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आवरण कथाः अनाज की ताजगी

हम जिन किसानों के साथ काम कर रहे हैं, अगर उन्हें मनचाही फसल उगाने की और अपने मनमाफिक उनकी कीमत तय करने की आजादी मिले. किसान ही अकेले हैं जिन्हें यह तय नहीं करने दिया जाता कि उनकी पैदावार के दाम किस तरह तय हो.

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aajtak.in
श्वेता पुंज/ संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 10 January 2018
आवरण कथाः अनाज की ताजगी इशिरा मेहता, पुनीत झांझरिया, संस्थापक ओरिजिनल इंडियन टेबल

ओरिजिनल इंडियन टेबल नाम की कंपनी के संस्थापक इशिरा मेहता और पुनीत झांझरिया हिंदुस्तानी जायके को बेहतर बनाने और प्राचीन शानदार अनाजों को वापस लाने के मिशन में लगे हैं. उम्र के चौथे दशक में चल रहे दोनों ने हिमाचल प्रदेश से लेकर उत्तरपूर्व के छोटे गांव-खेड़े तक देश भर—20 राज्यों और 90,000 किमी—में फैले खेत-खलिहानों की खाक छानी है.

अपनी यात्राओं में उन्होंने ऐसे धान्य और अनाजों की खोज की, जिनकी मांग कम या नहीं होने की वजह से किसान उन्हें तिलांजलि दे रहे थे या केवल निजी खपत के लिए उगा रहे थे. भले ही ये धान्य और अनाज उस इलाके की जलवायु के अनुकूल और पोषण के लिहाज से समृद्ध हैं.

मेहता कहते हैं, ''किसानों के लिए स्थानीय अनाज उगाना भी ज्यादा आसान है और ये सेहत के लिहाज से भी ज्यादा अच्छे हैं." इन पैदावारों को बेचने और ओरिजिनल इंडियन टेबल की स्थापना का विचार सालों की आजमाइश और गलतियों के बाद 2015 में आया.

झांझरिया और मेहता ने 2013 में किसानों को सीधे बाजार से जोडऩे और बिचौलियों से निजात दिलाने के विचार के साथ शुरुआत की थी. इसी ने ओरिजिनल इंडियन टेबल की शक्ल अख्तियार कर ली. झांझरिया और मेहता बराबर के हिस्सेदार हैं और कंपनी में पूरी रकम उन्होंने ही लगाई है.

वे अपना मार्केटिंग चैनल बनाने का इरादा भी रखते हैं और बाहर से रकम उगाहने से पहले निर्यात की तरफ देख रहे हैं और शेफ के साथ मिलकर भी काम कर रहे हैं.—श्वेता पुंज

इशिरा मेहता,  36 वर्ष, पुनीत झांझरिया,  39 वर्ष, संस्थापक ओरिजिनल इंडियन टेबल

पेशेवर दक्षता

झांझरिया ग्रासरूट्स बिजनेस फंड से जुड़े पूर्व निवेशक हैं और मेहता इंटरनेशनल फाइनेंस कॉर्पोरेशन में प्रोजेक्ट मैनेजर हंच

समाधान की तलाश

हिंदुस्तान के प्राचीन खोए हुए अनाजों को लाना, जो आहार सूची से गायब हुए.

शानदार समाधान

किसानों को फसलों का रकबा बढ़ाते देखने में. बढ़ती जागरूकता की वजह से साल-दर-साल ब्लैक राइस का उत्पादन बढ़ रहा है.

मिली खुशी

हम जिन किसानों के साथ काम कर रहे हैं, अगर उन्हें मनचाही फसल उगाने की और अपने मनमाफिक उनकी कीमत तय करने की आजादी मिले. किसान ही अकेले हैं जिन्हें यह तय नहीं करने दिया जाता कि उनकी पैदावार के दाम किस तरह तय हो.

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