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आवरण कथा-युवाओं पर बड़ा दांव

लोकसभा चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाने जा रहे पहली बार मतदाता बने युवाओं तक पहुंचने और उन्हें अपनी ओर खींचने की रणनीतियां बनाने और संदेश देने में व्यस्त हैं राजनैतिक दल

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कौ‌शिक डेकानई दिल्ली, 28 March 2019
आवरण कथा-युवाओं पर बड़ा दांव नया मतदाता

लाल किले की प्राचीर से 2017 में दिए अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, ''1 जनवरी, 2018 कोई सामान्य तारीख नहीं होगी—नई शताब्दी में पैदा हुए लोग 18 वर्ष के होने लगेंगे. इन लोगों के लिए यह जीवन का निर्णायक साल होगा. वे 21वीं शताब्दी में हमारे राष्ट्र के भाग्य-विधाता होंगे.'' इसके छह महीने बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रतिनिधि रामलाल के साथ करीब दो घंटे तक चली बैठक में मोदी ने उनसे कहा कि वे नई सहस्राब्दी वाले मतदाताओं—इस शताब्दी में जन्मे और आम चुनाव 2019 में मतदान करने के अधिकारी युवाओं—तक पहुंच बनाने की व्यापक योजना तैयार करें. निर्वाचन आयोग ने जब 10 मार्च को लोकसभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा की तो प्रधानमंत्री ने इस मतदाता सूची में जगह बनाने वाले आठ करोड़ चालीस लाख नए-नवेले मतदाताओं से सीधी अपील की कि वे आगामी चुनाव में बड़ी संख्या में मतदान करें.

पहली बार मतदाता के रूप में अपने मताधिकार का प्रयोग करने जा रहे युवाओं पर मोदी का निरंतर ध्यान देना अकारण नहीं है. सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के एक सर्वेक्षण के अनुसार, 2014 के लोकसभा चुनाव में पहली बार मतदान करने वालों ने भाजपा को सर्वाधिक समर्थन दिया था.

इसके मुताबिक 18-22 वर्ष आयु वर्ग के लोगों ने कांग्रेस की तुलना में भाजपा को दोगुना समर्थन दिया था. लंदन के राजनीतिविज्ञानी ऑलिवर हीथ ने 2015 में एक विश्लेषण में पाया था कि कांग्रेस से मतदाताओं के विमुख होने की आम धारणा के विपरीत 2014 में भाजपा की भारी जीत का कारण उसकी नए मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में सफलता थी.

कांग्रेस हालांकि अभूतपूर्व तरीके से हारी थी, फिर भी उसके समर्थकों का एक तिहाई ही ऐसा था जिसने अपनी पसंद बदलते हुए भाजपा को चुना था. हीथ समझाते हैं कि भाजपा उन मतदाताओं को अपनी ओर खींचने में सफल रही, जिन्हें इसके पहले प्रभावी रूप से प्रेरित नहीं किया जा सका था.

साथ ही, वहां पर भी कांग्रेस के पक्षधर मतदाता भाजपा की ओर गए जहां पार्टी की स्थिति पहले के चुनावों में कमजोर रही थी. मोदी भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं. परीक्षार्थियों को परीक्षा के तनाव से मुक्त रखने में सहायता करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री की लिखी पुस्तक एग्जाम वारियर्स में लेखक परिचय देने वाले अंशों में एक जगह पर लिखा गया है कि ''उनकी जीत में भारत के युवाओं का ऐतिहासिक योगदान था, खासतौर पर पहली बार मतदान करने वालों का.''

युवा वोटों के लिए दौड़-भाग

पिछले कई वर्षों से नए मतदाताओं को लक्ष्य कर किए जा रहे प्रयत्नों के परिणामस्वरूप 18-25 साल आयु वर्ग के मतदाताओं का मतदान के लिए निकलना तेजी से बढ़ा है. 2009 में इनका मतदान फीसद 54 था जो 2014 में बढ़कर 68 हो गया था. इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि 2014 में ऐसा पहली बार हुआ था कि मताधिकार का पहली बार प्रयोग करने वालों का मत-प्रतिशत पूरे चुनाव के कुल मत प्रतिशत 66 से ज्यादा था.

राजनैतिक विद्वानों का आकलन है कि यह रुझान 2019 में भी जारी रहेगा और इसी के मद्देनजर न केवल भाजपा बल्कि सभी प्रमुख राजनैतिक दलों ने देश की कुल आबादी के 9 प्रतिशत इस युवा मतदाता समूह के ज्यादा से ज्यादा हिस्से को अपने साथ जोडऩे की योजनाएं बनाई हैं.

राहुल गांधी की कांग्रेस को पुनर्जीवित करने की योजना भी मुख्य रूप से उनकी पार्टी की इसी योग्यता पर निर्भर करती है कि वह पहली बार मतदान करने वाले 8.40 करोड़ लोगों की पहली पसंद के रूप में उभरे. आंकड़ों के अनुसार 2014 में भाजपा और कांग्रेस को मिले कुल मतों का अंतर 6.40 करोड़ था.

अब 2019 में हर निर्वाचन क्षेत्र में औसतन लगभग पहली बार वोट देने वाले 1,55,000 मतदाता होंगे. यह मानते हुए कि कुल मतदान 70 प्रतिशत होगा, सभी 543 निर्वाचन क्षेत्रों में लगभग 1,08,500 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे.

2014 में हुए चुनावों में 188 निर्वाचन क्षेत्रों में हार-जीत का अंतर एक लाख से कम था और 224 क्षेत्रों में कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही थी. उस समय 92 निर्वाचन क्षेत्रों में हार-जीत का अंतर कुल मतदान के पांच प्रतिशत से कम रहा था.

लेकिन युवा मतदाताओं की इस बाढ़ को अपने पक्ष में करने के लिए कांग्रेस को बहुत बड़े पैमाने पर प्रचार अभियान चलाते हुए लगभग एक साल से सक्रिय भाजपा की चुनावी मशीनरी को कमजोर साबित करना होगा. भाजपा के अभियान की अगुआई खुद नरेंद्र मोदी के हाथ में है.

वे न केवल भाजपा के शीर्षस्थ प्रचारक हैं बल्कि भाजपा के सबसे ज्यादा विश्वसनीय ब्रॉन्ड भी हैं. और ब्रॉन्ड मोदी को पुलवामा में आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान में हुए हवाई हमले से और मजबूती हासिल हुई है.

पिछले दिसंबर में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की हार के बाद बेरोजगारी और कृषि क्षेत्र की दुर्दशा पर शोरगुल के बीच भारत-पाकिस्तान तनाव के हालिया दौर से भाजपा को मजबूती से सामने आने का मौका मिला है.

जल्दी शुरुआत का भाजपा को फायदा?

इंडिया टुडे संवाददाताओं ने देशभर में पहली बार के कुछ वोटरों से बातचीत की तो पता चला कि राष्ट्रीय सुरक्षा सबसे ज्वलंत मुद्दा है और लोगों ने पुलवामा आतंकी हमले के बाद मोदी सरकार की प्रतिक्रिया पर संतोष भी जाहिर किया. ज्यादातर लोगों ने रोजगार के अवसरों या इसकी कमी पर बात नहीं की.

ह आंशिक रूप से सत्य है क्योंकि फस्र्ट टाइम वोटर अभी जॉब मार्केट में पहुंचा नहीं है. लखनऊ के 18 साल के कॉलेज छात्र हर्ष वर्मा कहते हैं, ''मैं नरेंद्र मोदी का समर्थन करूंगा क्योंकि वे नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक सरीखे सख्त फैसले ले सकते हैं.

दिल्ली के हंसराज कॉलेज से वाणिज्य स्नातक कोर्स कर रहीं 19 साल की हर्षिता गुप्ता कहती हैं, ''नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का जिस तरह जवाब दिया है, उससे मैं काफी प्रभावित हूं.''

मोदी की यह सशक्त और निर्णायक होने की छवि ही है जिसे भाजपा मतदाताओं के इस युवा समूह के बीच अच्छी तरह से भुनाना चाहती है. एक मीडिया समूह की ओर से किए गए सर्वे से संकेत मिलता है कि 'मोदी को वोट करें' नारे के साथ साधा जा रहा भाजपा का प्रचार अभियान अच्छे नतीजे ला सकता है.

इस सर्वे के मुताबिक किसी एक पार्टी के पक्ष में मतदान करने का सवाल सामने होने पर केवल 18 प्रतिशत पुरुष और 10 प्रतिशत महिला मतदाता चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी के बारे में विचार करते हैं. यही वजह है कि युवाओं में पकड़ बनाने के भाजपा के सभी कार्यक्रम मोदी के ही इर्द-गिर्द घूमते हैं. मोदी के व्यक्तित्व का आकर्षण उन मतदाताओं में भी जोश भर रहा है जो गैर भाजपा सरकारों की जनहितकारी नीतियों से लाभान्वित हुए हैं.

पश्चिम बंगाल में हुगली के विवेकानंद महाविद्यालय में फिजिकल एजुकेशन की 19 वर्षीया छात्रा मौमिता दास की ही नजीर लें—उन्हें ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार का कन्याश्री अवार्ड मिला है जिसके तहत उन्हें करियर बनाने के लिए 25,000 रु. की ग्रांट मिली है.

उन्हें राज्य सरकार से साइकिल भी मिली है. राजनैतिक रूप से सचेत मौमिता अखबार और टीवी चैनल से खुद को अपडेट रखती हैं लेकिन वे वोट किसको देंगी, यह नहीं बताना चाहतीं. लेकिन सवाल पूछे जाने पर वे मोदी को लेकर अपना उत्साह छिपा नहीं सकीं.

उन्होंने कहा, ''मैं उन्हें पसंद करती हूं. उन्होंने देश के लिए और हम सबके लिए अच्छा काम किया है.'' यही वजह है कि भाजपा के युवाओं तक पहुंचने के सारे कार्यक्रम मोदी के आसपास घूमते हैं.

युवाओं के बीच पकड़ बनाने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में लड़कियों के प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान आइटी कॉलेज में 'युवाओं के मन की बात, मुख्यमंत्री के साथ' कार्यक्रम का आयोजन किया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति युवाओं में बढ़ते आकर्षण को भुनाने के लिए योगी ने कार्यक्रम में न केवल केंद्र सरकार के बेहतर कार्य गिनाए बल्कि 'मोदी जी ने देश की राजनीति को परिवारवाद से ऊपर उठाया है' कहकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसी पाटियों पर भी निशाना साध दिया. हालांकि पहली बार वोट डालने जा रहे युवाओं में राम मंदिर को लेकर भी एक जिज्ञासा है.

आइ.टी. कॉलेज में योगी आदित्यनाथ का भाषण खत्म होते ही बीटेक प्रथम वर्ष की छात्रा अंशिका गुप्ता ने पूछा, ''केंद्र और राज्य में भी भाजपा सरकार होने के बावजूद राम मंदिर क्यों नहीं बन पाया?'' योगी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी को आगे किया और बोले ''भरोसा रखें, प्रधानमंत्री मोदी को नामुमकिन को मुमकिन करना आता है. राममंदिर का निर्माण जरूर होगा.''

जनवरी में प्रधानमंत्री के प्रति युवा मतदाताओं का समर्थन जुटाने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने मुंबई में मोदी युवा शक्ति अभियान शुरू किया था. इसका उद्देश्य मुंबई के लगभग 60 कॉलेजों में प्रगति और विकास के बारे में मोदी का दृष्टिकोण स्थापित करना था.

इसी तरह, भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) ने युवा मतदाताओं को केंद्र में रखते हुए 'मोदी के लिए शपथ लें' अभियान के माध्यम से कुछ नंबरों पर 'मिस्ड काल' देकर समर्थन की अभिव्यक्ति का उपक्रम शुरू किया है.

इसके अलावा उसने देश भर के कॉलेजों में 'नमो युवा स्वयंसेवक' भी नियुक्त किए हैं. भाजयुमो की अध्यक्ष और सांसद पूनम महाजन का दावा है कि उनके संगठन को रोजाना 50,000 मिस्ड कॉल मिल रही हैं और चुनाव के समय तक देश भर में 50 लाख 'नमो युवा स्वयंसेवक' नियुक्त कर लिए जाएंगे.

जल्दी शुरुआत का भाजपा को फायदा?

भारतीय जनता पार्टी की युवा शाखा ने मुंबइया फिल्मों के चरित्रों और संवादों को पिरोने वाले पोस्टरों के माध्यम से मतदाता पंजीकरण के बारे में जागरूकता अभियान भी छेड़ रखा है.

इस अभियान के एक पोस्टर पर दबंग फिल्म के चर्चित संवाद को थोड़ा बदल कर लिखा गया है—''थप्पड़ से डर नहीं लगता, वोटर आइडी न होने से लगता है.''

अकेले भारतीय जनता युवा मोर्चा ही किसी राजनैतिक दल की ऐसी युवा शाखा है जो 'स्नैपचैट' जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भी मौजूद है. बीती 17 जनवरी को इसने अरुणाचल प्रदेश में तवांग से 'विजय लक्ष्य 2019' अभियान की शुरुआत करते हुए देश के दूर-दराज के जिलों में मोदी सरकार की उपलब्धियां पहुंचाने का कार्यक्रम शुरू किया.

इसकी अध्यक्ष महाजन अब तक देश के 200 जिलों में कोई एक लाख नए मतदाताओं से संवाद कर चुकी हैं. भारतीय जनता पार्टी की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने भी बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दक्षिण के विश्वविद्यालयों में व्यापक प्रचार अभियान छेड़ रखा है.

इनसे अलग भाजपा के आइटी सेल ने नए मतदाताओं को पंजीकृत होने में मदद करने वाले ऐप के माध्यम से 'मिलेनियम वोट कैंपेन' चला रखा है.

ऐसा नहीं है कि हर कोई भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय सुरक्षा के इर्द-गिर्द बुने गए कथानक से सहमत है. ऐसे युवा भी बड़ी संख्या में हैं जिनकी चिंताओं में सरकार से अपेक्षित सुविधाओं के सवाल भी ऊंची प्राथमिकता पर मौजूद हैं.

मुंबई में भांडुप के रहने वाले युवा सागर यादव की राय है कि निश्चय ही भ्रष्टाचार और राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले महत्वपूर्ण हैं, लेकिन मैं तो उस पार्टी का समर्थन करूंगा जो बेहतर इंटरनेट स्पीड और मुंबई में अनौपचारिक मुलाकातों के और केंद्र स्थापित करने की पहल करे.

जयपुर में चिकित्सा विज्ञान के 19-वर्षीय छात्र लक्ष्य भास्कर का कहना है कि वे कांग्रेस के पक्ष में मतदान करेंगे क्योंकि भाजपा ने उनके गृह जिले झुंझुनू में मेडिकल कॉलेज खोलने की दिशा में कोई काम नहीं किया.

कांग्रेस के समक्ष चुनौतियां

इस उम्मीद के साथ कि राष्ट्रीय नहीं, इसी तरह के स्थानीय मुद्दे बहुत-से युवा मतदाताओं के लिए निर्णायक कारक बनेंगे, कांग्रेस ने इन युवाओं तक पहुंचने की दौड़ तेज की है.

भाजपा ने अगर उत्तर प्रदेश में 'मेरा पहला वोट मोदी को' अभियान चलाया है तो कांग्रेस की महाराष्ट्र इकाई ने 'पहला वोट राष्ट्र को' अभियान चलाया है.

इस अभियान के तहत पार्टी कार्यकर्ता राज्य में अब तक ढाई लाख नए मतदाताओं से संपर्क कर चुके हैं.

दिसंबर 2017 में कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभालने के बाद से राहुल गांधी लगातार युवाओं को जोडऩे की बात करते रहे हैं.

इस क्रम में उन्होंने कांग्रेस के महाधिवेशन में युवाओं के लिए मंच पर जगह बनाए रखने की बात करने से लेकर 'अपनी बात राहुल के साथ' शृंखला में युवा छात्रों से संवाद भी किया है. यहां तक कि प्रियंका गांधी ने भी उत्तर प्रदेश में युवा छात्रों के साथ कुछ बैठकें की हैं.

कांग्रेस आगामी लोकसभा चुनावों के पहले 10 लाख युवा मतदाताओं को सदस्य बनाने के लक्ष्य पर काम कर रही है.

दूरस्थ क्षेत्रों में लड़के-लड़कियों को अंग्रेजी पढ़ाने से लेकर छात्रों को कॉलेज में प्रवेश लेने में मदद करने तथा मेट्रो शहरों में पूर्वोत्तर भारत की लड़कियों की सुरक्षा में सहयोग करने जैसे तमाम कामों के माध्यम से पार्टी पहली बार मतदान करने जा रहे युवाओं को आकर्षित करने के लिए प्रयासरत है.

युवाओं, अल्पसंख्यकों तथा दलितों के मुद्दे उठाने और मोदी सरकार की नाकामियों को उजागर करने वाली युवा कांग्रेस की राष्ट्रव्यापी 'युवा क्रांति यात्रा' लगभग डेढ़ महीने में देश के 25 राज्यों से होती हुई जनवरी में समाप्त हुई थी.

कांग्रेस की भाजपा के 'एकरूप भारत' विचार के मुकाबले 'मैं भारत हूं' अभियान की आकल्पना करते हुए जातिगत हिंसा तथा गोमांस पर प्रतिबंध जैसे मुद्दों से उपजे क्षोभ को भी अपने पक्ष में मोडऩे की योजना है. इसका उद्देश्य उदारवादी भारत की संकल्पना प्रस्तुत करना है जहां नागरिकों से उनके खान-पान, पहनावे, रीतियों तथा संस्कृति पर सवाल नहीं उठाए जाते.

मुंबई के बोरीवली इलाके की निवासी छात्रा मानसी ठक्कर का कहना है कि ''मैं ऐसे प्रत्याशी को वोट दूंगी जो यह सुनिश्चित करे कि मैं जो चाहूं पहन सकूं, जो चाहूं खा सकूं और जब चाहूं तब सड़क पर निकल सकूं.''

यह कथ्य उन इलाकों में ज्यादा प्रभावी होता दिख रहा है जहां भाषायी और सांस्कृतिक पहचान के मसलों पर संघर्ष रहे हैं. गुवाहाटी के 19-वर्षीय प्रतीक डेका का मत है कि ''देश कट्टर हिंदूवादी राजनीति और नहीं झेल सकता. मैं कांग्रेस के पक्ष में मतदान करूंगा क्योंकि वही भारत के धर्म-निरपेक्ष स्वरूप को बनाए रख सकती है.''

असम में युवाओं ने पिछले दिनों नागरिकता (संशोधन) अध्यादेश, 2016 का व्यापक विरोध किया था जिसके माध्यम से बांग्लादेश से अवैध रूप से आए हिंदू शरणार्थियों तथा पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए पांच अन्य धार्मिक समूहों के लोगों को भारत की नागरिकता प्रदान करने की योजना थी.

फिर भी, आम चुनाव अब बस एक माह दूर रह गया है और राहुल अपनी पार्टी की युवा शाखाओं—युवक कांग्रेस तथा नेशनल स्टुडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआइ)—को सही दिशा में तेजी से सक्रिय नहीं कर सके हैं. इसका मुख्य कारण इन संगठनों के बीच किसी तरह का समन्वय न होना है.

कांग्रेस के एक महासचिव बताते हैं कि ''दोनों इकाइयों ने मतदाताओं के एक ही समूह को लक्ष्य करते हुए अपने प्रयासों के लिए अलग-अलग बजट पेश किया था.

आपसी तालमेल से काम करने की बजाए युवक कांग्रेस, एनएसयूआइ और पार्टी के सोशल मीडिया सेल के प्रमुख आपस में कभी-कभार ही बात करते हैं.''

पार्टी के एक राज्यसभा सदस्य ने युवाओं तक पहुंचने के कार्यक्रमों में फीकेपन की बात को पार्टी में 2014 से चल रहे वित्तीय संकट से जोड़ा. उनके मुताबिक, ''हम मोदी की तरह से विपणन वाले ताम-झाम करने की बजाय शांति से काम में लगे हुए हैं.''

ऐसी सांगठनिक दिक्कतों के बावजूद, कांग्रेस ने युवा मतदाता का मन-मिजाज जानने के लिए कई सर्वेक्षण किए हैं और अपने 'शक्ति' ऐप के माध्यम से पार्टी कार्यकर्ताओं से नियमित प्रतिक्रिया भी ले रही है.

कांग्रेस की डेटा एनालिटिक्स टीम के प्रमुख प्रवीण चक्रवर्ती का दावा है कि मोदी सरकार के खिलाफ, खासकर ग्रामीण इलाकों में, युवाओं में भारी असंतोष है.

वे कहते हैं, ''नए सेवा अवसरों का सृजन नहीं हुआ है, जबकि विमुद्रीकरण में लाखों नौकरियां खत्म हो गई हैं. अपने शोध के आधार पर हम जानते हैं कि भारत का युवा क्या सोच रहा है.'' उनकी पार्टी के मुखिया ने भरोसा दिलाया है कि कांग्रेस के पास देश में बढ़ती बेरोजगारी की समस्या का हल है.

राहुल ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा कि ''भारत में रोजगार का गंभीर संकट है, लेकिन नरेंद्र मोदी के पास इससे निपटने की कोई रणनीति नहीं है. कांग्रेस दिखाएगी कि रोजगार कैसे सृजित होता है.''

चक्रवर्ती की टीम राहुल को सूचनाएं देने और युवाओं को आकर्षित करने के लिए उनके संदेशों को अंतिम रूप देने में व्यस्त है तो कांग्रेस के दिग्गज नेता मोदी से सीधी टक्कर ले रहे हैं. इस वर्ष के अपने गणतंत्र दिवस के संबोधन में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के शहरी युवाओं के लिए 'युवा स्वाभिमान योजना' की घोषणा की. कमलनाथ के मुताबिक, ''इस योजना के तहत, युवाओं को 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा.

उन्हें कौशल प्रशिक्षण भी दिया जाएगा. मध्य प्रदेश के इस कांग्रेसी दिग्गज को लगता है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार के एक महीने बाद प्रधानमंत्री की सामान्य श्रेणी में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए नौकरियों और शिक्षा में 10 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा का ऊंची जातियों के गरीब परिवारों के युवाओं ने स्वागत किया है.

राज्य के भोपाल जिले के बीएससी के 20 वर्षीय छात्र आशीष कुमार प्रजापति की इस बात से कमलनाथ की धारणा की पुष्टि होती है कि ''मैं आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य उम्मीदवारों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण देने के कारण भाजपा को वोट दूंगा. मुझे इसका लाभ मिलेगा.''

सामान्य वर्ग के युवाओं को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला भी भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में इस बात की बढ़ती स्वीकृति का परिणाम है कि युवाओं की सबसे बड़ी चिंता रोजगार ही है.

नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) की उस विवादित रिपोर्ट के सामने आने का इससे खराब कोई समय नहीं हो सकता था जिसके मुताबिक 2017-18 में भारत में बेरोजगारी 45 साल के सर्वोच्च स्तर 6.1 प्रतिशत पर थी.

इस रिपोर्ट से नए मतदाताओं को आकृष्ट करने की मोदी की महायोजनाओं की चूलें हिल सकती हैं.

मार्च में गृहमंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति की बैठक में कई सदस्यों ने बेरोजगारी का मसला उठाया और मतदाताओं को यह विश्वास दिलाने की योजना पर चर्चा की कि दोबारा सत्ता में आने पर भाजपा ज्यादा रोजगार अवसरों का सजृन करेगी.

भाजपा का चुनाव घोषणा-पत्र बनाने के काम में शामिल एक केंद्रीय मंत्री का कहना है कि ''हम अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगार अवसरों के सृजन की चर्चा भले करें, लेकिन भारतीय युवा अब भी सरकारी नौकरी पाना चाहता है.

मैं हाल ही में पूर्वोत्तर से हिमाचल तक और वहां से केरल तक घूमा हूं.

इस दौरान मुझे मिले सभी युवाओं ने यही पूछा कि उन्हें सरकारी नौकरी कैसे मिल सकती है.'' सन् 2017 में प्रकाशित एक युवा सर्वेक्षण में भी यह बात सामने आई थी कि 6,000 उत्तरदाताओं में से लगभग 65 प्रतिशत ने सरकारी नौकरी को प्राथमिकता दी थी.

क्षेत्रीय खिलाड़ी

केवल भाजपा और कांग्रेस ही नहीं, छोटे और क्षेत्रीय दल भी मतदाताओं के इस नए समूह के प्रति जागृत हुए हैं. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की युवा शाखा ने महाराष्ट्र के 100 कॉलेजों में जागरूकता अभियान चला कर नए मतदाताओं से उनके मताधिकार के प्रयोग की अपील की थी.

बहुजन समाज पार्टी पहली बार सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हुए युवाओं को दलितों के महान व्यक्तित्वों के बारे में जानकारी और शिक्षा प्रदान कर रही है.

पार्टी अपने संदेशों में यह बताना नहीं भूलती कि उत्तर प्रदेश में उसके 19 में से नौ विधायकों की उम्र 40 साल से कम है.

समाजवादी पार्टी को उम्मीद है कि उसके युवा नेता—अखिलेश यादव (45) और उनकी पत्नी डिंपल यादव (41)—चुनाव में युवाओं को पसंद आएंगे. पार्टी ने पूरे प्रदेश में बूथस्तर पर कार्यकर्ताओं के पंजीकरण का अभियान भी चलाया था.

शिवसेना के युवा नेता आदित्य ठाकरे सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और अक्सर युवाओं के मुद्दे उठाते रहते हैं.

पिछले दिनों पार्टी ने नए मतदाताओं के पंजीकरण को प्रोत्साहित करने के लिए मुंबई के कॉलेज छात्रों के बीच एक प्रतियोगिता की घोषणा की थी.

तृणमूल कांग्रेस से राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने ममता बनर्जी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के बारे में पश्चिम बंगाल के छात्रों के लिए एक प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का प्रारूप तैयार किया है.

ममता ने तृणमूल कांग्रेस की छात्र और युवा इकाइयों के लिए सदस्यता अभियान भी शुरू किया है.

वह लोकसभा चुनाव से पहले सदस्यों की संक्चया मौजूदा की दोगुनी 50 लाख तक पहुंचाना चाहती हैं.

राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) में युवा संपर्क कार्यक्रमों की देखरेख हरियाणा के 35-वर्षीय एमबीए संजय यादव कर रहे हैं.

वे तेजस्वी यादव के करीबी दोस्त हैं. पूर्व चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर, जो अब जनता दल (यूनाइटेड) के उपाध्यक्ष हैं, बिहार में नए मतदाताओं को अपनी पार्टी और सहयोगी भाजपा की ओर आकृष्ट करने के अभियान का संचालन करेंगे.

हालांकि, राजनैतिक दलों के लिए चुनौती यह है कि देश के युवाओं के मुद्दे बहुत सारे और जटिलतापूर्ण हैं.

शहरी और ग्रामीण युवाओं की अलग-अलग प्राथमिकताएं हैं जबकि युवा पुरुष और महिलाएं किसी एक मुद्दे पर एक जैसा नहीं सोचतीं.

मिसाल के तौर पर, ग्रामीण राजस्थान में, 18-वर्षीया पूजा कंवर और 18-वर्षीया संजू कंवर—दोनों विवाहित हैं—भाजपा को वोट देना चाहती हैं क्योंकि उनका ऋण माफ हो गया था, साथ ही उन्हें मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन और एक स्मार्टफोन भी मिला था.

पश्चिम बंगाल में 18-वर्षीया बीएससी छात्रा रीमा प्रामाणिक का कहना है कि वे तृणमूल कांग्रेस को वोट देंगी क्योंकि पार्टी ने उनकी मां को नौकरी दी और उनके पिता के इलाज के साथ-साथ उनके उच्च अध्ययन के लिए भी मदद की.

यह सिर्फ ममता बनर्जी की कन्याश्री योजना नहीं है जिसमें किशोरियों की शिक्षा के लिए नकद मदद मिलती है-अन्य राज्य सरकारों ने भी युवाओं को आकर्षित करने के लिए ऐसी ही योजनाएं तैयार की हैं. नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली बीजेडी सरकार ने 'मू हीरो, मू ओडिशा' जिसमें यंग एचीवर्स को सम्मानित किया जाता है, से लेकर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के 3,016 रु. का मासिक बेरोजगारी भत्ता देने के चुनावी वादे और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू की बेरोजगारों को 1,000  रु. भत्ता देने वाली 'मुख्यमंत्री युवा नेस्तम' जैसी योजनाएं युवाओं को लुभाने के लिए तैयार की गई हैं.

दी सरकार ने भी-बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, प्रधानमंत्री रोजगार प्रोत्साहन योजना, प्रधानमंत्री सुकन्या समृद्धि योजना और प्रधानमंत्री युवा उद्यमिता विकास अभियान जैसी योजनाएं युवाओं की शिक्षा और जीवन संवरण के लिए तैयार की हैं.

अनेक दूसरे कारक जैसे जाति और परिवार का दबाव भी ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान के समय पार्टी के चयन को प्रभावित करते हैं. फिर भी, विभिन्न दल महसूस कर रहे हैं कि चुनावों में प्रभावी कारक के तौर पर जाति का महत्व घट रहा है.

भाजपा महासचिव राम माधव के अनुसार ''जाति-आधारित राजनीति करने वाले दल सिकुड़ रहे हैं. ऐसा नहीं होता तो पिछले लोकसभा चुनावों और फिर विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में भाजपा को भारी बहुमत नहीं मिलता.''

इस बात से कांग्रेस के चक्रवर्ती भी सहमत हैं और उनके अनुसार आज के भारत में यहां तक कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी आर्थिक कारण ही चुनावी निर्णयों को निर्देशित करते हैं.  

जब प्रधानमंत्री चुनने की बात हो तो युवा भी राष्ट्रीय मनस्थिति में ही दिखते हैं. इंडिया टुडे के संवाददाताओं ने जब पहली बार मतदान के लिए तैयार 20 युवाओं से बात की तो केरल को छोड़ कर हर जगह मोदी के समर्थक मिले. केरल और तेलंगाना में राहुल को पहली पसंद बताया गया जबकि ममता बनर्जी और नीतीश कुमार अपने-अपने राज्य के युवाओं की पसंद थे.

यद्यपि 2014 के लोकसभा चुनाव में पहली बार मतदान करने वालों का मतदान-प्रतिशत सभी आयु-वर्गों के औसत मतदान प्रतिशत से अधिक था, फिर भी 2019 में भी ऐसी ही स्थिति के दोहराव की पूर्व-धारणा व्यक्त नहीं की जा सकती.

देश के ज्यादातर युवाओं में अभी भी राजनीति के प्रति अरुचि का भाव है. सीएसडीएस—कोनराड-आडीनोर-स्टिफटंग के 2017 के एक साझा अध्ययन में शामिल 46 प्रतिशत युवाओं ने राजनीति में कोई रुचि न होने की बात कही थी.

निर्वाचन आयोग, सरकारी संस्थाओं और गैर-सरकारी संगठनों के जागरूकता अभियानों के बाद भी बहुत कम युवाओं को पता है कि वे जिस शहर में रहते हुए शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, वहां मतदाता के रूप में पंजीकृत होने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए.

2107 में निर्वाचन आयोग ने फेसबुक के सहयोग से भावी मतदाताओं को मतदाता पंजीकरण के रिमाइंडर भेजे थे. तेरह भारतीय भाषाओं में भेजे इन संदेशों का उद्देश्य था नए मतदाताओं को नेशनल वोटर्स सर्विस पोर्टल तक पहुंचाना जहां से उन्हें पंजीकरण की प्रक्रिया के बारे में जानकारी मिल जाती थी. भारत में लगभग 23 प्रतिशत फेसबुक—प्रयोक्ता 18-23 वर्ष आयु-वर्ग में हैं.

अब गूगल सभी एंड्रायड प्रयोक्ताओं को मतदाता के रूप में पंजीकरण के बारे में याद दिला रहा है. निर्वाचन आयोग ने भी शिक्षकों को कैंपस एंबेसेडर के रूप में नियुक्त करते हुए कॉलेजों में मतदाता पंजीकरण कार्यक्रमों का आयोजन शुरू किया है. जनवरी में निर्वाचन आयोग ने मुंबई के कॉलेजों और स्कूलों में निर्वाचन साक्षरता क्लबों की स्थापना का अभियान शुरू किया. वहां लगभग 2500 संस्थानों ने ऐसे क्लबों की स्थापना की है.

देश जब अब तक के सबसे बड़े चुनावी युद्ध के लिए तैयार हो रहा है तो 'सहस्राब्दी मतदाताओं' को रिझाने के लिए भाजपा के राष्ट्रवादी एजेंडे से लेकर काग्रेस के समावेशन और रोजगार के वादे तक तरह-तरह के हथियारों का इस्तेमाल होगा. अलबत्ता, इन सारी बातों में एक स्वागतयोग्य परिवर्तन निहित है कि युवा तेजी से भारतीय चुनाव का केंद्र बिंदु बन रहे हैं.

साथ में रोहित परिहार, किरण डी. तारे, अमरनाथ के. मेनन,  जीमॉन जैकब, राहुल नरोन्हा, रोमिता दत्ता,  अमिताभ श्रीवास्तव, आशीष मिश्र और सुकांत दीपक

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