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आवरण कथा- गरीबी हटाओ 2.0

 सबसे गरीब लोगों को न्यूनतम आमदनी मुहैया कराने के राहुल गांधी के वादे से भाजपा में भारी खलबली, 3.6 लाख करोड़ रु. की योजना कांग्रेस का तुरुप साबित होगी या फुस्स हो जाएगी?

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर 02 April 2019
आवरण कथा- गरीबी हटाओ 2.0 राहुल गांधी

वह 2016 की सर्दियों की ठिठुरन भरी शाम थी. पूरा देश नोटबंदी पर बहस में उलझा था, और चुनावी लिहाज से देश का सबसे अहम राज्य उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए कमर कस रहा था, जो कुछ ही महीनों बाद होने वाले थे. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राज्य के दौरे से अभी-अभी लौटे थे और नरेंद्र मोदी सरकार के दो सबसे बड़े नोटों का प्रचलन बंद करने के फैसले से ''लोगों की तकलीफें देखकर" आहत थे. उन्होंने अपनी पार्टी के कुछ शीर्ष नेताओं से पूछा कि देश के गरीब लोगों को न्यूनतम आमदनी मुहैया कराने के लिए सीधे नकद रुपया हस्तांतरण योजना पर उनकी राय क्या है और यह कितनी कारगर और व्यावहारिक होगी.

अब तकरीबन दो साल बाद कांग्रेस ने न सिर्फ इस विचार को कागज पर उतार लिया है, बल्कि इसे 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले अपने सबसे बड़े वादे के तौर पर पेश कर दिया है. 25 मार्च को राहुल ने ऐलान किया कि अगर केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी तो देश के 20 फीसदी सबसे गरीब परिवारों को सालाना 72,000 रु. या हर महीने 6,000 रु. बिना शर्त मुहैया कराया जाएगा. उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस की न्यूनतम आय योजना (न्याय) का फायदा 5 करोड़ परिवारों या तकरीबन 25 करोड़ लोगों (प्रति परिवार 5 लोग मानकर) को मिलेगा.

इस योजना के विशाल पैमाने को देखते हुए इसे अब तक घोषित इस किस्म की योजनाओं में सबसे महत्वाकांक्षी और व्यापक सामाजिक कल्याण कार्यक्रम कहा जा सकता है—भले ही यह अभी चुनाव घोषणा-पत्र का हिस्सा हो. सीधे-सादे गणित के हिसाब से चलें, तो इससे सरकारी खजाने पर 3.6 लाख करोड़ रु. का बोझ बढ़ जाएगा, जो हिंदुस्तान के जीडीपी का 1.8 फीसद होता है. मतदान के पहले चरण से महज 17 दिन पहले घोषित 'न्याय' योजना चुनावों में गेमचेंजर साबित हो सकती है. राहुल ने 'अफसाने पर पकड़ मजबूत करने' की जद्दोजहद में यह दौर जीत लिया है.

 पिछले दिसंबर में कांग्रेस ने हिंदी पट्टी के तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा को धूल चटा दी थी. इस जीत से उत्साहित पार्टी ने बेरोजगारी और कृषि संकट के मुद्दों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपने हमलों को और पैना कर दिया और केंद्र सरकार को और ज्यादा लोकलुभावन आर्थिक योजनाएं लेकर आने के लिए मजबूर कर दिया था.

इसी के चलते उसने ऊंची जातियों के गरीबों को नौकरी और पढ़ाई में 10 फीसदी आरक्षण और प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत छोटे तथा सीमांत किसानों को हर साल 6,000 रु. मुहैया कराने सरीखी घोषणाएं करनी पड़ी थीं. फिर, पुलवामा की घटना घटी.

14 फरवरी को फिदायीन आतंकी हमले में अर्धसैनिक बलों के 40 जवानों की मौत और उसके बाद पाकिस्तान के बालाकोट में हिंदुस्तान के हवाई हमले ने देश का मिजाज बदल दिया. सार्वजनिक चर्चा देशभक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा की ओर मुड़ गई, जिससे मोदी को एक बार फिर बढ़त हासिल हो गई.

जब भाजपा बालाकोट हमले को लेकर वोट आकर्षित करने की कोशिश करने लगी, तो कांग्रेस ने अपनी ही किस्म की सर्जिकल स्ट्राइक कर दी और अफसाने को बदल दिया.

चुनाव में इसकी स्थिति को लेकर दुराव-छिपाव की कोई कोशिश भी नहीं है. जैसा कि राहुल कहते हैं, ''धमाका है यह, बम फटेगा. यह कांग्रेस की गरीबी के ऊपर सर्जिकल स्ट्राइक है. उन्होंने (भाजपा) गरीबों को खत्म करने का काम किया, हम गरीबी को खत्म करेंगे." उनके साथी इस ऐलान को लेकर स्वाभाविक ही जोश और उम्मीद से भरे हैं. राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट कहते हैं, ''राहुल गांधी असरदार ढंग से यह मुद्दा लेकर आए और बालाकोट के हवाई हमले की जगह इसे सार्वजनिक चर्चा का विषय बना दिया."

भाजपा इस योजना के सियासी मायने समझती है और उसने बगैर वक्त गंवाए इसके खिलाफ एकजुट मुहिम छेड़ दी. भाजपा के नेता इस संदेश को बढ़ा-चढ़ाकर पहुंचाने की पूरी जद्दोजहद कर रहे हैं कि कांग्रेस के पास 'न्याय' को लागू करने की न तो काबिलियत है और न मंशा और यह भी कि राहुल की योजना गरीबों के लिए जो वादा करती है, उससे ज्यादा तो मोदी सरकार पहले ही दे चुकी है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस ऐलान को 'झांसा' करार दिया और कहा कि गरीबों के लिए 5.34 लाख करोड़ रु. की योजनाएं तो पहले से ही चल रही हैं. वे कहते हैं, ''पंजाब, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में किसानों की कर्जमाफी का वादा तो कांग्रेस ने पूरा किया नहीं है और इस तरह साबित हो गया है कि कांग्रेस झांसा देने में उस्ताद है."

पार्टियां प्रभावित नहीं

यहां तक कि कुछ भाजपा-विरोधी पार्टियों ने भी राहुल की महत्वाकांक्षी योजना को चुनावी हथकंडा बताकर इसकी तीखी आलोचना की है. तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौगत रॉय कहते हैं, ''इसे चुनावी वादे की तरह ही लेना चाहिए. मुझे नहीं लगता कि यह चुनावी मुद्दा बनने वाला है." बीजू जनता दल के नेता कलिकेश सिंहदेव मानते हैं कि यह अच्छा विचार है, पर इसके लागू होने पर शक जाहिर करते हैं. वे कहते हैं, ''कांग्रेस इस बात पर खामोश है कि इसे लागू कैसे किया जाएगा. लोगों को बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता. इसलिए भी कि लोगों के बीच कांग्रेस की विश्वसनीयता कम है."

जनता दल (यूनाइटेड) के महासचिव के.सी. त्यागी का दावा है कि वोटिंग पैटर्न को कल्याणकारी योजनाओं के साथ जोड़ पाना मुश्किल है. वे कहते हैं, ''मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) को असरदार तरीके से लागू करने के बावजूद 2009 में कांग्रेस को आर्थिक तौर पर कमजोर तबकों के महज 27 फीसदी वोट ही मिले थे."

भाजपा के आइटी सेल के मुखिया अमित मालवीय कांग्रेस के पिछले बड़े वादों का हवाला देते हैं जो वोटरों को लुभा नहीं सके थे. मालवीय कहते हैं, ''2014 के लोकसभा चुनाव अभियान में कांग्रेस ने खाद्य सुरक्षा विधेयक की बात की थी. मतदाताओं में वह अनुकूल माहौल पैदा नहीं कर पाया था."

भाजपा ऊपरी और सार्वजनिक तौर पर चाहे जो कहे, लेकिन उसके लिए चिंता की वाजिब वजह है. राजनैतिक पंडितों का पक्के तौर पर मानना है कि दिसंबर के विधानसभा चुनावों में किसानों की कर्जमाफी के वादे ने कांग्रेस की संभावनाओं को अच्छा-खासा बढ़ाया था. भाजपा की ग्रामीण सीटों में मध्य प्रदेश में 31 फीसद, राजस्थान में 57 फीसद और छत्तीसगढ़ में 68 फीसद कमी आई थी.

हिंदुस्तान में लोकसभा के जिन 513 निर्वाचन क्षेत्रों का 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर वर्गीकरण किया गया था, उनमें से कम से कम 290 ग्रामीण और 131 अर्ध-ग्रामीण क्षेत्र हैं.

ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र वे हैं, जहां शहरी आबादी 25 फीसदी से कम है, जबकि अर्ध-ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र वे हैं जहां शहरी आबादी 25 फीसद से ज्यादा मगर 50 फीसद से कम है.

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 156 ग्रामीण और 69 अर्ध-ग्रामीण सीटें जीती थीं. दूसरे लफ्जों में उसकी जीती 282 सीटों में 80 फीसद ग्रामीण और अर्ध-ग्रामीण इलाकों से आई थीं.

जहां तक कांग्रेस की बात है, तो उसकी कुल 44 सीटों में 32—यानी 73 फीसदी—ऐसे ही इलाकों से आई थीं. लोकसभा सीटों की तादाद के लिहाज शीर्ष पांच में से तीन राज्यों में, बहुत बड़ा हिस्सा ग्रामीण और अर्ध-ग्रामीण सीटों का है—उत्तर प्रदेश में 80 में से 74, महाराष्ट्र में 48 में से 33, पश्चिम बंगाल में 42 में से 32, बिहार में 40 में से 39 और तमिलनाडु में 39 में से 23. भाजपा की मुश्किलों में इससे इजाफा हो सकता है कि 'न्याय' का दायरा केवल ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं है, जैसा कि मनरेगा और किसानों की कर्जमाफी का है.

लुभावना सपना?

अलबत्ता महज वादा कांग्रेस के लिए आसान कामयाबी का भरोसा नहीं दे सकता. व्यावहारिक बात तो यह है कि कांग्रेस भाजपा और उसके राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगी दलों को कुल जमा 14 राज्यों की 208 लोकसभा सीटों पर ही तगड़ी टक्कर देने की उक्वमीद कर सकती है (देखें, क्या कांग्रेस को न्याय से लाभ मिलेगा?), जहां वह या तो खुद अपने दम पर भाजपा से लोहा ले रही है या अपने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के घटक दलों के समर्थन से लड़ रही है.

2014 में कांग्रेस ने इनमें से महज 30 सीटें जीती थीं. पार्टी के लिए चुनौती यह है कि वह इस संदेश को बिल्कुल आखिरी वोटर तक पहुंचाए. हालांकि कांग्रेस के ही कई अंदरूनी सूत्र इन 14 में से कुछ राज्यों में न्याय के असर को लेकर अनिश्चित हैं. मसलन, चुनावी लिहाज से अहम गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बीपीएल (गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाली) आबादी राष्ट्रीय औसत (2011-12 में 22 फीसदी) से भी कम है. पंजाब राज्य किसान आयोग के अध्यक्ष अजय वीर जाखड़ कहते हैं, ''क्या पार्टी न्याय योजना को लोगों के गले उतार सकती है? क्या वह इससे तय लाभार्थियों यानी 20 फीसदी सबसे ज्यादा गरीब लोगों को यकीन दिला सकती है? दरअसल, यही कांग्रेस के लिए  सबसे बड़ी चुनौती है."

भोपाल स्थित राजनैतिक विश्लेषक अचल सिंह कहते हैं कि आखिर में सब कुछ उम्मीदवार की काबिलियत पर निर्भर करेगा कि वह न्याय योजना पर लोगों को किस कदर यकीन दिला  पाता है.

वे कहते हैं, ''संगठन में गहरी पैठ रखने वाले उम्मीदवार ही जनता को इस रकम के भुगतान की योजना बता पाएंगे और इसका सियासी फायदा उठा पाएंगे." वे यह भी कहते हैं कि कांग्रेस ने किसान कर्जमाफी और खरीद बोनस की जो घोषणाएं की थीं, उनका छत्तीसगढ़ में बेहतर असर इसलिए दिखाई पड़ा क्योंकि पार्टी की राज्य इकाई मध्य प्रदेश और राजस्थान की राज्य इकाइयों की बनिस्बत कहीं ज्यादा असरदार ढंग से उसे लोगों तक पहुंचा सकी.

चुनाव विश्लेषक और विकासशील समाज अध्ययन केंद्र के अध्यक्ष संजय कुमार न्याय को चुनाव जिताऊ नारे में बदलने की कांग्रेस की क्षमता पर शक जाहिर करते हैं. संजय कुमार कहते हैं, ''अगर कांग्रेस कम से कम 150 सीटों के साथ मुकाबले में उतर रही होती, तो इस संदेश के पहुंचने की वाकई अधिक संभावना होती. मगर 2014 में महज 45 सीटें जीतने वाली कांग्रेस केलिए 2019 में की जीत की संभावना अधिक नहीं बनती."

अलबत्ता सी-वोटर के संस्थापक यशवंत देशमुख पक्के तौर पर मानते हैं कि न्यूनतम आय गारंटी का राहुल का वादा इस चुनाव में उथल-पुथल मचाने वाली जबरदस्त रणनीति के तौर पर काम कर सकता है. देशमुख कहते हैं, ''कांग्रेस समझती है कि वह जीतने की हालत में नहीं है और दरअसल राष्ट्रीय अफसाना उसके हाथों से फिसल चुका है. इसलिए यह मुकम्मल उथल-पुथल मचाने वाली रणनीति हो सकती है क्योंकि उसे यह वादा पूरा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी."

यह ऐलान जिस वक्त किया गया है, उसने भी कई संभावित लाभार्थियों के मन में शक-शुबहा पैदा कर दिया है. महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के जरूर गांव के खेतिहर मजदूर 49 वर्षीय मोरेश्वर वाटिले कहते हैं, ''यह योजना और कुछ नहीं महज चुनावी वादा है. मुझे नहीं लगता कि हमें कभी भी यह रकम मिलेगी." छह सदस्यों का उनका परिवार चुनावी वादों से आजिज आ चुका है. वे कहते हैं, ''मेरा बेटा भू-विज्ञान में ग्रेजुएट है और मेरी बेटी बायोलॉजी पढ़ रही है.

मुझे उनसे उम्मीद है, न कि राजनेताओं से." राज्य के अमरावती जिले के जलगांव अर्वी गांव के 28 वर्षीय श्रीकांत चौधरी भी इस योजना में कम ही भरोसा करते हैं, जिनके छह लोगों के परिवार में उनके माता-पिता और कॉलेज जाने वाला छोटा भाई भी है. वे सवाल करते हैं, ''राहुल गांधी लाखों लोगों को 6,000 रु. महीना भला कैसे देंगे? क्या वे और ज्यादा नोट छापने की योजना बना रहे हैं?"

उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद के फजलगढ़ गांव की सुमन प्रजापति को लगता है कि बेहतरीन इरादों के बावजूद इस योजना को भ्रष्टाचार और लालफीताशाही से नहीं बचाया जा सकेगा. 45 बरस की इस विधवा के पास बीपीएल कार्ड तो है पर उन्हें कभी किसी सरकारी योजना का फायदा नहीं मिला. वे कहती हैं, ''गरीबों के लिए शुरू की गई दूसरी योजनाओं की तरह 'न्याय' योजना भी सरकारी मशीनरी को भ्रष्टाचार का एक और बहाना दे देगी."

मगर आशावादी भी हैं. बिहार के नवादा जिले के नरदीडीह गांव के 55 वर्षीय सीमांत किसान उमेश पासवान को भरोसा है कि 'न्याय' योजना उनके चार लोगों के परिवार को रुपए-पैसे से सुरक्षित करेगी और उनके पोते के लिए अच्छी तालीम पक्का करेगी. वे कहते हैं, ''हालांकि इस योजना के ऐलान के वक्त से शक पैदा होता है, लेकिन राहुल गांधी ने अगर इस योजना को पूरा करने का वादा किया है तो मैं कांग्रेस को वोट दूंगा."

महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में पंधारकवड़ा गांव के 31 वर्षीय बबलू धुर्वे ट्रकों पर रेत लादकर रोज 100 रुपए कमाते हैं. वे कहते हैं, ''यह योजना बहुत अच्छी है. मैं कांग्रेस को वोट दूंगा."

जब यूपीए 2009 में मनरेगा और किसान कर्जमाफी की कामयाबी के दम पर दोबारा सत्ता में आया था, कांग्रेस ने अविभाजित आंध्र प्रदेश से 33 और उत्तर प्रदेश से 21 सीटें जीती थीं. 2019 में पार्टी आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कहीं कमजोर मैदान पर खेल रही है. उत्तर प्रदेश में अभी इस बात का फैसला होना है कि कांग्रेस की तकदीर पर प्रियंका गांधी का कितना असर पड़ेगा या नहीं पड़ेगा.

उनके चुनाव अभियान के कार्यक्रम में भी कई उतार-चढ़ाव आए हैं. 14 फरवरी को लखनऊ में प्रियंका की पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस पुलवामा आतंकी हमले की वजह से रद्द करनी पड़ी थी. उन्होंने अपना पहला सार्वजनिक भाषण आखिरकार 12 मार्च को दिया, वह भी मोदी के गृहराज्य गुजरात में. वह भी तब जब चुनाव से पहले एक पूरा महीना प्रियंका की तरफ से एक भी सार्वजनिक बयान—या यहां तक कि एक ट्वीट—के बगैर गंवाया जा चुका था.

उत्तर प्रदेश के एक बड़े कांग्रेस नेता कहते हैं, ''राजनीति में प्रियंका के आगमन ने पार्टी के कार्यकर्ताओं में बहुत ज्यादा उत्साह पैदा कर दिया था. मगर वह फीका पड़ गया क्योंकि उन्होंने लखनऊ से बाहर निकलने की हिम्मत ही नहीं की. बड़ी लड़ाई के लिए जमीनी कार्यकर्ताओं को संगठित और प्रेरित करने की गरज से वाराणसी में नाव की सवारी भी बहुत देर से हुई."

लोकसभा की कुल 120 सीटें देने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार में 'न्याय' को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि से मुकाबला करना पड़ेगा, जो पहले ही शुरू की जा चुकी है. देश में ग्रामीण सीटों की एक-तिहाई सीटें और प्रधानमंत्री किसान सक्वमान निधि के कुल लाभार्थियों में से एक-चौथाई इन्हीं दो राज्यों से आते हैं. 'न्याय' फिलहाल जहां वादा भर है, वहीं मोदी सरकार ने 11 मार्च तक इस योजना के तहत 5,215 करोड़ रुपए 2.6 करोड़ किसानों के खातों में जमा भी कर दिए हैं.

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