एडवांस्ड सर्च

कानून का पाठ

कड़ी मेहनत और दोहराव के इस स्तर का मतलब यह था कि अधिकतर छात्र, यहां तक कि वे भी जिन्होंने विभिन्न संदर्भ पुस्तकों से नकल करके अपने प्रोजेक्ट्स तैयार किए हों, इस प्रक्रिया में कुछ न कुछ हासिल ही करते हैं.

Advertisement
शमनाद बशीरनई दिल्ली, 26 June 2019
 कानून का पाठ कानून की सीख बेंगलूरू के एनएलएसआइयू के कैंपस में वाइस-चांसलर आर. वेंकट राव के साथ छात्र

लॉ फर्मों के लंबे और श्रमसाध्य घंटों के लिए कुछ कहा जाना चाहिए. कुछ लोग इसे गुलामी कह सकते हैं, लेकिन इसका फायदा यह है कि यह एक ही काम में जुटे दूसरे लोगों के साथ आपको मजबूती के साथ बांधे रखने में मदद करता है-जो सुबह से ही कड़ी मशक्कत में जुट जाते हैं. ऐसा ही मेरे और मेरे प्रिय मित्र अमित दत्ता के साथ होता था. संयोग से, हमने नौकरी के लिए एक ही दिन साक्षात्कार दिया (देश की प्रमुख बौद्धिक संपदा फर्म आनंद ऐंड आनंद में) और उसके बाद कानून तथा जीवन के बारे में सीखने के लिए हम दोनों ने अनगिनत देर रातें दक्रतर में ही बिताईं.

अमित दत्ता जाने-माने आइपी वकील बन गए लेकिन मैंने अपना रास्ता थोड़ा बदल लिया. यह लेख कानूनी पढ़ाई के एक नए मॉडल की कामयाबी के बारे में है, जिसे कुछ ही सप्ताह पहले दिवंगत हुए प्रो. माधव मेनन ने बेंगलूरू स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (एनएलएसआइयू) के जरिए स्थापित किया था. एक ऐसा मॉडल जिसे कई बार दोहराया गया है—आखिरी बार जब मैंने गिनती की थी, संख्या 25 तक पहुंच गई थी.

कुछ साल पहले मैं अमित से मिलने गया तो मेरी मुलाकात उनकी बेटी तारा से हुई. वह अपनी वर्कशीट पर अंग्रेजी और गणित के कुछ सवालों को हल करने में जुटी हुई थी. बाद में अमित की पत्नी मोनिका, जो भारत के प्रमुख एंटरटेनमेंट लॉ वकीलों में से एक हैं, से पता चला कि तारा जो कर रही थी वह 'कुमोन' नामक एक जापानी शैक्षणिक तकनीक का हिस्सा है, जहां छात्र पूर्णतया दोहराव और अभ्यास के माध्यम से सीखते हैं.

मैं हैरान था. प्रो. मेनन ने अनजाने में एनएलएसआइयू में इसी चीज की तो शुरुआत की थी, जहां केवल प्रत्येक सेमेस्टर के अंत में परीक्षा से ठीक पहले कानून को रटने की बजाए, छात्रों को पूरे साल इसी तरह तैयार करने के लिए अकादमिक पाठ्यक्रम तैयार किया गया था. वे जानते थे कि अगर कानून को गंभीरता से लिया जाना है और इसे 1980 के दशक में सबसे प्रतिष्ठित रहे व्यावसायिक शिक्षण पाठ्यक्रम इंजीनियरिंग और चिकित्सा के साथ बराबरी पर खड़ा करना है, तो यह बदलाव जरूरी है.

इसलिए उन्होंने कानून की पढ़ाई के लिए तीन महीने का ट्राइमेस्टर मॉडल तैयार किया, जहां निरंतर सीखना था. इस त्रैमासिक मॉडल के हर छात्र को कक्षाओं में दिए जाने वाली विभिन्न प्रजेंटेशन आदि के साथ-साथ दो सेट की परीक्षा और कई शोध तथा लेखन प्रोजेक्ट्स करने होते थे. सभी छात्रों के लिए उनके प्रत्येक विषय में एक शोध पत्र (जिसे 'प्रोजेक्ट' कहा जाता है) लिखना अनिवार्य होता था. नतीजतन, जब तक छात्र लॉ स्कूल से उत्तीर्ण होकर निकलते थे, तब तक वे तकरीबन 75 परीक्षाएं दे चुके होते थे और 60 प्रोजेक्ट्स लिख चुके होते थे.

कड़ी मेहनत और दोहराव के इस स्तर का मतलब यह था कि अधिकतर छात्र, यहां तक कि वे भी जिन्होंने विभिन्न संदर्भ पुस्तकों से नकल करके अपने प्रोजेक्ट्स तैयार किए हों, इस प्रक्रिया में कुछ न कुछ हासिल ही करते हैं. उन दिनों, लोगों के पास लैपटॉप या इंटरनेट की इतनी सुविधा उपलब्ध नहीं थी, इसलिए हमें हाथ से नकल करनी होती थी और एक-एक शब्द लिखना पड़ता था. यानी लिखने या नकल के दौरान वे शब्द दिमाग के किसी न किसी कोने में पहुंचकर बैठ जाते, जिसे बाद में दोहराकर उभारा जा सकता था. नतीजतन, अधिकतर एनएलएस छात्र बुनियादी शोध और लेखन कौशल से परिचित हो गए और कॉलेज से निकलते-निकलते अन्य लॉ कॉलेजों के छात्रों के मुकाबले उनमें बेहतर विधि दक्षता और लेखन कौशल विकसित हो जाता था.

मैंने बाद में पता लगाया तो जाना कि प्रो. मेनन को इस कुमोन तकनीक की कोई जानकारी नहीं थी. यह तो असल में इस अनुकरणीय कानूनी शिक्षक की प्रतिभा थी. उन्होंने अनजाने में एक ऐसे शिक्षाशास्त्र का बीड़ा उठाया था, जिसमें दक्षता प्राप्त करने के लिए उन्होंने अभ्यास, अभ्यास और अधिक अभ्यास पर जोर दिया. यह कानूनी पेशे में सफलता के लिए सबसे महत्वपूर्ण घटक है. जरूरी नहीं कि जाने-माने वकील सबसे बुद्धिमान रहे हों बल्कि दिन-रात मेहनत करके और अनगिनत मुकदमों के जरिए वे अपना कौशल निखारते हैं.

जल्द ही, एनएलएसआइयू की ख्याति एक ऐसे ब्रान्ड के रूप में हो गई जहां के छात्र दूसरों की तुलना में बेहतर होते हैं, कम से कम कानूनी शोध और लेखन में तो जरूर ही. कठोर शैक्षणिक वातावरण का मतलब यह भी था कि छात्र लंबे समय तक और उच्च तनाव वाले वातावरण में भी काम कर सकते हैं.

एनएलएस मॉडल के कई अन्य पहलू थे, जिसमें छात्रों को नेतृत्व के लिए अत्यधिक स्वतंत्रता प्रदान करना, मूट कोर्ट और डिबेट जैसी गतिविधियों में संलग्न होना और अपने स्वयं की सोसाइटीज और ग्रुप बनाना शामिल है. यहां तक कि कैंपस की भर्तियां भी छात्रों की ओर से संचालित पहल थी.

प्रो. मेनन ने 'कानूनी सहायता' क्लीनिक के माध्यम से कानूनी सिद्धांत और व्यवहार के बीच पुल बनाने की भी कोशिश की. कानून स्कूलों में थोड़ा नैदानिक शिक्षा को लाने के अलावा, इससे छात्रों को परिवर्तन लाने के लिए कानून की ताकत और क्षमता से परिचित कराकर उन्हें सामाजिक रूप से संवेदनशील बनाने में मदद मिली. वे हमेशा कहते थे: वकील को सोशल इंजीनियर होना चाहिए. यह केवल कानूनी शिक्षा नहीं थी, बल्कि 'न्याय' की शिक्षा थी. उन्होंने उम्मीद जताई कि एनएलएस असाधारण वकीलों की एक ऐसी नई नस्ल तैयार करेगा, जो बेहतरी लाने के लिए समाज को बदलेंगे.

हमारे शैक्षणिक वर्ष की शुरुआत में ही, प्रो. मेनन ने हमें यह एहसास दिलाया कि हम 'चुने हुए' हैं इसलिए हम खास हैं. मुझे लगता है कि इस मनोवैज्ञानिक प्रोत्साहन ने एनएलएस की सफलता की कहानी लिखने में अहम भूमिका निभाई है और यहां के छात्रों में वह आत्मविश्वास भरा है जिसके साथ स्नातकों ने पेशेवर क्षेत्र में अपनी शानदार शुरुआत की है.

प्रो. मेनन ने कानून की विभिन्न विषयों की समझ को बढ़ावा दिया, जिससे आज के दौर के ऐसे वकीलों को गढऩे में मदद मिल सके, जो  केवल कानून (कानूनी पेच और मुकदमों) का हवाला नहीं दें, बल्कि नए कानूनी/नीति मानदंडों के निर्माण को भी प्रोत्साहित करें. कानून की सामग्री अक्सर अन्य विषयों से ली जाती है. इस प्रकार, कानूनी मानदंडों के वास्तविक सार और इसके बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक प्रभाव को समझने के लिए अंतर-विषयक तरीका बेहद महत्वपूर्ण था.

लेकिन सबसे बढ़कर, प्रो. मेनन के पास कानूनी शिक्षा के लिए एक स्पष्ट दृष्टिकोण था और अपने उद्देश्य के लिए वे प्रतिबद्ध फैकल्टी को आकर्षित करने में सक्षम थे. ऐसे ही एक संकाय सदस्य प्रो. एम.पी. पद्मनाभ पिल्लै थे जिन्होंने हमें कॉर्पोरेट कानून सिखाया. उन दिनों, भारत उदारीकरण की प्रक्रिया में था और सेबी जैसे संस्थान और एफडीआइ जैसे शब्द अक्सर सुर्खियों में रहते थे.

हालांकि, प्रो. पिल्लै ने इन नवीनतम बहसों में पडऩे से मना कर दिया और हमें कॉर्पोरेट कानून की मूल बातें सिखाईं, जिनमें कई मामले तो 1900 की शुरुआत के थे. हम उन मामलों का अध्ययन करने के कारण निराश थे और भड़क गए, जहां संबंधित पक्ष (जैसे सालोमन) काफी पहले मर चुके थे लेकिन प्रो. पिल्लै उन मामलों पर ही डटे रहे. उन्होंने नवीनतम मामलों के संदर्भ तो दिए, लेकिन उनका जोर मूलभूत न्यायशास्त्रीय बुनियादी बातों पर ही अधिक रहा. उनका तर्क था कि अगर नींव मजबूत नहीं होगी तो आप इसके ऊपर कभी मजबूत इमारत खड़ी नहीं कर सकेंगे.

यह एक ऐसा दृष्टिकोण है जिसकी वकालत एलॉन मस्क जैसे बड़े उद्यमी भी करते हैं. जब उनसे पूछा गया कि वे ज्ञान के इतने अलग-अलग क्षेत्रों में कैसे कामयाब रहे, तो उन्होंने कहा, ''ज्ञान को एक शब्दार्थ बताने वाले वृक्ष के रूप में देखना चाहिए. सुनिश्चित करें कि पत्तियों/विवरणों में जाने से पहले आपको मूल सिद्धांत, यानी उस पेड़ के तने और बड़ी शाखाओं की समझ हो चुकी है. अन्यथा उन शाखाओं पर कुछ भी लटकता नहीं मिलेगा.''

एनएलएस में, मौलिक 'प्रथम सिद्धांतों' पर स्पष्ट रूप से ध्यान केंद्रित किया जाता था. हम भाग्यशाली रहे कि हमें कम से कम ऐसे कुछ शिक्षकों (जैसे प्रो. पिल्लै) से पढऩे का मौका मिला, जिन्होंने कानून की पढ़ाई में इस सिद्धांत को अपनाया और हमारे कानूनी पेड़ के तने तथा जड़ों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया, जिसकी पत्तियां हमें अपने दम पर विकसित करनी पड़ी. और यह मजबूत नींव थी (विशेष रूप से कॉर्पोरेट कानून में) जिसके कारण एनएलएस के स्ïनातक विधि फर्मों में सबसे आगे रहते हैं.

आज त्रासदी यह है कि हम मूलभूत बुनियादी ढांचे की कीमत पर 'बाह्य उपकरणों' के लिए अधिक भटकते हैं. छात्र साइबर कानून पर कोर्स के लिए ज्यादा उमड़ते हैं. वे यह महसूस नहीं करते कि यह साइबरस्पेस के लिए पारंपरिक कानूनी उपचारों (जैसे अपकृति कानून और अनुबंध कानून) से अधिक कुछ नहीं है. 1930 के डोनोगह्यू बनाम स्टीवेन्सन मामले की समझ के बिना ड्रोन संबंधित क्षति के लिए देयता निर्धारित करने वाले आधुनिक उत्पीडऩ कानूनों को पूरी तरह समझा ही नहीं जा सकता.

ऐसा नहीं कि एनएलएस मॉडल एकदम परफेक्ट है. इससे इतर चीजें भी रही हैं. प्रो. मेनन ने उम्मीद की थी कि उनके छात्र भारत के वंचितों और हाशिए के समुदायों का पक्ष रखेंगे लेकिन इससे उलट यहां के बहुतायत छात्र भारत के कॉर्पोरेट वाणिज्यिक क्षेत्र में गए. इसके अलावा, संकाय सदस्यों पर पढ़ाने का इतना अधिक भार था कि वे कानूनी प्रतिमानों पर नए दृष्टिकोण प्रकाशित करने और नई अवधारणाएं विकसित करने के लिए ज्यादा प्रोत्साहित नहीं हो पाते.

लेकिन एक बात जो हम सभी प्रो. मेनन से सीख सकते हैं, वह है परिस्थिति के अनुसार उनके ढल जाने की क्षमता. अपनी पुरानी बात को छोड़कर वे लगातार नए विचारों की तलाश में जुटे रहते थे और उसे अपनाने के लिए हमेशा तैयार रहते थे. आगे के बड़े ट्रेंड को भांप लेने में उनकी महारत अलौकिक थी, जैसा कि उन्होंने वकीलों के लिए पेशेवर शिक्षा जारी रखने के प्रयोग के साथ किया. यह एक ऐसा पहलू था जिसे हमने लंबे समय तक उपेक्षित रखा था.

प्रो. मेनन अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका जज्बा हमेशा मौजूद रहेगा. सीखना उनके लिए आजीवन जारी रहने वाली प्रक्रिया थी. उनका मानना था कि खुद को निखारने के लिए सतत अध्ययन करते रहना व्यक्ति के लिए जरूरी है. वास्तव में, पिछले ही साल (उनके 83वें जन्मदिन के कुछ ही दिन बाद), मैंने देखा कि एक वर्कशॉप के दौरान वे सभी प्रस्तुतियों में बैठे रहे और सावधानी से नोट्स ले रहे थे! वे दूसरों को हुनरमंद बनाने के लिए हमेशा समर्पित रहे.

आइए, हम यह उम्मीद रखें कि हमारे भविष्य के शिक्षक उनकी विरासत के साथ न्याय करेंगे. और वे शिक्षाशास्त्र में लगातार सुधार करने की परंपरा को जारी रखते हुए देश को शानदार वकील, समस्याएं हल करने वाले और गेम चेंजर्स देंगे.

—शमनद बशीर इन्क्रीजिंग डायवर्सिटी बाय इन्क्रीजिंग एक्सेस टू लीगल एजुकेशन (आइडीआइए) के संस्थापक और प्रबंध न्यासी हैं.

प्रो. मेनन वकीलों को सोशल इंजीनियर मानते थे. वे केवल कानूनी शिक्षा नहीं बल्कि न्याय की शिक्षा के लिए प्रयासरत थे.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay