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कांग्रेसः प्रियंका तुरुप कितना कारगर

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने अपने नए तुरुप को आगे किया, तो पार्टी के राजनैतिक विरोधी 2019 की गर्मियों में होने वाले आम चुनावों के लिए नए सिरे से अपने चुनावी समीकरण गढऩे पर हो सकते हैं मजबूर

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कौशिक डेका और आशीष मिश्र 04 February 2019
कांग्रेसः प्रियंका तुरुप कितना कारगर प्रियंका गांधीः अक्तूबर 2013 में रायबरेली धाराई गांव में

यह वाकया 1999 की गर्मियों का है. 27 वर्षीय प्रियंका गांधी अपनी मां, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पहले लोकसभा चुनाव प्रचार के लिए अमेठी पहुंची थीं. मीडिया से बातचीत के दौरान एक रिपोर्टर ने उनसे पूछा कि उनकी मां के विदेशी मूल पर विपक्ष के हमले पर उनका क्या कहना है. प्रियंका पत्रकार के नजदीक पहुंचीं और अपना हाथ आगे बढ़ाकर पूछा, ''क्या आपको मेरी रगों में विदेशी खून दौड़ता दिखता है?"

यह प्रियंका के राजनैतिक रूप से चतुर दिमाग का पहला संकेत था, जिस पर कांग्रेस ने दो दशक बाद भरोसा किया है. पार्टी ने उस उत्तर प्रदेश (यूपी) में अपनी किस्मत संवारने के लिए प्रियंका पर दांव खेला है जहां से 543 सदस्यीय लोकसभा में सबसे अधिक सदस्य पहुंचते हैं. 2014 में, कांग्रेस ने यूपी की 80 में से सिर्फ दो लोकसभा सीटें जीतीं और जीतने वाले दोनों ही नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य थे—रायबरेली में सोनिया गांधी और अमेठी में राहुल गांधी.

पूर्वी यूपी के प्रभारी के रूप में प्रियंका के औपचारिक तौर पर राजनीति में प्रवेश ने न केवल राज्य कांग्रेस में नई जान फूंक दी है, बल्कि 2019 के चुनावी परिदृश्य को भी अचानक बदल दिया है. यूपी, जो अक्सर तय करता है कि दिल्ली में सरकार किसकी बनेगी, वहां भाजपा और समाजवादी पार्टी (सपा)-बहुजन समाज पार्टी (बसपा) गठबंधन के अलावा प्रियंका के नेतृत्व में तीसरी ताकत के रूप में उभर रही कांग्रेस के बीच, कांटे की त्रिकोणीय टक्कर होने की उम्मीद है. पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद कहते हैं, ''वे गेम-चेंजर हैं. उनके आने से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नई जान आ गई है, जिसे साफ देखा जा सकता है." पार्टी का मनोबल निश्चित रूप से बहुत बढ़ा है और बहुत से कार्यकर्ता तो मांग कर रहे हैं कि प्रियंका वाराणसी से आम चुनाव लड़ें और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके ही निर्वाचन क्षेत्र में सीधी चुनौती दें.

हालांकि प्रियंका की अब तक चुनावी राजनीति में परीक्षा नहीं हुई है, लेकिन कांग्रेस कार्यकर्ताओं का प्रियंका के लिए यह अभूतपूर्व उत्साह पूरी तरह से निरर्थक नहीं है. 1999 में, अरुण नेहरू—राजीव गांधी के रिश्ते के भाई और उनके मंत्रिमंडल के एक सदस्य—ने भी मनमुटाव के बाद कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था और भाजपा के टिकट पर सोनिया के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़े थे.

प्रियंका ने तब सिर्फ एक सभा को संबोधित किया और एक ऐसी बात कही जिसका लोगों पर गहरा असर हुआ, ''आपने इस क्षेत्र में मेरे परिवार के साथ विश्वासघात करने वाले व्यक्ति को चुनाव में आने कैसे दिया? उस शख्स ने कांग्रेस में होने के बावजूद सांप्रदायिक ताकतों से हाथ मिलाया और अपने भाई की पीठ में छुरा घोंपा." यह अरुण नेहरू के सियासी करियर का अंत था. मगर अब हालात बदल चुके हैं.

दो दशक बाद, यह प्रियंका के लिए अग्निपरीक्षा की घड़ी है क्योंकि पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रभारी के रूप में, वह प्रधानमंत्री मोदी और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दोनों की संयुक्त क्षमता को चुनौती देंगी. दरअसल, प्रधानमंत्री की सीट वाराणसी और योगी का गढ़ गोरखपुर भी पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही पड़ता है. यही वजह है कि दिल्ली के जीसस ऐंड मेरी कॉलेज से पढ़ी मनोविज्ञान की स्नातक प्रियंका को—चुनाव से ठीक 100 दिन पहले इस क्षेत्र का प्रभार सौंपा गया है.

पूर्वी यूपी में अवध, पूर्वांचल और निचले दोआब शामिल हैं और यहां से 40 लोकसभा सीटें हैं. 2009 में जब कांग्रेस ने यूपी से 21 सीटें जीतीं थी जो 1984 के बाद पार्टी को इस प्रदेश से मिली सबसे ज्यादा सीटें थीं. इन 21 में से 18 सीटें पूर्वी उत्तर प्रदेश से थीं. गौरतलब यह भी है कि 2014 के चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन सबसे खराब रहा, फिर भी अवध में इसे 17.8 प्रतिशत वोट मिले थे.

इस क्षेत्र में सर्वणों, मुख्य रूप से ब्राह्मणों का बड़ा वोट बैंक है जो कभी कांग्रेस का आधार वोट रहा है. प्रियंका के आने के बाद कांग्रेस को भाजपा से अपना पुराना वोट बैंक वापस मिलने की उम्मीद दिख रही है.

ब्राह्मण समुदाय, जिसकी आबादी 13 फीसदी है और जिसे कथित तौर पर कई कारणों से फिलहाल भाजपा से नाराज बताया जा रहा है, के वोटों को आकर्षित करने के लिए प्रियंका की हिंदू पहचान को दिखाने की जोरदार कोशिशें होंगी. कहा जा रहा है कि ब्राह्मण समुदाय विभिन्न वजहों से मोदी सरकार से कुछ खफा चल रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के 'सख्त' प्रावधानों में कुछ रियायत दी थी पर मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया. इसके अलावा राज्य प्रशासन में ठाकुर समुदाय का प्रभाव बहुत बढ़ा है. ऐसी वजहों से ब्राह्मण खफा हैं.

भाई राहुल के साथ कुंभ मेले में गंगा में डुबकी लगाने के बाद, प्रियंका 4 फरवरी को पूर्वी यूपी के महासचिव के रूप में अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत कर सकती हैं. कांग्रेस के एक राज्यसभा सांसद कहते हैं, ''सवर्ण मतदाता भगवा पार्टी से नाराज हैं, पर वे सपा-बसपा गठबंधन का समर्थन करने के लिए भी तैयार नहीं हैं." यूपी की आबादी में लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा पिछड़े वर्ग का है, जबकि दलितों की संख्या 22 प्रतिशत है.

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के आंकड़ों से पता चलता है कि 2009 में कांग्रेस का यूपी में शानदार प्रदर्शन इसलिए रहा क्योंकि पार्टी ने 2007 के विधानसभा चुनाव के बाद से कुर्मी, ब्राह्मणों, अन्य सवर्ण, मुसलमान और गैर-जाटव दलित तथा जाट वोट बैंक में अपना वोट शेयर काफी बढ़ाया था. 2014 में भाजपा ने कांग्रेस के हाथ से सवर्ण और कुर्मी वोट छीन लिए तो मुसलमान वोट सपा की ओर चले गए थे.

पार्टी ब्राह्मणों और गैर-ठाकुर उच्च जाति के मतदाताओं की दूसरी पसंद बनी रही. प्रियंका को कुर्मियों, ब्राह्मणों और गैर-ठाकुर सवर्णों का समर्थन फिर से हासिल करना होगा. व्यापारियों और कारोबारियों ने 2014 और 2017 में भाजपा की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, पर नोटबंदी और माल एवं सेवा कर (जीएसटी) के कारण उनमें से बहुत लोग भाजपा से खासे नाराज हैं. किसानों से भी भाजपा की दूरी बढ़ी है और कांग्रेस इसे भुनाने की कोशिश में है.

राहुल ने कृषि संकट को मोदी सरकार के खिलाफ अपने चुनाव अभियान के प्रमुख विषयों में से एक बना दिया. यूपी के किसान बूचडख़ानों पर नकेल कसने के कारण योगी सरकार से विशेष रूप से नाखुश हैं, क्योंकि सरकार की ओर से संचालित बूचडख़ाने अनुत्पादक गायों की बढ़ती संख्या से निपटने में विफल रहे हैं और इससे किसानों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा है, साथ ही उनकी फसलें भी खराब हो रही हैं. यानी नाराजगी व्यापक है.

जातिगत गुणा-भाग के अलावा 47 वर्षीया प्रियंका की युवाओं और महिलाओं के बीच एक सीधी अपील होगी. 2014 के चुनाव में, भाजपा को युवा मतदाताओं के समर्थन से बहुत लाभ हुआ था. 18-22 वर्ष आयु वर्ग के 51 प्रतिशत मतदाताओं ने पार्टी को वोट दिया था. महिलाओं के वोट का महत्व इस तथ्य से समझा जा सकता है कि पिछले दो विधानसभा चुनावों में, महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों की तुलना में अधिक रहा है.

कार्यकर्ताओं में उत्साह के बावजूद, राहुल को आगामी आम चुनाव में किसी बड़े चुनावी फायदे की उम्मीद नहीं है. यही कारण है कि वे यह बात जोर देकर कह रहे हैं कि प्रियंका की नियुक्ति कांग्रेस की एक अल्पकालिक रणनीति नहीं है, बल्कि 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के भव्य पुनरुद्धार योजना की शुरुआत है. सक्रिय राजनीति में प्रियंका के प्रवेश की टाइमिंग का ध्यान रखा गया. हिंदीपट्टी के तीन राज्यों में कांग्रेस को मिली जीत के तीन महीने बाद कांग्रेस ने उन्हें चुनावी समय में उतारा है.

यदि राहुल की अगुआई किसी बड़ी जीत के बिना प्रियंका को उतारा जाता तो इसे राहुल के नेतृत्व की विफलता के रूप में देखा जाता. कांग्रेस अध्यक्ष सोशल मीडिया पर मोदी से अधिक सक्रिय हैं. हालिया इंडिया टुडे के देश का मिजाज सर्वे में सामने आया है कि राफेल सौदे को लेकर सरकार पर राहुल के आरोपों ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया है.

हालांकि प्रियंका हमेशा से अपनी मां और भाई की राजनैतिक सलाहकार रही हैं. राजनीति में उनकी सार्वजनिक भागीदारी अमेठी और रायबरेली तक ही सीमित रही हो, पर वे कांग्रेस के कई बड़े फैसलों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल रही हैं. दिसंबर, 2018 में, वे मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों के नाम तय करने के लिए हुई बैठकों में राहुल की मदद के लिए मौजूद थीं. 2017 में प्रियंका की वजह से यूपी विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस-सपा में गठबंधन कायम हो पाया था. एक राजनैतिक रणनीतिकार कहते हैं, ''वे जानती हैं कि अलग-अलग प्राथमिकताओं और कद के लोगों से कैसे जुड़ा जाए." एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता उस प्रोटोकॉल की ओर इशारा करते हैं जिसे प्रियंका ने हमेशा बनाए रखा है, ''वे कभी भी किसी नेता को—चाहे वह बड़ा हो छोटा—अपने घर पर तलब नहीं करतीं. वे या तो खुद उनके घर जाती हैं या फिर अपने भाई और मां के घर पर उनसे मिलती हैं."

यूपी में अकेले लडऩे के कांग्रेस के फैसले के बाद प्रियंका कार्ड जरूरी हो गया था. कई कांग्रेस नेताओं ने राहुल से कहा था कि सपा-बसपा गठबंधन में 10 लोकसभा सीटों के साथ जूनियर पार्टनर की तरह चुनाव में उतरना पार्टी के लिए घातक होगा. इसलिए पार्टी 2019 में नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली भाजपा के खिलाफ एकजुट विपक्ष का हिस्सा रहते हुए भी गठबंधन से दूर रही. लेकिन प्रदेश में एक महत्वाकांक्षी चुनाव अभियान का नेतृत्व करने के लिए पार्टी को एक ऐसे मजबूत नेता की जरूरत थी, जो गुटबाजी से परे हो. प्रियंका इस कसौटी पर पूरी तरह से फिट बैठती हैं.

उनके ऊपर अपने परिवार के अन्य सदस्यों की तरह अतीत का कोई बोझ नहीं लदा है और वे उन लोगों तक भी पहुंच सकती है जो परिवार से दूर हो चुके हैं. राहुल के विपरीत, वे ज्यादातर नेताओं के साथ एसएमएस या फोन पर संपर्क में रहती हैं. कांग्रेस के एक महासचिव का कहना है, ''यूपी में प्रियंका दो ऐसे दिग्गजों के संपर्क में लगातार रहीं और उनसे पार्टी का काम पूरा करवाया, जिनका सोनिया और राहुल के साथ तालमेल अच्छा नहीं रहा है." इस बात को मानने में उन्होंने जरा भी हिचक नहीं दिखाई कि सुपरस्टार अमिताभ बच्चन की मां तेजी बच्चन से बचपन में मिले ट्यूशन का नतीजा है कि वे इतनी अच्छी हिंदी बोल और समझ लेती हैं. 2013 में उनके बेटे रेहान ने अरुण नेहरू की चिता को अग्नि दी, जिन्हें प्रियंका ने 1999 में गद्दार करार दिया था. अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, बौद्ध धर्म में उनकी गहरी रुचि और विपश्यना के नियमित अभ्यास ने उन्हें न केवल एक ऐसी शख्स बल्कि एक ऐसे गंभीर राजनीतिक के रूप में भी विकसित किया है, जिसके दिमाग में हमेशा बड़ी तस्वीर रहती है.

जनता के साथ तत्काल और स्वाभाविक  रूप से जुडऩे में प्रियंका माहिर हैं. मोदी भी इस मामले में बहुत धनी हैं. बहुत सारे कांग्रेस समर्थकों को प्रियंका में उनकी दादी इंदिरा गांधी का करिश्मा और ओज नजर आता है और इस करिश्मे को वे मोदी के खिलाफ भुनाने की उम्मीद करते हैं. वे धाराप्रवाह हिंदी बोलती हैं और बीच-बीच में अवधी भी बोल पड़ती हैं.

हालांकि भाई राहुल के साथ उनकी लगातार तुलना की जाती है, फिर भी अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि प्रियंका अधिक सहज हैं. उन्होंने हमेशा इस बात का ध्यान रखा है कि सार्वजनिक जीवन में वे कभी भी भाई को पछाड़ती न दिखें और उन्होंने हमेशा अपनी दादी की विरासत को भाई के साथ साझा करने की प्रवृत्ति ही दिखाई है. उन्होंने कहा था, ''राजनीति के बारे में उनके भाई की समझ वाकई बहुत अच्छी है और मुझे लगता है कि उनमें यह गुण मेरी दादी से आया है."

एक शानदार राजनैतिक परिवार की होने से उनमें राजनीति की एक स्वाभाविक समझ है. लेकिन प्रियंका की यही राजनैतिक विरासत भाजपा के हाथों में एक हथियार भी बनेगी. यूपी में भाजपा के जिन दो दिग्गजों—मोदी और योगी से प्रियंका की सीधी टक्कर होगी, वे दोनों ही सामान्य परिवारों से ताल्लुक रखते हैं. भाजपा, अपने दोनों दिग्गजों की पृष्ठभूमि की प्रियंका के विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि से तुलना करके बढ़त बनाने की कोशिश करेगी. सोशल मीडिया पर चले रहे अभियानों ने तो पहले ही ऐसा दिखाना शुरू कर दिया है.

हालांकि राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों ने अब तक उन पर व्यक्तिगत हमलों से गुरेज किया है, पर राजनीति में उनके औपचारिक प्रवेश ने बहुत से द्वार खोल दिए हैं. भाजपा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने अपने कुटिलतापूर्ण अंदाज में कहा, ''वे बाइपोलैरिटी डिस्ऑर्डर से ग्रस्त हैं. वे लोगों की पिटाई करती हैं. उनकी बीमारी उन्हें सार्वजनिक जीवन के लिए उपयुक्त नहीं बनाती. जनता को सतर्क रहना होगा न जाने कब वे अपना मानसिक संतुलन खो दें." भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि मजबूत नेताओं की कमी के कारण कांग्रेस को अब ''चॉकलेटी" चेहरों का सहारा लेना पड़ रहा है. बिहार के मंत्री विनोद नारायण झा ने कहा कि कांग्रेस अब सुंदर चेहरे दिखाकर वोट नहीं पा सकती.

झा ने यह भी बताया कि प्रियंका रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी हैं जो ''भ्रष्टाचार के कई मामलों में आरोपी" हैं. यही एक बड़ा बोझ है जिससे प्रियंका खुद को दबी हुई महसूस कर सकती हैं. उनके व्यवसायी पति वाड्रा स्कूल के जमाने से उनके मित्र रहे हैं, जिनसे प्रियंका ने 1997 में 10, जनपथ में एक सादे समारोह में हिंदू रीति-रिवाजों से शादी की थी. रॉबर्ट वाड्रा भूमि अधिग्रहण और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े लगभग दो दर्जन मामलों में सीबीआइ और ईडी की जांच का सामना कर रहे हैं.

दिल्ली में 35, लोधी एस्टेट में रहने वाले इस दंपती का एक 18 साल का बेटा रेहान और एक 16 साल की बेटी मिराया है. वाड्रा के पिता राजेंद्र का पश्चिमी यूपी के मुरादाबाद शहर में पीतल के बर्तन निर्यात करने का कारोबार था. रॉबर्ट, उनके भाई रिचर्ड और बहन मिशेल ने अपना अधिकांश बचपन दिल्ली में बिताया, जहां उनकी मां मॉरीन एक स्कूल में पढ़ाती थीं. 2001 में सड़क दुर्घटना में मिशेल की मौत हो जाने के कारण परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. रिचर्ड ने 2003 में आत्महत्या कर ली और राजेंद्र को 2009 में दिल्ली के एक गेस्टहाउस में फांसी पर झूलता पाया गया.

कांग्रेस ने वाड्रा के खिलाफ आरोपों को हमेशा भाजपा का राजनैतिक प्रतिशोध बताया है. पार्टी यह कहती रही है कि केंद्र और कई राज्यों में भाजपा की सरकारें होने के बावजूद पिछले पांच वर्षों में भाजपा वाड्रा के खिलाफ एक भी आरोप साबित नहीं कर पाई है.

हालांकि पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए, प्रियंका के खिलाफ राजनैतिक लड़ाई में जीतना मुश्किल होगा. वे ईंट का जवाब पत्थर से देना जानती हैं. 2014 में जब मोदी ने दावा किया था कि कांग्रेस बूढ़ी हो गई है, प्रियंका ने एक रैली में चुटकी ली, ''क्या मैं आपको बूढ़ी लगती हूं?" बाद में उसी साल रायबरेली में एक अन्य चुनाव प्रचार में उन्होंने मोदी को पलटकर जवाब दिया था. मोदी ने कांग्रेस का नामकरण आरएसवीपी—राहुल, सोनिया, वाड्रा और प्रियंका—और एबीसीडी—आदर्श घोटाला, बोफोर्स घोटाला, कोयला घोटाला और दामाद का घोटाला—के रूप में करते हुए कटाक्ष किया था. प्रियंका ने पलटवार करते हुए कहा था, ''आप किसी प्राथमिक स्कूल में पढ़ाने के लिए नहीं आए हैं. आप राष्ट्र को संबोधित कर रहे हैं. इसलिए जनता को आरएसवीपी या एबीसीडी की तरह अंग्रेजी वर्णमाला न सिखाएं."

मोदी और भाजपा, वर्णमाला तो नहीं पढ़ाएंगे, लेकिन निश्चित रूप से उनकी नजर उन जातिगत समीकरणों पर केंद्रित रहेगी जिसने 2014 और 2017 में पार्टी को राज्य में सफलता दिलाई थी. भाजपा की वह दोनों कामयाबी सधी हुई सोशल इंजीनियरिंग का परिणाम थीं. उच्च जातियों (ब्राह्मणों और ठाकुरों) के साथ गैर-यादव ओबीसी वर्ग और गैर-जाटव दलितों तथा किसानों से मिले समर्थन ने उसकी जीत की इबारत लिखी थी. भाजपा इस जातिगत समीकरण को फिर से दोहराना चाहेगी. पार्टी ने उच्च जातियों में आक्रोश को पहचाना और उसका मानना है कि आर्थिक रूप से पिछड़ी उच्च जाति के लोगों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की उसकी घोषणा से उसे लाभ मिलेगा.

भाजपा की कोशिश रहेगी कि राम मंदिर मुद्दे पर सक्रियता बढ़ाकर सभी जातियों को एक बड़े हिंदू छतरी के नीचे खड़ा किया जाए. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पिछले साल से इस मुद्दे पर जोर दे रहा है और सक्रिय है. आरएसएस ने भाजपा के जीते सभी 71 लोकसभा सीटों पर अपने प्रतिनिधि नियुक्त किए और स्थानीय सांसदों के प्रदर्शन का लेखा-जोखा लिया.

लेकिन योगी सरकार के प्रति पार्टी कार्यकर्ताओं की नाराजगी भाजपा का नया सिरदर्द है. कार्यकर्ताओं की योगी सरकार के प्रति बढ़े असंतोष का नतीजा ही था कि पिछले वर्ष 24 अक्तूबर को लखनऊ पहुंचे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने सभी मंत्रियों को पार्टी के संगठन मंत्री के सामने अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करने को कहा. दूसरा एक महत्वपूर्ण फैक्टर है जातिगत गोलबंदी, जो अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा की राह में दिक्कत पैदा कर सकता है.

2017 के विधानसभा चुनाव में गैर-यादव ओबीसी जातियों को अपने पक्ष में लामबंद कराने वाली भाजपा के लिए इस बार उन पिछड़ी जातियों में उत्साह नहीं दिख रहा है. पार्टी के एक पिछड़ा वर्ग के नेता बताते हैं, ''गैर-यादव पिछड़ी जातियों ने विधानसभा चुनाव में जितना समर्थन भाजपा को दिया था उससे कहीं कम अनुपात में भाजपा ने इन जातियों को सरकार और संगठन में जगह दी है. ऐसे में भाजपा की जाति जोडऩे की रणनीति इस बार लोकसभा चुनाव से पहले कमजोर है." भाजपा की इन्हीं कमियों को भांपकर कांग्रेस भी बड़ी चतुराई से संगठन का पुनर्गठन करने की तैयारी में है. पार्टी आलाकमान यूपी में कांग्रेस संगठन को चार जोन—पूर्वी, पश्चिमी, अवध और बुंदेलखंड में बांटकर हर जोन का एक-एक अध्यक्ष तैनात करने पर विचार कर रहा है. इन जोन अध्यक्षों और उनकी टीम की तैनाती में स्थानीय जातिगत समीकरणों का बखूबी ख्याल रखा जाएगा. हर जोन अध्यक्ष की रिपोर्टिंग प्रदेश अध्यक्ष को होगी.

उधर, अमित शाह राज्य भाजपा में मतभेदों को खत्म करने के लिए राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी जैसे पुराने दिग्गजों को भी पार्टी में सक्रिय करने की योजना बना रहे हैं. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा की यूपी के लिए लोकसभा चुनाव प्रभारी के रूप में नियुक्ति से संकेत मिलता है कि शाह का वर्तमान कार्यकाल खत्म होने के बाद, नड्डा को पार्टी की कमान संभालने के लिए तैयार किया जा रहा है. हिंदूवादी ताकतों से उनकी नजदीकी के कारण गुजरात भाजपा के दिग्गज नेता गोवर्धन जडफिया को यूपी में पार्टी का प्रभारी बनाया गया है.

 भाजपा को प्रियंका का मुकाबला करने के लिए अपनी अंतिम रणनीति बनानी होगी, उसी तरह सपा-बसपा गठबंधन को भी अपनी रणनीतियों पर फिर से विचार करना होगा. सपा-बसपा यानी दो धुर विरोधियों के बीच का यह गठबंधन उसी पुरानी कोशिश की पुनरावृत्ति है जिसके बूते दोनों दलों को 1993 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद तेजी से आगे बढ़ रही भाजपा को रोकने में सफलता मिली थी. उस समय मुलायम सिंह यादव की अगुआई में ओबीसी और कांशीराम के नेतृत्व में दलित एकजुट हुए थे तथा भाजपा को यूपी विधानसभा चुनाव में पटखनी दे दी थी. इंडिया टुडे के देश का मिजाज सर्वेक्षण के अनुसार, कागज पर सपा-बसपा गठबंधन दुर्जेय दिखता है, और इसके 58 लोकसभा सीटें जीतने की संभावना है.

बहरहाल, प्रियंका के आने से मुसलमान मतदाता बंट सकते हैं. प्रदेश की कुल आबादी का 19 प्रतिशत मुसलमान हैं और वे फिलहाल सपा-बसपा गठबंधन के पक्ष में खड़े हैं. मुसलमान सपा का समर्थन करना चाहते हैं पर बसपा को लेकर उनके मन में असमंजस है क्योंकि मायावती के नेतृत्व वाली पार्टी के पास एक भी मजबूत मुसलमान नेता नहीं है. 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद, बसपा के मुस्लिम चेहरा और पार्टी के पूर्व महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. पिछले डेढ़ वर्षों में, बसपा के 50 से अधिक प्रमुख मुसलमान नेता कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. सपा के मुसलमान चेहरे, रामपुर के विधायक आजम खान पहले ही कांग्रेस से गठबंधन करके वोटों को बंटने से रोकने को कह चुके हैं.

कांग्रेस के पूर्व विधायक और वरिष्ठ नेता सिराज मेहंदी कहते हैं, ''पड़ोसी राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार बनने का यूपी में सबसे बड़ा असर मुसलमान समुदाय पर पड़ा है. उसे अब लगने लगा है कि भाजपा को कांग्रेस ही हरा सकती है." यूपी के रास्ते दिल्ली की गद्दी पर काबिज होने की आस लगाने वाली कांग्रेस ने मुसलमान मतदाताओं को साधने के लिए खास रणनीति पर काम कर रही है. गुलाम नबी आजाद को यूपी में पार्टी प्रभारी पद से हटाए जाने का मुसलमान समुदाय में गलत संदेश न जाए, इसके लिए पार्टी युवा मुस्लिम नेताओं को अनुभवी नेताओं के साथ सहयोगी की भूमिका में लगाकर जागरूकता अभियान का खाका खींच रही है. 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी ने मुसलमान युवा नेताओं को तवज्जो देना शुरू किया था. इसी कड़ी में जौनपुर के पूर्व विधायक नदीम जावेद को अल्पसंख्यक विभाग की कमान सौंपी गई.

प्रदेश कोषाध्यक्ष पद पर नईम सिद्दीकी को तैनात किया गया. पार्टी के तेजतर्रार युवा नेता और 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले ''बोटी-बोटी काटने" जैसे विवादास्पद बयान को लेकर चर्चा में आए इमरान मसूद इस बार पश्चिमी यूपी में कांग्रेस का मुस्लिम चेहरा होंगे. पिछले कुछ वर्षों में मोहसिना किदवई, सलमान खुर्शीद, जफर अली नकवी, सिराज मेंहदी, नसीब पठान और फजले मसूद जैसे दिग्गज नेता हाशिए पर जा चुके हैं. स्थानीय तौर पर मुसलमान आबादी में जनाधार रखने वाले इन नेताओं को कांग्रेस क्षेत्रवार जिम्मेदारी देकर मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर खींचने का भरसक प्रयास करने वाली है.

हालांकि, प्रियंका का प्रवेश गैर-जाटव दलित वोटों को कांग्रेस की ओर लाने में मदद कर सकता है जो पिछले दो चुनावों में भाजपा की ओर गया था और जिसके बूते भगवा पार्टी ने बढ़त हासिल की थी. पिछले चार वर्षों में देशभर में दलितों पर हुए अत्याचार की घटनाओं को उजागर करने को लेकर पार्टी की एक विस्तृत योजना है. पार्टी गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी और भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद रावण जैसे दलित नेताओं के साथ बातचीत कर रही है.

 राहुल इस बात को समझते हैं कि इससे सपा-बसपा गठबंधन को कितना नुक्सान हो सकता है, पर कांग्रेस यह भी बखूबी समझती है कि इस कदम से सपा-बसपा कांग्रेस को ज्यादा सीटों के प्रस्ताव के साथ अपने साथ लेने पर पुनर्विचार करने को विवश हो सकती हैं. राहुल पहले ही एक संदेश दे चुके हैं, ''जहां तक संभव हो हम अखिलेश यादव और मायावती के साथ तालमेल बनाकर चलेंगे. साथ ही, कांग्रेस की विचारधारा के लिए जगह बनाना हमारे लिए अहम है और यह उस दिशा में एक बड़ा कदम है." कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि तीनों दलों के नेता अनौपचारिक रूप से लोकसभा क्षेत्रवार चर्चा के लिए आपस में बैठेंगे और जहां भी आवश्यक हो वहां दोस्ताना लड़ाई की संभावनाओं पर विचार करेंगे ताकि एक-दूसरे की क्षति कम से कम हो सके.

सपा-बसपा गठबंधन में जगह न पाने वाली कांग्रेस अब यूपी में छोटे दलों से तालमेल बिठाने को लेकर एकराय नहीं बना पाई है. सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) बनाकर सपा के खिलाफ अपना विद्रोही तेवर दिखा रहे हैं. कांग्रेस के लिए शिवपाल के खुले ऑफर के बावजूद कांग्रेसी नेता उनसे गठबंधन करने को लेकर उत्साहित नहीं हैं. कांग्रेस के एक प्रदेश सचिव बताते हैं, ''शिवपाल यादव को साथ लेकर कांग्रेस अखिलेश यादव के साथ मायावती से भी अपने संबंध नहीं खराब करना चाहती." 2009 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस ने राष्ट्रीय लोकदल और महान दल के साथ मिलकर लड़ा था. इस बार भी कांग्रेस की नजर महान दल, पीस पार्टी, अपना दल (कृष्णा पटेल) जैसे छोटे दलों पर है जिनसे वह अपनी शर्तों पर गठबंधन कर सकती है. पार्टी को कई मतदाता वर्गों में पैठ बनाने में इससे मदद मिल सकती है.

सपा-बसपा के लिए चुनौती सिर्फ मुसलमान, दलित और ओबीसी वोटों के विभाजन को रोकना नहीं है, बल्कि अपने सामाजिक दायरे का विस्तार करना और अन्य हाशिए पर खड़े समूहों को उचित प्रतिनिधित्व देकर उन्हें अपने साथ जोडऩा है. सपा अब तक यादवों, जो कि प्रदेश की कुल आबादी के 9 फीसदी है और बसपा जाटव वोटों जो कि आबादी के 12 फीसदी हैं, पर ही केंद्रित है. इस दिशा में एक वैसा ही प्रयास दिख रहा है जैसा कि उपचुनावों के दौरान नजर आया था. गोरखपुर और फूलपुर में सपा के उम्मीदवार निषाद और कुर्मी समुदाय से थे, जिन्हें पहले भाजपा के भरोसेमंद वोट के रूप में देखा जाता था. 80 सीटों के लिए जिताऊ जातिगत समीकरण खोजना कोई आसान काम नहीं होगा और प्रियंका के इस समर में कूद पडऩे से काम और जटिल हो गया है.

यहां तक कि प्रियंका के सामने भी चुनौती बहुत बड़ी है—एक ऐसी पार्टी को फिर से जिंदा करना जो 1984 में 51 फीसदी वोट हिस्सेदारी से खिसककर 30 साल में मात्र 7 फीसदी पर पहुंच गई है. 1999 में, जब उनसे पूछा गया कि वे राजनीति में कब शामिल होंगी, तो उन्होंने कहा था, ''आपको इसके लिए लंबा, बहुत लंबा इंतजार करना होगा." अब आखिरकार वे जब सियासत में खुलकर उतरने का फैसला कर चुकी हैं, तो उन्हें अपनी काबिलियत साबित करते हुए पार्टी की जीत की राह तैयार करने के लिए शायद लंबा समय नहीं मिलेगा.

प्रियंका के निजी दायरे

जन्मतिथिः 12 जनवरी, 1972

शिक्षाः दिल्ली के बाराखंबा रोड ऌपर मॉडर्न स्कूल से पढ़ाई की, फिर अपनी दादी इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भाई राहुल के साथ घर में ही शिक्षा-दीक्षा हासिल की. जीसस ऐंड मेरी कॉलेज से मनोविज्ञान में ग्रेजुएट

शादीः बचपन के दोस्त रॉबर्ट वाड्रा (अब 50 वर्षीय) के साथ, 18 फरवरी, 1997 को हिंदू विधि-विधान से शादी हुई

निवासः दिल्ली में 35 लोधी एस्टेट पर रहती हैं, दो बच्चे हैं—बेटा रेहान, 18 वर्ष, और बेटी मिराया, 16 वर्ष. प्रियंका का एक और घर शिमला से 14 किमी दूर छाराब्रा में है. 3.5 बीघे का यह प्लॉट 8,000 फुट से ज्यादा ऊंचाई पर है

शुरुआती असरः किशोर उम्र में अपनी दादी से प्रभावित थीं और सियासतदां बनना चाहती थीं. मैदान में उतरने के लिए तीन दशकों का वक्त लिया. हमेशा मां सोनिया और भाई राहुल की सियासी सलाहकार रही हैं और उनके निर्वाचन क्षेत्रों की देखरेख करती हैं. पहला चुनाव अभियान 1997 में चलाया, मां के लिए, जब वे 27 साल की थीं

निजी लम्हेः नेहरू मेमोरियल म्यूजियम ऐंड लाइब्रेरी के उस एक कमरे में नियमित तौर पर जाती हैं जहां उनके पिता के इस्तेमाल किए हुए कपड़े, जूते और दूसरी चीजें रखी हैं और उनकी साफ-सफाई करती हैं. वे एक घंटा इस कमरे में बिताती हैं और इस दौरान किसी को उसमें जाने की इजाजत नहीं होती

क्षमाशील हृदयः 19 मार्च, 2008 को नलिनी श्रीहरण से मिलने वेल्लूर जेल गईं, जिन्हें 1991 में राजीव की हत्या में भूमिका के लिए गिरफ्तार किया गया था. बाद में उन्होंने कहा, ''मेरा साथ हुई हिंसा और नुक्सान को लेकर अपने मन को शांत करने का यह मेरा तरीका था."

धार्मिक रुझानः बौद्ध दर्शन में यकीन और विपश्यना पद्धति का अभ्यास करती हैं

बेहद प्यार करने वाली माः अपने बच्चों की पीटीए में जाना कभी नहीं भूलतीं. उनके लिए कपकेक बनाना उन्हें बहुत अच्छा लगता है

भाजपा के क्या हैं दांव

भाजपा के बड़े नेता व्यक्तिगत बातचीत में मानते हैं कि प्रियंका अगड़ी जातियों के वोट खींच सकती हैं; पार्टी को सवर्ण जातियों के गुस्से का पता है और वह उम्मीद कर रही है कि आर्थिक तौर पर पिछड़ी अगड़ी जातियों के लिए 10 फीसदी आरक्षण से यह गुस्सा दूर हो जाएगा

पार्टी बीते दो चुनावों के जाति गणित—यानी अगड़ी जातियों (ब्राह्मण और ठाकुर) के गठजोड़ और गैर-यादव ओबीसी धड़ों, गैर-जाटव दलितों और किसानों के समर्थन—को बनाए रखने का मंसूबा बना रही है

राम मंदिर निर्माण का शोर-शराबा बढ़ाकर तमाम जातियों को हिंदू छतरी के तले लाने का मंसूबा बना रही है

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