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2018 सुर्खियों का सरताजः राहुल का उदय

राहुल गांधी ने पिछले डेढ़ दशक में एक नौसिखुए नेता से प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरने तक का लंबा चुनौतीपूर्ण सफर तय किया है. अब वे ताकतवर भाजपा और उसके शुभंकर बने नरेंद्र मोदी से मुचौटा लेने को तैयार

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर 04 January 2019
2018 सुर्खियों का सरताजः राहुल का उदय राहुल गांधी

राहुल गांधी लुटियन दिल्ली में तुगलक लेन स्थित अपने बंगले के मीटिंग रूम में लंबे-लंबे कदम भरते हुए दाखिल होते हैं. वे लाल रंग का गर्दन तक ऊंचा चुस्त स्वेटर और गहरे भूरे रंग का स्लीवलेस डाउंस जैकेट पहने हैं. अब वे फिर बेतरतीब अधपकी दाढ़ी रखने लगे हैं. दूसरे कमरे में कोई आधा दर्जन कांग्रेस प्रवक्ता उनके साथ बातचीत का इंतजार कर रहे हैं. उन्हें आज संसद में बहस के नतीजे के लिए तैयार किया जा रहा है ताकि वे शाम को प्राइम टाइम टेलीविजन पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रवक्ताओं के साथ चुनौतीपूर्ण मुकाबले में उतर सकें. उनकी पार्टी के लोग जिस आक्रामकता का प्रदर्शन करते हैं, वह बताती है कि राहुल गांधी अपने विरोधियों की ईंट का जवाब पत्थर से देने में यकीन करते हैं और यह भी कि उन्होंने देश की सबसे पुरानी पार्टी का कायापलट कर दिया है.

कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बने राहुल गांधी को महज एक साल से कुछ ज्यादा हुआ है, पर इतने वक्त में ही उन्होंने एक ऐसे नेता का दर्जा हासिल कर लिया है जिसने कामयाबी के साथ अपनी मौजूदगी दर्ज करवा दी है. यही वजह है कि उनकी अथक कोशिशों की बदौलत 2018 का साल उनके लिए इतनी उजली धूप लेकर आया कि निराशा और मायूसी के वे तमाम बादल छंट गए जिन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में जबरदस्त शिकस्त और 44 सीटों तक सिमट जाने के बाद से कांग्रेस पार्टी को घेर रखा था. राहुल पूरे साल आगे रहकर मोर्चों पर अगुआई करते रहे. उन्होंने 17 राज्यों के 50 दौरे किए. इनमें वे आठ राज्य भी शामिल हैं जिनमें चुनाव हुए. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर एक के बाद एक धुआंधार हमले किए और इसके लिए उन्होंने चार मुद्दे चुने—खेती का संकट, लडख़ड़ाती अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी और राफेल विमान सौदा. उन्होंने सोशल मीडिया पर भाजपा के खिलाफ जंग छेड़ दी और इसके लिए नया फिकरा—"चौकीदार चोर है''—ईजाद किया, जो चस्पां हो गया है. उन्होंने लोकसभा की बहस में कैमरों की चकाचौंध के बीच भौचक प्रधानमंत्री को गले लगाकर मंच और सुर्खियां हथिया लीं और दिखा दिया कि वे अपने विरोधियों को दुश्मन मानकर बर्ताव नहीं करते.

अब जब हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में कांग्रेस ने काबिलेतारीफ जीत हासिल कर ली है और कर्नाटक में गठबंधन सरकार बनाकर भाजपा को उसी के पैंतरों में मात दे दी है, तब पार्टी में नाटकीय उभार के लक्षण दिखाई दे रहे हैं. इसने राहुल गांधी को ऊंची उछाल देकर 2019 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी के अव्वल चैलेंजर के पायदान पर बिठा दिया है. तीन राज्यों की फतह की अहमियत का अंदाज इस हकीकत से लगाया जा सकता है कि 2014 में भाजपा ने इन तीन राज्यों में फैली लोकसभा की 65 सीटों में से 62 पर जीत हासिल की थी. जहां तक निजी कामयाबी की बात है, तो राहुल एक ऐसे नेता के तौर पर उभरे हैं जिन्हें तमाम पार्टियों में स्वीकार किया जाने लगा है—द्रमुक के स्तालिन उन्हें भावी प्रधानमंत्री के तौर पर देखते हैं, राकांपा के शरद पवार और माकपा के सीताराम येचुरी उनके साउंडिंग बोर्ड हैं जिनके जरिए उनकी तस्वीर और आवाज ज्यादा बड़ी होकर लोगों तक पहुंचती है, सपा के अखिलेश यादव और राजद के तेजस्वी यादव उनके खास जिगरी दोस्त हैं और टीडीपी के जिन एन. चंद्रबाबू नायडु की राजनीति कांग्रेस विरोध के इर्द-गिर्द घूमती थी, वे अब कांग्रेस को केंद्र में रखकर भाजपा विरोधी पार्टियों के गठबंधन के अनाधिकारिक संयोजक का काम कर रहे हैं.

इन फतहों ने राहुल की हैसियत में भले ही जबरदस्त इजाफा कर दिया है, पर वे इसे विनम्रता से ही देखते हैं. जब वे अपने घर पर इंडिया टुडे  के साथ खास बातचीत के लिए बैठे तो उन्होंने अपनी पार्टी की जीत का श्रेय लेने से संकोच बरता और कहा, "मुझे तब थोड़ी दिक्कत होती है जब कोई कहता है कि यह मैंने अकेले किया है. मैं एक सियासी संगठन का हिस्सा हूं जिसकी एक विचारधारा है. मेरी भूमिका है, पर जीत का श्रेय इन राज्यों के लोगों, कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और हमने जो बुनियादी ढांचा खड़ा किया, उसको दिया जाना चाहिए.'' वे आगे और स्पष्ट करते हैं, "हम 10 साल सत्ता में थे और मुझे दुख के साथ कहना पड़ेगा कि कांग्रेस पार्टी अहंकारी हो गई थी. मैं अपने नेताओं के दिमाग में यह बात बैठाने की कोशिश कर रहा हूं कि विनम्रता हमारे देश की संस्कृति का निचोड़ है. आप विनम्र हुए बगैर हिंदुस्तान की नुमाइंदगी नहीं कर सकते. विनम्रता के साथ ही इस देश की समझ और आगे का रास्ता आता है.''

यह उन बदलावों में से एक है जो राहुल कांग्रेस पार्टी में नई जान फूंकने और उसे एक बार फिर देश के विकास की अव्वल ताकत बनाने के लिए ला रहे हैं. राहुल ने अपनी पार्टी के लिए जो भारी-भरकम काम तय किए हैं, उन्हें पूरा करने के लिए जरूरी ऊर्जा और स्पष्टता अब उनमें दिखाई देती है. पिछले दिसंबर में जब उन्होंने अपनी विराट दुविधा से निजात पाई थी और पार्टी का अध्यक्ष बनने के लिए अपनी नामजदगी स्वीकार की थी, तब उनकी शुरुआत कुछ ज्यादा शुभ ढंग से नहीं हुई थी. उनके कमान संभालने के दो दिन बाद गुजरात विधानसभा के अहम चुनावों के नतीजे आए थे. इन चुनावों में अच्छी टक्कर देने के बावजूद कांग्रेस पार्टी भाजपा को लगातार छठी बार राज्य में जीत दर्ज करने से रोक नहीं सकी. यह हार कांग्रेस के लिए एक बुरे साल का शिखर थी, जब 2017 में वह अपनी हुकूमत वाले तीन राज्य—हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और मणिपुर—भाजपा के हाथों हार गई थी, गोवा को भी उसने हाथों से फिसल जाने दिया था. पंजाब की जीत अकेली गनीमत थी.

पिछले चार साल में उन्होंने 2014 की जबरदस्त हार के बाद पार्टी के बिखरे तानेबाने को जोडऩे की बहुतेरी बेताब कोशिशें कीं. हालांकि सोनिया गांधी पार्टी की प्रभारी थीं, मगर उपाध्यक्ष होने के नाते राहुल को भी खासी आलोचनाएं झेलनी पड़ीं. उसके बाद के दौर में एक के बाद एक कांग्रेस की हुकूमत वाले राज्य नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी के धावों के आगे घुटने टेकते गए. इसके नतीजतन कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट गया और पार्टी को फिर से जिंदा करने की राहुल की काबिलियत में संजीदा शक किए जाने लगे. इस बीच मोदी सरकार ने न केवल सोनिया और राहुल बल्कि उनके बहनोई रॉबर्ट वाड्रा को भी निशाना बनाते हुए गांधी परिवार के खिलाफ ढेरों मामले खोल दिए. राहुल के लिए यह वजूद की लड़ाई बन गई—महज कांग्रेस के वजूद की ही नहीं बल्कि खुद उनके और उनके परिवार के वजूद की भी. राहुल गांधी जानते थे कि 2018 का साल असली इम्तिहान का साल होगा. उन्हें अपनी सियासी तासीर खोजनी ही होगी वरना उन्हें और साथ में उनकी पार्टी को भी इतिहास के कूड़ेदान के हवाले कर दिया जाएगा.

राहुल गांधी के लिए अभी नहीं तो कभी नहीं वाली नौबत कैसे आ पहुंची? एक नेता के रूप में राहुल ने राजनीति में 2003 में सक्रिय रूप से कदम रखा और धीरे-धीरे राजनीति के गुर सीखने लगे. एक नामी राजनैतिक खानदान से ताल्लुक रखने और राजनीति की लंबी विरासत के बावजूद, राहुल राजनीति में कभी बहुत स्वाभाविक और सहज नहीं रहे. 34 साल की उम्र में पार्टी में शामिल होने के बाद भी उन्होंने आगे बढ़कर बड़ी जिम्मेदारियां उठाने और नेतृत्व करने में संकोच किया. उन्होंने परदे के पीछे से काम करना पसंद किया. उनके आवेगपूर्ण निर्णयों, पार्टी के पुराने दिग्गजों की छत्रछाया में असहज महसूस करने और तीखे तेवर के साथ कही गई बातों के कारण अक्सर कुछ-न-कुछ विवाद खड़ा हो जाता था.

राहुल शुरू से ही अलग किस्म की राजनीति करना चाहते थे. वे अपने दोस्तों को बताया करते थे कि भारतीय राजनीति का सतहीपन देखकर वे "हैरान'' हैं. वे उसी भेड़चाल में शामिल एक और नेता नहीं बन जाना चाहते या फिर राजनीति में बस इसलिए नहीं आना चाहते क्योंकि वे एक राजनैतिक परिवार से आते हैं और अपने परिवार की विरासत संभालनी चाहिए. वे नीचे से ऊपर तक कांग्रेस का नवनिर्माण चाहते थे, लेकिन उन्हें जल्दी ही समझ में आ गया कि पार्टी में कार्यकर्ताओं से ज्यादा, नेता मौजूद हैं और ये सभी इसलिए जुड़े हैं क्योंकि उन्हें राजनीति बहुत लाभदायक लगती है. जैसा कि वे कहते हैं, "देश के सभी राजनैतिक दलों के साथ जुड़ी एक सांस्कृतिक समस्या ही मेरी सबसे बड़ी चुनौती है. सारे नेता—हालांकि कुछ अपवाद भी हैं—एक बार सत्ता में आने के बाद अभिमानी बन जाते हैं और ऐसा सोचने लगते हैं कि वे अब बादशाह हो गए हैं. पर जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा था—वे ट्रस्टी भर हैं.''

कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के 10 साल के कार्यकाल के दौरान राहुल के पास कई अवसर थे जब वे आगे आकर दायित्व संभाल सकते थे लेकिन राहुल ने अपने दोस्तों से कहा कि वे कभी तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, या पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के बीच सत्ता का एक वैकल्पिक केंद्र नहीं बनना चाहते थे. उन्होंने परदे के पीछे से ही भूमिकाएं निभाना पसंद किया. हाल ही में उन्होंने खुलासा किया कि जब यूपीए सत्ता में थी, उन्होंने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) की शुरुआत कराई थी और इसे सफल बनाने की दिशा में काम किया था. इसके अलावा कांग्रेस के शीर्ष मंत्रियों और नेताओं के साथ वे कश्मीर में हालात सामान्य करने की दिशा में प्रयास कर रहे थे. उन्होंने यह भी कबूल किया कि उन्होंने यूपीए सरकार के दौरान खुद को एक अजीब स्थिति में पाया था. यूपीए के किसी भी गलत काम के लिए उन्हें आरोप झेलना पड़ता था और जब सरकार रास्ता भटक रही हो तो हमले भी नहीं कर सकते थे.

राहुल का जन्म एक प्रतिष्ठित और महान परिवार में हुआ. उनसे विशेष महानता की हमेशा अपेक्षा की जाती, या कहा जाए कि कई बार थोपी दी जाती थी. लेकिन राहुल का मानना है, वे यह महान काम जब भी करेंगे, अपनी शर्तों पर करेंगे और तब करेंगे जब खुद उन्हें—उनकी पार्टी या उनकी मां को नहीं—महसूस होने लगेगा कि वे इसके लिए सचमुच तैयार हैं. राजनीति में आने के 14 साल बाद उन्हें महसूस हुआ कि वह समय आ गया है. उन्होंने पिछले साल ही पार्टी अध्यक्ष बनना क्यों चुना? राहुल कहते हैं, "कांग्रेस पार्टी एक ऐसी विचारधारा है जिसकी जड़ें, गहरे विचारों से मजबूत हुई हैं. मुझे लगा कि इन विचारों को समझने के लिए मुझे थोड़ा समय चाहिए.

अब मैं इसे बेहतर तरीके से समझता हूं.'' उनके विरोधियों ने उनकी हिचकिचाहट को उनकी कमजोरी की निशानी बताया और आक्षेप किया कि राहुल में देश की सबसे पुरानी पार्टी का नेतृत्व करने और देश को आगे ले जाने का माद्दा नहीं है.

बहरहाल, देश को उनकी या कांग्रेस के इंतजार की कोई जरूरत नहीं थी. जैसा कि यूपीए सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में बहुत से मोर्चों पर चूक करती गई और राहुल भी खुद को असमंजस और अनिर्णय की स्थिति से बाहर नहीं निकाल पाए. इन सबसे नरेंद्र मोदी के असाधारण उदय के लिए जगह बनती चली गई. एक मुख्यमंत्री जिसे सांप्रदायिक हिंसा से निबटने को लेकर हमेशा कठघरे में खड़ा किया गया, मोदी ने एक नया फसाना गढ़ा जिससे देश प्रभावित हुआ. कांग्रेस नेतृत्व के अनिर्णय का मोदी ने भरपूर फायदा उठाया.

एक साधारण चायवाले के रूप में आम आदमी वाली अपनी छवि पेश करके और गुजरात विकास मॉडल की बात करके मोदी, भाजपा-आरएसएस के मजबूत संगठन की सहायता से सत्ता के शिखर पर पहुंच गए. सत्ता में बने रहने के लिए नामदारों पर उनका भरोसा सबको हैरान कर रहा है. 2014 में भाजपा ने बहुमत पाया और 25 वर्षों में ऐसा पहली बार हुआ था. कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत खराब रहा और राहुल तथा सोनिया अपनी सीटें बचा पाए.

राहुल के लिए 2014 की हार "भारी तूफान'' था और राहुल स्वीकार करते हैं कि "यह मेरे लिए सबसे माकूल बात'' थी. वह अग्निपरीक्षा का क्षण था. यह केवल आत्मावलोकन का नहीं बल्कि कुछ करने का समय था. राहुल ने चुनौती को स्वीकार किया. उन्होंने कांग्रेस संगठन की थाह लेनी शुरू कर दी. बुजुर्गों और युवाओं के बीच एक गहरी खाई दिखती थी और राहुल को वह खाई पाटनी थी. उन्हें दिख रहा था कि एक कांग्रेस के भीतर दो कांग्रेस सक्रिय हैं. पुराने दिग्गजों को एक कोने में लगाने के बजाय, जिनमें कई की वे पहले भी अनदेखी कर चुके थे, राहुल ने उनकी समझ और अनुभव का फायदा लेने के लिए उन्हें भी साथ रखा और पार्टी में युवा नेतृत्व के लिए भी जगह बनाते गए. उन्होंने काफी मशक्कत की है. सबको को वाजिब अधिकार और स्थान देना था. उन्होंने कहा कि यह "कांग्रेस का सैंडपेपर'' था जिसने उनके खुरदुरे किनारों को घिसकर चिकना कर दिया.

राहुल का दूसरा फॉर्मूला हर राज्य में पुराने और युवा नेताओं की मिली-जुली एक प्रतिभासंपन्न टोली तैयार करना था. इसलिए मध्य प्रदेश में कमलनाथ के हाथ पार्टी की कमान दी गई और ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत दूसरे युवा नेताओं को बड़ी भूमिकाएं सौंपी गईं. राजस्थान में उन्होंने सचिन पायलट को प्रदेश अध्यक्ष बनाया लेकिन दो बार के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को दरकिनार करने की गलती नहीं की, जिनकी राज्य में अच्छी पकड़ है. हालांकि मुख्यमंत्री बनाने की बारी आई तो राहुल ने पुराने नेताओं पर ही भरोसा किया. जैसा कि एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "पार्टी में दोनों पक्षों के बीच एक पुल की दरकार थी लेकिन उन्होंने पार्टी को अगली पीढ़ी की ओर ले जाने का वादा भी किया था.'' उन्होंने दावेदारों के बीच सुलह कराने के बाद राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पद के आकांक्षियों की अपने साथ मुस्कराती हुई तस्वीर पोस्ट की. संदेश एकदम साफ था कि वे हर किसी को साथ लेकर, सहमति तैयार करने में यकीन रखते हैं, अपना फैसला किसी पर थोपते नहीं.

राहुल ने संकट समाधान के लिए फौरन हरकत में आने की शैली में भी महारत हासिल कर ली है. मध्य प्रदेश चुनाव प्रचार अभियान के दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ एक अनौपचारिक बातचीत में राज्य कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह ने कहा, "मैं भाषण देने भी नहीं जाऊंगा क्योंकि मैं बोलता हूं तो कांग्रेस हार जाती है.'' वह बयान कैमरे में कैद हो गया और मीडिया ने इसे दिग्विजय सिंह का बगावती रुख माना. राहुल ने बात की और उनसे उसी दिन मुरैना के पास जौरा की रैली में अपने साथ मंच पर मौजूद रहने का आग्रह किया. बाद में उसी रात दिग्विजय विमान में राहुल के साथ दिल्ली आए और इस धारणा को ध्वस्त कर दिया कि कांग्रेस में गुटबंदी है. कांग्रेस कार्यकारिणी के एक सदस्य कहते हैं, "वे अब तेजी से हरकत में आ जाते हैं.''

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