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ऐतिहासिक उथल-पुथल की साक्षी राखीगढ़ी

ऐतिहासिक भारतीय नगर राखीगढ़ी में कब्र से मिले प्राचीन डीएनए के अध्ययन ने कुछ ऐसे सबूतों का खुलासा किया है जो हिंदुत्व राष्ट्रवादियों को असहज कर देंगे.

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काय फ़्रीज़ेराखीगढ़ी, 04 September 2018
ऐतिहासिक उथल-पुथल की साक्षी राखीगढ़ी मनोज ढाका एएफपी

"पेट्रस बोन'' मानव खोपड़ी का एक अपरिष्कृत लेकिन उपयोगी हिस्सा है—मूल रूप से यह आपके आंतरिक कान की रक्षा करता है. लेकिन यह बस इतनी ही रखवाली नहीं करता. हाल के वर्षों में, प्राचीन कंकाल से डीएनए निकालने में जुटे आनुवंशिकी वैज्ञानिकों ने पाया है कि पेट्रस हड्डी के एक खास हिस्से (कर्णावर्त को सुरक्षा देने वाला हिस्सा) का घनत्व बहुत अधिक होता है और उससे किसी अन्य ऊतक के मुकाबले कई बार 100 गुना अधिक डीएनए निकाले जा सकते हैं.

अब इस अचूक खोज से भारत के इतिहास को लेकर चलने वाली सबसे गर्मागर्म बहस का जवाब मिल सकता है. जब हरियाणा के राखीगढ़ी से 4,500 साल पुराने कंकाल के "पेट्रस बोन'' के अवशेषों के अध्ययन का पूरा परिणाम सामने आ जाएगा, तब हमारे देश के इतिहास और विज्ञान के कुछ बेहतरीन दिमागों के साथ ही साथ कई नेताओं को भी परेशान करने वाले कुछ प्रश्नों के उत्तर, इस प्रकार होने चाहिए—प्रश्नः क्या हड़प्पा सभ्यता के लोग संस्कृत भाषा और वैदिक हिंदू धर्म की संस्कृति का मूल स्रोत थे?

उत्तरः नहीं. प्रश्नः क्या भारत की वर्तमान जनसंख्या में उनका जीन एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में मौजूद है? उत्तरः निश्चित रूप से. प्रश्नः वे "आर्यों'' अथवा "द्रविड़ों'' की लोकप्रिय धारणाओं में से किसके करीब थे?

उत्तरः द्रविड़ों के. प्रश्नः वे आज के दक्षिण भारतीयों और उत्तर भारतीयों में से किससे मिलते थे? उत्तरः दक्षिण भारतीयों से. ये सारे प्रश्न निश्चित रूप से विवादास्पद हैं. इन निष्कर्षों पर पहुंचने वाले एक शोधपत्र के इसी महीने ऑनलाइन उपलब्ध हो जाने की संभावना है.

पुरातत्ववेत्ता तथा पुणे के डेक्कन कॉलेज के कुलपति डॉ. वसंत शिंदे की अगुआई वाली एक टीम की 2015 में की गई खुदाई के बहुप्रतीक्षित और लंबे समय से रोककर रखे गए परिणामों में ऐसे खुलासे होने वाले हैं.

इतना लंबा समय क्यों लगा? एक साल पहले जब इस लेखक ने शिंदे से बात की थी तो एक जवाब कुछ यूं मिला था, " यह राजनैतिक रूप से बेहद संवेदनशील मुद्दा है.''

शिंदे ने सितंबर 2017 में अपने शोध के निष्कर्षों को प्रकाशित करने का वादा किया था. पुरातत्वविद् इस तथ्य का जिक्र कर रहे थे कि हड़प्पा सभ्यता को लेकर किसी भी शोध को केंद्र सरकार के हिंदुत्व के एजेंडे से टकराना पड़ेगा—जिसकी राजनीति वैदिक हिंदू धर्म को भारतीय सभ्यता की उत्पत्ति बताए जाने की मांग करती है.

इतिहासकारों या हड़प्पाकालीन अथवा सिंधु घाटी सभ्यता पर काम करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह भारी दुविधा का मामला है.

दरअसल, जब 1920 के दशक में सिंधु घाटी सभ्यता पहली बार "खोजी गई'' थी, औपनिवेशिक पुरातत्वविदों ने इसे तत्काल पूर्व-वैदिक काल की सभ्यता-संस्कृति के सबूत के रूप में स्वीकार लिया और उन्होंने "आर्य'' आक्रमणकारियों का एक नया सिद्धांत दिया और कहा कि उत्तर-पश्चिम से आए आर्यों ने हड़प्पा सभ्यता को पूरी तरह नष्ट करके हिंदू भारत की नींव रखी.

बाद के वर्षों में मुख्यधारा के अधिकांश इतिहासकारों ने "आर्य आक्रमण सिद्धांत'' को एक अतिसरलीकरण बताते हुए खारिज कर दिया—जबकि उस कालक्रम धारणा को स्वीकार लिया जो वैदिक सभ्यता को सिंधु घाटी सभ्यता के उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार करती है.

आर्यों के आक्रमण का सिद्धांत हिंदुत्व के पैरोकार राष्ट्रवादियों को चुभता है, भले ही उसने दक्षिण भारत में लोकप्रिय राजनीति की ऐसी मूल कथा के रूप में अपनी जड़ें जमा ली हैं जो सिंधु घाटी सभ्यता को द्रविड़ संस्कृति के रूप में देखती है.

उसका मानना है कि आक्रमणकारी आर्यों ने भारत के मूल निवासियों पर हमला किया और उन्हें विंध्य के उस पार दक्षिण में खदेड़ दिया तथा यह सभ्यता केवल दक्षिण भारत में खुद को "ब्राह्मणवादी'' आक्रमणकारियों से बचाने में सफल रही.

महान आकांक्षाएं

इस बीच, सिंधु घाटी सभ्यता के लोग वास्तव में कौन थे, यह अब भी रहस्य बना हुआ है. शिंदे उन सभी उम्मीदों के असंगत बोझ को समझते हैं जिसकी जानकारी अब एक मृतप्राय नदी के धूल भरे खादर में बसे हरियाणा के एक छोटे-से गांव राखीगढ़ी के 4,500 वर्ष पुराने उस निवासी (जिसे "आइ4411'' के रूप में वर्गीकृत किया गया है) से प्राप्त हुई है.

आपने राखीगढ़ी का नाम सुना भी होगाः पिछले डेढ़ दशक में यह नाम हड़प्पायुगीन/सिंधु घाटी के भारत के सबसे बड़े क्षेत्र के रूप में पाठ्यपुस्तकों, पर्यटन के पर्चों और मीडिया में छाया रहा. वास्तव में, 2014 से तो इसे बाकायदा पाकिस्तान के सिंध स्थित पुरातात्विक स्थल "मोएनजो-दड़ो'' से भी बड़ा बताया जा रहा है, जिसकी पहली बार 1920 के दशक में खुदाई हुई थी.

अतिशयोक्ति के पुट के बावजूद, 1960 के दशक के उत्तरार्ध के बाद से यहां रुक-रुककर हुई खुदाई में, इसे 7वीं सहस्राब्दी ईसा पूर्व की एक विशाल नगर व्यवस्था के रूप में पहचाना गया. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गांव में खड़े सात टीले इसे ईसा पूर्व दूसरी और तीसरी सहस्राब्दी के "विकसित'' हड़प्पा नगर व्यवस्था की साइट के रूप में स्वीकारे जाने के लिए पर्याप्त सबूत पेश करते हैं. यह ऐसा शहर है जो भारत की पहली नगर सभ्यता के रूप में फला-फूला और 4,000 साल से भी पहले, रहस्यमय तरीके से नष्ट हो गया.

राखीगढ़ी में हुए शोध का सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हो सकता है, जिसकी बात अभी नहीं हो रही है किः साइट से प्राप्त प्राचीन डीएनए में आनुवंशिक मार्कर "आर1ए1'' का कोई संकेत नहीं पाया गया है. यह महत्वपूर्ण है क्योंकि "आर1ए1'', जिसे अक्सर हम "आर्य जीन'' कहते हैं, के बारे में अब कहा जाता है कि यह मूलतः कांस्य युग के उन पशुपालकों का है जो मध्य एशियाई "पोंटिक स्टेपी'' (काला सागर और कैस्पियन सागर के बीच फैले घास के मैदानों में) से लगभग 4,000 साल पहले अन्य स्थानों पर चले गए.

उनके प्रवासन ने दो भौगोलिक दृष्टि से दूरस्थ लेकिन भाषा विज्ञान की दृष्टि से एक दूसरे से जुड़े विश्व के दो हिस्सों, उत्तरी भारत और उत्तरी यूरोप, की आबादी पर एक मजबूत और "लैंगिक-पक्षपातपूर्ण'' मसलन, पुरुष प्रधान समाज का आनुवांशिक प्रभाव छोड़ा है.

राखीगढ़ी डीएनए परियोजना के मुख्य आनुवांशिक शोधकर्ता नीरज राय कहते हैं, "हम आर1ए का उल्लेख नहीं कर रहे हैं. आर1ए वहां नहीं है.'' बेशक, उनकी स्वीकारोक्ति शब्दाडंबरों में लिपटी हुई थी, लेकिन इससे जाहिर हो रहा था कि इस शोधपत्र में प्रस्तुत आंकड़े राखीगढ़ी के "आइ 4411'' की आनुवांशिक सामग्री से लिए गए हैं जो कि एक पुरुष है—आर1ए एक उत्परिवर्तन (म्युटेशन) है जो केवल पुरुष वाइ गुणसूत्र के नमूने में देखा जाता है.

सिंधु घाटी सभ्यता से किसी व्यक्ति के पहले जीनोम नमूने में इस आनुवंशिक पहचान का न पाया जाना उस अवधारणा को मजबूती देता है जिस पर आनुवंशिक वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और भाषाविदों के बीच पहले से ही आम सहमति है—सिंधु घाटी सभ्यता पहले से ही अस्तित्व में थी और यह पशुपालकों, घोड़े और रथ की सवारी करने वाले, कुल्हाड़ी एवं अन्य हथियारों से लैस, प्रोटो-संस्कृतभाषी प्रवासियों, जिनके वंश आज उत्तर भारतीय समुदायों की उच्च जातियों में सबसे स्पष्ट रूप से दिखते हैं, से एकदम भिन्न थी.

राय का कहना है कि हैप्लोग्रुप आर1ए राखीगढ़ी के नमूने में दिखाई नहीं दे रहा तो वह इसलिए, क्योंकि वहां से सीमित मात्रा में आनुवंशिक डेटा प्राप्त हुआ है. या फिर ऐसा भी तो हो सकता है कि राखीगढ़ी के उस प्राचीन निवासी में हैप्लोग्रुप आर1ए मौजूद ही न हो.

राय ने कहा, "हमारे पास वाइ गुणसूत्र क्षेत्रों (जीनोम) के बारे में ज्यादा कवरेज नहीं है.''

उनका कहना था कि उन्होंने अपने नमूने में माइट्रोकॉन्ड्रियल और ऑटोसोमल डीएनए से ज्यादा डेटा निकाला था (माइट्रोकॉन्ड्रियल डीएनए टेस्ट से मातृ वंश और ऑटोसोमल टेस्ट से माता-पिता दोनों से जुड़ी आनुवंशिक जानकारी प्राप्त होती है).

हालांकि उन्होंने यह जोर देकर स्वीकार किया कि "मध्य एशियाई लोगों का भारी संख्या में प्रवास हुआ और इससे दक्षिण एशियाई आनुवंशिक संरचना में काफी बदलाव आया'' और प्राचीन राखीगढ़ी के निवासियों का "मध्य एशियाई लोगों के साथ कोई संबंध नहीं है.''

दूसरे शब्दों में, जबकि सिंधु घाटी सभ्यता के निवासियों का इस वंश में से कोई भी सरोकार नहीं था तो आप आम भारतीय पाठकगण यह जान लें कि आपके जीन में पुरुष नस्ल का 17.5 प्रतिशत हिस्सा स्टेपी के पशुपालकों का है.

यहां गौर करने की बात है कि यह आनुवंशिक लक्षण भारत की राजनैतिक कल्पना में हावी रहने वाले इस्लामी या यूरोपीय औपनिवेशिक हमलावरों की अपेक्षाकृत नगण्य जैविक विरासत से कहीं ज्यादा प्रभावशाली व्यवस्था में मौजूद है.

तो, अब हम यह जान चुके हैं हमारे 4,500 वर्ष पुराने पूर्वज "आइ 4411'' कौन नहीं थे. तो फिर वे कौन थे? राय के अनुसार संक्षिप्त उत्तर यह है कि आइ 4411 की "दक्षिण भारतीय जनजातीय आबादी के साथ ज्यादा घनिष्टता दिखती है.''

विशेष रूप से नीलगिरि की पहाड़ियों में रहने वाले इरुला से. शोधपत्र का एक मसौदा बताता है कि इस व्यक्ति को वास्तव में इरुला के ज्यादा करीब (एक पूर्वज जैसे आनुवंशिक गुणों वाले समूह) रखा जा सकता है... लेकिन पंजाबियों के समान ऐसे समूहों की तरफ नहीं जिनमें पश्चिमी यूरेशियाई नस्ल का उच्च अनुपात दिखता है. रिपोर्ट आगे कहती है कि राखीगढ़ी के निवासी संभवतः कोई द्रविड़ भाषा बोलते थे.

बहरहाल, परिणामों में उपमहाद्वीप के बाहर की दूसरी आबादी, जिन्हें "ईरानी कृषक'' माना जाता है, के साथ मिश्रण आनुवंशिक के स्पष्ट साक्ष्य भी दिखते हैं. यह एक आबादी है जिसे प्राचीन डीएनए के पूर्व अध्ययनों में पहचाना गया था और यह इस परिकल्पना के अनुरूप है कि कृषि तकनीक का प्रसार पश्चिम एशिया के "उपजाऊ क्रिसेंट'' के संपर्क में आने से हुआ जिसे 5वीं से 8वीं सहस्राब्दी ईसा पूर्व में यूरेशियाई कृषि के उद्गम स्थानों में से एक के रूप में स्वीकार किया जाता है.

भारतीयों की पुरानी पीढ़ी के लिए राखीगढ़ी का निष्कर्ष ऐसा लग सकता है जैसे उन्होंने स्कूलों की किताबों में जो पढ़ा था और उसे फिर से पढऩे की जरूरत हैः "द्रविड़'' हड़प्पावासियों के बाद वैदिक युग के घुड़सवार स्टेपी के घास के मैदानों से आए थे. और जो लोग जनसांख्यिकीय आनुवंशिकी की हालिया घटनाओं पर नजर रखते हैं वे इस नवीनतम निष्कर्ष से सामने आई बातों से पूर्व परिचित होंगे.

इस बीच, लोकप्रिय प्रेस में हड़प्पा युग के भारत के पुरातात्विक या आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) के हालिया अनुसंधानों का जो भी कवरेज आया है, वह "आर्यों के आक्रमण सिद्धांत'' पर जबरन भटकाने की हद तक केंद्रित रहा है. इसका क्या अर्थ है? और क्यों इससे फर्क पड़ता है? इसका जवाब इस तथ्य में मिलता है कि हाल के वर्षों में प्राचीन भारतीय इतिहास पर बहुत माथापच्ची हुई है.

छल-कपट

राखीगढ़ी अध्ययन के निष्कर्षों की खबर आने के पूर्व बड़े अनुमान लगाए जा रहे थे. संबंधित शोधपत्रों और उनकी मीडिया रिपोर्टों के सहारे इस मामले को खूब हवा दी गई और सोशल मीडिया तथा ब्लॉग पर इसको लेकर तीखी बहस हुई.

शिंदे को कहा गया कि वे कुछ ऐसा इशारा दें जिससे यह प्रचारित किया जा सके कि राखीगढ़ी के परिणाम यहां के वर्तमान निवासियों (मुख्य रूप से जाट, जो आर1ए स्टेपी प्रवाशियों के वंशज समझे जाते हैं) और उस प्राचीन शहर के निवासियों के बीच "संतति'' के संबंधों को इंगित करते हों.

इस उद्दंड दौर में इस पर शायद ही किसी को आश्चर्य हो कि प्राचीन इतिहास को लील जाने को आतुर इस गृहयुद्ध में, झूठी खबरों का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में किया जाएगा.

इस साल जनवरी में एक हिंदी अखबार ने नीरज राय से साक्षात्कार पर आधारित एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें कहा गया था कि राखीगढ़ी से प्राप्त डीएनए वास्तव में उत्तर भारतीय ब्राह्मणों के डीएनए से बहुत मिलता-जुलता है और इसके निष्कर्ष उस प्रचलित तथ्य को स्थापित करेंगे कि भारत ही इंडो-यूरोपीय भाषा बोलने वालों का "उद्गम स्थान'' था.

"सरासर बकवास!'' —हालिया बहस पर डेविड वेस्लोव्स्की की कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया थी. यूरोजीन्स ब्लॉग के होस्ट वेस्लोव्स्की को दुनिया के अग्रणी आनुवांशिकीविदों में शुमार किया जाता है. वेस्लोव्स्की की साइट पर इस बात को लेकर लगातार बहस हुई कि राखीगढ़ी से प्राप्त कंकाल का डीएनए आर1ए1 मार्कर ही निकलेगा.

यहां, आण्विक साक्ष्यों के उत्कृष्ट बिंदुओं पर विस्तृत और गूढ़ चर्चाओं को अक्सर "आप बेवकूफ हैं'' या "जब परिणाम सामने आएंगे तो आपको मनोचिकित्सक की जरूरत होगी'' जैसी टिप्पणियों के साथ खारिज कर दिया जाता था.

और अब तक जो कुछ छनकर बाहर आ रहा है, उससे तो यही लगता है कि वेस्लोव्स्की की वह भविष्यवाणी कि "हड़प्पावासियों में कोई आर1ए नहीं था बल्कि वे दक्षिण भारतीयों के करीब थे'' सही साबित होने वाली है.

वैज्ञानिक साक्ष्य हिंदुत्ववादी भावनाओं के आड़े आ रहे थे और इसीलिए इन कर्कश आक्षेपों और पत्रकारिता के जरिए भ्रम फैलाने की कोशिशें हो रही थीं ताकि मूल बातें दबाई जा सकें. "हिंदुत्ववादी इतिहास'' की गाथा की शुरुआत औपनिवेशिक पुरातत्व और भाषाविज्ञान की प्रारंभिक हिंदू राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया स्वरूप हुई थी जो "आर्य आक्रमण सिद्धांत'' को अस्वीकार करने के लिए उन्माद की हद तक चला जाता है.

यह शायद आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर की किताब बंच ऑफ थॉट्स (1966) के उस आक्रामक उद्धरण से प्रेरित है जिसमें गोलवलकर लिखते हैं, "यह धूर्त विदेशी अंग्रेजों द्वारा फैलाया गया कपटपूर्ण प्रचार था कि हम कभी भी एक राष्ट्र नहीं थे, हम कभी भी इस मिट्टी की संतान नहीं थे बल्कि हम भी बाहर से आए लोग ही हैं जिनका इस देश पर दावा, बाहर से आए मुट्ठीभर मुस्लिम या अंग्रेज आक्रमणकारियों से अधिक नहीं है.''

इसी विचार से प्रेरित लोगों ने हाल के वर्षों में ज्यादा आक्रामकता के साथ यह स्थापित करने की कोशिश की है कि सिंधु घाटी सभ्यता "वैदिक'' ही थी. हिंदुत्व के राजनैतिक उदय के साथ इस लोकप्रिय कल्पना ने भी अपनी जड़ें पहले से अधिक गहरी जमा लीं.

2013 में, "हिंदू फंतासी'' उपन्यासों के एक लेखक अमिश त्रिपाठी ने अपने एक लघु उपन्यास में "वैदिक सिंधु घाटी सभ्यता'' के लिए उत्सुक इच्छा को जन्म दिया जिसमें भविष्य के पुरातत्वविद् साक्ष्य की खोज में जाते हैं और अंततः उन्हें इस बात के ठोस प्रमाण मिलते हैं कि "सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक सभ्यता, जिसे गलती से आर्य सभ्यता कहा गया है, दोनों एक ही थे.'' इस मर्मस्पर्शी कल्पित कथा को शीर्षक दिया गया "वैदिक इतिहास का वैज्ञानिक प्रमाण''.

निस्संदेह 2014 के आम चुनावों में भाजपा के बहुमत वाली सरकार के आगमन से हिंदुत्ववादी इतिहास के आत्म-मुग्ध आग्रहों को नई ऊर्जा और फंड, दोनों प्राप्त हुए हैं. भारतीय इतिहास को फिर से लिखने के प्रोजेक्ट को बढ़ावा देने के अभियान की कमान केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने संभाली है.

इसके लिए उन्होंने हरसंभव प्रयास किए हैं चाहे वह भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् के अध्यक्ष के रूप में एक ढुलमुल रूढ़िवादी की नियुक्ति हो या फिर आई-सर्व (इंस्टीट्यूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च ऑन वेदाज) जैसे पैरा-साइंटिफिक संस्थानों के जरिए ऐसे "अनुसंधान'' को बढ़ावा देना, जिसमें एक पूर्व राजस्व अधिकारी शौकिया खगोल विज्ञान सॉफ्टवेयरों का उपयोग करके यह दावा करती हैं कि "इस प्रकार श्री राम का जन्म 10 जनवरी को 5114 ईसा पूर्व में... दोपहर के 12 से 1 बजे के बीच हुआ था (अयोध्या में).''

इस साल मार्च में रॉयटर ने जनवरी 2017 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक के कार्यालय में शर्मा द्वारा आयोजित "इतिहास समिति'' की एक बैठक के विवरण का खुलासा करती एक रिपोर्ट दी.

समिति के अध्यक्ष के.एन. दीक्षित के अनुसार इसे एक "ऐसी रिपोर्ट पेश करने का काम सौंपा गया जिसके आधार पर सरकार को प्राचीन इतिहास के कुछ पहलुओं को फिर से लिखने में मदद मिल सके.''

बैठक के विवरणों में दर्ज हुआ "समिति लक्ष्य निर्धारित करती है—पुरातात्विक खोजों और डीएनए जैसे प्रमाणों का उपयोग करते हुए यह साबित करना कि आज के हिंदू ही हजारों साल पहले इस भूमि से सीधे अवतीर्ण हुए और वे ही इसके मूल निवासी हैं, और यह स्थापित करना कि प्राचीन हिंदू ग्रंथ तथ्य आधारित हैं, कोई मिथक नहीं.''

लेकिन मुख्यधारा का विज्ञान दूसरी दिशा में आगे बढ़ रहा था. इस साल मार्च में, हार्वर्ड के जनसंख्या आनुवांशिकीविद् डेविड राइक ने अपने क्षेत्र में शोध की स्थिति की समीक्षा करती रिपोर्ट हू वी आर ऐंड हाउ वी गॉट हीअर प्रकाशित की जो बेस्टसेलर रही.

इसमें इस बात पर भी टिप्पणी थी कि अग्रणी भारतीय वैज्ञानिकों ने पूर्व के भारतीय साक्ष्यों के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता का परिचय देते हुए यह कह दिया कि उत्तर-पश्चिम से आए यूरेशियाई लोगों का इस महाद्वीप में प्रवास अत्यंत प्राचीन काल में हुआ. इसने 2008 में एक अहम वैज्ञानिक साझेदारी को करीब-करीब खत्म ही कर दिया था. राइक लिखते हैं कि भारतीय वैज्ञानिक लालजी सिंह और के. थंगराज ने कहा कि "प्रवासन का सुझाव...राजनैतिक रूप से विस्फोटक होगा.''

इस मुद्दे को अंततः चतुराई से शब्दों का जाल बुनते हुए "पैतृक दक्षिण भारतीय'' और "पैतृक उत्तर भारतीय'' नामकरण करके हल किया गया था. इसमें एक और चालाकी दिखाते हुए इस बात को छुपाने की कोशिश हुई कि उत्तर भारतीय में एक महत्वपूर्ण आनुवंशिक हिस्सा इस उपमहाद्वीप के बाहर के लोगों का था.

लेकिन ऐसा लगता है कि जो बात छुपाने की कोशिश हुई, वह इस साल उजागर हो जाएगी क्योंकि एक तरफ जहां राइक और उनकी टीम द्वारा हार्वर्ड में तैयार एक शोधपत्र में यह तथ्य उभरकर आने की उम्मीद है, वहीं दूसरी तरफ राखीगढ़ी परियोजना का नेतृत्व करने वाले वैज्ञानिकों का निष्कर्ष भी कुछ ऐसा ही है.

जेनेटिक फॉर्मेशन ऑफ साउथ ऐंड सेंट्रल एशिया जैसे सपाट शीर्षक वाले इस शोधपत्र (आमतौर पर संक्षेप में श्एम नरसिम्हन एट अल्य द्वारा संदर्भित) के "प्रकाशन पूर्व'' प्रारूप को अप्रैल में सार्वजनिक किया गया.

यह रिपोर्ट भारतीय प्रेस की सुर्खियां बनेगी और सोशल मीडिया में तो हंगामा मचेगा ही, साथ ही कुछ और खुलासे होंगे जो यह बताएंगे कि प्राचीन भारतीय इतिहास में नस्ल निर्धारण के शोधकार्य को प्रभावित करने के लिए आज किस तरह का राजनैतिक दबाव बनाया जा रहा है. शिंदे ने कहा कि उन्होंने राइक से उनके पत्र के पहले मसौदे को लेकर जोर दिया था कि दक्षिण एशिया में श्प्रवास्य के संदर्भ से बचा जाना चाहिए.

या यूं कहें कि उन्होंने सुझाव दिया कि कुछ स्पष्ट कहने की बजाए बीच का रास्ता निकालते हुए अधिक महत्वाकांक्षी शब्द "इंटरैक्शन'' या पारस्परिक प्रभाव शब्द का इस्तेमाल किया जाए. इसी कारण शिंदे ने राइक को राखीगढ़ी के नमूनों तक पहुंचने के रास्ते में बहुत अड़ंगे खड़े किए, जबकिराइक उस पर गंभीरता से काम करने के इच्छुक थे.

ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि यह एक बड़ा खतरा होता और वास्तव में शोधपत्र से "प्रवास'' शब्द तो गायब दिखता है. फिर भी, अंततरू इसमें हड़प्पा के बाद "मिडिल टू लेट ब्रॉन्ज एज'' में भारतीय जीन पूल पर स्टेपी से आए लोगों का प्रभाव दर्शाने वाले ज्यादा प्रभावशाली तर्क दिए गए हैं.

बहरहाल, लगता है कि शोधपत्र के प्रकाशन की टाइमिंग भी बहुत चतुराई से तय की गई है. इस तथ्य के बावजूद कि इसके सह-लेखकों में राय, शिंदे, थंगराज, नरसिंहन शामिल हैं, इस रहस्यमयी देर के साथ आखिरकार जारी किए जा रहे पेपर का श्रेय राइक को जाता है.

इस लेखक के साथ हालिया बातचीत में, शिंदे ने अपनी टीम के पेपर के नतीजों को छुपाने का इरादा दर्शाया था और घुमा-फिराकर यह बताने की कोशिश करते रहे कि जो परिणाम सामने आए, वे बताते हैं कि राखीगढ़ी के निवासी "स्थानीय लोगों की तरह ही थे... उनका दक्षिण भारतीय जनजातियों के साथ कुछ संपर्क भी हुआ था.''

एक पत्रिका को दिए हालिया साक्षात्कार में, शिंदे विचित्र रूप से यकीन के साथ यह बता गए कि राखीगढ़ी के प्राचीन लोग "आधुनिक हरियाणवियों जैसे लंबे और तीखे नैन-नक्श वाले'' थे. शिंदे ने राखीगढ़ी के एक प्रमुख स्थानीय इतिहासकार वजीर चंद सरावे के उपनाम का हवाला देते हुए बताया कि यह दलित समुदाय का उपनाम है लेकिन यह 'सिरोही जाट' से मिलता-जुलता है.

यहां उल्लेखनीय है कि जहां नरसिंहन एवं अन्य ने सिंधु घाटी सभ्यता की साइट पर पाए गए प्राचीन मानव अवशेषों के डीएनए का प्रयोग करते हुए हड़प्पाई जीनोम के उस मॉडल का पता लगाया था जो सिंधु घाटी के "आगंतुकों'' का था और जिनका हड़प्पावासियों के साथ व्यापारिक संपर्क था.

यह संपर्क हड़प्पा के बाद (1200 ईसा पूर्व-1 ईस्वी) स्वात में रहने वाले लोगों के साथ भी बना रहा. राखीगढ़ी पेपर कहता है कि यह मॉडल सटीक था. इस मॉडल के लिए नरसिंहन के पेपर का संभावित लेबल "सिंधु घाटी परिधि'' राखीगढ़ी के आइ4411 के लिए महत्वपूर्ण मिलान है और इस आनुवंशिक समूह को अब "हड़प्पाई क्लाइन'' के रूप में पहचाना जाना चाहिए.

उलझन अब भी  

राखीगढ़ी अध्ययन के परिणाम के सार्वजनिक डोमेन में तेजी से लीक होने के परिणामस्वरूप, एक राजनैतिक प्रतिक्रिया अनिवार्य दिखती है—और वह कैसी होगी इसका अनुमान लगाया जा सकता है—द्रविड़वादियों और हिंदू विरोधी भारतीयों की फौज में विजयोल्लास दिखेगा जिनमें से कई 2014 के चुनाव में दिल्ली के पतन को उस "वैदिक आर्य आक्रमण'' की कथा की दुखद पुनरावृत्ति के रूप में देखेंगे. और हम भगवा दक्षिणपंथियों से उम्मीद कर सकते हैं कि वे अविश्वास जताते रहेंगे. दिलचस्प बात यह है कि राखीगढ़ी परियोजना के प्रति मजबूत संदेह एक अप्रत्याशित हलके से उठ रहा है.

प्राचीन भारतीय इतिहासकार रोमिला थापर ने इस नए विज्ञान को लेकर अपना संदेह व्यक्त किया है. जैसा कि सामने आ रहे राखीगढ़ी अनुसंधान में एक आरंभिक समस्या थी—और शुरुआती आंकड़ों में एक भ्रामक "पूर्वी एशियाई'' संकेत ही वह कारण है जिसकी वजह से अंतिम पत्र में उन कोरियाई वैज्ञानिकों को श्रेय नहीं दिया गया है जिन्होंने सबसे पहले इन नमूनों पर काम किया था.

इस बीच, एक अन्य सम्मानित इतिहासकार, नयनजोत लाहिड़ी कहती हैं, "जब तक हड़प्पाकालीन लिपि को पढ़ नहीं लिया जाता, सिंधु घाटी सभ्यता में आर्यों और वैदिक घटक पर आखिरी नतीजा नहीं निकाला जा सकता.''

यानी अभी भी बहुत काम किया जाना बाकी है. असल में एक प्राचीन सभ्यता को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की जल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए या उस सभ्यता पर आधुनिक कल्पनाओं को थोपने की कोशिश से बचना चाहिए. भारत में "उदारवादी'' कल्पना की भी बीमारी उतनी ही गहरी है जितनी "हिंदुत्ववादी'' कल्पना की.

भारत एक खोज में जवाहरलाल नेहरू भी मोएनजो-दड़ो की बात करते समय धर्मनिरपेक्षता के अपने अतिउत्साह को काबू में नहीं रख पाए. उन्होंने लिखा है, "इस शक्ति का रहस्य क्या था? यह कहां से आया? यह काफी आश्चर्यजनक था कि वहां धार्मिक तत्व विद्यमान होने के बावजूद वह हावी नहीं था और सभ्यता मुख्य रूप से धर्मनिरपेक्ष थी.''

आखिरकार, नेहरू की दृष्टि भी एक आधुनिक राष्ट्रवादी कल्पना ही है. आने वाले वर्षों में हमें विश्वास है कि हम हड़प्पा की रहस्यमय सभ्यता और उनके जीन के साथ-साथ संस्कृति और सामाजिक व्यवहार के तत्वों के बारे में और अधिक जान सकेंगे. अभी के लिए तो चमत्कारिक रूप से, उनके कान बोल रहे हैं. अच्छा होगा कि हम थोड़ी देर चुपचाप सुनते रहें.

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