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युद्ध के दांवपेचः बर्बादी का घातक दुष्चक्र

भारत और पाकिस्तान खतरनाक टकराव में मुब्तिला हैं जो पूर्ण युद्ध में बदल सकता है. इस कगार से वे कैसे कदम पीछे खींच सकते हैं?

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राज चेंगप्पा 06 March 2019
 युद्ध के दांवपेचः  बर्बादी का घातक दुष्चक्र एअर स्ट्राइक, प्रतीक फोटो

एक सैन्य इतिहासकार बारबरा डब्ल्यू. टचमैन ने कहा था कि युद्ध अनुमान की गलतियों का उजागर होना है. अगर भारत और पाकिस्तान एक बड़े टकराव के कगार पर खड़े हों, तो आप इस फेहरिस्त में जोखिम भरी बहादुरी, शको-शुबहे से भरे दिलो-दिमाग और गलतफहमी की गलतियों को भी जोड़ लीजिए. इन दोनों देशों के नेता रिश्तों की साज-संभाल को इस तरह देखने पर उतारू रहते हैं मानो पोकर खेल रहे हों—दौर जीतने के लिए वे रणनीति और हुनर के अलावा खतरनाक पैंतरों का भी सहारा लेते हैं.

पुलवामा में आतंकी हमले से पहले तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और उन्हें नियंत्रित रखने वाले सत्ता प्रतिष्ठान के आका मानते थे कि हिंदुस्तान को ललकारने के लिए तुरुप के सारे पत्ते उनके हाथ में हैं. दहशतगर्दी का पत्ता उनके पास था जिसका वे खूनखराबे के लिए लगातार इस्तेमाल करते थे. कश्मीर का पत्ता जिससे वे घाटी में अलगाव पैदा करते थे. मुस्लिम कार्ड जिसका वे पश्चिम को दूर रखने के लिए घमंड से इस्तेमाल करते थे. एटमी बम का पत्ता ताकि वे भारत को लहूलुहान करते हुए भी उसे कठोर प्रहार करने से रोक सकें. अफगान पत्ता जिससे अमेरिका को अपने इशारे पर नचा सकें. और चीन का पत्ता जिसका उन्होंने ट्रंप को पछाडऩे के लिए बार-बार इस्तेमाल किया.

मई 2014 में जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता में आए हैं, हिंदुस्तान ने इन पत्तों का असर खत्म करने और इनसे मिलने वाले जिन फायदों का पाकिस्तान को भरोसा रहा है उन्हें बेअसर करने के लिए लगातार काम किया है. मोदी ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात सरीखे इस्लामी देशों और पश्चिम एशियाई देशों के साथ मजबूत रिश्ते बनाए ताकि उसका मुस्लिम कार्ड छिन्न-भिन्न कर सकें. इस हद तक कि पाकिस्तान को बेचैन और मायूस करते हुए दशकों में पहली बार हिंदुस्तान को इस्लामी सहयोग संगठन (ओआइसी) के विदेश मंत्रियों की बैठक में गेस्ट ऑफ ऑनर के तौर पर बुलाया गया. पाकिस्तान को खिझाते और कुढ़ाते हुए हिंदुस्तान ने अफगानिस्तान में भारी निवेश किया ताकि उसे पाकिस्तान के ऐन पिछवाड़े में वह एक खिलाड़ी बना सके. हिंदुस्तान ने अमेरिका के साथ रणनीतिक भागीदारी मजबूत की और चीन को दोस्ती और सख्ती के मेल से अपने साथ रखा.

'मुझसे पंगा मत लेना'

अलबत्ता दहशतगर्दी और कश्मीर के मामले में पाकिस्तान लचीला होता दिख रहा था. सितंबर 2016 में उड़ी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में बहुप्रचारित सर्जिकल स्ट्राइक से उसे करारा तमाचा मारा. ऐसा करते हुए मोदी ने इशारा कर दिया कि अगर जरूरत पड़ी तो वे ताकत का इस्तेमाल करने को तैयार हैं. इस हमले के जख्मों को सहलाते हुए पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान के रसूखदार लोगों ने वापसी की साजिश रची. उनके हाथ के खिलौने की तरह काम करने वाले जैश-ए-मोहम्मद ने 14 फरवरी को पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आत्मघाती बम हमले को अंजाम दिया, जिसमें 40 हिंदुस्तानी सुरक्षाकर्मी मारे गए. हिंदुस्तान में आम चुनाव में महज दो महीने रह गए थे और ऐसे में मोदी के लिए बेहद जरूरी हो गया कि वे तेजी और ताकत से प्रहार करें.

जब हिंदुस्तान ने प्रहार किया, तब गजब के असर के साथ किया. पुलवामा हमले के 12 दिन बाद 26 फरवरी को भारतीय वायु सेना (आइएएफ) के लड़ाकू विमानों ने पाकिस्तानी सरजमीन के भीतर घुसकर खैबर पख्तूनख्वा सूबे में जैश के प्रशिक्षण अड्डे पर बड़ा हमला बोल दिया. विदेश मंत्रालय (एमईए) ने इसे आतंकी संगठन को एक और हमले से रोकने के लिए 'एहतियाती गैर-सैन्य हमला' कहा. एमईए ने दावा किया कि हिंदुस्तान ने जैश के सरगना मसूद अजहर के साले मौलाना यूसुफ अजहर की अगुआई में चल रहे इस ठिकाने को नेस्तनाबूद कर दिया है.

उसने यह नहीं बताया कि कितने लोग मारे गए, पर कहा कि 'बहुत बड़ी तादाद' में लोगों का सफाया कर दिया गया है. विदेश सचिव विजय केशव गोखले ने बताया कि हिंदुस्तान ने यह हमला इसलिए भी किया क्योंकि पाकिस्तान ने जैश और दूसरे आतंकी धड़ों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. बावजूद इसके कि हिंदुस्तान ने हाल के दिनों में उसे इनकी मौजूदगी के बारे में जानकारी दी थी.

हिंदुस्तान ने विश्व समुदाय को भरोसा दिलाया कि वह इसे और आगे बढ़ाना नहीं चाहता और जिम्मेदारी और संयम से आगे भी काम करता रहेगा.

इसके फौरन बाद हुए घटनाक्रम में हमले ने मोदी की छवि और उसके साथ उनकी चुनावी संभावनाओं में अच्छा-खासा इजाफा कर दिया. 1971 के बाद किसी भी प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान की सरजमीन के भीतर घुसकर हवाई हमलों की इजाजत नहीं दी थी.

जैश पर हमला करके मोदी ने सीआरपीएफ के जवानों की मौत का बदला ले लिया. उन्होंने बड़े देशों और खासकर अमेरिका को इस बात के लिए राजी करके कि भारत को आत्मरक्षा में हमला करने का अधिकार है, खासी कामयाबी हासिल की, जिसका सबूत तब भी मिला जब हमले के बाद हिंदुस्तान की अंतरराष्ट्रीय आलोचना नहीं हुई.

पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना नहीं बनाकर हिंदुस्तान ने संयम दिखाया और संकेत दिया कि उसने बस एक बार किया जाने वाला हमला बोला है. तिस पर भी उसने भविष्य के आतंकी हमलों के लिए एक नई सीमा रेखा तय कर दी और पाकिस्तान को संकेत दिया कि भविष्य में उसे सजा देने के लिए कार्रवाई पीओके तक सीमित नहीं रहेगी.

हिंदुस्तान का आकलन यह भी था कि पाकिस्तान के लिए पलट हमला कर पाना मुश्किल होगा क्योंकि अगर उसने सैन्य ठिकानों पर हमला करने या नागरिक आबादी पर प्रहार करने की कोशिश की तो दुनिया भर में उसकी खासी लानत-मलामत होगी. हिंदुस्तान भी इसे युद्ध की कार्रवाई मानेगा.

हिंदुस्तान के शुरुआती आत्मविश्वास में इस बात से भी इजाफा हुआ कि पाकिस्तान ने पूरी ताकत से यह मानने से इनकार कर दिया कि हमले में किसी की जान गई है या उस जगह जैश का कोई शिविर मौजूद भी था. यह 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद के अफसाने से मिलता-जुलता था, जब पाकिस्तान लगातार और अडिय़ल ढंग से कहता रहा था कि मोदी सरकार के दावे झूठे हैं.

मोदी और उनकी टीम को अलबत्ता उम्मीद थी कि पाकिस्तान किसी न किसी तरीके से जवाबी कार्रवाई करेगा, खासकर इसलिए भी क्योंकि भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान के हवाई क्षेत्र में घुसपैठ की थी और उसके इलाके में भीतर घुसकर हमला बोला था.

वे यह देखकर हैरान रह गए कि इस्लामाबाद ने तेजी से पलटवार किया. भारत के हमले के एक दिन बाद ही पाकिस्तानी वायु सेना के लड़ाकू विमानों ने जम्मू-कश्मीर में भारतीय हवाई क्षेत्र में घुसपैठ की. हिंदुस्तानी लड़ाकू विमान खदेडऩे के लिए झपटे तो पाकिस्तान एक मिग 21 को धराशायी करने और पैराशूट के सहारे पीओके में उतरे उसके पायलट विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान को पकडऩे में कामयाब रहा.

इस बीच हिंदुस्तान ने एक पाकिस्तानी विमान मार गिराने का दावा किया. मगर उसे इस बात से भारी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी कि उसका एक पायलट पाकिस्तान के हाथों में चला गया.

एक-दूसरे को नीचा दिखाने का खेल

फतह के एहसास से सरोबार इमरान खान पाकिस्तान टीवी पर नमूदार हुए और दावा किया कि इस्लामाबाद केवल यह दिखाना चाहता था कि वह तुर्शी-ब-तुर्शी जवाब दे सकता है. हिंदुस्तानी हमले से पैदा हुई खुशी और उल्लास के फीका पडऩे के साथ मोदी सरकार पलट हमला करने को लालायित होगी.

जब टकराव और ज्यादा खतरनाक होता जा रहा है और युद्ध का खतरा मंडरा रहा है, अमेरिका, रूस और चीन सरीखे बड़े और ताकतवर देशों ने दोनों मुल्कों को आगाह किया है कि वे संयम बरतें और झगड़े को बढ़ाएं नहीं. मोदी सरकार के सामने फिर मुश्किल विकल्प की घड़ी आन पड़ी.

अगर हिंदुस्तान फिर हमला करता है, तो वह अंतरराष्ट्रीय समर्थन से हाथ धो सकता है, खासकर अमेरिका के समर्थन से, जिसने यह साफ कर दिया है कि तनाव को थोड़ा भी बढ़ाना किसी के हित में नहीं है. हिंदुस्तान ने दुनिया को पाकिस्तान के विश्वासघात का यकीन दिला दिया है और रणनीतिक तौर पर पलट हमला करने की जरूरत नहीं है. मगर मोदी को अपने देश में बनी इस धारणा से भी निपटना है कि पाकिस्तान ने हिंदुस्तानी विमान को मार गिराकर और उसके पायलट को अपने कब्जे में लेकर हिसाब बराबर कर दिया है.

विडंबना यह है कि हमलों के बाद दोनों देशों ने दुहाई दी कि वे एक-दूसरे के साथ अमन-चैन के रिश्ते रखना चाहते हैं. पूरी जंग की तो बात ही छोड़ दें, कोई भी सीमित युद्ध तक पर आमादा नहीं हो सकता. दोनों जानते हैं कि उन्हें ऐसी एक जंग की जबरदस्त आर्थिक कीमत चुकानी पड़ेगी, खासकर पाकिस्तान को, जो पहले ही भुगतान संतुलन की तीव्र समस्या से कराह रहा है. खान ने तो हिंदुस्तान को अकेले दहशतगर्दी के मुद्दे पर ही बात करने की पेशकश की—जो एक किस्म की रियायत है, क्योंकि पाकिस्तान हमेशा इस बात पर जोर देता रहा है कि वह आतंकवाद पर तभी बातचीत करेगा जब साथ ही कश्मीर के मुद्दे पर भी बातचीत हो.

इस पेशकश पर अलबत्ता मोदी के राजी होने की कोई संभावना नहीं है, जब तक कि खान मसूद अजहर को गिरक्रतार नहीं करते और इससे ज्यादा अहम यह कि उस विशाल आतंकी नेटवर्क को नेस्तनाबूद नहीं करते जिसे पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान के रसूखदारों ने भारत पर हमले करने के लिए स्थापित किया है. पाकिस्तानी फौज के इरादों को लेकर हिंदुस्तान के मन में गहरे संदेह हैं और उसे भरोसा नहीं है कि वह उन आतंकी धड़ों के खिलाफ कार्रवाई करेगा जिसे उसने इतने सालों के दौरान पाला-पोसा है.

बाहर निकलने के रास्ते की तलाश

तो क्या जंग होगी? विशेषज्ञ बंटे हुए हैं. यूनाइटेड स्टेट्स इंस्टीट्यूट अॉफ पीस के एशिया सेंटर के एसोसिएट वाइस-प्रेसिडेंट और पाकिस्तानी अमेरिकी मोईद यूसुफ कहते हैं, ''देखो, हम बर्बादी की तरफ बढ़ रहे हैं और इसकी वजह को लेकर किसी को भी गाफिल और बेपरवाह नहीं रहना चाहिए. हिंदुस्तान और पाकिस्तान के लिए मुश्किल दोहरी है. एक, हिंदुस्तान इसे 'वन-ऑल' यानी बराबर अंकों से खत्म करना गवारा नहीं कर सकता—इसे 'वन अप' ही होना होगा जिसमें उसके अंक ज्यादा हों. अब, आगे बढ़ती सीढ़ी पर वन अप मुमकिन नहीं है क्योंकि जब भी हिंदुस्तान प्रतिक्रिया करेगा, पाकिस्तान कहेगा, ''आखिरी गोली तो मैं ही चलाऊंगा''.

दो, हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच टकराव के बढऩे पर नियंत्रण का कोई दोतरफा तंत्र मौजूद नहीं है. उन्होंने गुजरे वक्त में तदर्थ तरीके से चीजें की हैं और इस बात की कोई असल समझ नहीं है कि इसके बढऩे के संकट से बाहर कैसे निकला जाए.'' (देखें बातचीत)

कारनेगी एंडोवमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के सीनियर फेलो एश्ले जे. टेलिस मानते हैं कि दोनों पक्ष जहां खम ठोकने का प्रदर्शन करेंगे, वहीं मौजूदा टकराव के और ज्यादा बढऩे की संभावना नहीं है. इसकी वजहें वे बताते हैं, ''दोनों पक्ष बाहर निकालने का रास्ता तलाश रहे हैं—क्योंकि अपनी-अपनी बात वे कह चुके हैं. हिंदुस्तान अपनी यह बात रख चुका है कि आतंकी हमलों की सजा देने के लिए जवाबी कार्रवाई की जाएगी और अगर जरूरत पड़ी तो यह जवाबी कार्रवाई पाकिस्तान के इलाकों तक जाएगी. पाकिस्तान अपनी यह बात जाहिर कर चुका है कि हिंदुस्तान की किसी भी कार्रवाई का जवाब दिया जाएगा. मैं नहीं देखता कि इस मोड़ पर इसे अगले पायदान तक बढ़ाने से किसी भी पक्ष के हित आगे बढ़ते हों.''

टेलिस को लगता है कि आगे कोई भी हमला हिंदुस्तान के लिए उलटे नतीजे लेकर आएगा. यह भी कि हमें आंतकी नेटवर्क को खत्म करने के लिए पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाए रखना चाहिए, पकड़े गए पायलट की रिहाई के लिए खामोशी से काम करते रहना चाहिए और हवाई हमलों को लेकर हिंदुस्तान में जश्न के माहौल को हल्का करने की शुरुआत करनी चाहिए.

असल परेशानी यह है कि चीते की पीठ पर सवार होना तो आसान है, पर उससे उतर पाना मुश्किल है जैसा कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान को भी अब एहसास हो रहा है. सबसे अहम बात है धारणा और अफसाने को अपने हिसाब से तय करने की. अब से आगे मामला सियासत का है, कार्रवाई की कामयाबी का नहीं. दोनों देश जीत का दावा करते हुए पीछे हट सकते हैं और हालात की तीव्रता को कम कर सकते हैं.इसमें कोई शक नहीं कि हिंदुस्तान ने पाकिस्तान के दहशतगर्दी के पत्ते को करारी चोट पहुंचा दी है, मगर उसे इस बात के लिए भी कड़ी मेहनत करने की दरकार है कि घाटी में बिगड़ते हालात को सुधारा जाए और अपने कामों से कश्मीरियों के दिलो-दिमाग जीते जाएं. वह पाकिस्तान को निहत्था और लाचार करने के लिए यही सबसे अच्छा तुरुप का इक्का चल सकता है.

''अब यह अपनी जीत परिभाषित करने का खेल है''

भारत और पाकिस्तान जैसी दो एटमी शक्तियां इस वक्त सशस्त्र संघर्ष के मुहाने पर खड़ी हैं. ऐसे मोड़ पर यूनाइटेड स्टेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ पीस में एशिया सेंटर के एसोसिएट वाइस-प्रेसिडेंट मोईद यूसुफ से ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा ने बात कर जानना चाहा कि दोनों देशों के बीच आसन्न युद्ध को रोकने के लिए आखिर क्या किया जाना चाहिए. यूसुफ पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी हैं. हाल ही में उनकी किताब ब्रोकरिंग पीस इन न्यूक्लियर एन्वायरनमेंट्सः यूएस क्राइसिस मैनेजमेंट इन साउथ एशिया बाजार में आई है. बातचीत के संपादित अंशः

प्र-भारत और पाकिस्तान के बीच मौजूदा स्थिति कितनी गंभीर है?

1999 में करगिल युद्ध के बाद से यह पहला मौका है जब भारत-पाकिस्तान के बीच एक तरह का सैन्य टकराव

तय-सा लग रहा. मुझे नहीं लगता कि 2001 में भारतीय संसद पर हमले के बाद या 2008 में मुंबई हमलों के बाद भी इतनी नाजुक हालत पैदा हुई थी. यह करगिल के बाद से युद्ध के सर्वाधिक अंदेशे वाला समय है.

प्र.यानी आपको लगता है कि हम युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं?

देखिए, हम विनाश की ओर बढ़ रहे हैं और इसकी वजहों को लेकर किसी को भी भ्रम में नहीं रहना चाहिए. भारत और पाकिस्तान के लिए यह समस्या दोहरी है. भारत इसे 'बराबरी पर खत्म' वाले हाल में छोड़ पाने की स्थिति में नहीं—उसे बढ़त बनाकर रखनी है. लेकिन, बढ़ते तनाव वाली इस सीढ़ी पर एक कदम ऊपर रह पाना संभव नहीं है क्योंकि जब भी भारत कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा, पाकिस्तान कहेगा 'पहल करने वाला मैं नहीं.' दूसरी बात, भारत और पाकिस्तान ने हालात खराब होने से रोकने को कोई द्विपक्षीय नियंत्रण-तंत्र खड़ा नहीं किया.

दोनों ने पहले भी सारा काम फौरी अंदाज में ही किया है और उन्हें इस बात की समझ भी नहीं कि बढ़ते तनाव वाली स्थिति से बाहर कैसे आया जाए. पूरी दुनिया को भारत और पाकिस्तान को समझाना चाहिए कि देखो, यह मसला हम निबटा लेंगे, पर इस संकट को अभी खत्म करने के लिए जल्द ऐसा कुछ करने की जरूरत है. पर मैं ऐसा कुछ होता देख नहीं रहा.

प्र.पहले अमेरिका इन दोनों के बीच शांति स्थापित करवा देता था. क्या आपको लगता है कि वह अब ऐसा करेगा?

अब तक तो नहीं किया. अमेरिका का ध्यान उत्तर कोरिया शिखर सम्मेलन और अफगानिस्तान वार्ता जैसे मुद्दों पर शायद ज्यादा लगा है. भारत और पाकिस्तान उसके रडार पर नहीं थे. पहले ऐसे हालात बनने पर अमेरिका, ब्रिटेन और दूसरे देशों के आला अफसर भारत और पाकिस्तान जा पहुंचते थे और दोनों पक्षों को मामला सुलझाने के लिए कहते थे. इस बार अब तक ऐसा नहीं हुआ है. भले इन मुल्कों की अपनी व्यस्तताएं हों पर उनमें मुझे पहले जैसी तत्परता भी नहीं दिख रही. मुझे नहीं लगता, वाशिंगटन से फोन पर बात कर लेने भर का अब कोई असर होता है. मेरे ख्याल से यह कूटनीतिक सक्रियता का मामला है, कि लोग सामने आएं, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद बिना किसी का पक्ष लिए दखल दे और कहे कि अभी हम बढ़ते तनाव को खत्म करना चाहते हैं, बाकी मसले के हल का रास्ता निकाल लिया जाएगा.

प्र.इस बढ़ते तनाव में आपको एटमी उपयोग का अंदेशा दिखता है?

इसी तरह के एक और दौर तक ये हालात जारी रहे तो दोनों अपने एटमी ताकत होने का किस ढंग से संकेत देंगे, इस बारे में दोनों मुल्क अगर सोचना शुरू नहीं करते हैं तो मुझे बेहद हैरानी होगी. तुरंत अभी मुझे एटमी हथियार तैनात किए जाने का खतरा नहीं दिखता और मुझे नहीं लगता कि 'अपरिहार्य उपयोग' जैसा सचमुच कोई एटमी संकट है. लेकिन यह बात बिल्कुल साफ है कि दोनों पक्ष इस समय प्रोटोकॉल के बारे में सोच रहे होंगे, इस पर विचार कर रहे होंगे कि अगर यह सब अगले दौर में जाता है—जिसकी संभावना मैं अभी खारिज नहीं कर रहा—तो वे क्या संकेत देना चाहेंगे, कैसे कदम उठाना चाहेंगे.

प्र.आपको नहीं लगता, भारत-पाकिस्तान इस वक्त संकट से निबटने में सक्षम हैं?

शीतयुद्ध की व्याख्या थी कि अगर कभी एटमी युद्ध हुआ तो उन देशों के न चाहने के बावजूद होगा. इस बात पर कोई सवाल ही नहीं कि दोनों मुल्क समझदार हैं और एटमी युद्ध नहीं चाहते. वे खुद ऐसा नहीं करेंगे, लेकिन जब युद्ध का कुहासा छा जाता है और संकट गहराने लगता है तो उस दौरान बहुत-सी बातें गलत दिशा में भी जा सकती हैं. तो आप वहां तक नहीं जाना चाहते. इसीलिए सवाल है कि क्या भारत और पाकिस्तान के पास तनाव नियंत्रण का कोई दोतरफा तंत्र है? हमें यह तो पता है कि संकट में फंसें कैसे, पर यह नहीं पता कि इस संकट से बाहर कैसे आएं. यही वह बिंदु है जो नाकामी की वजह बन सकता है. हमने इस बात की व्यवस्था नहीं की है कि अमेरिका जैसे किसी सशक्त तीसरे पक्ष की मदद के बिना किसी गंभीर तनावपूर्ण संकट से बाहर कैसे निकलें. अब तक का इतिहास रहा है कि जैसे ही तनाव बढ़ता है, ये सशक्त तीसरे पक्ष बीच में आ जाते हैं और संकट को समाप्त करने की कोशिश करते हैं. दो एटमी शक्तियों का ऐसी स्थिति में होना ठीक नहीं, जिसमें उन्हें दूसरों का मुंह ताकना पड़ता हो. मूलतः यही मुद्दा है.

प्र .एटमी तनाव-वृद्धि को नियंत्रित करने वाले जिस तंत्र की आप बात कर रहे हैं, वे दरअसल हैं क्या?आप देखिए कि पाकिस्तान और भारत के बीच एटमी शक्तियों के रूप में संबंधों के नियमन संबंधी अत्यंत व्यापक सहमति दस्तावेज 1999 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर यात्रा के समय आया था. उसके बाद से हम उस दस्तावेज में उल्लिखित दुर्घटना-नियंत्रण उपायों, जोखिम घटाने के उपायों और दोनों देशों के आला नेताओं के बीच हॉटलाइन संपर्क जैसी बातों का पांच प्रतिशत भी हासिल नहीं कर सके. इनमें से कुछ भी हासिल न कर सकने की वजह थी, हमारे संबंधों की दशा और वे स्थितियां जो अब भी मौजूद हैं. हमें पारदर्शिता से लागू किए गए जोखिम घटाने के उपायों की जरूरत है. मुद्दा यह है कि हम दोनों एक दूसरे की कही बातों का भरोसा नहीं करते, इसलिए किसी संकट के समय जो चीज सबसे पहले गायब हो जाती है वह है समस्या को हल करने के लिए बातचीत के रास्ते इस्तेमाल करने के संजीदा प्रयास. दोनों ही पक्षों को जो चाहिए, वह पाने के लिए तीसरे पक्ष का सहारा लेना सस्ता विकल्प जान पड़ता है क्योंकि उन्हें पता है कि दूसरे पक्ष से कोई रियायत हासिल करने का सीधा रास्ता नहीं है.

प्र.आपने किताब में 'ब्रोकर्ड बार्गेनिंग' (मध्यस्थ के जरिए सौदेबाजी) जुमले का इस्तेमाल किया है. इसका क्या अर्थ है?

मई 1998 को याद कीजिए. अगर आपने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की बातों को सुना हो तो वे जो कह रहे थे, उसमें वे अपने-अपने मुल्कों को यह भी बता रहे थे कि उन्हें बाहरी दुनिया की सलाह मानने की जरूरत नहीं, और वे रणनीतिक रूप से स्वतंत्र हैं. यह वह बात है जो एटमी हथियार होने पर आती है. लेकिन गुत्थी यह है कि 20 साल बाद भी दोनों एटमी शक्तियां संकट के क्षणों में तीसरी शक्तियों पर निर्भर हैं कि वे आएं और उनका संकट समाप्त करें. मतलब कि आपको अभी भी एक मध्यस्थ की जरूरत है क्योंकि आपके पास सीधा द्विपक्षीय तनाव नियंत्रण तंत्र नहीं है. चूंकि बहुत सारी वजहों से तीसरे पक्षों को इस बात की चिंता नहीं है कि कुछ गड़बड़ हो सकती है, वे अपनी मर्जी के हिसाब से आते हैं.

प्र.तो यहां से अब हम किधर जाएंगे?

इस बात का इससे उतना वास्ता नहीं कि अब क्या होगा, इसका संबंध इससे ज्यादा है 'कौन क्या कह रहा है'. भारत और पाकिस्तान के लिए अब यह बेहद अहम है कि वे संदेशों के आदान-प्रदान का ऐसा रास्ता खोजने पर सहमत हों जो उन्हें इस झंझट से निकाल सके. यह अब अपने कथ्यों को चतुराई से कुछ इस तरह से घुमाने का खेल हो गया है जिसमें दोनों पक्ष अपनी जनता से कह सकें कि उनकी जीत हुई है.

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