला खड़ा किया. कांग्रेस में सिंधिया को आगे बढ़ाने के पीछे कांग्रेस की मजबूरी चौहान के बढ़ते निजी जनाधार पर मिली रिपोर्ट थी. उसके मुताबिक, बीजेपी के मंत्रियों-विधायकों के खिलाफ गुस्सा होने के बावजूद हर विधानसभा सीट पर चौहान का अपना 4 फीसदी वोट बैंक बनना था.

गुजरात में नरेंद्र मोदी को बड़ी जीत से रोकने में कांग्रेस को एक अदद चेहरे की कमी खली थी, सो राहुल ने मध्य प्रदेश में वॉकओवर देने की बजाए शिवराज सरकार से मुकाबले का फैसला किया. उसी का नतीजा है कि उमा भारती बनाम दिग्विजय सिंह की 2003 की लड़ाई के बाद पहली बार बीजेपी-कांग्रेस में व्यक्तित्व का टकराव होने जा रहा है. इस बार चौहान के सामने सिंधिया राजघराने का महाराज है. प्रदेश की राजनीति में रजवाड़ों के वर्चस्व का इतिहास रहा है. पूरे मध्य प्रदेश में महाकौशल, राघोगढ़, सिंधिया साम्राज्य और जूदेव परिवार के अलावा छोटी रियासतों वाली राजसत्ता राजनीति का संचालन करती रही. रजवाड़े अब रहे नहीं पर इलाके में शाही परिवार का प्रभाव और रुतबा अब भी कायम है. युवा और बेदाग छवि वाले सिंधिया को सामने लाने से कांग्रेस में भी ऊर्जा का संचार हुआ है. एक दशक बाद पहली बार मध्य प्रदेश में कांग्रेस गंभीरता से चुनाव मैदान में उतरी है.

ग्वालियर की सभा में कांग्रेसी नेता

डबल बैरल की बंदूक
ज्योतिरादित्य सिंधिया को राजनैतिक रूप से लॉन्च करने के लिए 2001 में एक समारोह तय था. पर उसी साल माधवराव सिंधिया की हेलिकॉप्टर हादसे में मौत हो गई. राजनीति में ज्यादा व्यस्त माधवराव जब निजी संस्थाओं को वक्त नहीं दे पा रहे थे और कामकाज प्रभावित हो रहा था, तो उनके एक करीबी और 40 साल से परिवार से जुड़े डॉ. केशव पांडे ने उन्हें सलाह दी कि उन संस्थाओं की जिम्मा युवराज को क्यों नहीं सौंप देते? इस पर माधवराव का जवाब था, ‘‘मेरा बेटा डबल बैरल की बंदूक है. उसे पता है कि चीजों को पेशेवर अंदाज में कैसे चलाया जाता है.’’ दरअसल, डबल बैरल की टिप्पणी गर्व महसूस कर रहे एक बाप की थी, जिसका बेटा डबल एमबीए कर चुका था. खुद ज्योतिरादित्य भावुक होते हुए पिता के असामयिक निधन को जिंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट बताते हैं.

महाराज की छवि रखने और इसी नाम से पुकारे जाने वाले सिंधिया बेहद साधारण लिबास पहनना पसंद करते हैं और अपनी गाड़ी में कभी एयरकंडीशनर नहीं चलाते. लेकिन खाने के शौकीन सिंधिया जब भी ग्वालियर अपने महल में आते हैं तो उससे पहले उनके खाने का मेन्यू फैक्स से खानसामा के पास पहुंच जाता है. महाराष्ट्रियन दाल उन्हें बेहद पसंद है. वे ‘‘फिश वाइन’’ के भी शौकीन हैं और उन्हें पता है कि मछली की आंख पर निशाना साधना ही लक्ष्य की प्राप्ति नहीं है.

प्रशासन में टीमवर्क को अहम मानकर चलने वाले सिंधिया स्वभाव से जिद्दी हैं और कुछ करने की ठान लेने पर उसे पूरा किए बिना चौन नहीं लेते. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का वरदहस्त होने के बावजूद वे कांग्रेस के उन आधा दर्जन क्षत्रपों को किनारे कर आगे बढऩे की कोशिश नहीं करते. ग्वालियर-चंबल संभाग में 17 अक्तूबर की विशाल जनसभा में जब दिग्विजिय ने भाषण देने से इनकार कर दिया तो सिंधिया ने उन्हें बोलने के लिए मना लिया ताकि कांग्रेस की एकजुटता पर सवाल न उठे. दिग्विजय ने कहा, ‘‘मैं कभी सोनियाजी और राहुलजी के सामने भाषण नहीं देता, लेकिन आज बालहठ (सिंधिया की जिद) के सामने झुकना पड़ रहा है.’’ उनकी इस टिप्पणी पर महाराज ने अपने ही रजवाड़े में मंच से हाथ जोड़कर मनसबदार (दिग्विजय) का मुस्कराकर धन्यवाद ज्ञापित करने में हिचक नहीं दिखाई.

सिंधिया की सबसे बड़ी ताकत वैसे राहुल ही हैं. पर 2जी घोटाले में फंसे ए. राजा के साथ उसी विभाग में मंत्री रहने के बावजूद उन पर उंगली तक न उठना उनकी बेहतर प्रशासनिक क्षमता को उजागर करता है. कांग्रेस की रणनीति साफ छवि वाले शिवराज के मुकाबले ऐसे ही नेता को उतारने की थी. दोनों की भाषण कला एक जैसी है. सिंधिया के बीजेपी पर आरोप लगाने पर जब तालियां बजती हैं तो वे माइक का मुंह जनता की तरफ कर देते हैं. शिवराज अगर सीधा संवाद करने के लिए अपनी योजनाओं का बखान कर तालियां बटोरते हैं, तो सिंधिया आरोपों की झड़ी लगाकर जनता से ही जवाब मांगते हैं.

उनके सियासी कौशल का संदेश भी अब नीचे तक पहुंचने लगा है. ग्वालियर रैली में भिंड से आए 87 वर्षीय बुजुर्ग मोहकम सिंह कहते हैं, ‘‘अगर माधवरावजी महाराज थे, तो ज्योतिरादित्य राजनीति के उस्ताद हैं.’’ वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी के शौकीन सिंधिया के बारे में कहा जाता है कि वे बाल की खाल निकालकर ही कोई अगला कदम उठाते हैं. सिंधिया को चेहरा बनाए जाने से ग्वालियर-चंबल संभाग में उत्साह है. हालांकि इसके बावजूद ज्यादातर लोग मानते हैं कि ऐलान में बहुत देरी हो चुकी है. हार्वर्ड और कैंब्रिज से पढ़े सिंधिया परिवार के रीति-रिवाजों को पूरी तरह से निभाते हैं. सुबह 8 बजे उठने के बाद व्यायाम और पूजा-पाठ उनकी दिनचर्या का हिस्सा है. दोनों समय मां के पैर छूना आज भी उनकी आदत है. महीने में औसतन 10 से 12 दिन वे दौरे पर रहते हैं तो महीने में दो दिन संसदीय क्षेत्र में बिताते हैं.

चौहान को अब मोदी का आसरा
सिंधिया को कमान सौंपे जाने के बाद से बीजेपी को राह थोड़ी कठिन दिखने लगी है. वैसे तो पिछले साल ही सिंधिया को सामने लाने की खबरें उडऩे पर बीजेपी को शुबहा हो गया था कि देर-सवेर यह होगा. बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि युवा और खास तौर से पहली बार वोट डालने जा रहे मतदाता सिंधिया के व्यक्तित्व के प्रति आकर्षित हो सकते हैं. लेकिन इसकी काट के लिए बीजेपी अब नरेंद्र मोदी को राज्य में सघन प्रचार के लिए उतारेगी. इस कदम से अल्पसंख्यक मतदाताओं में गलत संदेश जाने के डर से ही चौहान विधानसभा चुनाव तक मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार बनाए जाने के पक्ष में नहीं थे. मोदी का राज्य में दौरा भी सीमित माना जा रहा था. पर अब बीजेपी के एक नेता कहते हैं, ‘‘युवाओं में मोदी से ज्यादा क्रेज सिंधिया का नहीं हो सकता. सिंधिया के प्रति आकर्षित होने वाले वोट को रोकने के लिए हम मोदी की युवाओं में इसी अपील का सहारा लेंगे.’’

बीजेपी ने वैसे, सियासी हमलों में सिंधिया को कम तवज्जो देने की भी रणनीति बनाई है. हालांकि उसके राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) रामलाल कहते हैं, ‘‘सिंधिया के आने से कोई फर्क नहीं पड़ा है. हमारा नारा वही है जो नरेंद्र मोदी ने दिया है कि कांग्रेस मुक्त भारत चाहिए.’’ हालांकि कई जगह बीजेपी ने ‘‘आगे-आगे शिवराज, पीछे-पीछे महाराज्य’’ का नारा दिया है. लेकिन रामलाल इसे आधिकारिक नारा नहीं मानते. बीजेपी अब राहुल गांधी की रैली से पहले विज्ञापनों में पूछ रही हैः प्रदेश आगमन पर शहजादे से कुछ सवाल. इसमें भोपाल गैस कांड के आरोपी एंडरसन को फरार करवाना, रॉबर्ट वाड्रा पर भूमि घोटाले का आरोप, प्रधानमंत्री मननमोहन सिंह का अपमान, भ्रष्टाचार, महंगाई, निर्भया बलात्कार और राष्ट्रीय राजमार्ग की बदहाली का सवाल उठाकर जवाब मांगा जा रहा है.

शिवराज का ‘‘इंदिरा’’ स्टाइल
पिछले 2-3 महीनों में सिंधिया के साथ सभी कांग्रेस नेताओं की एकजुटता और सत्ता परिवर्तन रैलियों में उमड़ी भीड़ ने बीजेपी की हैट्रिक की राह को कठिन बनाया है. ऐसे में सोच-समझकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 1971 में इंदिरा गांधी की अपनाई शैली को अपने भाषणों में समाहित कर समूची कांग्रेस पर निशाना साधना शुरू कर दिया है. ग्वालियर की राहुल की रैली से पहले चौहान अपनी जन आशीर्वाद यात्रा पर कटनी में थे. चौहान के भाषणों में अपने शासन की उपलब्धि, अगले पांच साल की योजना और केंद्र सरकार के भ्रष्टाचार से लेकर सौतेले व्यवहार का जिक्र होता है. कांग्रेस की ओर से घोषणावीर सीएम होने के आरोपों का जवाब चौहान कुछ इस तरह दे रहे हैं, ‘‘घोषणा कायर नहीं, वीर ही करते हैं.’’ राहुल-सिंधिया अपने भाषण में आम जनता को भोजन, सूचना, शिक्षा, रोजगार के अधिकार देने का दंभ भरते हैं, तो चौहान बताते हैं कि कैसे उन्होंने किसानों से सारा अनाज खरीदा, बोनस दिया और फिर 1 रु. किलो गेंहू दिया.

वे भी सवाल पूछते हैं, कांग्रेस ने आखिर दिया क्या? कांग्रेस नेताओं की एकजुटता पर वे कहते हैं, ‘‘कांग्रेस के जो नेता पहले एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते थे, अब हाथ मिला रहे हैं. सत्ता में आने के लिए व्याकुल हो रहे हैं.’’ चुनावी सभाओं में चौहान इंदिरा गांधी की तरह भावनात्मक लहर पैदा कर रहे हैं,  ‘‘मैं कहता हूं गरीबी हटाओ, वो कहते हैं शिवराज हटाओ. मैं कहता हूं पानी लाओ, वो कहते हैं शिवराज हटाओ...’’ मुख्यमंत्री अपनी सभी योजनाओं का नाम गिनाकर इस नारे को दोहराते हैं. जनता के लिए ही जीने और जरूरत पडऩे पर मरने का भी वादा करते हैं.

भोपाल की रैली में चौहान और बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व

बीजेपी की कमजोर कड़ी
शिवराज सिंह चौहान सरकार की सबसे बड़ी मुश्किल उनके मंत्री और विधायक हैं तो खासियत वे खुद हैं. चौहान की लोकप्रियता बढ़ी है, लेकिन करीब दर्जन भर मंत्रियों पर आधे से ज्यादा विधायकों के खिलाफ जनता में रोष है. चौहान को पूरी तरह से भ्रष्ट सरकार का कैप्टन करार देते हुए सिंधिया कहते हैं, ‘‘7,000 घोषणाओं में से 6,000 अगर ठंडे बस्ते में हैं तो नाव का कैप्टन जिम्मेदारी से कैसे बच सकता है. जो कैप्टन लाडली लक्ष्मी अभियान करे और मध्य प्रदेश बलात्कार की राजधानी बन जाए तो कैसे कह सकते हैं कि सीएम की जिम्मेदारी नहीं. जिस कैप्टन के तहत पूरा भ्रष्टाचार का आलम पूरे प्रदेश में है. खुद सीएम पर डंपर कांड में आरोप है. राज्य में सारे सरकारी ठेके सिर्फ सुधीर शर्मा और दिलीप सूर्यवंशी को ही क्यों मिले?’’ हालांकि शिवराज अपनी इस कमजोरी को समझ चुके हैं और उन्होंने सारा दारोमदार प्रदेश अध्यक्ष और अपने सबसे विश्वस्त सहयोगी नरेंद्र सिंह तोमर पर छोड़ दिया है. पिछले विधानसभा चुनाव में भी तोमर-शिवराज की जोड़ी थी.

बीजेपी की कोशिश सभी नेताओं को जिम्मेदारी देकर काम पर लगाने की है ताकि असंतोष न रहे. संगठन को और चाक-चौबंद रखने के लिए बूथों की निगरानी के लिए अब मंडल की बजाए ग्राम/शहर केंद्र बनाए गए हैं और हर केंद्र में 4-5 बूथ है. इससे निगरानी बेहतर करने का प्रयास हो रहा है. तोमर हर सीट पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से अनौपचारिक चर्चा कर चुके हैं. लेकिन बगावत के अंदेशे को देखते हुए पार्टी ने अभी चुनाव समिति तक का गठन नहीं किया है. हालात को देखते हुए आलाकमान ने भी सब कुछ शिवराज-तोमर पर छोड़ दिया है. ये दोनों नेता गुजरात की तर्ज पर कई मंत्रियों समेत 60 फीसदी विधायकों के टिकट काटना चाहते हैं, लेकिन साहस नहीं जुटा पा रहे. इसके अलावा राज्य में कुपोषण, शिशु मृत्यु दर जैसी समस्या शिवराज की विकास की तस्वीर पर दाग छोड़ रही है.

राहुल नीति से होगा मध्य भारत फतह?
मध्य प्रदेश के लिए कांग्रेस की चुनावी थीम भले ही हो ‘‘सबका कहना इस बार, कांग्रेस की आएगी सरकार’’, लेकिन संगठन के लिए राहुल नीति है-सभी नेताओं की एकता. राहुल ने सिंधिया को खास निर्देश दे रखा है कि हफ्ते में दो बार सभी वरिष्ठ नेता एक साथ बैठेंगे, ताकि मतभेद खत्म हों. संगठन को एकत्रित करने के लिए प्रदेश स्तर पर दौरा, विधानसभा वार समीक्षा के साथ-साथ बीजेपी पर हमले की खास तैयारी की गई है. कांग्रेस ने जिलेवार बीजेपी विधायकों की ओर से किए गए वादे और उस पर हुए अमल की पड़ताल की है. स्थानीय स्तर पर सिर्फ उन्हीं मुद्दों को उठाया जा रहा है. मुद्दे के तौर पर भ्रष्टाचार, कुपोषण, लोकायुक्त के छापे में चपरासी तक के घर से मिल रहे करोड़ों रुपए अहम होंगे. मोहन प्रकाश कहते हैं, ‘‘हम बीजेपी की रणनीति देखकर काम नहीं करते. अब हम अपनी रणनीति पर बीजेपी को घुमाएंगे.’’

सिंधिया को परोक्ष रूप से सीएम उम्मीदवार बनाने से कांग्रेस में उत्साह है, लेकिन पार्टी ने निर्णय में काफी देर कर दी. जिस समय उनके नाम का एलान हुआ, उस वक्त तक शिवराज अपनी जन आशीर्वाद यात्रा में लोगों का विश्वास जीत रहे थे. बीजेपी जानती है कि कांग्रेस का संगठन कमजोर है. 2003 में जब बीजेपी ने दिग्विजय सरकार को सत्ता से बेदखल किया था तो उससे पहले सड़कों पर लड़ाई लड़ी थी. शिवराज की छवि पूरे प्रदेश और जनता से जुड़ी है तो सिंधिया की छवि राजशाही है. हालांकि बीजेपी ने उनकी इस छवि पर चोट करने की कोशिश की तो उन्होंने जवाब दिया, ‘‘मैं 21वीं सदी के भारत का एक नौजवान हूं...व्यक्ति अतीत के आधार पर नहीं बढ़ सकता. बीजेपी का काम आलोचना करना है. मुझे इस बात का आश्चर्य है कि वे उसी परिवार की आलोचना कर रहे हैं जिस परिवार की मेरी दादी (विजयाराजे सिंधिया) उस पार्टी के संस्थापकों में से थीं. जब मेरी बुआ (वसुंधरा राजे) को राजस्थान में मुख्यमंत्री बनाया तो ये सब शब्द याद नहीं आए, जो अब याद आ रहे हैं.’’ छवि बदलने की जरूरत वैसे सिंधिया भी समझते हैं, लेकिन उनके समर्थक चाहकर भी एकदम से ऐसा नहीं कर पा रहे.

मध्य भारत में सिंधिया को कमान सौंपकर कांग्रेस ने इस बार यहां चुनाव को रोचक बना दिया है. अब देखना है कि सिंधिया इस सियासी ड्रामे में खुद को नायक के रूप में स्थापित कर पाते हैं या...

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