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बरगद का गिरना

आइएलऐंडएफएस संकट ने भारत के बैंकिंग क्षेत्र की मुसीबतों को हवा दे दी और इसे 2019 में और बढऩे के ही कयास लगाए जा रहे हैं

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एम.जी. अरुणनई दिल्ली, 02 January 2019
बरगद का गिरना नोआह सलीम एएफपी

इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आइएलऐंडएफएस) के चालाक पूर्व सीईओ रवि पार्थसारथी का उदय और पतन उनकी कंपनी के जैसा ही रहा है. इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट तैयार करने और क्रियान्वयन में विशेषज्ञता के साथ भारत में सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) की यह अग्रणी कंपनी तब निगरानी में आ गई जब इसे अपने ऋण की अदायगी में परेशानी आने लगी और इसने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के क्षेत्र को हिलाकर रख दिया. पार्थसारथी जो राजनैतिक हलके में गहरी पकड़ रखते हैं, तीन दशकों तक कंपनी का चेहरा थे, लेकिन अब उन्हें कंपनी की बदहाली का जिम्मेदार माना जा रहा है.

कुछ का कहना है कि आइएलऐंडएफएस ने 200 से अधिक सहायक कंपनियों के साथ बहुत तेजी से और बहुत लंबी छलांग लगाई. कंपनी ने 10 साल से अधिक अवधि की दीर्घकालीन परियोजनाओं का वित्तपोषण किया है, लेकिन उधार कम अवधि के लिए लिया, इससे परिसंपत्ति-देयता का अंतर बढ़ गया. इस प्रक्रिया में कंपनी पर 91,000 करोड़ रु. का कर्ज चढ़ गया.

इस डर से कि इस कंपनी के पतन से पूरे एनबीएफसी क्षेत्र पर एक बड़ा संकट आ खड़ा होगा, सरकार इसे नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में लेकर आई जिसने सरकार को कंपनी के 15-सदस्यीय बोर्ड को बदलने की अनुमति दी. गैर-कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में बैंकर उदय कोटक के नेतृत्व में नए बोर्ड ने कंपनी के 30,000 करोड़ रु. के रोड एसेट को बेचने का फैसला किया है जो कि कंपनी की कुल देनदारियों की एक-तिहाई राशि है.

अक्तूबर में जब यह संकट खुलकर सामने आया तब पार्थसारथी इलाज के लिए विदेश गए थे, उन्हें भारत लौटना पड़ा है क्योंकि गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय उनसे पूछताछ करना चाहता था. अब वे कथित तौर पर एक बार फिर से इलाज के लिए विदेश यात्रा की अनुमति मांग रहे हैं. बहरहाल, आइएलऐंडएफएस पर आए संकट ने एनबीएफसी क्षेत्र को पुनर्जीवित करने के लिए राहत पैकेज की जरूरत पर बहस छेड़ दी है और सरकार ने भी सेक्टर को उबारने के लिए रिजर्ब बैंक पर विशेष तरलता खिड़की खोलने का दबाव बनाया था.

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