एडवांस्ड सर्च

आवरण कथा- गरीबी हटाओ 2.0

 सबसे गरीब लोगों को न्यूनतम आमदनी मुहैया कराने के राहुल गांधी के वादे से भाजपा में भारी खलबली, 3.6 लाख करोड़ रु. की योजना कांग्रेस का तुरुप साबित होगी या फुस्स हो जाएगी?

Advertisement
कौशिक डेका 02 April 2019
आवरण कथा- गरीबी हटाओ 2.0 राहुल गांधी

वह 2016 की सर्दियों की ठिठुरन भरी शाम थी. पूरा देश नोटबंदी पर बहस में उलझा था, और चुनावी लिहाज से देश का सबसे अहम राज्य उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए कमर कस रहा था, जो कुछ ही महीनों बाद होने वाले थे. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राज्य के दौरे से अभी-अभी लौटे थे और नरेंद्र मोदी सरकार के दो सबसे बड़े नोटों का प्रचलन बंद करने के फैसले से ''लोगों की तकलीफें देखकर" आहत थे. उन्होंने अपनी पार्टी के कुछ शीर्ष नेताओं से पूछा कि देश के गरीब लोगों को न्यूनतम आमदनी मुहैया कराने के लिए सीधे नकद रुपया हस्तांतरण योजना पर उनकी राय क्या है और यह कितनी कारगर और व्यावहारिक होगी.

अब तकरीबन दो साल बाद कांग्रेस ने न सिर्फ इस विचार को कागज पर उतार लिया है, बल्कि इसे 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले अपने सबसे बड़े वादे के तौर पर पेश कर दिया है. 25 मार्च को राहुल ने ऐलान किया कि अगर केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी तो देश के 20 फीसदी सबसे गरीब परिवारों को सालाना 72,000 रु. या हर महीने 6,000 रु. बिना शर्त मुहैया कराया जाएगा. उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस की न्यूनतम आय योजना (न्याय) का फायदा 5 करोड़ परिवारों या तकरीबन 25 करोड़ लोगों (प्रति परिवार 5 लोग मानकर) को मिलेगा.

इस योजना के विशाल पैमाने को देखते हुए इसे अब तक घोषित इस किस्म की योजनाओं में सबसे महत्वाकांक्षी और व्यापक सामाजिक कल्याण कार्यक्रम कहा जा सकता है—भले ही यह अभी चुनाव घोषणा-पत्र का हिस्सा हो. सीधे-सादे गणित के हिसाब से चलें, तो इससे सरकारी खजाने पर 3.6 लाख करोड़ रु. का बोझ बढ़ जाएगा, जो हिंदुस्तान के जीडीपी का 1.8 फीसद होता है. मतदान के पहले चरण से महज 17 दिन पहले घोषित 'न्याय' योजना चुनावों में गेमचेंजर साबित हो सकती है. राहुल ने 'अफसाने पर पकड़ मजबूत करने' की जद्दोजहद में यह दौर जीत लिया है.

 पिछले दिसंबर में कांग्रेस ने हिंदी पट्टी के तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा को धूल चटा दी थी. इस जीत से उत्साहित पार्टी ने बेरोजगारी और कृषि संकट के मुद्दों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपने हमलों को और पैना कर दिया और केंद्र सरकार को और ज्यादा लोकलुभावन आर्थिक योजनाएं लेकर आने के लिए मजबूर कर दिया था.

इसी के चलते उसने ऊंची जातियों के गरीबों को नौकरी और पढ़ाई में 10 फीसदी आरक्षण और प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत छोटे तथा सीमांत किसानों को हर साल 6,000 रु. मुहैया कराने सरीखी घोषणाएं करनी पड़ी थीं. फिर, पुलवामा की घटना घटी.

14 फरवरी को फिदायीन आतंकी हमले में अर्धसैनिक बलों के 40 जवानों की मौत और उसके बाद पाकिस्तान के बालाकोट में हिंदुस्तान के हवाई हमले ने देश का मिजाज बदल दिया. सार्वजनिक चर्चा देशभक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा की ओर मुड़ गई, जिससे मोदी को एक बार फिर बढ़त हासिल हो गई.

जब भाजपा बालाकोट हमले को लेकर वोट आकर्षित करने की कोशिश करने लगी, तो कांग्रेस ने अपनी ही किस्म की सर्जिकल स्ट्राइक कर दी और अफसाने को बदल दिया.

चुनाव में इसकी स्थिति को लेकर दुराव-छिपाव की कोई कोशिश भी नहीं है. जैसा कि राहुल कहते हैं, ''धमाका है यह, बम फटेगा. यह कांग्रेस की गरीबी के ऊपर सर्जिकल स्ट्राइक है. उन्होंने (भाजपा) गरीबों को खत्म करने का काम किया, हम गरीबी को खत्म करेंगे." उनके साथी इस ऐलान को लेकर स्वाभाविक ही जोश और उम्मीद से भरे हैं. राजस्थान के उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट कहते हैं, ''राहुल गांधी असरदार ढंग से यह मुद्दा लेकर आए और बालाकोट के हवाई हमले की जगह इसे सार्वजनिक चर्चा का विषय बना दिया."

भाजपा इस योजना के सियासी मायने समझती है और उसने बगैर वक्त गंवाए इसके खिलाफ एकजुट मुहिम छेड़ दी. भाजपा के नेता इस संदेश को बढ़ा-चढ़ाकर पहुंचाने की पूरी जद्दोजहद कर रहे हैं कि कांग्रेस के पास 'न्याय' को लागू करने की न तो काबिलियत है और न मंशा और यह भी कि राहुल की योजना गरीबों के लिए जो वादा करती है, उससे ज्यादा तो मोदी सरकार पहले ही दे चुकी है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस ऐलान को 'झांसा' करार दिया और कहा कि गरीबों के लिए 5.34 लाख करोड़ रु. की योजनाएं तो पहले से ही चल रही हैं. वे कहते हैं, ''पंजाब, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में किसानों की कर्जमाफी का वादा तो कांग्रेस ने पूरा किया नहीं है और इस तरह साबित हो गया है कि कांग्रेस झांसा देने में उस्ताद है."

पार्टियां प्रभावित नहीं

यहां तक कि कुछ भाजपा-विरोधी पार्टियों ने भी राहुल की महत्वाकांक्षी योजना को चुनावी हथकंडा बताकर इसकी तीखी आलोचना की है. तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौगत रॉय कहते हैं, ''इसे चुनावी वादे की तरह ही लेना चाहिए. मुझे नहीं लगता कि यह चुनावी मुद्दा बनने वाला है." बीजू जनता दल के नेता कलिकेश सिंहदेव मानते हैं कि यह अच्छा विचार है, पर इसके लागू होने पर शक जाहिर करते हैं. वे कहते हैं, ''कांग्रेस इस बात पर खामोश है कि इसे लागू कैसे किया जाएगा. लोगों को बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता. इसलिए भी कि लोगों के बीच कांग्रेस की विश्वसनीयता कम है."

जनता दल (यूनाइटेड) के महासचिव के.सी. त्यागी का दावा है कि वोटिंग पैटर्न को कल्याणकारी योजनाओं के साथ जोड़ पाना मुश्किल है. वे कहते हैं, ''मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) को असरदार तरीके से लागू करने के बावजूद 2009 में कांग्रेस को आर्थिक तौर पर कमजोर तबकों के महज 27 फीसदी वोट ही मिले थे."

भाजपा के आइटी सेल के मुखिया अमित मालवीय कांग्रेस के पिछले बड़े वादों का हवाला देते हैं जो वोटरों को लुभा नहीं सके थे. मालवीय कहते हैं, ''2014 के लोकसभा चुनाव अभियान में कांग्रेस ने खाद्य सुरक्षा विधेयक की बात की थी. मतदाताओं में वह अनुकूल माहौल पैदा नहीं कर पाया था."

भाजपा ऊपरी और सार्वजनिक तौर पर चाहे जो कहे, लेकिन उसके लिए चिंता की वाजिब वजह है. राजनैतिक पंडितों का पक्के तौर पर मानना है कि दिसंबर के विधानसभा चुनावों में किसानों की कर्जमाफी के वादे ने कांग्रेस की संभावनाओं को अच्छा-खासा बढ़ाया था. भाजपा की ग्रामीण सीटों में मध्य प्रदेश में 31 फीसद, राजस्थान में 57 फीसद और छत्तीसगढ़ में 68 फीसद कमी आई थी.

हिंदुस्तान में लोकसभा के जिन 513 निर्वाचन क्षेत्रों का 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर वर्गीकरण किया गया था, उनमें से कम से कम 290 ग्रामीण और 131 अर्ध-ग्रामीण क्षेत्र हैं.

ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र वे हैं, जहां शहरी आबादी 25 फीसदी से कम है, जबकि अर्ध-ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र वे हैं जहां शहरी आबादी 25 फीसद से ज्यादा मगर 50 फीसद से कम है.

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 156 ग्रामीण और 69 अर्ध-ग्रामीण सीटें जीती थीं. दूसरे लफ्जों में उसकी जीती 282 सीटों में 80 फीसद ग्रामीण और अर्ध-ग्रामीण इलाकों से आई थीं.

जहां तक कांग्रेस की बात है, तो उसकी कुल 44 सीटों में 32—यानी 73 फीसदी—ऐसे ही इलाकों से आई थीं. लोकसभा सीटों की तादाद के लिहाज शीर्ष पांच में से तीन राज्यों में, बहुत बड़ा हिस्सा ग्रामीण और अर्ध-ग्रामीण सीटों का है—उत्तर प्रदेश में 80 में से 74, महाराष्ट्र में 48 में से 33, पश्चिम बंगाल में 42 में से 32, बिहार में 40 में से 39 और तमिलनाडु में 39 में से 23. भाजपा की मुश्किलों में इससे इजाफा हो सकता है कि 'न्याय' का दायरा केवल ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं है, जैसा कि मनरेगा और किसानों की कर्जमाफी का है.

लुभावना सपना?

अलबत्ता महज वादा कांग्रेस के लिए आसान कामयाबी का भरोसा नहीं दे सकता. व्यावहारिक बात तो यह है कि कांग्रेस भाजपा और उसके राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगी दलों को कुल जमा 14 राज्यों की 208 लोकसभा सीटों पर ही तगड़ी टक्कर देने की उक्वमीद कर सकती है (देखें, क्या कांग्रेस को न्याय से लाभ मिलेगा?), जहां वह या तो खुद अपने दम पर भाजपा से लोहा ले रही है या अपने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के घटक दलों के समर्थन से लड़ रही है.

2014 में कांग्रेस ने इनमें से महज 30 सीटें जीती थीं. पार्टी के लिए चुनौती यह है कि वह इस संदेश को बिल्कुल आखिरी वोटर तक पहुंचाए. हालांकि कांग्रेस के ही कई अंदरूनी सूत्र इन 14 में से कुछ राज्यों में न्याय के असर को लेकर अनिश्चित हैं. मसलन, चुनावी लिहाज से अहम गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बीपीएल (गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाली) आबादी राष्ट्रीय औसत (2011-12 में 22 फीसदी) से भी कम है. पंजाब राज्य किसान आयोग के अध्यक्ष अजय वीर जाखड़ कहते हैं, ''क्या पार्टी न्याय योजना को लोगों के गले उतार सकती है? क्या वह इससे तय लाभार्थियों यानी 20 फीसदी सबसे ज्यादा गरीब लोगों को यकीन दिला सकती है? दरअसल, यही कांग्रेस के लिए  सबसे बड़ी चुनौती है."

भोपाल स्थित राजनैतिक विश्लेषक अचल सिंह कहते हैं कि आखिर में सब कुछ उम्मीदवार की काबिलियत पर निर्भर करेगा कि वह न्याय योजना पर लोगों को किस कदर यकीन दिला  पाता है.

वे कहते हैं, ''संगठन में गहरी पैठ रखने वाले उम्मीदवार ही जनता को इस रकम के भुगतान की योजना बता पाएंगे और इसका सियासी फायदा उठा पाएंगे." वे यह भी कहते हैं कि कांग्रेस ने किसान कर्जमाफी और खरीद बोनस की जो घोषणाएं की थीं, उनका छत्तीसगढ़ में बेहतर असर इसलिए दिखाई पड़ा क्योंकि पार्टी की राज्य इकाई मध्य प्रदेश और राजस्थान की राज्य इकाइयों की बनिस्बत कहीं ज्यादा असरदार ढंग से उसे लोगों तक पहुंचा सकी.

चुनाव विश्लेषक और विकासशील समाज अध्ययन केंद्र के अध्यक्ष संजय कुमार न्याय को चुनाव जिताऊ नारे में बदलने की कांग्रेस की क्षमता पर शक जाहिर करते हैं. संजय कुमार कहते हैं, ''अगर कांग्रेस कम से कम 150 सीटों के साथ मुकाबले में उतर रही होती, तो इस संदेश के पहुंचने की वाकई अधिक संभावना होती. मगर 2014 में महज 45 सीटें जीतने वाली कांग्रेस केलिए 2019 में की जीत की संभावना अधिक नहीं बनती."

अलबत्ता सी-वोटर के संस्थापक यशवंत देशमुख पक्के तौर पर मानते हैं कि न्यूनतम आय गारंटी का राहुल का वादा इस चुनाव में उथल-पुथल मचाने वाली जबरदस्त रणनीति के तौर पर काम कर सकता है. देशमुख कहते हैं, ''कांग्रेस समझती है कि वह जीतने की हालत में नहीं है और दरअसल राष्ट्रीय अफसाना उसके हाथों से फिसल चुका है. इसलिए यह मुकम्मल उथल-पुथल मचाने वाली रणनीति हो सकती है क्योंकि उसे यह वादा पूरा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी."

यह ऐलान जिस वक्त किया गया है, उसने भी कई संभावित लाभार्थियों के मन में शक-शुबहा पैदा कर दिया है. महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के जरूर गांव के खेतिहर मजदूर 49 वर्षीय मोरेश्वर वाटिले कहते हैं, ''यह योजना और कुछ नहीं महज चुनावी वादा है. मुझे नहीं लगता कि हमें कभी भी यह रकम मिलेगी." छह सदस्यों का उनका परिवार चुनावी वादों से आजिज आ चुका है. वे कहते हैं, ''मेरा बेटा भू-विज्ञान में ग्रेजुएट है और मेरी बेटी बायोलॉजी पढ़ रही है.

मुझे उनसे उम्मीद है, न कि राजनेताओं से." राज्य के अमरावती जिले के जलगांव अर्वी गांव के 28 वर्षीय श्रीकांत चौधरी भी इस योजना में कम ही भरोसा करते हैं, जिनके छह लोगों के परिवार में उनके माता-पिता और कॉलेज जाने वाला छोटा भाई भी है. वे सवाल करते हैं, ''राहुल गांधी लाखों लोगों को 6,000 रु. महीना भला कैसे देंगे? क्या वे और ज्यादा नोट छापने की योजना बना रहे हैं?"

उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद के फजलगढ़ गांव की सुमन प्रजापति को लगता है कि बेहतरीन इरादों के बावजूद इस योजना को भ्रष्टाचार और लालफीताशाही से नहीं बचाया जा सकेगा. 45 बरस की इस विधवा के पास बीपीएल कार्ड तो है पर उन्हें कभी किसी सरकारी योजना का फायदा नहीं मिला. वे कहती हैं, ''गरीबों के लिए शुरू की गई दूसरी योजनाओं की तरह 'न्याय' योजना भी सरकारी मशीनरी को भ्रष्टाचार का एक और बहाना दे देगी."

मगर आशावादी भी हैं. बिहार के नवादा जिले के नरदीडीह गांव के 55 वर्षीय सीमांत किसान उमेश पासवान को भरोसा है कि 'न्याय' योजना उनके चार लोगों के परिवार को रुपए-पैसे से सुरक्षित करेगी और उनके पोते के लिए अच्छी तालीम पक्का करेगी. वे कहते हैं, ''हालांकि इस योजना के ऐलान के वक्त से शक पैदा होता है, लेकिन राहुल गांधी ने अगर इस योजना को पूरा करने का वादा किया है तो मैं कांग्रेस को वोट दूंगा."

महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में पंधारकवड़ा गांव के 31 वर्षीय बबलू धुर्वे ट्रकों पर रेत लादकर रोज 100 रुपए कमाते हैं. वे कहते हैं, ''यह योजना बहुत अच्छी है. मैं कांग्रेस को वोट दूंगा."

जब यूपीए 2009 में मनरेगा और किसान कर्जमाफी की कामयाबी के दम पर दोबारा सत्ता में आया था, कांग्रेस ने अविभाजित आंध्र प्रदेश से 33 और उत्तर प्रदेश से 21 सीटें जीती थीं. 2019 में पार्टी आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कहीं कमजोर मैदान पर खेल रही है. उत्तर प्रदेश में अभी इस बात का फैसला होना है कि कांग्रेस की तकदीर पर प्रियंका गांधी का कितना असर पड़ेगा या नहीं पड़ेगा.

उनके चुनाव अभियान के कार्यक्रम में भी कई उतार-चढ़ाव आए हैं. 14 फरवरी को लखनऊ में प्रियंका की पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस पुलवामा आतंकी हमले की वजह से रद्द करनी पड़ी थी. उन्होंने अपना पहला सार्वजनिक भाषण आखिरकार 12 मार्च को दिया, वह भी मोदी के गृहराज्य गुजरात में. वह भी तब जब चुनाव से पहले एक पूरा महीना प्रियंका की तरफ से एक भी सार्वजनिक बयान—या यहां तक कि एक ट्वीट—के बगैर गंवाया जा चुका था.

उत्तर प्रदेश के एक बड़े कांग्रेस नेता कहते हैं, ''राजनीति में प्रियंका के आगमन ने पार्टी के कार्यकर्ताओं में बहुत ज्यादा उत्साह पैदा कर दिया था. मगर वह फीका पड़ गया क्योंकि उन्होंने लखनऊ से बाहर निकलने की हिम्मत ही नहीं की. बड़ी लड़ाई के लिए जमीनी कार्यकर्ताओं को संगठित और प्रेरित करने की गरज से वाराणसी में नाव की सवारी भी बहुत देर से हुई."

लोकसभा की कुल 120 सीटें देने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार में 'न्याय' को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि से मुकाबला करना पड़ेगा, जो पहले ही शुरू की जा चुकी है. देश में ग्रामीण सीटों की एक-तिहाई सीटें और प्रधानमंत्री किसान सक्वमान निधि के कुल लाभार्थियों में से एक-चौथाई इन्हीं दो राज्यों से आते हैं. 'न्याय' फिलहाल जहां वादा भर है, वहीं मोदी सरकार ने 11 मार्च तक इस योजना के तहत 5,215 करोड़ रुपए 2.6 करोड़ किसानों के खातों में जमा भी कर दिए हैं.

पश्चिम बंगाल (42 सीटें) और ओडिशा (21 सीटें) में, जहां जनमत सर्वेक्षणों ने ममता बनर्जी और नवीन पटनायक को जबरदस्त जनसमर्थन पर सवार दिखाया है, कांग्रेस ने मुख्य विपक्षी पार्टी की जगह भाजपा के हाथों लगभग गंवा दी है. 14 राज्यों की 2018 सीटों के अलावा कांग्रेस की उम्मीदें दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, गोवा, पूर्वोत्तर के सात राज्यों और छह केंद्र शासित प्रदेशों पर टिकी हैं—जहां कुल 42 सीटें हैं.

लाभकारी योजनाएं और चुनाव

तकरीबन आधी सदी पहले इंदिरा गांधी ने 'गरीबी हटाओ' का नारा गढ़ा था और 1971 का लोकसभा चुनाव जबरदस्त कामयाबी के साथ जीता था. अर्थशास्त्री सुखदेव थोराट कहते हैं कि यह बात ऐतिहासिक तौर पर साबित हो चुकी है कि ''गरीबों के हक में कोई अच्छी नीतिगत घोषणा चुनाव जीतने में पार्टियों की मदद करती है."

2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव और महाराष्ट्र में एक के बाद एक विधानसभा चुनाव (1971 से 1995 के बीच) गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाओं के ऐलान के बल पर जीते गए हैं. 1991 में पी.वी. नरसिंह राव ने बड़े आर्थिक सुधारों का सूत्रपात करके कांग्रेस की विचारधारा को बदल दिया था और उसका वामपंथी-समाजवादी झुकाव पलट गया था. नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस एक के बाद एक लोकसभा के तीन चुनाव—1996, 1998 और 1999—हार गई.

2004 में कांग्रेस ने देश भर में ग्रामीण संकट की थाह पाने में नाकाम रहे एनडीए की 'इंडिया शाइनिंग' मुहिम के आगे जीत की पटकथा लिखी. अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज के मुताबिक, कांग्रेस के घोषणापत्र में रोजगार गारंटी कानून के वादे ने 2004 के फैसले को पार्टी के हक में झुका दिया. सत्ता में आने के बाद कांग्रेस ने 2006 में मनरेगा योजना शुरू की.

थोराट कहते हैं कि मनरेगा और किसान कर्जमाफी के साथ-साथ शिक्षा के अधिकार ने 2009 में फिर जीतने में कांग्रेस की मदद की. वे कहते हैं, ''1972-73 में महाराष्ट्र सरकार की ईजाद की गई रोजगार गारंटी योजना ने, जो बाद में पूरे देश के लिए मॉडल बन गई, तकरीबन 1995 तक राज्य में दबदबे वाली ताकत बने रहने में कांग्रेस की मदद की."

उत्तर प्रदेश में 2012 के विधानसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल करने वाली समाजवादी पार्टी ने चुनाव अभियान के दौरान बेरोजगार ग्रेजुएट के लिए 1,000 रुपए के मासिक भत्ते का ऐलान किया था. कई विश्लेषक तेलंगाना में पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में तेलंगाना राष्ट्र समिति की जबरदस्त जीत का श्रेय उसकी सरकार की रायतु बंधु कृषि निवेश समर्थन कार्यक्रम को देते हैं.

न्याय का विचार कहां से

अगर कांग्रेस के अंदरूनी लोगों की मानें, तो 'न्याय' राहुल के दिमाग की उपज है. अफसरशाह से कांग्रेसी बने और राहुल का दफ्तर संभालने वाले के. राजू कहते हैं, ''हालांकि 2004 और 2014 के बीच (यूपीए की हुकूमत में) 14 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला गया था, पर राहुल गांधी को लगा कि मनरेगा ही काफी नहीं है. वे पिछले दो साल से आमूलचूल बदलाव लाने वाले कदम की बात करते आ रहे थे. 'न्याय' वही कदम है." वे बताते हैं कि ''बीते एक दशक के दौरान अपनी यात्राओं और गरीबों के साथ अपनी बातचीत" के आधार पर कांग्रेस अध्यक्ष इस नतीजे पर पहुंचे कि हरेक हिंदुस्तानी परिवार को 12,000 रु. महीने की न्यूनतम आमदनी की जरूरत है.

फिर, राहुल ने कांग्रेस की रिसर्च टीम को निर्देश दिया कि वह ऐसे परिवारों की गिनती करे जिनकी मासिक आमदनी 12,000 रुपए से कम है. रिसर्चरों ने राष्ट्रीय नमूना सर्वे कार्यालय (एनएसएसओ), केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) और सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना 2011 के नतीजों पर भरोसा किया और ऐसे परिवारों की तादाद 5 करोड़ आंकी. टीम ने इन परिवारों की औसत मासिक आमदनी का हिसाब लगाया जो 6,000 रु. यानी राहुल के बुनियादी आमदनी के 12,000 रु. के न्यूनतम मानदंड की आधी निकली.

इस डेटा से लैस राहुल ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश के साथ मिलकर काम किया ताकि संसाधन जुटाने का रास्ता निकाल सकें और 5 करोड़ परिवारों के खातों में 6,000 रु. जमा किए जा सकें और इस तरह उनकी औसत मासिक आमदनी को बढ़ाकर 12,000 रु. पर पहुंचाया जा सके. इरादा यह है कि यह रकम हरेक परिवार की सबसे उम्रदराज महिला के बैंक खाते में जमा की जाएगी.

हालांकि कांग्रेस नेताओं ने ब्योरों का खुलासा नहीं किया है, पर पार्टी के अंदरूनी लोगों का कहना है कि मनमोहन सिंह, चिदंबरम और जयराम रमेश ने राहुल को भरोसा दिलाया है कि इस महत्वाकांक्षी योजना को अमली जामा पहनाया जा सकता है और बजट के खर्चों में से कम से कम 10 फीसदी रकम इसके लिए तय की जा सकती है. इसके अलावा, यह योजना चरणों में लागू की जाएगी.

'न्याय' से जुड़े घटनाक्रम से वाकिफ एक कांग्रेस नेता कहते हैं, ''राहुल के दिमाग में शुरू से ही साफ था कि मौजूदा कल्याण योजनाओं का एक भी पैसा 'न्याय' की खातिर कम नहीं किया जाएगा. रकम कोई मुद्दा नहीं होगी. देश बड़े उद्योगपतियों को ढेरों सब्सिडी देता है. सबसे अमीर लोगों के लिए टैक्स स्लैब में इजाफा करने और कर आधार को बढ़ाने की काफी गुंजाइश है."

कांग्रेस के कम्युनिकेशन प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला उम्मीदों से भरपूर नजर आते हैं, जब वे कहते हैं, ''गरीबों की खातिर हम 3.6 लाख करोड़ रु. पक्का जुटा लेंगे." भाजपा के बारे में वे आरोप लगाते हैं कि ''प्रधानमंत्री मोदी ने अपने मुट्ठी भर अंतरंग दोस्तों के 3.17 लाख करोड़ रु. माफ कर दिए."

देश में गहरी होती जाती आर्थिक गैर-बराबरी की तरफ इशारा करते हुए चुनाव विश्लेषक से सियासतदां बने योगेंद्र यादव सुझाव देते हैं कि कम से कम 1 फीसदी का संपत्ति कर लगाना न्याय के लिए संसाधन जुटाने का एक संभावित तरीका हो सकता है.

1990 के दशक के मध्य में हिंदुस्तान में महज 2 अरबपति थे. अब 131 अरबपति हैं. 2018 में कुल दौलत का 52 फीसदी हिस्सा सबसे ऊपर की 1 फीसद आबादी के पास था, जबकि इसके मुकाबले सबसे नीचे की 60 फीसदी आबादी के पास दौलत का केवल 4.7 फीसदी हिस्सा था. सुरेश तेंडुलकर समिति ने हिंदुस्तान की बीपीएल आबादी के 2011-12 में कुल आबादी के 22 फीसदी होने का अनुमान लगाया था, तो सी. रंगराजन समिति ने 2014 में गरीबी रेखा की नई परिभाषा तय की और 9.4 करोड़ और लोगों को इसके दायरे में  लाकर बीपीएल आबादी की हिस्सेदारी को 29 फीसद पर पहुंचा दिया.

पेरिस स्थित वल्र्ड इनइक्वलिटी लैब के मुताबिक, सालाना 2.5 करोड़ रु. से ज्यादा की संपदा वाले (सबसे ऊपर के 0.1 फीसदी परिवार) परिवारों की कुल संपदा पर 2 फीसदी की दर से कर लगाकर 'न्याय' के लिए रकम जुटाई जा सकती है. इससे 2.3 खरब रुपए मिलेंगे. इस थिंक-टैंक के को-डायरेक्टर लुकास चांसेल ने बताया कि उन्होंने यह फॉर्मूला अर्थशास्त्री और मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआइटी) के प्रोफेसर अभिजित बनर्जी के साथ साझा किया था, जिनसे इस योजना का खाका तैयार करते वक्त राहुल ने सलाह ली थी.

नया विचार नहीं

'न्याय' योजना सार्वभौम बुनियादी आमदनी (यूबीआइ) के दुनिया भर में चर्चित विचार में ही कुछ हेर-फेर करके तैयार की गई है. यूबीआइ का विचार हाल के वर्षों में व्यापक अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय रहा है. बेसिक इनकम अर्थ नेटवर्क इसे बिना शर्त सभी को व्यक्तिगत आधार पर मियादी नकद भुगतान के तौर पर मुहैया कराने की बात करता है जिसके लिए साधनों, जांच या काम की शर्त नहीं रखी जानी चाहिए. यूबीआइ का विचार अमेरिका के संस्थापक महापुरुषों में से एक थॉमस पाइन ने 1796 में विकसित किया था. हाल के वर्षों में यह विचार टेस्ला के एलन मस्क और फेसबुक के मार्क जकरबर्ग की बदौलत लोकप्रिय हुआ, जो कहते हैं कि ऑटोमेशन रोजगार के पारंपरिक मॉडल को बदल रहा है.

फ्रांस, अमेरिका, फिनलैंड, स्पेन, ब्राजील, नीदरलैंड्स, कनाडा, तुर्की, स्विट्जरलैंड, साइप्रस, इंडोनेशिया, केन्या, मेक्सिको, पाकिस्तान, फिलीपींस, दक्षिण अफ्रीका और यमन सरीखे कई देशों ने सशर्त या आंशिक तौर पर सीधे नकद हस्तांतरण की योजनाएं लागू की हैं. मगर विशालता और महत्वाकांक्षा के लिहाज से इन सबका उससे कोई मुकाबला नहीं है जो राहुल 'न्याय' के जरिए देना चाहते हैं. लंदन स्थित ओवरसीज डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट में सीनियर रिसर्चर मोइजा बिनत सरवर ने तीन नकद हस्तांतरण कार्यक्रमों—पाकिस्तान में 2008 में लॉन्च किए गए बेनजीर इनकम सपोर्ट प्रोग्राम (बीआइएसपी), 2003 में शुरू की गई ब्राजील की बोल्सा फैमिलिआ और 2007 में फिलीपींस में शुरू किए गए पंताविड पामिलयांग पिलिपिनो प्रोग्राम—का अध्ययन किया है. अपने शोध पत्र में सरवर लिखती हैं, ''लंबे-चौड़े गरीब समर्थक नीतिगत कार्यक्रम के सियासी फायदे गद्दीनशीन नेताओं के लिए इस लिहाज से अहम थे कि इससे इन तीनों में से हरेक देश में उनका वोटर आधार मजबूत और एकजुट हुआ और ब्राजील के मामले में तो इसमें बढ़ोतरी भी हुई."

हैदराबाद विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के डॉ. कृष्णा रेड्डी चिट्टेडी कई देशों में ऐसी योजनाओं के अच्छे असर की तरफ इशारा करते हैं. चिट्टेडी कहते हैं, ''फिनलैंड का तजुर्बा बताता है कि बेरोजगार नौजवानों को आमदनी में सहायता का अच्छा असर स्वास्थ्य और तनाव पर पड़ा, लेकिन काम की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया." वे यह भी कहते हैं, ''बोल्सा फैमिलिओ योजना को व्यापक तौर पर सबसे असरदार योजनाओं में से एक होने का श्रेय दिया जाता है और गरीबी में करीब 28 फीसदी कमी लाने में इसने अहम भूमिका अदा की."

हिंदुस्तान में दो न्यूनतम आय पायलट परियोजनाएं 2010 और 2013 में मध्य प्रदेश में चलाई गई थीं, जिनमें 6,000 परिवार शामिल थे. यूनिसेफ की वित्तीय मदद से चलाए गए मध्य प्रदेश अनकंडिशनल कैश ट्रांसफर प्रोजेक्ट ने हौसला बढ़ाने वाले नतीजे दिखाए, बावजूद इसके कि इसमें मासिक नकद भुगतान महज 300 रु. या उससे भी कम था. इसके लाभार्थियों ने ज्यादा बचत करना और रकम का इस्तेमाल अक्लमंदी से, मसलन शिक्षा पर, करना शुरू कर दिया. इसने इस आम धारणा को चुनौती दी कि नकद हस्तांतरण का हश्र इस रकम के संदिग्ध मकसदों, मसलन शराब, पर खर्च करने में होता है.

यूबीआइ के विचार को 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में सामाजिक कल्याण योजनाओं के विकल्प के तौर पर पेश किया गया था. सर्वे में इस विचार को 'आमूलचूल नया विजन' और 'गरीबी को खत्म करने का सबसे छोटा रास्ता' बताया गया था. इसने हिंदुस्तान की 75 फीसदी आबादी को सालाना 7,620 रु. नकद मुहैया कराने का सुझाव दिया था. यह रकम तेंडुलकर समिति की तय की गई 2011-12 की गरीबी रेखा और 2016-17 के मुद्रास्फीति के सूचकांकों पर आधारित थी. सर्वे ने अनुमान लगाया था कि यूबीआइ के इस किस्म के मॉडल पर खर्च देश के जीडीपी के 4.9 फीसदी के आसपास होगा. इसके मुकाबले भारत के जीडीपी की 5.2 फीसदी रकम 950 केंद्रीय और केंद्र उप-प्रायोजित कल्याण योजनाओं पर खर्च कर दी जाती है.

क्या 'न्याय' टिकाऊ है?

हालांकि राहुल का दावा है कि 'न्याय' योजना को लागू करने पर वित्तीय अनुशासन पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन अर्थशास्त्री इसकी व्यावहारिकता के मुद्दे पर बंटे हुए हैं (देखें 'न्याय' की राजनीति). समाज कल्याण के विभिन्न कार्यक्रमों पर पहले से हो रहे खर्चों के अलावा कई राज्यों की ओर से किसानों की कर्जमाफी की घोषणा के कारण अर्थव्यवस्था के लिए वित्तीय चुनौतियां और भी कठिन हो गई हैं.

इसके साथ ही बिजली वितरण कंपनियों की खराब हालत और हजारों करोड़ रु. के एनपीए के बोझ से दबे बैंकों के कारण भी वित्तीय संकट से जूझना पड़ रहा है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआइ) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का कहना है कि न्यूनतम आय योजना अगर कुशलता से लागू की गई तो यह ''दिखा सकता है कि चीजें कैसे चलाई जाती हैं...इस कार्यक्रम का ढांचा इस तरह से तैयार करना होगा जिससे जमीनी स्तर पर वृद्धि लाई जा सके." लेकिन वे यह भी चेतावनी देते हैं कि मौजूदा राजकोषीय स्थिति इस तरह के विशाल खर्च वाले कार्यक्रम के लिए अनुकूल नहीं है. इसके साथ ही राजन कहते हैं, ''अगली सरकार को इस बात का आकलन करने की जरूरत होगी कि राजकोषीय स्थिति इसके लिए कितना बोझ उठा सकती है. फिलहाल तो यह बहुत तंग है. यह सही है कि आप इस पर अतिरिक्त बोझ नहीं डाल सकते."

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज की प्रोफेसर जयती घोष का मानना है कि 'न्याय' को अपने प्रस्तावित अवतार में लागू करना असंभव मालूम होता है. वे कहती हैं, 'न्यूनतम आय को सुनिश्चित कराने का व्यावहारिक तरीका यह हो सकता है कि जन स्वास्थ्य सेवा और सभी को काम का अधिकार देने की योजना को आपस में जोड़कर लागू किया जाए, जैसे कि शहरी क्षेत्रों के लिए और सभी वयस्कों के लिए 100-दिन के काम का पैकेज देना." वे यह भी कहती हैं, ''जो काम करने के योग्य नहीं हैं, उन्हें पेंशन दी जा सकती है. इससे न्यूनतम आय स्वतरू ही सुनिश्चित हो जाएगी. यह काम करने का न केवल एक लोकतांत्रिक तरीका होगा बल्कि सम्मानजनक भी होगा जिसमें काम करने वाले को उसका पारिश्रमिक मिलेगा, न कि खैरात बांटने की राजनीति."

बहरहाल, इस कार्यक्रम को लागू करने में सबसे मूलभूत चुनौती यह होगी कि गरीब की पहचान कैसे की जाए क्योंकि भारत में आय का जो डेटा है, वह बहुत निक्वन स्तर का है. गरीब परिवारों को वार्षिक अनुदान या आर्थिक सहायता देने के लिए देश में आय का वास्तविक आंकड़ा जुटाना होगा और उसका विश्लेषण करके उसे प्रकाशित करना होगा. भारत की सांख्यिकी व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए यह बहुत मुश्किल काम साबित होगा. राजू के अनुसार, ''हम भी जानते हैं कि यह हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी. हमारी टीम गरीबों की पहचान करने के लिए कोई बढिय़ा तरीका ईजाद करने के काम पर जुटी हुई है."

कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस कार्यक्रम से ग्रामीणों की दशा सुधरने के बजाए देश की राजकोषीय स्थिति पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा और महंगाई में इजाफा होगा. ईवाइ इंडिया के मुक्चय नीति सलाहकार डी.के. श्रीवास्तव कहते हैं, ''किसानों की तकलीफों के पीछे कई मूलभूत कारण हैं. उन्हें जब तक दूर नहीं किया जाता है तब तक इस तरह के कार्यक्रम से उन्हें राहत नहीं पहुंचाई जा सकती और न ही इससे प्रत्यक्ष रोजगार ही पैदा होगा. इससे खपत तो बढ़ सकती है लेकिन उसका ज्यादा फायदा नहीं होगा बल्कि महंगाई ही बढ़ सकती है."

फिर भी, गरीबी मिटाने में पार्टी के अतीत के प्रदर्शनों के आधार पर कांग्रेस के नेताओं को उम्मीद है कि वे लोगों का विश्वास जीत लेंगे. सुरजेवाला कहते हैं, ''यहां तक कि मोदी सरकार के तहत जारी 2016-17 का आर्थिक सर्वेक्षण भी स्वीकार करता है कि कांग्रेस के शासन के तहत भारत में गरीबी घटी थी—आजादी के समय 70 प्रतिशत से घटकर 2011-12 में 22 प्रतिशत." कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि इसी सर्वेक्षण में सार्वभौमिक न्यूनतम आय के विचार का प्रस्ताव रखा गया था. हालांकि, इसमें मूलभूत अंतर है. सर्वेक्षण में प्रस्तावित न्यूनतम आय को जहां सब्सिडियों को खत्म करने के उद्देश्य से डिजाइन किया गया है, वहीं राहुल 'न्याय' को लागू करने के लिए पहले से चल रही कल्याणकारी योजनाओं को बंद नहीं करना चाहते.

बहरहाल, कांटे की चुनावी जंग में दीर्घकालीन ढांचागत सुधारों को निश्चित रूप से बहुत लुभावना आइडिया नहीं माना जा सकता. देश के चुनावी रंगमंच पर राहुल गांधी ने बहुत महत्वाकांक्षी पटकथा लिखकर यकीनन हलचल मचा दी है. अब यह कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है कि वे देश भर में इसका प्रचार करें और वोटरों को अपनी ओर आकर्षित करें. यह कार्यक्रम सफल होता है या असफल, फिलहाल तो इस बात पर निर्भर करेगा कि लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन कैसा रहता है और दूसरी पार्टियों के प्रदर्शन पर इसका क्या असर पड़ता है.

—साथ में अजीत कुमार झा, एम.जी. अरुण, श्वेता पुंज, उदय माहूरकर, रोहित परिहार,आशीष मिश्र, अमरनाथ के. मेनन, किरण डी. तारे, राहुल नरोन्हा, अमिताभ श्रीवास्तव

और रोमिता दत्ता

***

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay